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सेक्सी प्रेत (2)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
रात दोबारा आई थी,
पर इस बार वह खाली नहीं थी।
कबीर को नींद नहीं आ रही थी—
या शायद नींद उसे आना नहीं चाहती थी।
हवेली की दीवारें अब अजनबी नहीं लग रही थीं।
लकड़ी की फ़र्श से आती हल्की-हल्की आवाज़ें
किसी चाल जैसी नहीं,
साँसों के चलने जैसी लग रही थीं।
उसने घड़ी देखी—
2:17।
ठीक वही वक़्त
जब मन सबसे ज़्यादा असुरक्षित होता है।
1
कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।
ऐसा नहीं था कि तापमान बदला हो—
बदला था एहसास।
कबीर ने सीने पर हाथ रखा।
दिल की धड़कन तेज़ थी,
पर उसमें घबराहट नहीं थी।
उसमें…
अपेक्षा थी।
“तुम फिर आओगी?”
वो खुद से नहीं,
अंधेरे से पूछ रहा था।
जवाब तुरंत नहीं मिला।
पर कुछ पल बाद—
कंधे के पास
एक हल्की-सी ठंडक।
ऐसी ठंडक
जो सिहरन नहीं देती,
जगा देती है।
2
वो दिखाई नहीं दी।
पर कमरे की हर चीज़
उसकी मौजूदगी स्वीकार कर रही थी।
पर्दे बिना हवा के हिले।
मोमबत्ती की लौ
एक पल को स्थिर हो गई।
और फिर—
कबीर के कानों के पास
वही स्वर।
इस बार और साफ़।
“नाम पूछोगे?”
कबीर की साँस अटक गई।
“हाँ,”
वो फुसफुसाया,
“अगर तुम्हें आपत्ति न हो…”
एक हल्की-सी हँसी।
हँसी नहीं—
साँसों की मुस्कान।
“नाम…
तुम्हारे लिए क्या मायने रखता है?”
“नाम से कहानी शुरू होती है,”
कबीर बोला,
“और बिना कहानी के
मैं अधूरा हूँ।”
कमरे में कुछ पल चुप्पी रही।
फिर—
“तो फिर सुनो…”
3
हवेली की दीवारें
मानो पीछे हट गईं।
कबीर की आँखों के सामने
दृश्य बदलने लगा।
एक लड़की—
सफ़ेद साड़ी में नहीं,
सपनों में लिपटी हुई।
लोगों की नज़रें
उस पर ठहरती थीं।
बहुत देर तक।
और हर नज़र
उसे थोड़ा-थोड़ा
कमज़ोर करती थी।
“लोग देखते थे,”
वो स्वर बोला,
“पर समझते नहीं थे।”
“उन्होंने कहा—
तुम बहुत खुली हो।”
कबीर की मुट्ठी भींच गई।
“उन्होंने कहा—
तुम बहुत सुंदर हो।”
उसके गले में कसाव आ गया।
“और फिर एक दिन,”
स्वर धीमा हो गया,
“उन्होंने कहा—
तुम बहुत ज़्यादा हो।”
4
कबीर की आँखों से
नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
“और तुम?”
उसने पूछा,
“तुमने क्या कहा?”
कई पल तक
कोई जवाब नहीं।
फिर—
“मैंने कुछ नहीं कहा।”
“क्यों?”
“क्योंकि उस दिन
मैं बोलती…
तो बच जाती।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया।
वो सन्नाटा डरावना नहीं था।
वो सन्नाटा
न्याय माँग रहा था।
5
सुबह कबीर थाने पहुँचा
बिना सोए।
इंस्पेक्टर राघव सिंह
चाय का कप थामे बैठा था।
“आप ठीक नहीं लग रहे,”
उसने कहा।
“अगर मैं कहूँ—
यह शहर ठीक नहीं है?”
कबीर ने पलटकर पूछा।
राघव ने गहरी नज़र से देखा।
“आप उसे महसूस करने लगे हैं,”
वो बोला।
“किसे?”
कबीर ने पूछा।
राघव ने खिड़की से बाहर देखा।
“उसे…
जिसे लोग
‘सेक्सी प्रेत’ कहते हैं।”
कबीर चौंक गया।
“तो नाम तुमने नहीं रखा?”
उसने पूछा।
राघव की आवाज़ भारी हो गई।
“नहीं,”
वो बोला,
“यह नाम लोगों ने रखा।
जब उन्हें अपनी नज़र का
बोझ सहना पड़ा।”
6
राघव ने एक फ़ाइल आगे बढ़ाई।
तस्वीरें नहीं थीं।
सिर्फ़ बयान थे।
“वो मुझे देख रही थी…”
“मैं भाग नहीं पाया…”
“डर नहीं लगा…
बस अच्छा लगा…”
कबीर ने काग़ज़ बंद कर दिया।
“ये हत्या नहीं हैं,”
वो बोला।
“तो क्या हैं?”
राघव ने पूछा।
कबीर ने धीमे से कहा—
“ये आईने हैं।”
7
रात फिर लौटी।
इस बार
कबीर ने लाइट नहीं जलाई।
“तुम नाराज़ हो?”
उसने अंधेरे से पूछा।
एक हल्की-सी सरसराहट।
“नहीं…”
“फिर दुखी?”
“नहीं…”
“तो?”
कुछ पल बाद
वो स्वर
उसके बिल्कुल पास—
“मैं जाग रही हूँ।”
कबीर की साँस तेज़ हो गई।
“मेरे कारण?”
उसने पूछा।
एक पल की चुप्पी।
फिर—
“तुम पहले इंसान हो
जो मुझे देखना नहीं,
सुनना चाहता है।”
उस पल
कबीर को एहसास हुआ—
वो डर नहीं रहा था।
वो बदल रहा था।
✒️ भाग दो समाप्त
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 2 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 620
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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