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सेक्सी प्रेत (10)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

सुबह का अख़बार
आज फिर ख़ामोश नहीं था।
पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में खबर थी—
स्थानीय व्यापारी की रहस्यमयी मौत — कमरे में अकेला था, फिर भी चीखें सुनी गईं
नीचे फोटो।
चेहरा ढका हुआ।
पर नाम साफ़ लिखा था—
मनीष खुराना।
कबीर के हाथ अनायास काँप गए।
वही नाम…
राघव की फाइल में था।
वही पाँच लोगों में से एक।
वही आदमी
जिसने उस रात
नंदिनी को “सबक सिखाने” की बात कही थी।

फोन बजा।
राघव।
आवाज़ भारी।
“तुमने खबर देखी?”
“हाँ।”
“ये सामान्य मौत नहीं है,”
राघव बोला,
“दरवाज़ा अंदर से लॉक…
कोई घुसा नहीं…
कोई ज़हर नहीं…
कोई चोट नहीं…”
“फिर?”
“बस… दिल रुक गया।”
चुप्पी।
फिर उसने धीमे से कहा—
“लेकिन एक अजीब बात है…”
“क्या?”
“कमरे में…
महिला इत्र की तेज़ खुशबू थी।”

कबीर ने धीरे से हवेली की ओर देखा।
ऊपर की खिड़की में परदा हिला।
उसके होंठ सूख गए।
“छाया…”
उसने बुदबुदाया।
उसके भीतर
एक साथ दो भाव उठे—
सुकून।
और डर।

शाम को वो सीधे मनीष के घर पहुँचा।
बड़ा बंगला।
बाहर पुलिस।
भीड़।
फुसफुसाहटें।
“भूत ने मारा…”
“पाप का फल…”
“कुछ तो गड़बड़ है…”
कबीर अंदर गया।
राघव इंतज़ार कर रहा था।

कमरा बंद था।
दरवाज़ा खोला गया।
अंदर घुटी हुई हवा।
पर वही महक…
हल्की, मीठी, पहचान में आने वाली।
जैसे किसी ने अभी-अभी
गुलाब और चंदन मिलाकर हवा में छोड़ दिया हो।
कबीर का दिल तेज़ धड़कने लगा।
वो महक
उसे अच्छी तरह पहचान थी।

बिस्तर पर मनीष पड़ा था।
आँखें खुली।
चेहरे पर…
अजीब मुस्कान।
डर नहीं।
पीड़ा नहीं।
बल्कि…
संतोष।
जैसे कोई सपना देख रहा हो।
राघव फुसफुसाया—
“ऐसा एक्सप्रेशन… मैंने सिर्फ़ एक बार देखा था।”
“कहाँ?”
“उस लड़की की पोस्टमार्टम फोटो में…”
दोनों चुप।

टेबल पर एक चीज़ मिली।
पुरानी डायरी।
राघव ने उठाई।
“शायद उसकी पर्सनल होगी।”
कबीर ने पन्ने पलटे।
पहले बिज़नेस नोट्स।
फिर अचानक…
हड़बड़ी में लिखी लाइनें—
“वो फिर आई…”
“सफ़ेद साड़ी…”
“मुझे देखती रही…”
“मैं सो नहीं पा रहा…”
“वो मुस्कुरा रही थी…”
“कहती है — याद है वो रात?”
आखिरी लाइन काँपती लिखावट में—
“मुझे माफ़ कर दो…”
कबीर की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

“ये गिल्ट है,”
राघव बोला।
“या समन,”
कबीर ने कहा।
“क्या मतलब?”
“जैसे अदालत में बुलावा आता है…”
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“वो उसे लेने आई थी।”

उसी समय—
लाइट झपकी।
खिड़की खुद-ब-खुद खुली।
हवा अंदर आई।
परदे उड़ने लगे।
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
राघव ने काँपते हुए कहा—
“फिर वही…”
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
वो जानता था।
वो यहाँ है।

उसे हल्की फुसफुसाहट सुनाई दी।
कोई और नहीं सुन पा रहा था।
सिर्फ़ वो।
“कबीर…”
उसकी आवाज़।
नरम।
पर गहरी।
“तुमने…?”
उसने मन में पूछा।
जवाब आया—
“मैंने उसे छुआ भी नहीं।”
“फिर वो मरा कैसे?”
“उसका डर…
उसकी यादें…
उसकी आत्मा खुद उसे ले गई।”
कबीर समझ गया।
वो मारती नहीं।
सच का सामना कराती है।
और कुछ लोग
सच झेल नहीं पाते।

बाहर भीड़ बढ़ रही थी।
लोग मोबाइल से फोटो ले रहे थे।
“भूत का केस है!”
“उस हवेली वाली औरत!”
“वो लेखक भी शामिल है!”
राघव ने कबीर को देखा—
“अब ये सिर्फ़ हत्या नहीं…
पैनिक बन जाएगा।”
“कानून क्या करेगा?”
कबीर ने पूछा।
राघव हँसा—
“भूत को गिरफ्तार?”

रात को हवेली लौटते समय
आसमान बादलों से घिरा था।
बिजली चमक रही थी।
जैसे मौसम भी बेचैन हो।
कबीर अंदर गया।
आज वो खुद इंतज़ार नहीं कर रहा था।
छाया पहले से वहाँ थी।
खिड़की के पास।
चाँदनी में।

“तुमने उसे डराया?”
कबीर ने पूछा।
वो मुस्कुराई।
“मैंने सिर्फ़ याद दिलाया।”
“क्या तुम सबको ऐसे ही…?”
“मैं सज़ा नहीं देती,”
वो बोली,
“मैं आईना दिखाती हूँ।”
“और अगर कोई आईना देखकर मर जाए?”
छाया ने उसकी आँखों में देखा—
“तो वो पहले से मरा हुआ था।”

कबीर के भीतर उथल-पुथल थी।
“पर ये रास्ता सही है?”
वो बोला।
“ये न्याय है… या बदला?”
कुछ पल वो चुप रही।
फिर धीरे से बोली—
“जब कानून सो जाए…
तो आत्माएँ जागती हैं।”
“और अगर तुम खुद राक्षस बन गई तो?”
छाया पहली बार काँपी।
उसकी आँखों में दर्द आया।
“तभी तो तुम हो…”
“मैं?”
“मुझे याद दिलाने के लिए
कि मैं इंसान थी।”

अचानक—
कबीर का फोन बजा।
राघव।
घबराई आवाज़।
“कबीर… दूसरा आदमी…”
“क्या हुआ?”
“हॉस्पिटल में भर्ती है…
चिल्ला रहा है—
‘वो मुझे बुला रही है… सफ़ेद औरत…’”
कबीर की नज़र धीरे से छाया पर गई।
वो खिड़की से बाहर देख रही थी।
शहर की ओर।
जैसे कोई सूची बना रही हो।
जैसे किसी अदालत की अगली तारीख तय हो रही हो।
उसने बिना उसकी ओर देखे कहा—
“पहला फैसला हो चुका है…”
हल्की हवा चली।
इत्र की वही महक फैली।
“अब अगली पेशी है।”

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
10 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
768
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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