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सेक्सी प्रेत (8)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

शहर जब डरता है
तो दो काम करता है—
या तो दरवाज़े बंद कर लेता है,
या मशालें उठा लेता है।
और इस शहर ने
दूसरा रास्ता चुना था।

सुबह की हवा भारी थी।
कबीर ने खिड़की खोली तो बाहर असामान्य हलचल थी।
लोग समूहों में खड़े बातें कर रहे थे।
कुछ चेहरों पर ग़ुस्सा,
कुछ पर जिज्ञासा,
कुछ पर वही पुराना…
नैतिक न्याय का नशा।
उसका लेख अब वायरल हो चुका था।
हर मोबाइल में वही हेडलाइन—
“सेक्सी प्रेत नहीं… नंदिनी”
नाम अब छुपा नहीं था।
और नाम का खुलना
कई लोगों के लिए
खतरा बन गया था।

फोन लगातार बज रहा था।
एक पत्रकार—
“आपको धमकी मिल रही है?”
एक अजनबी—
“पुरानी बातें क्यों खोद रहे हो?”
एक महिला—
“धन्यवाद… किसी ने तो उसका नाम लिया…”
कबीर हर आवाज़ सुन रहा था।
पर उसके कान
किसी और आवाज़ को ढूँढ रहे थे।
छाया की।
आज सुबह से
वो चुप थी।
असामान्य रूप से चुप।

हवेली में अजीब-सी खालीपन थी।
पहले जहाँ हल्की महक रहती थी,
आज सिर्फ़ धूल थी।
“छाया…”
कबीर ने पुकारा।
कोई जवाब नहीं।
“नंदिनी…”
फिर भी नहीं।
उसका दिल
अनजाने डर से भर गया।
“तुम नाराज़ हो?”
उसने धीमे से कहा।
कुछ पल बाद
हवा हल्की-सी काँपी।
पर वो नहीं आई।

थाने में
राघव के चेहरे पर तनाव साफ़ था।
“स्थिति खराब है,”
वो बोला।
“कितनी खराब?”
कबीर ने पूछा।
“लोग इकट्ठा हो रहे हैं,”
राघव बोला,
“कुछ कह रहे हैं— प्रेत को पकड़ो।
कुछ कह रहे हैं— ये सब झूठ है।
और कुछ…”
“कुछ?”
कबीर ने पूछा।
“कुछ लोग
अपने नाम मिटाना चाहते हैं,”
राघव ने धीमे से कहा।
कबीर समझ गया।
गुनहगार
सच से ज़्यादा
गवाहों से डरते हैं।

“तुम्हें शहर छोड़ देना चाहिए,”
राघव बोला।
कबीर हँसा।
“और कहानी अधूरी छोड़ दूँ?”
“ये कहानी नहीं— आग है,”
राघव चिल्लाया,
“तुम समझ क्यों नहीं रहे?”
“क्योंकि अगर मैं चला गया,”
कबीर बोला,
“तो वो फिर से ‘सेक्सी प्रेत’ बन जाएगी।
नंदिनी नहीं।”
राघव चुप हो गया।

शाम होते-होते
भीड़ सच में इकट्ठा होने लगी।
कुछ हाथों में डंडे।
कुछ में टॉर्च।
कुछ में मोबाइल कैमरे।
लोग डर से ज़्यादा
उत्साह में थे।
जैसे किसी शिकार पर निकले हों।
“आज देखते हैं कौन है वो,”
कोई बोला।
“नाटक है सब,”
दूसरा बोला।
“अगर सच में है— पकड़ेंगे,”
तीसरा बोला।
कबीर की रूह काँप गई।
लोगों को
हमेशा किसी को दोषी बनाना पसंद होता है।

हवेली की ओर बढ़ती भीड़
दूर से दिखाई दे रही थी।
मशालों की रोशनी
अँधेरे को काट रही थी।
कबीर दरवाज़े पर खड़ा था।
दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
“छाया…”
उसने आख़िरी बार पुकारा।
और तभी—
पीछे से
ठंडी हवा का तेज़ झोंका।
वो आ गई थी।

आज छाया अलग थी।
उसकी आकृति पहले से गहरी।
आँखों में दर्द नहीं—
क्रोध।
“उन्होंने तुम्हें डरा दिया,”
कबीर बोला।
“नहीं,”
वो बोली,
“उन्होंने मुझे याद दिला दिया।”
“क्या?”
“वही रात…
वही भीड़…
वही फैसले।”
कबीर ने उसके करीब आकर कहा—
“इस बार अलग है।
इस बार मैं हूँ।”
छाया ने उसे देखा।
“तुम भी इंसान हो,”
वो बोली,
“और इंसान
भीड़ में बदलते देर नहीं लगाते।”

बाहर शोर बढ़ गया।
“यहीं है वो हवेली!”
“अंदर कोई है!”
“निकालो!”
पत्थर खिड़की से टकराया।
काँच टूट गया।
कबीर का दिल बैठ गया।
“तुम्हें जाना होगा,”
छाया बोली।
“नहीं,”
कबीर ने कहा।
“अगर तुम रहे—
तो वो तुम्हें मार देंगे।”
“अगर मैं गया—
तो वो तुम्हें राक्षस बना देंगे,”
कबीर बोला।
दोनों चुप।

भीड़ गेट तोड़कर अंदर आ गई।
मशालें।
चीखें।
गालियाँ।
“कहाँ है प्रेत?”
“नाटकबाज़!”
“वीडियो बनाओ!”
कबीर आगे बढ़ा।
“कोई प्रेत नहीं है!”
वो चिल्लाया।
“ये सब इंसानों का अपराध है!”
भीड़ हँसी।
“हट जा लेखक!”
किसी ने धक्का दिया।
कबीर गिर पड़ा।

उसी पल—
हवा अचानक जम गई।
मशालें काँपने लगीं।
लोग रुक गए।
और फिर—
छाया उनके बीच खड़ी थी।
पूरी।
स्पष्ट।
सुंदर नहीं।
भयावह भी नहीं।
बस…
अपरिहार्य।

भीड़ पीछे हटी।
“वो… वो है…”
“सच में…”
कुछ लोग भागे।
कुछ जम गए।
एक आदमी—
वही जो उस रात शामिल था—
घुटनों पर गिर पड़ा।
“माफ़ कर दो…”
वो रोने लगा।
छाया ने उसे देखा।
बस देखा।
आदमी काँपने लगा।
अपनी ही साँसों से डरकर
बेहोश हो गया।

कबीर खड़ा हुआ।
“बस!”
वो चिल्लाया।
“ये बदला नहीं—
सच है!”
भीड़ उसकी ओर देखने लगी।
“तुम लोग उससे नहीं—
खुद से डर रहे हो!”
चुप्पी।
भारी चुप्पी।

छाया ने कबीर की ओर देखा।
“तुम्हें डर नहीं लगता?”
कबीर मुस्कुराया।
“लगता है,”
वो बोला,
“पर तुमसे नहीं।
उनसे…
जो ज़िंदा होकर भी इंसान नहीं।”
छाया की आँखें
पहली बार नरम पड़ीं।

भीड़ धीरे-धीरे हटने लगी।
कोई चिल्लाया नहीं।
कोई पत्थर नहीं फेंका।
सिर्फ़ सन्नाटा।
हवेली फिर शांत हो गई।
कबीर ने छाया से पूछा—
“अब क्या?”
छाया ने आसमान की ओर देखा।
“अब वो डरेंगे…
और डर कभी-कभी बदलाव लाता है।”
“और तुम?”
कबीर ने पूछा।
छाया मुस्कुराई—
“मैं अभी गई नहीं हूँ।”

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
8 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
793
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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