PretikaParanormalदेवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य

भाग 1: सीलबंद फ़ाइल, जोशीमठ से आगे का वीराना और 1911 का डाक-बंगला

Piyashi Atma · Paranormal · 23 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
Chapter
1 of 6
Category
Paranormal
Reading time
23 min
Words
4565
Language
Hindi (हिंदी)
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1. लोक निर्माण विभाग का तहख़ाना और 114 साल पुरानी फ़ाइल
पहाड़ों के बारे में मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग केवल दो ही चीज़ें जानते हैं—सुहावना मौसम और खूबसूरत नज़ारे।

लेकिन जो लोग गढ़वाल और कुमाऊं की गहरी, पथरीली घाटियों की कोख में पले-बढ़े हैं, वे एक कड़वा और खौफ़नाक सच जानते हैं: हिमालय जितना देवताओं का है, उससे कहीं ज़्यादा वह उन शक्तियों का है जिनका नाम दिन ढलने के बाद ज़बान पर लाना भी पाप माना जाता है। वहाँ हर दर्रे का अपना एक पहरेदार होता है, हर बांझ (Oak) और बुरांश के जंगल की अपनी प्यास होती है, और कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर मुसाफ़िर चलता तो अपनी मर्ज़ी से है, लेकिन लौटता किसी और के हुक्म से है।

आदित्य रावत कोई तांत्रिक नहीं था, न ही वह किसी परलौकिक रहस्य की खोज में निकला कोई साहसी खोजी पत्रकार था।

वह महज़ सत्ताईस साल का एक बेहद आम, सीधा-सादा नौजवान था। देहरादून के सर्वे चौक के पास लोक निर्माण विभाग (PWD) के ज़िला कार्यालय में वह संविदा (contract) पर एक मामूली सहायक मानचित्रकार (Draftsman/Survey Assistant) के पद पर काम करता था। महीने के बाइस हज़ार रुपये, एक पुरानी स्प्लेंडर बाइक और राजपुर रोड के किनारे एक सीलन भरा सिंगल रूम—यही उसकी कुल जमा-पूंजी और दुनिया थी।

उस मंगलवार की दोपहर, देहरादून में मूसलाधार बारिश हो रही थी।

दफ़्तर के चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल ने चश्मे के ऊपर से देखते हुए आदित्य को अपने केबिन में बुलाया। मेज़ पर लाल फीते से बंधी, धूल और फफूंद से सड़ी हुई एक बेहद पुरानी, पीले पड़ चुके काग़ज़ों वाली फ़ाइल रखी थी। उस फ़ाइल के ऊपर ब्रिटिश राज के दौर की सरकारी मुहर छपी थी:

FOREST & REVENUE SURVEY — BRITISH GARHWAL DIVISION (1911)

अति-गोपनीय: सेक्टर 7 (नंदा देवी बफर ज़ोन — कालिंदी घाटी सीमान्त)

स्थान: 'अंधार-चौकी' डाक-बंगला (ऊँचाई: 11,800 फीट)

"आदित्य," नौटियाल जी ने अपनी चाय का घूंट भरते हुए एक धीमी, दबी हुई आवाज़ में कहा, जैसे उन्हें डर हो कि बाहर चपरासी भी न सुन ले।

"उत्तराखंड सरकार सेंट्रल बॉर्डर रोड्स और इको-टूरिज्म के तहत भारत-तिब्बत सीमा से जुड़े कुछ पुराने ब्रिटिश रूटों का दोबारा सर्वे करवा रही है। चमोली ज़िले में जोशीमठ से लगभग पैंतालीस किलोमीटर आगे, एक ऐसी घाटी है जो 1962 के युद्ध के बाद से पूरी तरह सील पड़ी है। वहाँ 1898 का बना एक पुराना अंग्रेज़ी डाक-बंगला है—'अंधार-चौकी'। तुम्हें वहाँ जाकर उसकी वर्तमान संरचना (structural stability) की फ़ील्ड-रिपोर्ट और जीपीएस कोऑर्डिनेट्स लेकर आने हैं।"

आदित्य ने चौंककर फ़ाइल को देखा: "सर, लेकिन इतने ऊँचे और वीरान बफ़र ज़ोन में मैं अकेला? वहाँ कोई सड़क भी नहीं जाती। विभाग के सीनियर सर्वेयर क्यों नहीं जा रहे?"

नौटियाल जी के चेहरे की झुर्रियाँ अचानक सख्त हो गईं। उन्होंने खिड़की से बाहर गिरते पानी को देखा, फिर बहुत धीमे स्वर में बोले:

"क्योंकि कोई सीनियर वहाँ जाना नहीं चाहता, आदित्य। पिछले महीने जोशीमठ डिवीजन के दो ओवरसियर वहाँ भेजे गए थे... वे तीसरे दिन ही अपना सारा सामान वहीं छोड़कर बदहवास हालत में लौट आए। एक ने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और दूसरा इस वक़्त श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के मनोरोग वार्ड में भर्ती है। वह सिर्फ़ एक ही बात दोहराता रहता है—'वह सीटी बजाकर बुलाता है... वह हमारी शक्ल लेकर आता है!'"

नौटियाल जी ने फ़ाइल को आदित्य की तरफ़ सरका दिया:
"और दूसरी सबसे बड़ी वजह... इस फ़ाइल का आखिरी पन्ना देखो, आदित्य।"

आदित्य ने कांपती उंगलियों से उस सदी पुरानी फ़ाइल का अंतिम पन्ना खोला।

उस पन्ने पर 14 नवंबर 1962 की एक हस्तलिखित प्रविष्टि (handwritten entry) थी। उस पर अंतिम नियुक्त सरकारी चौकीदार का नाम और हस्ताक्षर दर्ज थे:

कार्यवाहक चौकीदार: त्रिलोक सिंह रावत

गाँव: धारकोट, पट्टी दसज्यूला, गढ़वाल।

(टिप्पणी: 17 नवंबर 1962 की बर्फीली रात से लापता। शव अप्राप्त। केस बंद।)

आदित्य के रोंगटे खड़े हो गए। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

त्रिलोक सिंह रावत... उसके अपने सगे दादा थे!

वही दादा, जिनके बारे में बचपन में उसकी दादी बस इतना कहकर चुप हो जाती थी कि वे 1962 में बर्फ़ीले तूफ़ान में खो गए थे और कभी वापस नहीं लौटे। उनके नाम पर गाँव में केवल एक खाली कुशा (घास का पुतला) जलाकर उनका श्राद्ध कर दिया गया था!

"अगर तुम यह सर्वे पूरा करके ले आते हो, आदित्य," नौटियाल जी ने फुसफुसाते हुए कहा, "तो विभाग तुम्हें स्थायी जूनियर इंजीनियर बना देगा। और... शायद तुम्हें यह भी पता चल जाए कि बासठ साल पहले उस डाक-बंगले के अंदर तुम्हारे दादा के साथ वास्तव में क्या हुआ था।"

नौकरी का लालच, अपने पुरखों के दबे हुए रहस्य की कशिश और एक आम इंसान की नियति—ये तीन ऐसी रस्सियाँ थीं जिन्होंने आदित्य के गले में फंदा कस दिया।

उसने फ़ाइल उठा ली।

2. अलकनंदा का गर्जन और देवताओं की सीमा
दो दिन बाद।

ऋषिकेश से बद्रीनाथ की ओर जाने वाले संकरे, घुमावदार पहाड़ी रास्ते पर राज्य परिवहन की बस हिचकोले खा रही थी।

देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम के मटमैले पानी को पार करते हुए, श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के पार जैसे-जैसे बस चमोली और जोशीमठ की ऊँचाइयों की तरफ़ बढ़ रही थी, दुनिया का स्वरूप बदल रहा था। मैदानों की गर्म, उमस भरी हवा अब चीड़ (Pine) और देवदार की तीखी, ठंडी और रेज़िन जैसी खुशबू में बदल चुकी थी।

जोशीमठ पहुँचते-पहुँचते शाम के पाँच बज चुके थे।

यहाँ से आगे न कोई पक्की सड़क थी, न पर्यटकों की चहल-पहल। यहाँ से शुरू होता था वह दुर्गम, पथरीला इलाका जिसे स्थानीय भोटिया और गढ़वाली लोग 'देव-सीमाना' कहते थे—वह लक्ष्मण-रेखा जिसके पार इंसानी बस्तियाँ ख़त्म हो जाती थीं और केवल विशाल, नंगे, भूरे पहाड़ और बर्फ़ीली चोटियाँ खड़ी थीं।

जोशीमठ के अंतिम बाज़ार के एक छोटे से लकड़ी के चाय के ढाबे पर आदित्य बैठा था।

उसके सामने एक साठ वर्षीय, झुर्रियों वाले चेहरे और छोटी, भेदती हुई आँखों वाला स्थानीय पहाड़ी गाइड बैठा था—जगतू (Jagtu Ram)। जगतू के साथ उसके दो पहाड़ी खच्चर बंधे थे, जिन पर राशन, रस्सियाँ और सर्वे के उपकरण लदे थे।

जगतू ने अपनी बीड़ी का कश खींचते हुए आदित्य को ऊपर से नीचे तक देखा।

"रावत जी, सरकार तुम्हें तनख्वाह देती है, इसलिए तुम्हारी मजबूरी समझ आती है," जगतू ने बीड़ी का धुआँ हवा में छोड़ते हुए कहा। उसकी आवाज़ में सूखी लकड़ी के टूटने जैसी खड़खड़ाहट थी।

"लेकिन अंधार-चौकी कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई भला मानुष अपनी मर्ज़ी से जाए। उस डाक-बंगले को 1911 में एक अंग्रेज़ अफ़सर—मेजर एडवर्ड थोर्न—ने बनवाया था। वह वहाँ शिकार करने नहीं, बल्कि ज़मीन के नीचे कुछ 'खोजने' गया था। स्थानीय लोग कहते हैं कि उसने उस बंजर पहाड़ी के नीचे सोए हुए किसी प्राचीन 'क्षेत्रपाल' या कुलदेवता के थान (स्थान) को डायनामाइट से उड़वा दिया था।"

आदित्य ने अपना चाय का गिलास मेज़ पर रखते हुए पूछा: "तो क्या हुआ था उसके बाद, जगतू दा?"

जगतू की आँखें संकरी हो गईं। उसने अपने गले में बंधे काले धागे और तांबे के तावीज़ को छुआ:
"उसके बाद मेजर थोर्न अपनी ही बीवी और सात साल की बेटी के साथ उस डाक-बंगले के डाइनिंग हॉल में मरा हुआ मिला था।

उनकी देह पर एक खरोंच तक नहीं थी, लेकिन उनके चेहरे... उनके चेहरे ख़ौफ़ के मारे इतने विकृत हो चुके थे कि देखने वालों की रूह कांप गई थी।

उनकी आँखें फटी हुई थीं और उनकी जीभ उनके तालू से चिपकी हुई थी, जैसे उन्होंने कोई ऐसी चीज़ देख ली हो जिसे देखना किसी नश्वर मनुष्य के बस की बात नहीं थी!

तब से वह इलाका वीरान है।

वहाँ आज भी हवा सीधी नहीं चलती। वहाँ 'छलावा' घूमता है, रावत जी!"

"छलावा?" आदित्य ने एक आधुनिक नौजवान के संशय के साथ मुस्कुराने की कोशिश की। "छलावा तो बस एक लोक-कथा है, जगतू दा। कोई दृष्टि-भ्रम (optical illusion) या जंगली जानवरों की परछाईं होगी।"

जगतू हँसा नहीं।

उसने अपनी लाठी को ज़मीन पर ज़ोर से पटका। ढाबे के कोने में बैठे दो अन्य स्थानीय वृद्धों ने भी आदित्य की बात सुनकर अपने सिर झुका लिए।

"शहर की किताबों ने तुम्हारी मति हर ली है, बाबू," जगतू ने फुसफुसा कर कहा।

"छलावा कोई परछाईं नहीं होता। वह इस देवभूमि की सबसे धूर्त और घातक प्रेत-शक्ति है। वह तुम्हारी कमज़ोरी जानता है।

अगर तुम जंगल में अकेले हो, तो वह तुम्हारे पीछे-पीछे चलेगा।

वह तुम्हारे उस रिश्तेदार या दोस्त की आवाज़ में तुम्हें पुकारेगा जो मीलों दूर घर पर बैठा है!

अगर तुमने पीछे मुड़कर देखा, या उसकी आवाज़ पर 'हाँ' कह दिया... तो तुम्हारी चेतना पर उसका कब्ज़ा हो जाएगा। वह तुम्हें हँसते-हँसते किसी हज़ार फीट गहरी खाई में कूदने पर मजबूर कर देगा!

और सबसे भयानक बात... वह तुम्हारी अपनी ही शक्ल धरकर तुम्हारे सामने आकर खड़ा हो जाएगा!"

जगतू ने अपनी लाठी उठाई: "रात गहरी होने वाली है। अगर कल सुबह उस डाक-बंगले तक पहुँचना है, तो हमें आज रात 'मलारी' के अंतिम वन-विश्राम गृह में रुकना होगा। और याद रखना रावत जी... उस घाटी में सीटी बजाना या किसी भी बंद खिड़की पर तीन बार से ज़्यादा दस्तक देना साक्षात काल को न्योता देना है।"

3. अंधार-चौकी की खूनी घाटी और बुरांश का सन्नाटा
अगली सुबह चार बजे, जब आसमान में तारे अभी भी बर्फ़ीली सुइयों की तरह चमक रहे थे, वे दोनों मलारी से आगे के उस संकरे, दुर्गम ट्रेक पर बढ़ चले।

रास्ता इतना संकरा था कि एक तरफ़ सीधी, नंगी, काली ग्रेनाइट की चट्टानें थीं और दूसरी तरफ़ हज़ारों फीट नीचे उफनती हुई धौलीगंगा नदी की सफेद झाग वाली जलधारा, जिसकी दहाड़ किसी भूखे शेर जैसी गूँज रही थी।

जैसे-जैसे वे सात हज़ार से नौ हज़ार, और फिर ग्यारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर पहुँचे, पेड़ों का स्वरूप बदलने लगा।

चीड़ के ऊँचे दरख़्त पीछे छूट गए थे। अब चारों तरफ़ पुराने, मुड़े-तुड़े, कंकाल जैसे दिखने वाले भोजपत्र और गहरे लाल फूलों वाले बुरांश (Rhododendron) के घने जंगल थे।

लेकिन उन फूलों का लाल रंग सुंदर नहीं था; ऐसा लगता था जैसे पेड़ों की शाखाओं पर ताज़ा ख़ून छिड़का गया हो।

हवा में इतनी भयानक, चुभने वाली ठंडक थी कि आदित्य की नाक और कानों की लवें सुन्न पड़ चुकी थीं।

थर्मल इनर्स और हेवी डाउन-जैकेट के बावजूद उसकी पसलियाँ कांप रही थीं।

दोपहर के बारह बजे के करीब, जंगल अचानक ख़त्म हो गया।

सामने एक विशाल, अंडाकार, सूखी और पथरीली घाटी फैली हुई थी। इस घाटी में घास का एक तिनका तक नहीं उगा था।

पहाड़ों के ऊपर बादलों का एक ऐसा भारी, स्लेटी और काला छत्ता छाया हुआ था जो दिन के उजाले को भी एक अजीब, मनहूस, गोधूलि बेला जैसे नीले-अंधेरे में बदल रहा था।

"यही है..." जगतू ने अपने खच्चरों की लगाम खींचते हुए एक कांपती हुई उंगली से सामने की ओर इशारा किया।

घाटी के बिल्कुल मुहाने पर, एक संकरी चट्टानी ढलान की चोटी पर... वह डाक-बंगला खड़ा था।

'अंधार-चौकी डाक-बंगला'।

उस इमारत को देखते ही आदित्य की छाती में एक अजीब सा, भारी दबाव महसूस हुआ—जैसे किसी ने उसके फेफड़ों पर कोई ठंडा, भारी पत्थर रख दिया हो।

वह 1898 की ब्रिटिश गोथिक और पहाड़ी वास्तु-कला का एक वीभत्स मिश्रण था।

काले स्लेट के पत्थरों से बनी ढलवां छतें, जो कई जगहों से टूटकर अंदर धँस चुकी थीं। इमारत की दीवारें स्थानीय कत्थई पत्थरों और देवदार की मोटी, जली हुई लकड़ी की कड़ियों से बनाई गई थीं।

बंगले के चारों तरफ़ एक विशाल, संकरा लकड़ी का बरामदा था, जिसकी रेलिंग पर जंग लगी लोहे की कंटीली तारें लिपटी थीं।

और सबसे अजीब बात—

उस डाक-बंगले के मुख्य लकड़ी के भारी दरवाज़े के ठीक ऊपर...

एक बहुत पुराना, जंग लगा लोहे का घोड़ा-नाल, तिब्बती लामाओं के फटे हुए काले तंत्र-ध्वज, और एक लगभग तीन फीट ऊँचा तांबे का त्रिशूल उल्टा गड़ा हुआ था, जिस पर सिंदूर और बकरे के सूखे ख़ून की पपड़ियाँ आज भी साफ़ देखी जा सकती थीं!

किसी ब्रिटिश इमारत पर हिंदू तांत्रिक त्रिशूल और तिब्बती रक्षा-कवच का यह मेल इस बात का साफ़ सबूत था कि इस जगह को केवल आंधी-तूफ़ान से बचाने के लिए नहीं, बल्कि किसी चीज़ को 'अंदर क़ैद रखने' या 'बाहर रोकने' के लिए सील किया गया था!

"मैं अंदर नहीं जाऊँगा," जगतू ने खच्चरों से आदित्य का सर्वे-सामान, राशन के डिब्बे और स्लीपिंग बैग उतारते हुए दो-टूक कहा। उसके माथे पर पसीने की ठंडी बूँदें उभर आई थीं।

"क्या मतलब अंदर नहीं जाओगे, जगतू दा?" आदित्य ने घबराते हुए कहा। "विभाग ने तुम्हें मेरे साथ तीन दिन रुकने के पैसे दिए हैं!"

"पैसे ज़िंदा इंसान के काम आते हैं, रावत जी, मुर्दों के नहीं," जगतू ने अपनी जैकेट के भीतर से एक छोटी सी चमड़े की थैली निकाली और आदित्य के हाथ में थमा दी।

"इसमें पवित्र काली माता के थान की भस्म और सात साल पुराने सरसों के अभिमंत्रित बीज हैं। इसे अपनी जेब से कभी अलग मत करना।

मैं बाहर, अस्तबल के पास बने उस पुराने चौकीदार क्वार्टर में रुकूँगा।

और मेरी एक बात अपने दिमाग़ में पत्थर की लकीर की तरह गाड़ लो, रावत जी...

शाम के ठीक पाँच बजे जब पहाड़ों पर सूरज की आख़िरी किरण बुझ जाए... तो इस बंगले के मुख्य हॉल की उस बड़ी अंगीठी (Fireplace) में आग जला देना।

आग बुझनी नहीं चाहिए!

और चाहे बाहर से तुम्हारी मरी हुई दादी की आवाज़ आए, या मेरा गला कटने की चीख़ सुनाई दे... सुबह की पहली धूप निकलने से पहले इस दरवाज़े की कुंडी मत खोलना!"

इससे पहले कि आदित्य कुछ पूछ पाता, जगतू ने अपने खच्चरों को खींचा और तेज़ी से बंगले के पीछे बने अस्तबल के टूटे हुए क्वार्टर की तरफ़ बढ़ गया।

आदित्य उस वीरान, सन्नाटे से भरी घाटी में उस विशाल, काले भूतिया बंगले के सामने अकेला खड़ा रह गया।

4. 114 साल पुरानी सीलन और मृत लॉगबुक
आदित्य ने भारी कदमों से बरामदे की सड़ी हुई, चरमराती लकड़ी की सीढ़ियों पर कदम रखा।

चर्र्र्र्र... चटक!

हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था मानो लकड़ी के तख़्ते सदियों बाद किसी इंसान का वज़न पाकर कराह रहे हों।

मुख्य दरवाज़े पर एक विशाल, पीतल का ताला लटका था, लेकिन उस ताले की कुंडी को किसी भारी लोहे की चीज़ से कई साल पहले ही तोड़ा जा चुका था।

आदित्य ने अपने कंधे से दरवाज़े को धक्का दिया।

कड़-कड़-कड़... धाँय!

दरवाज़ा एक भारी, चीखती हुई आवाज़ के साथ अंदर की तरफ़ खुला।

भीतर से एक ऐसी गंध का बवंडर बाहर निकला जिसने आदित्य का दम घोंट दिया।

यह केवल पुरानी लकड़ी या सीलन की गंध नहीं थी; यह सड़े हुए चमड़े, पुराने मोम, और दशकों से बंद पड़ी किसी श्मशानी क़ब्र की बासी, भारी और मीठी गंध थी।

आदित्य ने अपनी हाई-बीम एलईडी टॉर्च ऑन की।

सफ़ेद, तेज़ रोशनी का दायरा उस विशाल, ऊँची छत वाले ब्रिटिश डाइनिंग हॉल पर पड़ा।

हॉल के बीचों-बीच महोगनी की एक विशाल, धूल से पटी डाइनिंग टेबल रखी थी, जिसके चारों तरफ़ विक्टोरियन शैली की नक्काशीदार कुर्सियाँ इस तरह करीने से लगी थीं जैसे कल रात ही यहाँ कोई शाही भोज समाप्त हुआ हो।

मेज के ऊपर पीतल की पुरानी कटलरी, जंग लगे चम्मच और टूटे हुए चीनी मिट्टी के कप-प्लेट उसी तरह रखे थे।

दीवारों पर अंग्रेज़ी दौर के कुछ काले-सफ़ेद, धुंधले तैलचित्र (oil paintings) टंगे थे।

एक तस्वीर मेजर एडवर्ड थोर्न की थी—शिकारी वर्दी में, मूंछों पर ताव दिए, हाथ में दोनाली बंदूक लिए खड़ा एक सख्त ब्रिटिश अफ़सर।

लेकिन जब आदित्य ने टॉर्च की रोशनी उस तस्वीर की आँखों पर डाली, तो उसे एक अजीब, रोंगटे खड़े कर देने वाला अहसास हुआ। तस्वीर की आँखें सामान्य तैलचित्र जैसी सपाट नहीं थीं; वे किसी जीवित, शिकारी परिंदे की तरह कमरे के हर कोने में आदित्य की हलचल का पीछा कर रही थीं!

कमरे के एक कोने में, काँच के एक विशाल शोकेस में दो पुराने टैक्सीडर्मी (taxidermy) स्टफ्ड जानवर रखे थे—एक हिम तेंदुआ (Snow Leopard) और एक कस्तूरी मृग।

उन जानवरों की खालें जगह-जगह से झड़ चुकी थीं, लेकिन उनकी काँच की कृत्रिम, पीली आँखें उस अंधेरे में टॉर्च की रोशनी को प्रतिबिंबित करके इस तरह चमक रही थीं मानो वे अभी शोकेस का शीशा तोड़कर बाहर छलांग लगा देंगे।

हॉल के सिरे पर वह विशाल, काले पत्थरों से बनी विक्टोरियन अंगीठी थी।

अंगीठी के ऊपर रखे एक लकड़ी के रैक पर एक भारी, चमड़े की जिल्द वाली डायरी रखी थी।

आदित्य ने आगे बढ़कर उस डायरी को उठाया।

धूल झाड़ते ही उस पर सोने के अक्षरों में लिखा दिखा:

VISITORS LOG BOOK & NIGHT OCCUPANCY REGISTER

ANDHAR-CHAUKI DAK BUNGALOW (1898 – 1962)

आदित्य ने कांपते हाथों से उस डायरी के पीले, कुरकुरे पन्नों को पलटना शुरू किया।

शुरुआती पन्नों पर 1901, 1905, 1911 के ब्रिटिश कमिश्नरों, भूवैज्ञानिकों और शिकारियों के औपचारिक नोट दर्ज थे। मौसम, तापमान और शिकार किए गए जानवरों का ब्योरा।

लेकिन 1911 के नवंबर महीने के बाद, लिखावट अचानक बदल गई थी।

अक्षर टेढ़े-मेढ़े, कांपती हुई स्याही और पागलों जैसे दबाव के साथ लिखे गए थे।

मेजर एडवर्ड थोर्न की अंतिम प्रविष्टि (7 नवंबर 1911) को पढ़कर आदित्य के माथे की नसें फटने लगीं:

"वे पहाड़ नहीं हैं। वे सोए हुए दैत्य हैं।

आज रात फिर उस खाई से वह सीटी बज रही है।

मेरी पत्नी एलिज़ाबेथ कह रही है कि उसकी मृत बहन खिड़की के बाहर खड़ी होकर उसे बुला रही है। मैंने खिड़की की जाली पर ताला लगा दिया है, लेकिन एलिज़ाबेथ दरवाज़े को अपने नाखूनों से खुरच रही है।

भगवान के लिए... इस घाटी के पत्थर जीवित हैं!

जो कोई भी इस रजिस्टर को पढ़े... सूर्यास्त के बाद अंगीठी की आग मत बुझने देना।

क्योंकि जब आग बुझती है... तो वह कमरा तुम्हारा नहीं रहता... वह 'उसका' हो जाता है!"

आदित्य ने जल्दी से पन्ने आगे पलटे।

डायरी का अंतिम पन्ना 1962 का था।

वहाँ उसके दादा—त्रिलोक सिंह रावत—की हिंदी में, खड़िया मिट्टी और नीली रोशनाई से लिखी गई डायरी प्रविष्टि थी।

तारीख़ थी: 16 नवंबर 1962।

उस पन्ने पर लिखा था:

"आज छठा दिन है। बर्फ़ ने सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। नीचे चौकी से कोई रसद नहीं आई।

रेडियो पर केवल सरसराहट आ रही है।

आज शाम जब मैं कुएँ से पानी लेने गया, तो मैंने देखा कि बर्फ़ पर मेरे पैरों के निशानों के बगल में... किसी नंगे, विशाल, तीन उंगलियों वाले उल्टे पंजों के ताज़ा निशान बने हुए थे।

कोई मेरे पीछे चल रहा था।

जब मैं मुड़ा, तो कोई नहीं था... लेकिन हवा में मेरी माँ की लोरी गूँज रही थी। मेरी माँ तो बीस साल पहले मर चुकी है!

यह कुलदेवता का कोप है। अंग्रेज़ ने जिस शिवलिंग को तोड़ा था, उसकी सर्प-शिला इस बंगले के तहख़ाने में दबी है।

कल रात मुझे वह सौदा करना ही पड़ेगा... अपने वंश को बचाने के लिए!"

पन्ना वहीं ख़त्म हो गया था।

नीचे के तीन पन्ने किसी तेज़ धारदार चीज़ से, शायद किसी खंजर से, बेरहमी से फाड़ दिए गए थे!

5. साँझ की ख़ूनी लकीर और अंगीठी का तांडव
आदित्य ने रजिस्टर को टेबल पर पटक दिया।

उसका दिल इतनी तेज़ गति से धड़क रहा था कि उसे अपने सीने में हथौड़े चलने का अहसास हो रहा था।

उसने अपनी कलाई घड़ी देखी।

शाम के 4 बजकर 48 मिनट हो चुके थे।

खिड़की से बाहर का दृश्य देखकर उसका ख़ून जम गया।

घाटी में दिन का उजाला किसी बुझते हुए बल्ब की तरह अचानक ग़ायब हो रहा था।

पश्चिम की चोटियों के पीछे सूरज डूब नहीं रहा था, ऐसा लग रहा था मानो किसी विशाल, अदृश्य जबड़े ने उस लाल गोले को एक ही घूंट में निगल लिया हो।

आसमान का रंग गहरा, गंदा बैंगनी और फिर स्याह काला होने लगा था।

और उसके साथ ही—

पहाड़ों पर तापमान एक ही झटके में माइनस आठ डिग्री तक गिर गया।

हवा ने अपनी दिशा बदल ली थी। हवा अब किसी सीटी की तरह, किसी पागल औरत के रोने की तरह, उस बंगले की खिड़कियों और स्लेट की छतों से टकराकर चीत्कार कर रही थी—सांय-सांय-सांय!

आदित्य को जगतू की वह चेतावनी याद आई: 'शाम के ठीक पाँच बजे अंगीठी में आग जला देना... आग बुझनी नहीं चाहिए!'

आदित्य पागलों की तरह दौड़ा।

हॉल के कोने में देवदार की कुछ सूखी, रेज़िन भरी लकड़ियों के लट्ठे और चीड़ के सूखे छिलके रखे थे।

उसने अपनी जेब से माचिस निकाली। उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि पहली तीन तीलियाँ टूट गईं।

चौथी तीली जली।

उसने उसे चीड़ की छाल पर छुआ दिया।

भभक!

आग की नारंगी, गर्म लपटें अंगीठी के भीतर नाच उठीं। सूखी देवदार की लकड़ी चटखने लगी—चट-चट-चट!

कमरे में थोड़ी गर्मी और रोशनी फैली।

आदित्य ने एक लंबी, हांफती हुई साँस ली।

उसने मुख्य हॉल के भारी लकड़ी के मुख्य दरवाज़े की दोनों बड़ी, लोहे की सांकलें (sliding bolts) चढ़ा दीं। उसने खिड़कियों के भारी, मख़मली, धूल से भरे पर्दों को खींच दिया ताकि बाहर का वह मनहूस, जमा देने वाला अंधकार अंदर न झांक सके।

उसने अंगीठी के सामने एक पुरानी आर्मचेयर खींच ली।

उसने अपने पास एक बैटरी वाली इमरजेंसी लालटेन, अपना सर्विस-रिवॉल्वर (जो विभाग ने उसे आत्मरक्षा के लिए दिया था) और जगतू की दी हुई वह भस्म वाली थैली रख ली।

रात के आठ बज चुके थे।

बाहर बर्फ़बारी शुरू हो चुकी थी।

बर्फ़ के भारी, गीले फाहे खिड़की के शीशों से इस तरह टकरा रहे थे जैसे कोई बाहर खड़ा होकर अपनी उंगलियों से शीशे को थपथपा रहा हो—टप... टप... टप...

आदित्य ने अपने कानों में हेडफ़ोन लगाने की कोशिश की, लेकिन उसका फ़ोन... जो एक घंटे पहले 80% चार्ज था... पूरी तरह डेड हो चुका था! उसकी स्क्रीन पर केवल लाल रंग का एक अजीब, विकृत ग्लिच आ रहा था, जो किसी कंकाल की खोपड़ी जैसा दिख रहा था।

उसने फ़ोन फेंक दिया।

कमरे में केवल दो ही आवाज़ें थीं—एक अंगीठी में जलती लकड़ियों की चटकन, और दूसरी... आदित्य के अपने फेफड़ों की तेज़, घबराई हुई साँसें।

6. सीटी की धुन और परछाइयों का जन्म
रात के ठीक ग्यारह बजकर तैंतालीस मिनट।

अंगीठी की आग अब धीमी पड़ने लगी थी।

कोयले लाल अंगारों में बदल चुके थे। कमरे का तापमान फिर से गिरने लगा था।

आदित्य की साँसें अब कमरे के भीतर सफ़ेद भाप बनकर जम रही थीं। उसकी पलकों और भौंहों पर कमरे के अंदर ही ओस की बारीक बर्फ़ जमने लगी थी।

अचानक—

बाहर चल रहे उस भयानक बर्फीले तूफ़ान के शोर के बीच से... एक बहुत बारीक, सुरीली और रूहानी आवाज़ उभरी।

फ़ूऊऊऊ... फ़ू-फ़ू-फ़ू...

कोई सीटी बजा रहा था।

वह कोई बेतरतीब हवा की सीटी नहीं थी।

वह एक धुन थी।

एक पुरानी, पहाड़ी लोक-धुन—वही धुन जो गढ़वाल के गाँवों में चरवाहे अपनी बासुरी पर बजाते हैं जब वे शाम को अपने मवेशियों को बाड़े में लाते हैं!

आदित्य की रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ का एक तीखा खंजर उतर गया।

इस ग्यारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर, माइनस पंद्रह डिग्री के तूफ़ान में, इस वीराने में कौन सीटी बजा सकता था?

आदित्य कुर्सी पर सीधा होकर बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथों से उस सरकारी रिवॉल्वर को भींच लिया।

सीटी की आवाज़ धीरे-धीरे पास आने लगी।

वह बंगले के अहाते में आई...

फिर वह बरामदे की सीढ़ियों के पास पहुँची...

और फिर—

बरामदे की सड़ी हुई लकड़ी के तख़्तों पर कदमों की आवाज़ शुरू हुई!

चर्र्र... खट... चर्र्र... खट...

कदम बहुत भारी थे।

लेकिन उन कदमों में कोई जूतों की आवाज़ नहीं थी।

वह आवाज़ किसी नंगे, गीले, जमे हुए माँस के पंजों की थी जो उस बर्फीले बरामदे पर चिपक-चिपक कर आगे बढ़ रहे थे!

छप... चर्र्र... छप...

आदित्य की आँखें फटी की फटी रह गईं।

कदम बरामदे से होते हुए... सीधे उस मुख्य हॉल के भारी लकड़ी के दरवाज़े के ठीक बाहर आकर रुक गए।

दरवाज़े के नीचे की जो दो इंच की चौखट की दरार थी...

वहाँ से बर्फ़ की ठंडी हवा अंदर आ रही थी।

आदित्य ने टॉर्च की रोशनी उस दरार पर डाली।

और जो उसने देखा...

उस दृश्य ने आदित्य की चीख़ को उसके हलक़ के भीतर ही पत्थर बना दिया।

दरवाज़े के नीचे... उस संकरी दरार के पार... दो इंसानी पैर खड़े थे।

लेकिन वे पैर सामान्य नहीं थे!

उन पैरों की चमड़ी नीली, सड़ी हुई और बर्फ़ से जली हुई (frostbitten) थी।

और सबसे भयानक बात—

वे पैर सीधे नहीं थे!

दोनों पैरों की एड़ियाँ आगे की तरफ़ थीं... और दसों उंगलियाँ पीछे की तरफ़ मुड़ी हुई थीं!

उल्टे पैर!

7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-ट्विस्ट: दस्तक और दादा का बुलावा (The Twist)
कमरे का सन्नाटा इतना भारी हो गया कि आदित्य को अपनी नसों में दौड़ते हुए ख़ून की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

तभी—

दरवाज़े के उस भारी, मोटे लकड़ी के पैनल पर एक बहुत धीमी, नम्र और परिचित दस्तक हुई।

खट... खट... खट...

ठीक तीन बार।

और फिर, उस दरवाज़े की मोटी लकड़ी के पार से एक आवाज़ आई।

वह आवाज़ किसी भूत या राक्षस की नहीं थी।

वह आवाज़... जगतू की थी!

"रावत जी... अरे आदित्य बाबू, दरवाज़ा खोलो!" जगतू की वही जानी-पहचानी, बीड़ी से बैठी हुई देहाती आवाज़ दरवाज़े के पार से आ रही थी।

"अरे बाबू, बाहर बहुत भयानक तूफ़ान आ गया है! मेरा क्वार्टर बर्फ़ में दब गया है... खच्चर मर गए हैं! ठंड के मारे मेरी छाती फटी जा रही है, बाबूजी! रहम करो... बस कुंडी खोल दो!"

आदित्य की उंगलियाँ कांप उठीं।

एक पल के लिए उसके भीतर का आम, दयालु इंसान जाग उठा।

उसने सोचा कि शायद सचमुच जगतू बाहर ठंड में मर रहा हो!

वह कुर्सी से उठा। उसने दो कदम दरवाज़े की तरफ़ बढ़ाए। उसका हाथ उस भारी लोहे की सांकल को छूने ही वाला था कि...

अचानक, उसकी नज़र अंगीठी के ऊपर रखी उस पुरानी डायरी पर पड़ी।

जगतू की वह अंतिम चेतावनी उसके दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधी:
'चाहे बाहर से तुम्हारी मरी हुई माँ की आवाज़ आए, या मेरा गला कटने की चीख़... सुबह की पहली धूप से पहले कुंडी मत खोलना! वह छलावा है!'

आदित्य झटके से पीछे हट गया।

उसने कांपती आवाज़ में चिल्लाकर कहा: "नहीं! मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगा! तुम जगतू नहीं हो!"

दरवाज़े के पार... एक सेकंड के लिए बिल्कुल सन्नाटा छा गया।

कोई हवा नहीं, कोई साँस नहीं।

और फिर—

उस दरवाज़े के पार से जो आवाज़ आई...

उसने आदित्य के अस्तित्व की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया।

जगतू की आवाज़ अचानक ग़ायब हो गई।

उसकी जगह...

एक बहुत वृद्ध, भारी और रुंधे हुए गले वाली आवाज़ निकली—वही आवाज़ जो आदित्य ने अपने बचपन के पुराने टेप-रिकॉर्डर में अपने स्वर्गीय दादाजी—त्रिलोक सिंह रावत की सुनी थी!

"आदित्य... मेरे बच्चे..." वह आवाज़ दरवाज़े की दरारों से रिसकर अंदर आ रही थी।

"तू अपने दादा के लिए भी दरवाज़ा नहीं खोलेगा?

देख... मैं बासठ साल से इस बर्फीली खाई में भटक रहा हूँ... मेरे जिस्म पर कफ़न भी नहीं है, बेटा... मुझे बहुत ठंड लग रही है!

ज़रा देख तो सही... मैं तेरे लिए क्या लाया हूँ!"

चर्र्र्र्र्क!

अचानक, मुख्य दरवाज़े के बगल वाली खिड़की का भारी मख़मली पर्दा... अपने आप, बिना किसी हवा के, एक झटके में एक तरफ़ सरक गया!

खिड़की के शीशे पर बाहर की तरफ़ बर्फ़ जमी थी।

और उस बर्फीले शीशे के पार... बाहर के घोर, काले अंधकार में... एक चेहरा चिपका हुआ था!

आदित्य ने चीख़ते हुए अपनी टॉर्च उस चेहरे पर मारी।

शीशे पर चिपका हुआ वह चेहरा...

हूबहू उसके दादा—त्रिलोक सिंह रावत—का था! वही सफ़ेद मूंछें, वही गढ़वाली टोपी, वही चेहरा!

लेकिन उस चेहरे की आँखें...

आँखों के भीतर कोई पुतली या सफ़ेद हिस्सा नहीं था; वहाँ केवल दो खोखले, काले, लहूलुहान गड्ढे थे, जिनके भीतर से काले रंग का गाढ़ा ख़ून रिसकर उस बर्फीले शीशे पर जम रहा था!

और वह चेहरा...

अपनी भयानक, सूखी, काली बत्तीसी निकालकर आदित्य को देखकर मुस्कुरा रहा था!

तभी

उस चेहरे ने अपना हाथ उठाया।
उस हाथ की पाँच उंगलियाँ नहीं थीं; उस पर सात लम्बी, हड्डियों जैसी नुकीली उंगलियाँ थीं!
और उस हाथ में...

उस हाथ में कटा हुआ, ताज़ा, ख़ून से लथपथ जगतू का सिर था!

जगतू की कटी हुई आँखें अब भी जीवित थीं और वे दर्द से शीशे के पार आदित्य को घूर रही थीं!

अंगीठी की आग अचानक एक ही सेकंड में... बिना किसी हवा के... काली पड़कर बुझ गई!

और पूरे डाक-बंगले के बंद कमरों से... एक साथ... हज़ारों लोगों के सीटी बजाने की भयानक आवाज़ गूँज उठी!

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देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · सभी भाग →

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