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सेक्सी प्रेत (5)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 3 मिनट

कुछ रातें होती हैं
जो बीत तो जाती हैं,
पर कभी खत्म नहीं होतीं।
कबीर उस रात सोया नहीं।
हवेली की छत को घूरते हुए
वो बस एक ही बात सोचता रहा—
अगर छाया सच है,
तो यह शहर झूठ पर खड़ा है।

1

“तुमने कहा था—
अगर मैं समझना चाहता हूँ,
तो तुम्हें रोकने की कोशिश न करूँ,”
कबीर ने अंधेरे से कहा।
आज छाया ने
ख़ुद को छुपाया नहीं।
कमरे के बीच
हल्की-सी धुँध थी।
और धुँध के भीतर—
एक आकृति।
पूरी नहीं।
पर पर्याप्त।
“समझना दर्द देता है,”
छाया बोली,
“और तुम अभी भी
दर्द को शब्दों में ढालना चाहते हो।”
“क्योंकि शब्द ही मेरे हथियार हैं,”
कबीर ने कहा।
छाया कुछ पल चुप रही।
फिर—
“तो सुनो…”

2

(अतीत)
उस रात
बारिश नहीं हो रही थी।
पर हवा भारी थी।
कॉलेज का आख़िरी साल।
शहर छोटा था—
और नज़रें बड़ी।
छाया
उस वक़्त
सिर्फ़ एक लड़की थी।
नाम था—
नंदिनी।
“बहुत हँसती है,”
लोग कहते थे।
“ध्यान खींचती है,”
वो जोड़ते थे।
नंदिनी
सिर्फ़ ज़िंदा रहना जानती थी।

3

उस रात
वो देर से लौटी थी।
गलती यही थी।
गली सुनसान थी।
पर नज़रें नहीं।
एक आवाज़—
फिर दूसरी।
उसने पलटकर देखा।
पहचान थी।
यही सबसे बड़ा धोखा होता है।
“हम तो बस छोड़ने आए थे,”
किसी ने कहा।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और फिर—
शब्द।
आरोप।
हँसी।

4

“उन्होंने मुझे नहीं छुआ,”
छाया की आवाज़ काँप गई,
“उन्होंने उससे भी बुरा किया।”
“क्या?”
कबीर की आवाज़ टूट रही थी।
“उन्होंने मेरी कहानी
मेरे बिना लिख दी।”
कबीर की आँखों से
आँसू बह निकले।
“और जब दरवाज़ा खुला,”
छाया बोली,
“तो मैं वही थी—
पर सब कुछ बदल चुका था।”

5

सुबह हुई।
नंदिनी घर पहुँची।
माँ की आँखों में
सवाल थे।
पिता की आँखों में
शर्म।
और समाज की आँखों में—
फैसला।
“बात बाहर नहीं जानी चाहिए,”
कहा गया।
“लड़की की इज़्ज़त…”
कहा गया।
नंदिनी चुप रही।
फिर से।

6

“और फिर?”
कबीर फुसफुसाया।
छाया की आवाज़
अब कठोर थी।
“फिर एक रात
मैं छत पर खड़ी थी।”
“नहीं…”
कबीर ने सिर हिलाया।
“मैं कूदी नहीं,”
छाया बोली,
“मुझे धकेला गया।”
कमरे की हवा
जैसे फट गई।
“और अगले दिन,”
छाया ने कहा,
“अख़बार ने लिखा—
‘संवेदनशील लड़की।’”

7

कबीर की मुट्ठियाँ
भींच गईं।
“तो ये जो मौतें हो रही हैं—”
उसने कहा।
“सज़ा नहीं हैं,”
छाया ने बात काटी,
“ये परछाइयाँ हैं।”
“किसकी?”
कबीर ने पूछा।
“उन नज़रों की
जो आज भी
बदलना नहीं चाहतीं।”

8

छाया आगे बढ़ी।
इस बार
कबीर पीछे नहीं हटा।
“मैं बदला नहीं चाहती,”
वो बोली,
“मैं स्वीकार चाहती हूँ।”
“और अगर शहर
तैयार न हुआ?”
कबीर ने पूछा।
छाया की आवाज़
फुसफुसाहट बन गई—
“तो शहर
ख़ुद को देखेगा
हर रात।”

9

उस रात
कबीर ने तय कर लिया—
वो यह कहानी
सिर्फ़ लिखेगा नहीं।
वो इसे
सामने लाएगा।
चाहे इसके लिए
उसे छाया के ख़िलाफ़
क्यों न खड़ा होना पड़े।
और शायद—
यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा थी।
✒️ भाग पाँच समाप्त
(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
5 of 32
Category
Horror
Reading time
3 min
Words
486
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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