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सेक्सी प्रेत (3)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 3 मिनट

कुछ रातें होती हैं
जो सोने नहीं देतीं—
क्योंकि वे
कुछ याद दिलाने आती हैं।
कबीर खिड़की के पास खड़ा था।
बाहर चाँद आधा छुपा हुआ था,
जैसे वह भी
पूरा सच देखने से डर रहा हो।
हवेली के भीतर
आज असामान्य शांति थी।
वो शांति
ख़ाली नहीं थी—
वो ठहरी हुई थी।

1

“तुमने अभी तक
अपना नाम नहीं बताया,”
कबीर ने धीरे से कहा।
कमरे में कोई हलचल नहीं हुई।
पर हवा का बहाव
जैसे रुक गया हो।
फिर वही परिचित एहसास—
पीठ के पीछे
कोई मौजूद है।
“नाम…”
स्वर आया,
“नाम इंसानों के लिए होते हैं।”
कबीर मुड़ा नहीं।
“तो फिर तुम क्या हो?”
उसने पूछा।
कुछ पल चुप्पी।
फिर—
“मैं वो हूँ
जो नाम के बाद भी
बिना नाम के रह जाती है।”

2

कबीर ने कुर्सी खींचकर बैठना चाहा।
पर पैर जवाब नहीं दे रहे थे।
यह डर नहीं था।
यह…
स्वीकार था।
“लोगों ने तुम्हें
‘सेक्सी प्रेत’ कहा,”
कबीर बोला,
“तुम्हें बुरा नहीं लगा?”
कमरे की हवा
अचानक ठंडी हो गई।
“बुरा?”
वो स्वर हल्का-सा हँसा,
“नहीं…
मज़ेदार लगा।”
“कैसे?”
कबीर ने पूछा।
“क्योंकि जब तक मैं ज़िंदा थी,
उन्होंने मुझे और भी नाम दिए थे।”

3

कबीर की आँखों के सामने
दृश्य बनने लगे।
एक कॉलेज।
पुरानी सीढ़ियाँ।
लड़कों की टोलियाँ।
और बीच में—
वो।
हँसती हुई।
खुद में मग्न।
“उन्होंने कहा—
तुम ज़्यादा हँसती हो,”
स्वर बोला।
दृश्य बदला।
एक गली।
शाम का अंधेरा।
“उन्होंने कहा—
तुम देर से घर आती हो।”
फिर—
एक कमरा।
दरवाज़ा बंद।
“उन्होंने कहा—
तुम्हें पता होना चाहिए था।”
कबीर की साँस
तेज़ हो गई।
“और फिर?”
उसने भर्राई आवाज़ में पूछा।

4

कुछ पल
कोई जवाब नहीं।
फिर—
“फिर उन्होंने कहा—
तुम्हारा चरित्र ढीला है।”
कबीर की उँगलियाँ
कुर्सी की लकड़ी में धँस गईं।
“और तुम?”
वो लगभग चीख पड़ा,
“तुमने क्या किया?”
एक लंबी चुप्पी।
फिर—
“मैंने चुप रहना चुना।”
“क्यों?”
कबीर की आँखें नम थीं।
“क्योंकि मैंने सोचा—
चुप्पी मुझे बचा लेगी।”

5

हवेली की दीवारें
मानो काँप गईं।
“पर चुप्पी ने
मुझे मार डाला।”
वो शब्द
हवा में नहीं—
कबीर की छाती में गिरे।
“तुम मरी नहीं,”
कबीर ने कहा,
“तुम यहाँ हो।”
एक हल्की-सी हँसी।
“मैं देह से नहीं मरी,”
स्वर बोला,
“मैं नज़र से मरी।”
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
“तो तुम बदला ले रही हो?”
उसने पूछा।
कुछ पल बाद—
“नहीं…”
“फिर ये मौतें?”
कबीर ने सवाल किया।

6

हवा फिर बदली।
इस बार
उसमें कठोरता थी।
“मैं आईना हूँ,”
स्वर बोला,
“जो देखता है—
वो खुद को देखता है।”
“और जो डर जाता है?”
कबीर ने पूछा।
“वो बच जाता है।”
“और जो नहीं?”
कुछ पल बाद
वो उत्तर आया—
“वो खुद से हार जाता है।”

7

सुबह कबीर शहर के पुराने रिकॉर्ड दफ़्तर पहुँचा।
धूल।
फाइलें।
नाम।
बहुत से नाम।
पर एक नाम
बार-बार कटा हुआ।
एक केस।
संदिग्ध आत्महत्या।
पीड़िता का नाम—
लिखा गया था…
फिर काट दिया गया।
कबीर ने क्लर्क से पूछा।
“इसका नाम क्यों नहीं है?”
क्लर्क ने इधर-उधर देखा।
फिर धीमे से बोला—
“क्योंकि नाम लेने से
शहर को शर्म आती है।”

8

रात को कबीर ने पहली बार
उसे पुकारा।
“अगर नाम नहीं,”
उसने कहा,
“तो क्या मैं तुम्हें
कुछ कहकर बुला सकता हूँ?”
कमरा शांत था।
फिर—
“कहकर देखो…”
कबीर ने गहरी साँस ली।
“छाया,”
उसने कहा,
“क्योंकि तुम
सब पर पड़ती हो—
पर कोई तुम्हें
अपना नहीं मानता।”
कुछ पल
कुछ नहीं हुआ।
फिर
कबीर की हथेली के पास
एक गर्माहट।
और वही स्वर—
इस बार बेहद नरम—
“छाया…”
उस एक शब्द में
न कोई नाम था,
न कोई आरोप।
बस…
पहचान।
✒️ भाग तीन समाप्त
(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
3 of 32
Category
Horror
Reading time
3 min
Words
589
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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