Pretika › Horror › सेक्सी प्रेत

सेक्सी प्रेत (32) अंतिम भाग

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 5 मिनट

सुबह की धूप राख पर गिर रही थी।
जहाँ कल रात रिसर्च सेंटर खड़ा था…
वहाँ अब सिर्फ़ टूटी दीवारें थीं।
मुड़ी हुई लोहे की सरिए।
जले हुए तार।
और हवा में बारूद की हल्की गंध।
सब कुछ खत्म हो चुका था।
या कम से कम… ऐसा दिख रहा था।
कबीर मलबे के सामने खड़ा था।
आँखें सूखी।
आँसू शायद रात में ही खत्म हो चुके थे।
राघव उसके पास आया।
“चल… यहाँ कुछ नहीं बचा।”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
बस राख में देखता रहा।
जैसे किसी की परछाई ढूँढ रहा हो।

पुलिस।
एम्बुलेंस।
मीडिया।
चारों तरफ अफरा-तफरी।
लोग इसे “गैस ब्लास्ट” कह रहे थे।
कोई “शॉर्ट सर्किट।”
कोई “आतंकी हमला।”
लेकिन असली सच…
सिर्फ तीन लोग जानते थे।
कबीर।
राघव।
शेखर।
और चौथा…
जो अब इस दुनिया में नहीं थी।
नंदिनी।

“हम रिपोर्ट में क्या लिखेंगे?” शेखर ने धीमे से पूछा।
राघव बोला —
“मशीन फेलियर। ओवरलोड। बस।”
“और… वो चीज़?”
तीनों कुछ सेकंड चुप रहे।
कबीर बोला —
“वो कहानी थी…
जो अब खत्म हो गई।”
लेकिन उसके अपने शब्द…
उसे खुद झूठ लगे।

तीन दिन बाद।
कबीर अपने फ्लैट में अकेला था।
कमरा अजीब शांत।
पहले यहाँ हँसी गूँजती थी।
नंदिनी की आवाज़।
उसकी कॉफी की खुशबू।
अब सिर्फ घड़ी की टिक-टिक।
टक…
टक…
टक…
हर आवाज़ दिल पर चोट जैसी।

वो सो नहीं पा रहा था।
आँखें बंद करता…
तो वही दृश्य।
नंदिनी का मुस्कुराना।
रोशनी में घुल जाना।
उसकी आखिरी बात —
“अब मैं डर नहीं… याद हूँ…”
“याद…”
कबीर बिस्तर से उठ बैठा।
“अगर वो याद है…
तो फिर इतनी असली क्यों लगती है?”

रात के 2:17
अचानक—
रसोई से टक की आवाज़ आई।
जैसे कप गिरा हो।
कबीर जम गया।
“हवा होगी…”
उसने खुद से कहा।
लेकिन खिड़की बंद थी।
एसी भी बंद।
फिर आवाज़ कैसे?

वो धीरे-धीरे किचन की तरफ गया।
फर्श पर…
एक कप गिरा था।
वही कप।
जो नंदिनी रोज़ इस्तेमाल करती थी।
वो महीनों से शेल्फ पर रखा था।
कभी हिला भी नहीं।
आज… खुद गिर गया?
उसके हाथ काँप गए।

“नहीं…”
वो खुद को समझाने लगा।
“ये दिमाग का खेल है।”
लेकिन तभी—
पीछे से हल्की सी खुशबू आई।
लैवेंडर।
नंदिनी का परफ्यूम।
ठीक वही।
एक सेकंड के लिए…
उसे लगा कोई उसके पीछे खड़ा है।
उसने मुड़कर देखा।
कोई नहीं।

दिल तेज़ धड़कने लगा।
डर?
नहीं।
ये डर नहीं था।
ये… उम्मीद थी।
“नंदिनी…?”
उसकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई।
कमरा शांत।
फिर—
बहुत हल्की…
बहुत धीमी…
हँसी।

कबीर का दिल रुक सा गया।
वो वही हँसी थी।
वही मासूम…
वही शरारती…
जो वो हजार बार सुन चुका था।
“तुम…?”
खिड़की के पास परदा हल्का हिला।
बिना हवा के।

अचानक उसके फोन की स्क्रीन खुद-ब-खुद ऑन हुई।
गैलरी खुली।
नंदिनी की फोटो।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
स्लाइडशो खुद चलने लगा।
जैसे कोई देख रहा हो।
चुन रहा हो।
याद कर रहा हो।

“ये मशीन नहीं है…”
कबीर बुदबुदाया।
“तो फिर…?”
उसके दिमाग में एक बात बिजली की तरह कौंधी।
छाया-भक्षक खत्म हो गया था।
लेकिन…
जो आत्माएँ उसने कैद की थीं…
क्या सब मुक्त हुईं?
या…
कोई रह गई?

तभी—
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
साँस से धुंध निकलने लगी।
वही ठंड…
जो पहले महसूस होती थी।
लेकिन इस बार अलग थी।
पहले वाली ठंड में डर था।
इसमें… सुकून था।

धीरे-धीरे—
हवा में हल्की रोशनी बनने लगी।
धुएँ जैसी…
लेकिन काली नहीं।
सफेद।
नरम।
जैसे चाँदनी का धागा।
वो आकार लेने लगी।
चेहरा।
बाल।
आँखें।
कबीर की साँस अटक गई।
“नंदिनी…”

वो सामने थी।
पूरी नहीं।
आधी पारदर्शी।
लेकिन साफ़।
जैसे पानी में दिखती परछाई।
वो मुस्कुरा रही थी।
“डरो मत…”
आवाज़ बहुत हल्की।
जैसे हवा कानों से टकराई हो।

कबीर के आँसू बह निकले।
“तुम गई नहीं…?”
“मैं गई थी…”
उसने कहा।
“लेकिन पूरी नहीं…”
“मतलब?”
“कुछ वादे…
आत्मा को रोक लेते हैं…”

“तुम्हारा वादा…”
कबीर समझ गया।
“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी…”
वो रो पड़ा।
“तो रहो… यहीं रहो…”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
“नहीं… ये सही नहीं…”

“मुझे जाना होगा…”
“फिर क्यों आई?”
वो मुस्कुराई।
“अलविदा कहने…”
“और ये बताने…”
“छाया-भक्षक खत्म नहीं हुआ…”

कबीर सन्न।
“क्या?”
“उसका बीज… बच गया है…”
“कहाँ?”
उसने खिड़की के बाहर इशारा किया।
शहर की तरफ।
“डर में…”
“हर इंसान के अंदर…”

“जब तक लोग डरेंगे…”
“वो फिर जन्म ले सकता है…”
“और तब…”
“तुम्हें फिर लड़ना होगा…”

कबीर ने गहरी साँस ली।
इस बार उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी।
सिर्फ़ दृढ़ता।
“तो लड़ूँगा…”
“हर बार…”
“तुम्हारे लिए…”
“सबके लिए…”

नंदिनी की आँखें चमक उठीं।
“यही वजह है…
कि मैं तुमसे प्यार करती थी…”
धीरे-धीरे उसका शरीर रोशनी बनने लगा।

“अब सच में… अलविदा…”
“फिर मिलेंगे?”
“शायद…”
“किसी और जन्म में…”
“या… किसी और कहानी में…”

वो पास आई।
उसने कबीर के माथे को छुआ।
एक गर्माहट।
पहली बार…
उसकी छुअन ठंडी नहीं थी।
जैसे सूरज की किरण।

और फिर—
वो टूटते तारे की तरह बिखर गई।
कमरा फिर खाली।
लेकिन इस बार…
अकेलापन नहीं था।

सुबह।
कबीर बालकनी में खड़ा था।
सूरज उग रहा था।
शहर जाग रहा था।
लोग भाग रहे थे।
जी रहे थे।
डर रहे थे।
हँस रहे थे।
यही दुनिया थी।
यही लड़ाई थी।

उसने मोबाइल खोला।
नंदिनी की फोटो देखी।
मुस्कुराया।
“मैं तैयार हूँ…”

अचानक—
स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन आया।
UNKNOWN FILE RECEIVED
उसने खोला।
रिसर्च सेंटर का पुराना डेटा।
और आखिरी लाइन—
SHADOW ENTITY SIGNAL — ACTIVE

कबीर की आँखें सख्त हो गईं।
“तो खेल खत्म नहीं हुआ…”
उसने जैकेट उठाई।
दरवाज़ा खोला।

हवा चली।
पीछे कमरे में हल्की सी खुशबू फिर आई।
लैवेंडर।
जैसे कोई कह रहा हो—
“मैं साथ हूँ…”
कबीर मुस्कुराया।
और बाहर चला गया।
नई लड़ाई की ओर।

समाप्त

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
32 of 32
Category
Horror
Reading time
5 min
Words
914
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग

सेक्सी प्रेत · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories