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सेक्सी प्रेत (7)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 3 मिनट

कहानी लिखना आसान होता है।
उसे दुनिया के सामने रखना कठिन।
क्योंकि शब्द
सिर्फ़ काग़ज़ नहीं काटते—
वे चेहरों से नक़ाब भी उतारते हैं।
और शहर
नक़ाब खोना पसंद नहीं करता।

सुबह पाँच बजे तक
कबीर लिखता रहा।
टेबल पर कॉफी के तीन खाली कप,
आँखों के नीचे काले घेरे,
पर उँगलियाँ रुकी नहीं।
हर वाक्य
जैसे किसी दबे ज़ख्म को
खुरच रहा था।
उसने पहली बार
नंदिनी का नाम
पूरे आत्मविश्वास से लिखा।
बिना डर।
बिना हिचक।
नंदिनी।
नाम लिखते ही
कमरे की हवा बदल गई।
जैसे हवेली ने
गहरी साँस ली हो।

“तुम सच में लिख रहे हो…”
पीछे से स्वर आया।
कबीर मुड़ा।
छाया खड़ी थी।
आज उसकी आकृति
पहले से ज़्यादा स्पष्ट थी।
चेहरा अब धुँधला नहीं था।
आँखें…
गहरी और जीवित।
“हाँ,”
कबीर बोला,
“अगर तुम्हें वापस लाना है,
तो तुम्हारा नाम ज़िंदा करना होगा।”
छाया ने उसे लंबे समय तक देखा।
“नाम ज़िंदा होते हैं
तो नफ़रत भी ज़िंदा होती है,”
वो बोली।
“डर कर नाम मिटा देना
सबसे बड़ा अपराध है,”
कबीर ने जवाब दिया।

दोपहर तक
लेख ऑनलाइन चला गया।
शीर्षक—
“सेक्सी प्रेत नहीं… नंदिनी”
पहले दस मिनट—
कुछ नहीं।
फिर—
फोन बजने लगे।
मैसेज।
नोटिफिकेशन।
कॉल।
“ये क्या लिख दिया?”
“साबित कर सकते हो?”
“तुम्हें पता है किसके ख़िलाफ़ जा रहे हो?”
कबीर मुस्कुराया।
सच हमेशा
पहले ग़ुस्सा जगाता है।

थाने में
राघव ने लेख पढ़ा।
हर लाइन
उसकी साँस भारी कर रही थी।
नंदिनी का नाम देखकर
उसने आँखें बंद कर लीं।
“तुमने आग लगा दी,”
उसने कबीर को फोन पर कहा।
“आग पहले से थी,”
कबीर बोला,
“मैंने बस धुआँ हटाया है।”
राघव चुप रहा।
“तुम्हें समझ नहीं है,”
वो बोला,
“कुछ लोग ये बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
“उन्हें करना पड़ेगा,”
कबीर ने कहा।

शाम होते-होते
शहर में अजीब हलचल थी।
कुछ लोग
नंदिनी के घर के बाहर मोमबत्तियाँ रख रहे थे।
कुछ लोग
कह रहे थे—
“पुरानी बातों को क्यों उखाड़ना?”
कुछ लोग
गालियाँ दे रहे थे।
और कुछ लोग—
डर रहे थे।

रात को हवेली में
तूफ़ान-सा माहौल था।
खिड़कियाँ अपने आप हिल रही थीं।
छाया बेचैन थी।
“तुमने सबको जगा दिया,”
वो बोली।
“यही तो चाहिए था,”
कबीर ने कहा।
“नहीं…”
उसकी आवाज़ काँपी,
“अब वो मुझे फिर से मारेंगे।”
कबीर आगे बढ़ा।
“इस बार नहीं,”
उसने कहा,
“इस बार तुम अकेली नहीं हो।”

अचानक—
कबीर के फोन पर मैसेज आया।
एक और मौत।
नाम देखकर
उसका दिल रुक गया।
वो उन्हीं लड़कों में से एक था
जो नंदिनी वाली रात
मौजूद थे।
राघव का कॉल आया।
“वो घर में अकेला था,”
राघव बोला,
“दरवाज़ा अंदर से बंद…
और चेहरा—”
“संतोष?”
कबीर ने पूछा।
“नहीं,”
राघव बोला,
“इस बार डर।”

कबीर ने धीरे से
छाया की ओर देखा।
“तुमने?”
उसने पूछा।
छाया चुप रही।
उसकी आँखों में
दर्द था।
“मैंने उसे छुआ भी नहीं,”
वो बोली,
“पर वो मुझे देखकर भागा…
बहुत भागा…”
“फिर?”
कबीर ने पूछा।
“अपने डर से गिर पड़ा।”
कमरा शांत हो गया।

कबीर समझ गया—
अब मामला बदल चुका था।
पहले लोग
आकर्षण में मर रहे थे।
अब लोग
गिल्ट में मर रहे थे।
और गिल्ट
किसी भी प्रेत से ज़्यादा खतरनाक होता है।

“तुम्हें रोकना पड़ेगा,”
राघव ने फोन पर कहा।
“किसे?”
कबीर ने पूछा।
“उसे… या खुद को,”
राघव बोला,
“वरना शहर जल जाएगा।”
कबीर ने फोन काट दिया।
पीछे छाया खड़ी थी।
दोनों की नज़रें मिलीं।
और पहली बार—
उनके बीच
टकराव साफ़ दिखाई दिया।

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
7 of 32
Category
Horror
Reading time
3 min
Words
557
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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