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सेक्सी प्रेत

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

यह शहर रात में अलग तरह से साँस लेता था।
दिन के उजाले में जहाँ लोग अपने काम, अपने झूठ और अपने डर छुपा लेते थे—
वहीं रात होते ही दीवारें सुनने लगती थीं,
खिड़कियाँ देखने लगती थीं,
और हवाएँ…
महसूस कराने लगती थीं।
कबीर ने जब इस शहर में कदम रखा,
तो उसे डर नहीं लगा।
उसे कुतूहल भी नहीं हुआ।
उसे लगा—
जैसे वह यहाँ पहले भी आ चुका हो।

1

पुरानी हवेली शहर के आख़िरी छोर पर थी।
चारों तरफ़ जंगली झाड़ियाँ,
टूटी बाउंड्री,
और लोहे का वो गेट जो बंद होने के बावजूद
आमंत्रण देता था।
कबीर ने बैग कंधे से उतारा।
आसमान में बादल ऐसे जमे थे जैसे किसी रहस्य को ढँकने आए हों।
“यहीं क्यों?”
उसने खुद से पूछा।
जवाब कहीं बाहर नहीं था।
जवाब उसके भीतर था।
कबीर पेशे से खोजी लेखक था।
वो उन कहानियों के पीछे जाता था
जिन्हें समाज अफवाह कहकर दफना देता है।
और इस शहर में पिछले छह महीनों में—
सात मौतें हुई थीं।
सभी पुरुष।
सभी अकेले।
सभी के चेहरे पर—
मौत के बाद भी
एक अजीब-सा संतोष।
और एक ही आख़िरी वाक्य—
“वो बहुत खूबसूरत थी…”

2

हवेली के अंदर कदम रखते ही
कबीर को लगा
जैसे किसी ने उसकी पीठ पर
नज़र रख दी हो।
छत ऊँची थी।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें—
धुँधली, फीकी,
जैसे यादें भी थक जाती हैं।
लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमराईं।
पर उस आवाज़ में डर नहीं था।
उसमें…
कोमलता थी।
“अजीब है,”
कबीर बुदबुदाया,
“यह जगह डराती नहीं…
खींचती है।”
उसने नोटबुक निकाली।
पहला पन्ना खोला।
और वहीं—
बिना सोचे—
उसने लिख दिया:
सेक्सी प्रेत।

3

पहली रात नींद ने कबीर को छुआ नहीं।
बारिश की बूँदें खिड़की से टकरा रही थीं,
पर कमरे के भीतर एक और ही लय थी।
एक महक।
वो महक किसी इत्र की नहीं थी।
वो महक त्वचा पर नहीं बैठती थी—
वो सीधे
स्मृतियों में उतरती थी।
कबीर ने करवट बदली।
दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ थी।
डर से नहीं।
उस एहसास से
जो अनजाना होते हुए भी
बेहद परिचित था।
और तभी—
किसी की उपस्थिति।
न आवाज़।
न परछाईं।
बस…
एक एहसास कि
वह अकेला नहीं है।

4

“कौन है?”
कबीर ने धीमे से पूछा।
कमरे में जवाब नहीं गूँजा।
पर उसकी साँसों का उतार-चढ़ाव बदल गया।
जैसे किसी ने
बहुत क़रीब आकर
कुछ कहा हो—
बिना शब्दों के।
उसने आँखें बंद कर लीं।
और तभी
उसके भीतर
एक तस्वीर उभरी—
लंबे बाल।
अधखुली आँखें।
होठों पर ठहरी मुस्कान।
सुंदर नहीं।
सम्मोहक।
कबीर की उँगलियाँ मुट्ठी में सिमट गईं।
उसका शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था,
पर दिमाग़
इनकार कर रहा था।
“यह असंभव है,”
उसने खुद से कहा।
और उसी पल
उसके कानों के पास
एक बेहद धीमा स्वर—
“असंभव सिर्फ़ वो होता है
जिसे समझा नहीं गया हो…”

5

सुबह कबीर पसीने में डूबा जागा।
कमरा वैसा ही था।
कोई निशान नहीं।
कोई हलचल नहीं।
पर उसकी कलाई पर
अब भी
एक हल्की-सी गरमाहट थी।
जैसे किसी ने
बिना छुए
छू लिया हो।
नीचे आँगन में
हवेली की देखभाल करने वाली
बूढ़ी औरत बैठी थी।
“यहाँ पहले कौन रहता था?”
कबीर ने पूछा।
औरत ने ऊपर देखा।
उसकी आँखों में डर नहीं था।
उसमें चेतावनी थी।
“एक लड़की,”
वो बोली,
“बहुत लोगों को पसंद थी।”
“नाम?”
कबीर ने पूछा।
औरत चुप रही।
फिर बस इतना कहा—
“कुछ नाम
मरने के बाद भी
ज़िंदा रहते हैं।”

6

शाम को कबीर शहर के थाने पहुँचा।
इंस्पेक्टर राघव सिंह
फाइलों में डूबा हुआ था।
“आप उन मौतों पर लिखने आए हैं?”
राघव ने बिना ऊपर देखे कहा।
“मैं सच पर लिखने आया हूँ,”
कबीर बोला।
राघव ने पहली बार नज़र उठाई।
“तो फिर सावधान रहिए,”
उसने कहा,
“क्योंकि यहाँ सच
बहुत आकर्षक है।”
“और ख़तरनाक?”
कबीर ने पूछा।
राघव की आँखें सख़्त हो गईं।
“नहीं,”
वो बोला,
“यहाँ ख़तरनाक लोग हैं।
वो नहीं…”

7

रात को हवेली फिर जागी।
इस बार साया
सिर्फ़ महसूस नहीं हुआ।
वो दिखाई दिया।
कमरे के कोने में
एक स्त्री-आकृति।
स्पष्ट नहीं।
पर बेहद प्रभावशाली।
कबीर बोल नहीं पाया।
वो साया एक क़दम आगे आया।
फिर रुका।
और वही स्वर—
अब और क़रीब—
“मुझसे मत डरो…”
कबीर की साँस अटक गई।
“तुम… कौन हो?”
वो मुश्किल से बोला।
साया मुस्कुराया।
“मैं वो हूँ
जिसे लोग देखना चाहते थे,
पर समझ नहीं पाए…”
कमरे की लाइट काँपी।
और अंधेरा
कबीर के चारों ओर
सघन हो गया।
उस पल
कबीर को एहसास हुआ—
वो इस शहर में
कहानी लिखने नहीं आया।
वो यहाँ
किसी की कहानी पूरी करने आया है।
✒️ भाग एक समाप्त
(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
1 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
743
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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