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सेक्सी प्रेत (4)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 3 मिनट

सच कभी अचानक सामने नहीं आता।
वो धीरे-धीरे
इंसान की आदतों में
ज़हर की तरह घुलता है।
कबीर की सुबह
बेचैनी से शुरू हुई।
नींद पूरी नहीं हुई थी,
पर आँखें पूरी तरह खुल चुकी थीं।
हवेली अब उसे डरावनी नहीं लगती थी।
वो उसे
जानती हुई लगती थी।

1

“छाया,”
कबीर ने नाम लिया।
कमरे में कोई उत्तर नहीं आया।
पहली बार
उसका नाम लेने पर
ख़ामोशी मिली।
कबीर का दिल
हल्का-सा बैठ गया।
“क्या मैंने ज़्यादा कर दिया?”
वो खुद से बोला।
उसने खिड़की खोली।
बाहर सुबह थी—
पर उजाला अधूरा।
ठीक उसी तरह
जैसे उसकी समझ।

2

थाने में
इंस्पेक्टर राघव सिंह
पहले से ज़्यादा गंभीर था।
“एक और मौत,”
उसने कहा।
“कैसी?”
कबीर ने तुरंत पूछा।
“शहर के बाहर,”
राघव बोला,
“एक फ़ोटोग्राफ़र।”
“आख़िरी शब्द?”
कबीर ने पूछा।
राघव ने गहरी साँस ली।
“उसने कहा—
‘मैंने उसे देखा…
पर मैंने उसे समझा नहीं।’”
कबीर की आँखें
अपने आप बंद हो गईं।

3

मौके पर
हवा में अजीब-सी ठंडक थी।
लाश ज़मीन पर पड़ी थी।
चेहरे पर वही…
अजीब संतोष।
पर इस बार
कुछ अलग था।
कबीर झुका।
लाश की उँगलियों में
एक कैमरा था।
“इसने कुछ देखा है,”
कबीर बुदबुदाया।
राघव ने कैमरा निकाला।
तस्वीरें खुलीं।
पहली—
एक धुँधली आकृति।
दूसरी—
ज़्यादा साफ़।
तीसरी—
एक स्त्री का चेहरा।
खूबसूरत नहीं।
अपरिहार्य।

4

कबीर की साँस रुक गई।
“ये… वही है,”
उसने कहा।
राघव ने गौर से देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
उसने पूछा।
“क्योंकि उसने
देखा नहीं,”
कबीर बोला,
“उसने कैद किया।”
राघव चुप हो गया।
“जो देखता है,”
कबीर ने कहा,
“वो बच सकता है।
जो कैद करता है—
वो नहीं।”

5

शाम को
कबीर हवेली लौटा।
हवेली आज
ठंडी थी।
“छाया,”
उसने फिर पुकारा।
इस बार
जवाब आया।
पर पहले जैसा नहीं।
“तुम वहाँ गए थे,”
स्वर बोला।
“हाँ,”
कबीर ने कहा,
“मैं सच जानना चाहता था।”
“सच देखने के लिए नहीं होता,”
छाया बोली,
“सच सहने के लिए होता है।”
“क्या तुमने उसे मारा?”
कबीर ने सीधा सवाल किया।
कमरे में
हवा सख़्त हो गई।

6

“मैंने उसे छुआ तक नहीं,”
छाया की आवाज़ में
पहली बार
कड़वाहट थी।
“तो वो मरा कैसे?”
कबीर ने पूछा।
“उसने मुझे
जैसे चीज़ समझा,”
छाया बोली,
“जैसे मैं उसकी तस्वीर हूँ।”
“और तुम?”
कबीर ने पूछा।
“मैं आईना बन गई।”
कबीर की आँखों में
दर्द उतर आया।
“तो हर वो इंसान—
जो तुम्हें ग़लत नज़र से देखे—
मर जाएगा?”
एक लंबी चुप्पी।
फिर—
“नहीं,”
छाया बोली,
“पर हर वो इंसान
अपने सच से टकराएगा।”

7

“और मैं?”
कबीर ने धीरे से पूछा।
कमरा शांत हो गया।
फिर छाया
उसके बेहद क़रीब आई।
इस बार
उसकी मौजूदगी
काँपती हुई थी।
“तुम देखना चाहते हो,”
वो बोली,
“या समझना?”
कबीर ने आँखें बंद कीं।
“समझना,”
उसने कहा।
कुछ पल बाद—
“तो फिर
मुझे रोकने की कोशिश मत करना,”
छाया बोली,
“क्योंकि मैं अब
रुकने वाली नहीं हूँ।”

8

उस रात
कबीर ने पहली बार
डर महसूस किया।
छाया से नहीं—
उस सच्चाई से
जो शहर के हर आदमी में
छुपी थी।
और उस सवाल से—
अगर छाया सही है,
तो क्या उसे
रोका जाना चाहिए?
या
सुना जाना चाहिए?
✒️ भाग चार समाप्त
(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
4 of 32
Category
Horror
Reading time
3 min
Words
516
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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