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सेक्सी प्रेत (6)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 3 मिनट
कुछ सच ऐसे होते हैं
जिनसे इंसान भागता नहीं—
उन्हें ओढ़ लेता है।
इंस्पेक्टर राघव सिंह
ऐसा ही एक इंसान था।
वो सुबह भी
थाने के उसी कमरे में बैठा था,
जहाँ पिछले पंद्रह सालों से
उसने अपराधों को
फ़ाइलों में बंद किया था।
पर आज
फ़ाइलें उसे देख रही थीं।
1
कबीर बिना बताए
थाने आ गया था।
“आप थके हुए लग रहे हैं,”
राघव ने कहा।
“मैं सोया नहीं,”
कबीर बोला।
“मैं भी,”
राघव ने बिना मुस्कुराए कहा।
कुछ पल की चुप्पी।
फिर कबीर ने सीधा सवाल दागा—
“नंदिनी का केस
आपके वक़्त में बंद हुआ था, है न?”
कमरे की हवा
भारी हो गई।
राघव ने चाय का कप
धीरे से नीचे रखा।
“तुम उसका नाम जानते हो,”
वो बोला।
“क्योंकि आपने उसे
कभी लिखने नहीं दिया,”
कबीर ने कहा।
2
राघव कुर्सी से उठा।
खिड़की के पास गया।
“उस वक़्त मैं नया था,”
वो बोला,
“और सच अकेला था।”
“तो आपने झूठ चुना?”
कबीर ने पूछा।
राघव की आवाज़
भरी हुई थी—
“नहीं…
मैंने चुप्पी चुनी।”
“और चुप्पी ने
एक लड़की को मार दिया,”
कबीर ने कहा।
राघव मुड़ा।
उसकी आँखों में
पहली बार
डर था।
3
“क्या तुम्हें पता है,”
राघव बोला,
“उस रात कितने फोन आए थे?”
“राजनीतिक,”
“सामाजिक,”
“पारिवारिक।”
“और हर फोन ने
एक ही बात कही—
‘बात दब जानी चाहिए।’”
कबीर ने दाँत भींचे।
“और आपने दबा दी,”
वो बोला।
“नहीं,”
राघव ने सिर हिलाया,
“बात ने मुझे दबा दिया।”
4
“तो अब?”
कबीर ने पूछा।
राघव हँसा—
कड़वा।
“अब एक प्रेत है,”
वो बोला,
“और एक शहर
जो डरने लगा है।”
“डर बुरा नहीं होता,”
कबीर ने कहा,
“अगर वो बदलना सिखाए।”
राघव ने गहरी साँस ली।
“और अगर वो मारने लगे?”
उसने पूछा।
कबीर ने कुछ नहीं कहा।
5
शाम को
कबीर हवेली लौटा।
आज
छाया ने इंतज़ार नहीं कराया।
वो कमरे के बीच खड़ी थी।
पहली बार
काफ़ी स्पष्ट।
आँखें—
गहरी।
चेहरा—
स्थिर।
“तुमने उससे बात की,”
छाया बोली।
“हाँ,”
कबीर ने कहा।
“और उसने?”
“उसने सच को
देर से देखा,”
कबीर बोला।
छाया की हँसी
धीमी थी।
“देर से देखा गया सच
अक्सर खून माँगता है।”
6
“तुम खून नहीं माँग रही,”
कबीर ने कहा,
“तुम आईना दिखा रही हो।”
छाया आगे बढ़ी।
इस बार
बहुत क़रीब।
“आईना टूट भी सकता है,”
वो बोली।
“तो मुझे तोड़ दो,”
कबीर ने कहा।
छाया रुक गई।
पहली बार
वो हिचकी।
“तुम अलग क्यों हो?”
उसने पूछा।
“क्योंकि मैं
नज़र नहीं हूँ,”
कबीर बोला,
“मैं सुनने आया हूँ।”
7
छाया की आँखों में
कुछ बदल गया।
क्रोध नहीं।
दुख।
“अगर तुम सच लिख दोगे,”
वो बोली,
“तो लोग फिर कहेंगे—
लड़की ने ध्यान खींचा।”
“और अगर न लिखा?”
कबीर ने पूछा।
“तो मैं खिंचाव बन जाऊँगी,”
छाया बोली,
“और खिंचाव
हमेशा जानलेवा होता है।”
कबीर समझ गया—
ये लड़ाई
छाया और शहर के बीच नहीं थी।
ये लड़ाई
कहानी और चुप्पी के बीच थी।
8
उस रात
कबीर ने लिखना शुरू किया।
पहली लाइन—
“यह कहानी एक प्रेत की नहीं,
एक समाज की है
जिसने अपनी सुविधा के लिए
एक लड़की को
मरने दिया।”
कलम रुकी नहीं।
और हवेली की दीवारों पर
पहली बार
ख़ामोशी
हल्की पड़ने लगी।
✒️ भाग छह समाप्त
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 6 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 3 min
- Words
- 523
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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