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भाग आठवाँ — साठ साल बाद, गुरु-शिष्या

Piyashi Atma · Paranormal · 5 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
8 of 8
Category
Paranormal
Reading time
5 min
Words
863
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस शाम, मानवी ने देशपांडे को गैलरी लाई — बूढ़ा आदमी, लाठी के सहारे, धीरे-धीरे चलता हुआ, और उसके चेहरे पर वो हालत थी जो किसी क़ैदी की होती है जो अपनी क़ब्र की तरफ़ नहीं, अपनी मुक्ति की तरफ़ चल रहा हो। गैलरी का दरवाज़ा उनके लिए खुला — बिना धक्के के, बिना आवाज़ के — और अंदर, उसी धुंधली रोशनी में, वो पेंटिंग लगी थी — 1962 वाली — और पेंटिंग में, वसुंधरा खड़ी थी, उसी खिड़की के पास, उसी मुद्रा में, पर आज उसके चेहरे पर वो अधूरी मुस्कान नहीं थी — आज उसके चेहरे पर वो शांति थी जो किसी के इंतज़ार की आखिरी घड़ी में आती है।

देशपांडे पेंटिंग के सामने खड़े हुए — और बहुत देर तक, बूढ़े आदमी ने कुछ नहीं कहा, बस देखता रहा, और उसकी आँखों से आँसू बहते रहे, और फिर, धीरे-धीरे, उसकी लाठी गिर गई, और वो घुटनों के बल बैठ गया, पेंटिंग के सामने, और उसने अपने हाथ जोड़ लिए, और उसने वो कहा जो उसने साठ साल से नहीं कहा था — "वसुंधरा... मेरी बेटी... तुम्हारी पेंटिंग... तुम्हारी पेंटिंग सुंदर नहीं थी — क्योंकि तुम्हारी पेंटिंग सुंदर शब्द से बहुत ऊपर थी — तुम्हारी पेंटिंग जीवित थी, और मैंने उस जीवित चीज़ को मार दिया, क्योंकि मैं जानता था कि अगर वो जीवित रही, तो दुनिया तुम्हें जानेगी, मुझे नहीं — और मैं... मैं उस बात को सहन नहीं कर सका — मैं एक छोटा आदमी था, वसुंधरा, एक बहुत छोटा आदमी, और मैंने तुम्हें अपनी छोटाई में क़ैद कर दिया — मुझे माफ़ कर देना, बेटी — अगर हो सके तो — क्योंकि मैंने अपनी सज़ा काट ली है, साठ साल, हर रात, हर सपने में — और अब मैं मरने वाला हूँ, और मैं नहीं चाहता कि मैं इस पाप के साथ मरूँ — मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे सामने खड़े होकर, तुम्हारी आँखों में देखकर, तुमसे कहूँ — कि तुम मेरी सबसे बड़ी शिष्या नहीं, तुम मेरी सबसे बड़ी ग़लती हो — और मैंने अपनी ग़लती को सुधारने के लिए साठ साल लगा दिए, पर आज, इस वक़्त, मैं उसे सुधारने आया हूँ — बोलो बेटी, क्या करूँ? बोलो, मैं क्या करूँ कि तुम्हारी मुक्ति हो?"

और तब, गैलरी में, एक हलचल हुई — पेंटिंग की सतह पर, वसुंधरा के चेहरे पर, एक बदलाव उतरा — और उसकी आँखों से, पेंटिंग के अंदर से, आँसू बहने लगे — ऐसे आँसू जो रंगों में घुलकर उन्हें और गहरा बना देते हैं — और वसुंधरा बोली, अपनी असली आवाज़ में, वो आवाज़ जो साठ साल से किसी ने नहीं सुनी थी — "गुरुजी... मैंने साठ साल आपका इंतज़ार किया... और साठ साल में मैंने बहुत कुछ सीखा... मैंने सीखा कि मुझे आपसे बदला नहीं चाहिए था... मुझे तो बस यह सुनना था कि आपने मेरी कला को सराहा... और आज आपने वो कह दिया... और आज मैं जान गई कि मेरी कला मरी नहीं थी... मेरी कला तो आपके अंदर जीवित थी, आपके पश्चाताप में, आपकी सज़ा में... और गुरुजी, अब मैं आपको अपनी आखिरी इच्छा बताती हूँ — मैं चाहती हूँ कि मेरी हड्डियों को उनकी क़ब्र मिले, और मेरी पेंटिंग को उसका असली नाम मिले — 'वसुंधरा — अधूरी नहीं, अमर' — और मैं चाहती हूँ कि आप, अपने बचे हुए दिनों में, उन बच्चों को चित्रकला सिखाएँ, जो आपकी तरह होनहार हैं, पर जिन्हें कोई गुरु नहीं मिला — ताकि आपकी विद्या किसी और वसुंधरा तक पहुँचे, और इस बार, वो विद्या क़ैद नहीं करेगी, वो विद्या उड़ान देगी — क्योंकि कला क़ैद करने के लिए नहीं होती, गुरुजी — कला तो मुक्त करने के लिए होती है, और आज, आपकी इस सच्चाई ने मुझे मुक्त कर दिया — मैं अब जा सकती हूँ, और मैं जाते-जाते आपसे एक बात कहती हूँ — मैंने आपको माफ़ कर दिया था बहुत पहले, पर आपने खुद को आज माफ़ किया है — और यही मेरी असली मुक्ति है, गुरुजी — कि आज, आपने मुझे मेरी मुस्कान लौटा दी, क्योंकि मेरी मुस्कान मेरी पेंटिंग में नहीं, मेरी मुस्कान आपके इस सच में छिपी थी, और आज आपने उसे बोलकर मुझे मुक्त कर दिया।"

और उसी पल, पेंटिंग की सतह पर, एक चमक उतरी — और वसुंधरा के चेहरे पर, पहली बार, साठ साल बाद, एक मुस्कान उतरी — पूरी मुस्कान, दोनों तरफ़ की लकीरों के साथ — और वो मुस्कान इतनी सुंदर थी कि मानवी की आँखों में आँसू आ गए, और रोहन ने अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया, और देशपांडे, घुटनों के बल बैठा हुआ, अपने हाथों में अपना चेहरा छिपाकर रोने लगा — ऐसे रोने लगा जैसे कोई अपनी सबसे बड़ी जीत पर रोता है — और गैलरी की सभी पेंटिंगों में, एक साथ, सभी चेहरे मुस्कुराने लगे, और फिर, धीरे-धीरे, एक-एक करके, सभी पेंटिंगें सामान्य होने लगीं — जैसे उनमें से कुछ निकल रहा हो, कुछ हल्का, कुछ शांत — और आखिरी में, 1962 वाली पेंटिंग भी सामान्य हो गई — बस उसमें वसुंधरा की मुस्कान रह गई, हमेशा के लिए, और उसके नीचे की प्लेट पर, अपने आप, नए शब्द उभर आए — "वसुंधरा कानूनगो — 1940-1962 — अधूरी नहीं, अमर — मुक्त।"

**⏳ सस्पेंस — क्या सब खत्म हो गया...? या गैलरी की किसी और पेंटिंग में अब भी कोई क़ैद है...?**

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