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सेक्सी प्रेत (11)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

रातें हमेशा लंबी नहीं होतीं।
पर
जिसे नींद न आए…
उसके लिए
एक-एक मिनट भी
सज़ा बन जाता है।
और आज
शहर के पाँच लोगों के लिए
रात सज़ा बनने वाली थी।

हवेली के बरामदे में
कबीर अकेला बैठा था।
टेबल पर फाइलें फैली थीं।
पुराने अख़बार।
एफआईआर कॉपी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट।
नामों की सूची।
पाँच में से—
एक मर चुका।
एक अस्पताल में।
तीन बाकी।
उसने धीरे से नाम पढ़े।
जैसे कोई हाज़िरी ले रहा हो।
“सुरेश मल्होत्रा…”
“देव अग्रवाल…”
“अमित त्यागी…”
हर नाम के साथ
उसे छाया का चेहरा याद आ रहा था।
दर्द।
अपमान।
घुटन।
और एक सवाल—
क्या न्याय ऐसा ही दिखता है?

“तुम डर रहे हो।”
आवाज़ पीछे से आई।
वो मुड़ा।
छाया।
आज वह पास खड़ी थी।
बहुत पास।
इतनी कि उसकी ठंडी उपस्थिति
त्वचा पर महसूस हो रही थी।
“हाँ,”
कबीर ने सच कहा।
“मुझसे?”
“नहीं…
तुम्हारे अंदर जो बदल रहा है, उससे।”

वो कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
“मैं बदल नहीं रही…
मैं याद कर रही हूँ।”
“क्या?”
“वो रात।”
उसकी आँखों में धुंध उतर आई।
हवा भारी हो गई।
कबीर ने पहली बार महसूस किया—
आज वो सिर्फ़ प्रेत नहीं…
गवाह है।

(फ्लैशबैक – छाया की स्मृति)
बारिश।
खाली सड़क।
हँसी।
नशे की बदबू।
चार परछाइयाँ।
एक लड़की भागती हुई।
“रुको!”
“इतनी भी क्या जल्दी है…”
हाथ पकड़ना।
कपड़े फटना।
चीख।
मुँह दबा देना।
आसमान देखती आँखें।
और एक आवाज़—
“चुप रह… बहुत ‘सेक्सी’ बनती है ना…”

कबीर की साँस अटक गई।
“बस…”
उसने कहा।
“और मत याद करो।”
छाया ने उसकी ओर देखा।
आँखों में आँसू नहीं थे।
क्योंकि आँसू
शरीर के साथ चले जाते हैं।
पर दर्द…
दर्द आत्मा में रह जाता है।
“अगर मैं याद नहीं करूँगी,”
वो बोली,
“तो कोई और भी याद नहीं रखेगा।”

उसी समय—
कबीर का फोन बजा।
राघव।
“तीसरा आदमी… सुरेश…”
“क्या हुआ?”
“घर से भागकर थाने आया है। कह रहा है—
कोई औरत उसका पीछा कर रही है।”
“वो तुम हो?”
कबीर ने छाया से पूछा।
वो शांत रही।
फिर बोली—
“मैंने सिर्फ़ उसका नाम लिया था।”

थाने का दृश्य—
सुरेश काँप रहा था।
पसीने में भीगा।
“वो मेरे कमरे में थी!”
“कौन?” राघव चिल्लाया।
“वही… सफ़ेद… बाल खुले…”
“तुमने शराब पी है?”
“नहीं! वो आई… मेरे कान में बोली—
‘याद है मुझे?’”
वो रोने लगा।
“मैंने कुछ नहीं किया… सबने किया… मैंने बस पकड़ा था…”
कमरा सन्न।
राघव ने पहली बार महसूस किया—
ये कबूलनामा है।
बिना पूछताछ।

रात गहराती गई।
शहर के तीन अलग-अलग घरों में—
तीन आदमी जाग रहे थे।
एक कमरे की लाइट जलाकर बैठा।
दूसरा मंदिर में।
तीसरा शराब में डूबा।
पर तीनों को
एक ही चीज़ दिख रही थी—
सफ़ेद साड़ी।

हवेली में—
कबीर बेचैन।
“तुम सबको डराओगी?”
उसने पूछा।
छाया बोली—
“मैं सिर्फ़ दरवाज़ा खटखटाती हूँ।”
“और अगर वो खोल दें?”
“फिर सच अंदर चला जाता है।”
“और अगर वो मर जाएँ?”
वो चुप रही।
चुप्पी ही जवाब थी।

आधी रात।
अचानक—
हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।
हवा तेज़।
परदे उड़ते हुए।
छाया की आकृति धुंधली होने लगी।
“क्या हुआ?”
कबीर चिल्लाया।
वो बोली—
“आज रात… गवाह बोलेंगे…”
“कौन गवाह?”
“उनकी आत्माएँ।”
और वो गायब।

उसी समय—
शहर के तीनों घरों में
अजीब घटनाएँ।
सुरेश के कमरे में आईना खुद टूट गया।
देव को हर शीशे में वही चेहरा दिखा।
अमित को बिस्तर पर किसी के बैठने का एहसास।
और हर जगह—
वही महक।
वही फुसफुसाहट।
“याद है मुझे…”

सुबह—
तीन खबरें।
एक बेहोश।
एक पागलपन की हालत में।
और—
एक गायब।
दरवाज़ा खुला।
कमरा खाली।
सिर्फ़ दीवार पर नाखून से खरोंचा हुआ एक शब्द—
“माफ़ी”

कबीर ने अख़बार बंद किया।
दिल भारी था।
“ये रास्ता खतरनाक है,”
उसने खुद से कहा।
छाया फिर सामने आई।
आज वो थकी लग रही थी।
जैसे हर याद
उसकी ताकत खा रही हो।
“तुम्हें दर्द होता है?”
कबीर ने पूछा।
वो मुस्कुराई।
“आत्माएँ भी थकती हैं।”

कबीर उसके करीब आया।
पहली बार उसने हाथ बढ़ाया।
डरते हुए।
हवा छुई।
पर ऐसा लगा
जैसे किसी ठंडी उँगली ने उसे हल्के से छुआ।
“मैं तुम्हें राक्षस नहीं बनने दूँगा,”
उसने कहा।
छाया की आवाज़ फुसफुसाई—
“तो मुझे इंसान बनाए रखना…”
तभी—
फोन बजा।
राघव।
आवाज़ काँप रही थी—
“कबीर… जो आदमी गायब था…”
“हाँ?”
“वो… पुराने कुएँ के पास मिला है…”
“ज़िंदा?”
राघव चुप।
फिर बोला—
“चेहरे पर… वही मुस्कान…”
कबीर ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
दूर कहीं हवा चली।
और छाया की धीमी आवाज़ आई—
“आज रात… तीन गवाहियाँ पूरी हुईं…”

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
11 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
729
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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