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सेक्सी प्रेत (9)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 5 मिनट
रात गुजर चुकी थी।
पर शहर अभी भी सोया नहीं था।
सुबह की पहली रोशनी आई,
लेकिन अँधेरा गया नहीं।
क्योंकि
अँधेरा अब आसमान में नहीं,
लोगों के दिमाग़ में था।
हर मोबाइल स्क्रीन पर एक ही वीडियो चल रहा था—
धुंधली फुटेज…
हवेली…
भागती भीड़…
और बीच में…
एक औरत।
सफ़ेद, धुँधली, पर साफ़।
कोई चीख रहा था—
“प्रेत है!”
कोई कह रहा था—
“एडिटिंग है!”
कोई लिख रहा था—
“भूत नहीं, सच है।”
शहर दो हिस्सों में बँट चुका था।
विश्वास बनाम तर्क।
डर बनाम अपराधबोध।
और इस सबके बीच—
कबीर।
दरवाज़े पर तेज़ दस्तक हुई।
ठक-ठक-ठक!
“दरवाज़ा खोलिए!”
कबीर ने खोला।
सामने चार पुलिस वाले।
बीच में राघव।
लेकिन आज उसका चेहरा दोस्त का नहीं—
अधिकारी का था।
“तुम्हें थाने चलना होगा,”
उसने औपचारिक आवाज़ में कहा।
“क्यों?”
कबीर ने शांत स्वर में पूछा।
“पब्लिक डिस्टर्बेंस, अफवाह फैलाना,
और… अलौकिक घटनाओं से भीड़ भड़काना।”
कबीर हँस पड़ा।
“तो अब सच बोलना भी अपराध है?”
राघव ने धीरे से कहा—
“ऊपर से ऑर्डर है।”
जीप में बैठते समय
कबीर ने पीछे मुड़कर हवेली देखी।
खिड़की के परदे हल्के-से हिले।
वो जान गया।
छाया देख रही है।
उसे अजीब सुकून मिला।
जैसे कोई कह रहा हो—
डरो मत… मैं हूँ।
थाने के बाहर मीडिया।
माइक।
कैमरे।
“क्या आपने भूत की कहानी गढ़ी?”
“क्या ये पब्लिसिटी स्टंट है?”
“क्या आप मानसिक रूप से अस्थिर हैं?”
कबीर मुस्कुराता रहा।
उसे एहसास हुआ—
लोगों को सच से ज़्यादा
तमाशा पसंद है।
पूछताछ कक्ष।
एक टेबल।
तीन कुर्सियाँ।
पीली ट्यूब लाइट।
राघव के साथ एक और आदमी बैठा था।
सूट में।
ठंडी आँखें।
“मैं डीएसपी त्रिपाठी,”
उसने कहा।
“आप लेखक हैं?”
“हाँ।”
“और आप दावा करते हैं कि एक मृत स्त्री की आत्मा से बात करते हैं?”
कबीर ने सीधा जवाब दिया—
“मैं दावा करता हूँ कि एक मरी हुई औरत के साथ अन्याय हुआ था।”
त्रिपाठी मुस्कुराया।
“कानून भावनाओं से नहीं चलता।”
“पर अपराध भावनाओं से होते हैं,”
कबीर बोला।
फाइल टेबल पर पटकी गई।
पुरानी रिपोर्ट्स।
तस्वीरें।
पोस्टमार्टम।
“देखिए,”
त्रिपाठी बोला,
“उसकी मौत आत्महत्या थी। केस बंद।”
“ये रिपोर्ट झूठी है,”
कबीर ने कहा।
“साबित कीजिए।”
चुप्पी।
कानून कागज़ माँगता है।
सच सिर्फ़ यादें देता है।
उसी वक्त—
थाने की लाइट टिमटिमाई।
राघव ने ऊपर देखा।
“वायरिंग खराब है क्या?”
फिर अचानक—
कमरे में ठंड बढ़ गई।
एसी बंद था।
फिर भी साँस से धुआँ निकल रहा था।
त्रिपाठी ने हाथ रगड़ा।
“ये क्या—”
कबीर मुस्कुराया।
“आप कानून की बात कर रहे थे ना…”
“कभी-कभी
गवाह कागज़ पर नहीं आते।”
पीछे की दीवार पर लगी फाइलें
अपने आप गिर गईं।
धड़ाम!
दरवाज़ा खुद-ब-खुद बंद।
हवा घूमी।
कागज़ उड़ने लगे।
त्रिपाठी पहली बार घबराया।
“ये क्या मज़ाक है?!”
और फिर—
टेबल पर रखी एक पुरानी फोटो
सीधे उसके सामने आकर गिर पड़ी।
नंदिनी की तस्वीर।
पोस्टमार्टम वाली।
गर्दन पर उँगलियों के निशान साफ़।
त्रिपाठी की आँखें फैल गईं।
राघव ने फोटो उठाई।
“ये तो… पहले नहीं था…”
कबीर ने धीरे से कहा—
“सच कभी-कभी खुद पेशी पर आ जाता है।”
अचानक दरवाज़ा खुला।
एक कॉन्स्टेबल हाँफता हुआ आया।
“सर… बाहर…”
“क्या हुआ?”
“सीसीटीवी में… कोई दिख रहा है…”
“कौन?”
“कोई… औरत…”
सभी कंट्रोल रूम में पहुँचे।
स्क्रीन पर थाने का कॉरिडोर।
खाली।
फिर—
धीरे-धीरे धुँध।
और उसमें एक आकृति।
सफ़ेद।
चलती हुई।
कैमरे की ओर देखती हुई।
फिर गायब।
पूरे कमरे में सन्नाटा।
त्रिपाठी के होंठ सूख गए।
“ये… एडिटिंग है…”
राघव बोला—
“सर, ये लाइव फीड है।”
त्रिपाठी ने कबीर को देखा।
पहली बार उसमें तिरस्कार नहीं था।
डर था।
“वो… तुम्हारे साथ है?”
कबीर ने कहा—
“नहीं।
मैं उसके साथ हूँ।”
शाम तक
पूरे थाने में चर्चा।
“सच में भूत है।”
“नहीं, कुछ टेक्निकल होगा।”
“लेकिन कैमरा…”
डर
तर्क को धीरे-धीरे खा रहा था।
कबीर समझ गया—
आज कानून भी असहाय है।
रात को राघव ने चुपके से लॉकअप खोला।
“चलो।”
“छोड़ रहे हो?”
कबीर ने पूछा।
“ऑफिशियली नहीं,”
वो बोला,
“पर मैं जानता हूँ तुम अपराधी नहीं।”
“और वो?”
कबीर ने पूछा।
राघव बोला—
“अगर वो सच में है…
तो शायद वो हमसे ज़्यादा इंसाफ़ समझती है।”
हवेली लौटते समय
चाँद पूरा था।
हवा शांत।
जैसे शहर थक चुका हो।
कबीर अंदर गया।
“छाया…”
वो आई।
धीरे-धीरे।
आज उसकी आँखों में क्रोध नहीं।
थकान थी।
“तुम थाने आई थीं?”
कबीर ने पूछा।
वो हल्का मुस्कुराई।
“कानून को याद दिलाना था…
कि मैं अभी खत्म नहीं हुई।”
“तुम डराती क्यों हो उन्हें?”
“मैं नहीं डराती,”
वो बोली,
“उनके अपराध डराते हैं।”
कबीर उसके सामने खड़ा था।
“अगर कानून तुम्हें इंसाफ़ नहीं देगा…
तो क्या करोगी?”
छाया ने उसकी आँखों में देखा।
बहुत गहराई से।
फुसफुसाई—
“फिर आत्मा खुद फैसला करेगी।”
हवा अचानक ठंडी हो गई।
दूर कहीं सायरन बजा।
और उसी समय—
कबीर का फोन बजा।
राघव की आवाज़ काँप रही थी—
“कबीर…
उन पाँच लोगों में से एक…
जो उस रात शामिल थे…”
“क्या हुआ?”
“वो… अपने कमरे में…
मरा मिला है।”
“कैसे?”
राघव फुसफुसाया—
“चेहरे पर मुस्कान थी…”
“और कमरे में…
इत्र की वही महक…”
कबीर धीरे से मुड़ा।
छाया खिड़की के पास खड़ी थी।
चाँदनी उसके आर-पार जा रही थी।
वो बोली—
“कुछ फैसले… अदालत नहीं करती।”
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 9 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 5 min
- Words
- 832
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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