PretikaParanormalदेवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य

भाग 2: अँधेरे का जबड़ा, भस्म की रेखा और तहख़ाने का रूहानी कुआँ

Piyashi Atma · Paranormal · 24 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
Chapter
2 of 6
Category
Paranormal
Reading time
24 min
Words
4638
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. बुझी हुई लपटें और शून्य से बीस डिग्री नीचे का आतंक
अंगीठी की आग का बुझना केवल रोशनी का जाना नहीं था; वह उस डाक-बंगले के भीतर जीवित और मृत के बीच खिंची अंतिम दीवार का ढहना था।

जिस पल वह आखिरी लाल अंगारा काला पड़ा, उस कमरे का तापमान किसी गहरी खाई में गिरने वाले पत्थर की तरह नीचे लुढ़का। शून्य से पाँच, शून्य से दस, और फिर शून्य से बीस डिग्री सेल्सियस। हवा में मौजूद नमी एक ही सेकंड में बर्फ़ की सुइयों में बदल गई। आदित्य के कोट, उसकी जींस और उसकी पलकों पर पाले (frost) की एक सफ़ेद, खुरदरी चादर जम गई। उसकी साँसें फेफड़ों से बाहर निकलते ही शीशे के बुरादे की तरह खड़खड़ा रही थीं।

कमरे में इतना भयानक अंधकार छा गया कि अपनी हथेली भी दिखाई नहीं दे रही थी। केवल उस खिड़की के चौखट पर... जहाँ बाहर की बर्फीली धुंध में वह चेहरा चिपका था... एक नीली, सड़ी हुई फॉस्फोरस जैसी चमक नाच रही थी।

टक... टक... टक...

काँच पर नाखूनों की खरोंच तेज हो गई।

वह कोई आम खरोंच नहीं थी। वे सात लम्बी, हड्डियों जैसी उंगलियाँ उस एक सदी पुराने बेल्जियम ग्लास पर इस तरह घिस रही थीं जैसे कोई भूखा जानवर किसी बंद बक्से को फाड़ने की कोशिश कर रहा हो। शीशे की सतह पर बारीक, मकड़ी के जाले जैसी दरारें उभरने लगी थीं।

और उस हाथ में...

उस हाथ में लटके हुए जगतू के कटे हुए सिर की वे निष्प्राण, सफ़ेद आँखें अब भी आदित्य को घूर रही थीं। जगतू के कटे हुए नीले होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे। कोई आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी, लेकिन होंठों की हरकत से साफ़ पढ़ा जा सकता था:
‘कुंडी... मत... खोलना...’

तभी—

उस चेहरे के खोखले, लहूलुहान गड्ढों से काले ख़ून के आँसू शीशे पर बहे। और उस चेहरे का मुँह एक अमानवीय, वीभत्स चौड़ाई में खुल गया—इतना चौड़ा कि जबड़े की हड्डियाँ टूटने की ‘चटक’ आवाज़ कमरे के भीतर तक सुनाई दी।

सीटी की आवाज़ अब केवल बाहर से नहीं आ रही थी।

डाक-बंगले के बंद कमरों से, छत की लकड़ी की कड़ियों के बीच से, और दीवारों के भीतर छिपे चूहों के बिलों से... एक साथ सैकड़ों, हज़ारों लोगों के सीटी बजाने की पराश्रव्य (ultrasonic) गूँज उठने लगी:

फ़ूऊऊऊ... फ़ू-फ़ू... फ़ूऊऊऊ...

वह आवाज़ कानों के पर्दों को फाड़कर सीधे दिमाग़ के न्यूरॉन्स पर चोट कर रही थी। आदित्य का सिर इतनी तेज़ दर्द से फटने लगा कि वह अपने दोनों हाथों से कनपटियों को दबाकर फर्श पर घुटनों के बल गिर पड़ा। उसके नथुनों से ख़ून की दो गर्म लकीरें रिसकर उसकी जमी हुई मूंछों पर टपक पड़ीं।

2. काली भस्म का घेरा और रिवाल्वर का व्यर्थ लोहा
"नहीं... मुझे होश में रहना होगा... अगर मैं गिर गया, तो मैं कभी नहीं उठूँगा!"

आदित्य ने अपनी दाँत भींचते हुए अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उंगलियाँ ठंड से इतनी अकड़ चुकी थीं कि उन्हें मोड़ना भी अंगारों पर चलने जैसा लग रहा था।

जेब के भीतर उसकी उंगलियाँ उस छोटी, खुरदरी चमड़े की थैली से टकराईं जो जगतू ने उसे मलारी में दी थी—काली माता के थान की भस्म और सात साल पुराने अभिमंत्रित सरसों के बीज।

जैसे ही उसकी त्वचा ने उस थैली को छुआ, आदित्य के बदन में एक हल्की, गर्म सिहरन दौड़ी।

उसने थैली की डोरी अपने दाँतों से खींचकर खोली।

चर्र्र्र्क! धाँय!

खिड़की का शीशा टूट गया!

बर्फ़ीले शीशे के नुकीले टुकड़े कमरे के फर्श पर बिखर गए। बाहर की बर्फीली, जमा देने वाली आंधी एक हिंसक बवंडर की तरह डाइनिंग हॉल के भीतर घुसी। टेबल पर रखी पुरानी चीनी मिट्टी की प्लेटें और पीतल की कटलरी हवा में उड़कर दीवारों से टकराकर चकनाचूर होने लगीं।

और उस टूटी हुई खिड़की के चौखट से...

वह सात उंगलियों वाला लंबा, नीला, सड़ा हुआ हाथ अंदर की तरफ़ रेंगने लगा!

उस हाथ की त्वचा पर बाल नहीं थे; उस पर काले फफोले और पुरानी सिलाई के निशान थे, जैसे किसी मुर्दे के हाथ पर अलग-अलग शवों की उंगलियाँ सिल दी गई हों। वह हाथ हवा में टटोलता हुआ सीधे आदित्य की तरफ़ बढ़ रहा था।

आदित्य ने अपनी बायीं हथेली में वह भस्म और सरसों के बीज उड़ेले।

उसने अपने चारों तरफ़ लकड़ी के फर्श पर उस भस्म की एक गोल, अटूट लकीर खींच दी।

और उसने अपने कांपते हुए मुँह से वही पुराना कुलदेवता का स्मरण दोहराया जो बचपन में उसकी दादी हर शाम दीया जलाते समय बोलती थी:

"ॐ नमो बद्री-केदारनाथाय!

अष्टादश-भुजा धारी, महासू-भैरव रखवाली!

भूत-प्रेत, पिशाच-छलावा, दह-दिशा बांधूं,

कुलदेवता की आण, नंदा देवी की आण!"

जैसे ही उसने अंतिम शब्द बोला और मुट्ठी भर सरसों के बीज उस रेंगते हुए हाथ की तरफ़ फेंके—

चट-चट-चट! भभक!

वे सरसों के बीज जैसे ही उस नीले, सड़े हुए पंजे से टकराए, उनमें से बारूद की तरह नीली चिंगारियाँ फूटीं!

हवा में किसी जीवित माँस के जलने की असहनीय, बदबूदार गंध फैल गई।

खिड़की के पार से एक ऐसी तीखी, सुअर के काटे जाने जैसी चीख़ निकली जिसने उस पूरे डाक-बंगले की नींव को हिलाकर रख दिया। वह सात उंगलियों वाला हाथ झटके से पीछे खिंच गया।

आदित्य ने अपनी कांपती उंगलियों से ज़मीन पर पड़ा सरकारी रिवॉल्वर उठाया।

उसने खिड़की के उस अंधेरे चौखट की तरफ़ निशाना साधा।

धाँय! धाँय!

दो गोलियों की गूँज उस बंद कमरे में तोप के धमाके जैसी लगी। बारूद की कड़वी गंध ने एक पल के लिए उस सड़ी हुई हवा को दबा दिया।

लेकिन गोलियों ने बाहर किसी शरीर को नहीं भेदा।

वे केवल बाहर के घोर, काले अंधकार में विलीन हो गईं।

और उस अंधकार के भीतर से... एक बहुत भारी, खोखली, पत्थरों के आपस में रगड़ने जैसी हँसी सुनाई दी:

"गोलियाँ...? हाहाहा! तू धातु के इन छोटे तिनकों से उस सत्ता को मारेगा, जिसने 1911 में मेजर थोर्न की पूरी तोपची टुकड़ी को इसी फर्श पर अपने ही दाँतों से अपनी नसें काटने पर मजबूर कर दिया था?"

3. ऊपरी मंज़िल का ग्रामोफ़ोन और इतिहास की प्रतिध्वनि
कमरे के भीतर खिड़की से आती बर्फ़ की आंधी अब शांत हो चुकी थी, लेकिन वह सन्नाटा पहले से कहीं अधिक ख़तरनाक था।

आदित्य उस भस्म के खींचे हुए गोल घेरे के भीतर पालथी मारकर बैठा था।

वह जानता था कि जब तक वह इस रेखा के भीतर है, वह सुरक्षित है। लेकिन यह भस्म हमेशा के लिए नहीं थी; कमरे के भीतर बहती हुई हवा के झोंके धीरे-धीरे उस राख की लकीर को उड़ा रहे थे। उसके पास मुश्किल से आधा घंटा था।

अचानक—

डाइनिंग हॉल की ठीक ऊपर वाली छत—जो मेजर एडवर्ड थोर्न का मास्टर बेडरूम हुआ करती थी—वहाँ से भारी फ़ौजी बूटों के चलने की आवाज़ आने लगी।

ठक... ठक... ठक...

कोई ऊपर चहलकदमी कर रहा था। भारी कदमों के साथ-साथ किसी लोहे की भारी ज़ंजीर के फर्श पर घिसटने की आवाज़ आ रही थी—छन-छन... घिसट...

और फिर—

एक पुरानी, कसी हुई स्प्रिंग के घूमने की चरमराहट हुई।

कड़-कड़-कड़... (विंड-अप की आवाज़)

और उसके बाद...

एक बहुत पुराना, 1911 का विक्टोरियन ग्रामोफ़ोन (Phonograph) बज उठा!

उस ग्रामोफ़ोन की पीतल की नाल से एक अत्यंत धीमी, कर्कश और घिसटी हुई सुई की आवाज़ के साथ एक पुराना अंग्रेज़ी बच्चों का गीत (lullaby) गूँजने लगा। लेकिन वह गीत सामान्य नहीं था; रिकॉर्ड की गति इतनी धीमी थी कि गाने वाली औरत की आवाज़ किसी मरणासन्न डायन की तरह विकृत लग रही थी:

"Hush-a-bye, baby, on the tree top,

When the wind blows, the cradle will rock...

When the bough breaks, the cradle will fall,

And down will come baby, cradle and all..."

उस अंग्रेज़ी लोरी के हर एक अंतरे के बीच में...

किसी गढ़वाली औरत के छाती पीट-पीट कर रोने की दिल दहला देने वाली आवाज़ गूँज रही थी—एक ऐसा विलाप, जिसे सुनकर किसी भी जीवित मनुष्य का कलेजा मुँह को आ जाए:

"हाय रे मेरो लाल... कहाँ छोड़ गयो रे तू मिकूँ...

बर्फ़ की सेज पर भूखो-प्यास सो गयो रे...

उठ रे बबुआ, घर चल... रात बीती गई रे..."

वह विलाप किसी एक स्त्री का नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो सौ साल पहले उस घाटी में जितनी भी माताएँ अपने बच्चों को बर्फ़ीले तूफ़ान या महामारी में खो चुकी थीं, वे सब उस ग्रामोफ़ोन की पीतल की नाल के भीतर बैठकर रो रही हों।

आदित्य ने अपने दोनों हाथों से अपने कानों को कसकर बंद कर लिया।

लेकिन आवाज़ हवा से नहीं आ रही थी; वह आवाज़ सीधे उसकी खोपड़ी के भीतर गूँज रही थी, उसकी नसों में बर्फ़ का पानी बनकर दौड़ रही थी।

तभी—

डाइनिंग हॉल की लकड़ी की छत से ‘चर्र्र्र... कड़कड़ाती’ आवाज़ आई।

आदित्य ने सहमकर ऊपर देखा।

छत की देवदार की भारी, काली कड़ियाँ किसी अदृश्य, भीमकाय वज़न के नीचे झुक रही थीं। छत के तख़्ते इस तरह चरमरा रहे थे जैसे ऊपर कोई ऐसा वजूद रेंग रहा हो जिसका वज़न कई टन हो।

और उन तख़्तों की दरारों से...

काला, गाढ़ा और जमा देने वाला बदबूदार ख़ून टपकना शुरू हो गया!

टप... टप... टप...

ख़ून की पहली बूँद ज़मीन पर गिरी।

और वह बूँद ठीक उस भस्म के खींचे हुए गोल घेरे से केवल दो इंच दूर गिरी, जिसके भीतर आदित्य बैठा था।

जैसे ही वह काला ख़ून लकड़ी के फर्श को छुआ, फर्श से सड़ांध भरी सफ़ेद भाप उठी और लकड़ी का तख़्ता जलकर काला पड़ गया!

आदित्य की नज़र ऊपर टिकी रह गई।

ख़ून की बूँदें अब एक पतली धार में बदलने लगी थीं। और वह धार सीधे... ठीक आदित्य के सिर के ऊपर से, उस भस्म की गोल लकीर के केंद्र की तरफ़ झुक रही थी!

अगर उस ख़ून की एक भी बूँद उस भस्म के घेरे पर गिर जाती, तो वह पवित्र रक्षा-कवच एक ही सेकंड में कट जाता। और उसके बाद... इस कमरे के भीतर जो कुछ भी अदृश्य खड़ा था, वह उसे नोचकर खा जाता!

"मुझे यहाँ से निकलना होगा..." आदित्य के भीतर की आदिम जीवन-रक्षा की चेतना चीख़ उठी। "यह घेरा मुझे बचाएगा नहीं, यह मुझे यहीं क़ैद करके मार देगा!"

2. सीढ़ियों का साया और मेजर थोर्न का कंकाल-स्वरूप
आदित्य ने अपनी नज़रें चारों तरफ़ दौड़ाईं।

डाइनिंग हॉल के कोने में, जहाँ उस भारी महोगनी की मेज़ का साया पड़ रहा था, वहाँ एक पुराना, आधा फटा हुआ कश्मीरी कालीन बिछा था।

कालीन का एक कोना मुड़ा हुआ था।

और उस मुड़े हुए कोने के नीचे... फर्श की लकड़ी में जड़ा हुआ एक लोहे का भारी, चौकोर कुंडा (Trapdoor Handle) दिखाई दे रहा था!

वही था वह गुप्त रास्ता!

वही तहख़ाना (Cellar), जिसके बारे में उसके दादा त्रिलोक सिंह रावत ने 1962 की उस डायरी में लिखा था: ‘अंग्रेज़ ने जिस शिवलिंग को तोड़ा था, उसकी सर्प-शिला इस बंगले के तहख़ाने में दबी है...’

लेकिन उस ट्रैपडोर तक पहुँचने के लिए आदित्य को उस भस्म के घेरे से बाहर निकलना था। और उस ट्रैपडोर के ठीक रास्ते में... डाइनिंग हॉल की घुमावदार लकड़ी की सीढ़ियाँ थीं जो ऊपर के मास्टर बेडरूम की तरफ़ जाती थीं।

और उन सीढ़ियों पर...

आदित्य की टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों के निचले पायदान पर पड़ी।

सीढ़ियों के अंधेरे से... धीरे-धीरे... कोई नीचे उतर रहा था।

ठक... ठक... ठक...

वह कोई साया या धुंध नहीं थी। वह एक पूर्ण, ठोस, भौतिक वजूद था।

उसने 1911 के दौर की ब्रिटिश भारतीय सेना की खाकी हंटिंग वर्दी पहन रखी थी। कंधों पर मेजर के पीतल के सितारे धूल और काई से ढके थे। पैरों में भारी लेदर के राइडिंग बूट्स थे, जिन पर जंग लगी लोहे की रकाबें लटकी थीं।

लेकिन उस वर्दी के ऊपर जो चेहरा था...

वह चेहरा किसी जीवित मनुष्य का नहीं था।

वह मेजर एडवर्ड थोर्न था!

उसका आधा चेहरा तो उसी पुराने तैलचित्र जैसा गोरा, तीखी नाक और मूंछों वाला अंग्रेज़ था, लेकिन उसका बायाँ आधा चेहरा... पूरी तरह गल चुका था!

बाएँ गाल का मांस झड़ चुका था और सफ़ेद जबड़े की हड्डियाँ बाहर निकली हुई थीं। और सबसे भयानक बात—उसकी खोपड़ी के भीतर कोई दिमाग़ या आँख नहीं थी; उसकी खोपड़ी के भीतर से बांझ और भोजपत्र के प्राचीन पेड़ों की काली, नुकीली जड़ें बाहर निकलकर उसकी गर्दन और सीने में धँसी हुई थीं!

उसका सीना... वर्दी के भीतर से पूरी तरह खोखला था!

पसलियों के उस खाली पिंजरे के बीच में दिल की जगह... एक अजीब, नीले रंग का फॉस्फोरस जैसा पत्थर धड़क रहा था—धक... धक... धक...

मेजर थोर्न की वह बची हुई एक नीली आँख घूमी और उसने सीधे आदित्य की आँखों में देखा।

जब उसने अपने सड़े हुए होंठ खोले, तो कमरे में एक साथ दो आवाज़ें गूँजीं—एक तीखी, कड़क अंग्रेज़ी उच्चारण वाली, और दूसरी... किसी बहुत प्राचीन, पहाड़ी पिशाच की घुरघुराहट:

"So... the Rawat blood has returned to my cellar."

(तो... रावत ख़ानदान का ख़ून मेरे तहख़ाने में वापस लौट ही आया।)

उसकी आवाज़ में बर्फ़ीली हवा की सीटी जैसी सरसराहट थी:
*"1911 में मैंने इस पहाड़ की छाती में डायनामाइट लगाया था, बालक... मुझे लगा था कि मैं यहाँ सोने और यूरेनियम की खदान ढूँढ रहा हूँ।

लेकिन मैंने क्या निकाला?

मैंने उस आदिम 'क्षेत्रपाल' की नींद को तोड़ दिया, जो सतयुग से इस कालिंदी दर्रे के नीचे सो रहा था!

उसने मेरी देह को इस ज़मीन की जड़ों में सिल दिया... और तुम्हारे उस मक्कार दादा—त्रिलोक सिंह—ने 1962 में मुझे धोखा देकर इस बंगले के नीचे वह ताला लगा दिया जिसकी चाबी केवल उसके ख़ून से खुल सकती थी!"*

मेजर थोर्न ने अपनी कमर से 1911 की वही पुरानी वेब्ली सर्विस-रिवॉल्वर निकाली।

लेकिन उस रिवॉल्वर की नली से कोई गोली नहीं निकलने वाली थी; उस नली से काले धुएँ के रूप में दर्जनों छोटी-छोटी, चीख़ती हुई इंसानी रूहें बाहर फड़फड़ा रही थीं!

3. भस्म का टूटना और पाताल में छलांग
छत से ख़ून की वह मोटी धार अब उस भस्म के घेरे के बिल्कुल किनारे पर गिर चुकी थी।

छ्छ्छ्छ्र्र्र!

राख की वह पवित्र लकीर जलकर बुझ गई। रक्षा-कवच टूट गया!

जिस पल घेरा टूटा, कमरे के भीतर की सारी परछाइयाँ एक साथ जीवित हो उठीं।

दीवारों पर टंगे हिरण और हिम तेंदुए के वे स्टफ्ड सिर अपनी लकड़ी की पट्टियों से बाहर निकलकर हवा में जबड़े चलाने लगे। डाइनिंग टेबल की भारी कुर्सियाँ अपने आप हवा में उछलीं और आदित्य की तरफ़ उड़ने लगीं!

"अब तू यहीं रहेगा, रावत!" मेजर थोर्न का कंकाल-रूपी जबड़ा पागलों की तरह हिला।

वह सीढ़ियों से नीचे झपटा। उसकी उंगलियाँ लोहे के छुरों की तरह खिंच गईं।

आदित्य के पास सोचने का एक मिली-सेकंड भी नहीं था।

उसने अपनी डाउन-जैकेट का कॉलर भींचा, अपने दोनों हाथों से उस सरकारी रिवॉल्वर को पकड़ा, और अपनी पूरी ताक़त से उस मुड़े हुए कश्मीरी कालीन की तरफ़ छलांग लगा दी!

धड़ाम!

एक भारी महोगनी की कुर्सी आदित्य की पीठ पर आकर टकराई।

दर्द का एक भयानक करंट उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गया, लेकिन उसने दर्द की परवाह नहीं की।

फर्श पर घिसटते हुए उसने अपने दाएँ हाथ से उस ट्रैपडोर के लोहे के कुंडे को जकड़ लिया।

कुंडा बर्फ़ और जंग से जाम था।

"खुल जा... हरामज़ादे खुल जा!" आदित्य ने अपनी दाँत पीसते हुए दहाड़ लगाई।

पीछे से मेजर थोर्न का वह सड़ा हुआ, जड़ों से भरा हाथ आदित्य के टखने पर आ टिका।

बर्फ़ का करंट!

जैसे ही थोर्न की उंगलियों ने आदित्य की जींस के पार उसकी त्वचा को छुआ, आदित्य के दाएँ पैर की नसें नीली पड़ गईं। ऐसा लगा मानो किसी ने उसकी जांघ के भीतर खौलता हुआ तरल नाइट्रोजन उँडेल दिया हो।

आदित्य ने अपने बाएँ पैर के जूते की भारी एड़ी से मेजर थोर्न के उस सड़े हुए चेहरे पर पूरी ताक़त से वार किया!

चटक!

थोर्न के जबड़े की दो हड्डियाँ टूटकर गिर पड़ीं। उसकी पकड़ एक सेकंड के लिए ढीली हुई।

और उसी एक सेकंड में—

आदित्य ने अपनी पूरी देह का वज़न उस लोहे के कुंडे पर डाल दिया।

चर्र्र्र्र्क! धड़ाम!

लकड़ी का वह भारी, छह इंच मोटा चौकोर तख़्ता ऊपर उठ गया।

नीचे... एक सीलन भरा, सड़ांध मारता हुआ, अंतहीन काला गड्ढा था, जिसमें नीचे की तरफ़ संकरी, नक्काशीदार पत्थरों की सीढ़ियाँ उतर रही थीं।

आदित्य बिना यह देखे कि नीचे कितनी गहराई है, उस खुले हुए अंधेरे मुहाने में कूद गया!

उसने गिरते-गिरते अपने दोनों हाथों से उस भारी लकड़ी के तख़्ते को ऊपर से खींच लिया।

धड़-धड़ाम!

ट्रैपडोर बंद हो गया।

आदित्य ने नीचे से उस भारी, लोहे की प्राचीन सांकल को अड़ा दिया।

ऊपर से तुरंत भयानक, पागलों जैसी मुक्कों और नाखूनों की बौछार शुरू हो गई—धड़-धड़-धड़! खुरच-खुरच!

मेजर थोर्न और वे सैकड़ों साए उस बंद तख़्ते को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वह तख़्ता देवदार की ऐसी अभिमंत्रित लकड़ी का बना था जिस पर तांबे के पुराने सुरक्षा-यंत्र की पत्तियाँ जड़ी थीं। वे ऊपर से उसे तुरंत नहीं तोड़ सकते थे।

आदित्य पत्थरों की सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ नीचे गिरा और एक सख्त, गीली चट्टानी सतह पर जाकर रुक गया।

4. 1962 की बंकर-चौकी और युद्ध का कंकाल
कमरे का शोर अब बहुत दूर, किसी बंद संदूक के भीतर से आता हुआ महसूस हो रहा था।

यहाँ नीचे...

एक ऐसा गहरा, दमघोंटू, पाषाण-युगीन सन्नाटा था जो कानों में किसी भारी धातु की तरह चुभ रहा था।

आदित्य ने हांफते हुए, अपनी टूटी हुई पीठ और सुन्न पड़े पैर को सहलाया। उसका पैर अब भी कांप रहा था, लेकिन वह चलने लायक था।

उसने अपनी टॉर्च उठाई।

टॉर्च का काँच चटक चुका था, लेकिन उसकी सफ़ेद एलईडी रोशनी अब भी जल रही थी।

उसने रोशनी को चारों तरफ़ घुमाया।

यह डाक-बंगले का कोई साधारण वाइन-सेलार या राशन रखने का तहख़ाना नहीं था।

यह पहाड़ की मूल, जीवित काले बेसाल्ट पत्थर की चट्टान को अंदर से काटकर बनाई गई एक विशाल, अंडाकार गुफ़ा थी।

दीवारों पर अंग्रेज़ों के ज़माने के चूने का लेप नहीं था; उन दीवारों पर हज़ारों साल पुरानी, प्रागैतिहासिक शैल-चित्रकारियाँ (cave paintings) उकेरी गई थीं—बर्फ़ीले त्रिशूल, सींगों वाले विशालकाय भालू, मुंड-माला पहने हुए भयानक क्षेत्रपाल, और ऐसी नर्तकियाँ जिनके पैर पीछे की तरफ़ मुड़े हुए थे (आंछड़ियों के चित्र)।

लेकिन उस प्राचीन गुफ़ा के एक हिस्से में...

1962 के दौर का एक भारतीय सेना का सैन्य बंकर बना हुआ था!

कमरे के एक कोने में जंग लगे लोहे के भारी सैन्य बक्से रखे थे, जिन पर धुंधले सफ़ेद अक्षरों में लिखा था:

INDIAN ARMY — 4TH GRENADIERS (CHUSHUL/GARHWAL SECTOR)

EMERGENCY RATION & AMMUNITION (OCTOBER 1962)

बक्से खुले पड़े थे।

भीतर पुराने, जंग लगे थ्री-नॉट-थ्री (.303) राइफ़ल के कारतूस, फटे हुए मोटे ऊनी कंबल, और मिट्टी के तेल के खाली डिब्बे बिखरे पड़े थे।

दीवार पर एक लकड़ी की मेज़ के ऊपर... 1960 के दशक का एक पुराना, भारी, वैक्यूम-ट्यूब वाला सैन्य वायरलेस ट्रांसीवर (Radio Transceiver) रखा था।

उसकी हेडफ़ोन की तारें चूहे कुतर चुके थे, लेकिन उसकी हरी ट्यूनिंग लाइट... बिना किसी बिजली या बैटरी के भी... बहुत धीमी, मद्धिम गति से स्पंदित (pulse) हो रही थी!

टिट-टिट... टिट-टिट-टिट... (मॉर्स कोड जैसी बहुत बारीक आवाज़)

और उस मेज़ के ठीक पीछे, दीवार पर...

सैनिकों की भारी संगीन (bayonet) से खुरच-खुरच कर एक विशाल महासू देवता का 'शत्रु-नाशक रक्षा-यंत्र' बनाया गया था। उस यंत्र के ठीक बीच में, सूखकर काले पड़ चुके इंसानी ख़ून से कुछ पंक्तियाँ लिखी गई थीं।

आदित्य कांपते हुए उस दीवार के पास पहुँचा।

उसने टॉर्च की रोशनी उस लिखावट पर डाली।

वह लिखावट... उसके दादा त्रिलोक सिंह रावत की थी!

दीवार पर लिखा था:

"17 नवंबर 1962।

चीनी सेना ने रेज़ांग ला और तवांग में मोर्चा खोल दिया है। नीचे घाटी से संपर्क टूट चुका है।

लेकिन यहाँ... इस अंधार-चौकी पर जो चीज़ जाग चुकी है, वह चीनियों से हज़ार गुना ज़्यादा भयानक है।

मेजर थोर्न का कंकाल अब अकेला नहीं है।

कालिंदी दर्रे की 'आंछड़ियों' ने उस अंग्रेज़ के साथ मिलकर इस ज़मीन की सील तोड़ दी है।

आज रात मुझे वह अंतिम आहुति देनी ही होगी।

अगर मैंने इस 'सर्प-शिला' पर वह सौदा नहीं किया... तो मेरा वंश कभी फलेगा नहीं।

मेरा बेटा... मेरा नन्हा राजीव... तू मुझे कभी माफ़ मत करना!"

आदित्य की साँसें हलक़ में अटक गईं।

राजीव... राजीव रावत!

वह उसके पिता का नाम था!

वही पिता, जो 1962 में केवल दो महीने के एक दूधमुँहे बच्चे थे, जिन्हें त्रिलोक सिंह अपने पीछे गाँव में छोड़ आए थे!

"दादाजी ने मेरे पिता के साथ क्या किया था?" आदित्य की आँखों से बेबसी के आँसू टपक पड़े। "उन्होंने ऐसा कौन-सा सौदा किया था जिसने 62 साल बाद मुझे इस मौत के कुएँ में खींच लिया?"

5. काले पत्थर का वेदी-कक्ष और सर्प-शिला
तहख़ाने के सबसे पिछले हिस्से में, जहाँ बेसाल्ट चट्टान एक संकरे, धनुषाकार मेहराब में बदल जाती थी... वहाँ से एक बहुत हल्की, नीली और हरी रूहानी रोशनी बाहर रिस रही थी।

हवा में कपूर, सड़ी हुई कस्तूरी और एक बहुत प्राचीन, जीवित साँप की केंचुली जैसी गंध फैली थी।

आदित्य अपने कांपते पैरों को घसीटता हुआ उस मेहराब के भीतर दाख़िल हुआ।

सामने जो दृश्य था, उसने आदित्य के मस्तिष्क की तर्क-शक्ति की अंतिम परत को भी जलाकर राख कर दिया।

यह उस गुफ़ा का सबसे भीतरी गर्भगृह था।

कमरे के फर्श पर काले पत्थरों की एक तीन-मंज़िला वेदी बनी हुई थी।

और उस वेदी के बिल्कुल केंद्र में... एक अठारह इंच ऊँची, घनीभूत, चमकती हुई काले ग्रेनाइट की 'सर्प-शिला' (The Coiled Serpent Stone) स्थापित थी!

वह कोई साधारण नक्काशीदार पत्थर नहीं था।

वह शिला एक जीवित, सात फनों वाले काले नाग की तरह कुंडली मारे बैठी थी।

और सबसे रूह-कँपा देने वाली बात यह थी कि उस पत्थर की सतह ठंडी या सूखी नहीं थी; उसकी सतह पर एक बहुत गाढ़ा, पारदर्शी, चिपचिपा तेल रिस रहा था जो किसी जीवित साँप के शरीर की तरह मद्धिम गति से ऊपर-नीचे साँस ले रहा था—हिसस्स... फूँ...

शिला के फन के बीच में, जहाँ भगवान शिव का त्रिनेत्र होता है... वहाँ एक गहरा, लाल रंग का रक्त-मणि (Blood Ruby) जड़ा हुआ था।

वह मणि उस अंधेरे में किसी धड़कते हुए दिल की तरह लाल रोशनी छोड़ रही थी।

और उस सर्प-शिला के ठीक सामने...

पत्थरों के फर्श पर एक बहुत पुराना, चीड़ की लकड़ी का बक्सा रखा था।

बक्से के ढक्कन पर पीतल की एक नेमप्लेट लगी थी:

त्रिलोक सिंह रावत — कार्यवाहक चौकीदार (1962)

आदित्य घुटनों के बल उस बक्से के सामने बैठ गया।

उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि वह बक्से की पीतल की कुंडी को बमुश्किल खोल पाया।

बक्से के भीतर...

उसके दादा का वही पुराना, खाकी वूलन कोट रखा था। उनका पीतल का चौकीदार का बिल्ला, कुछ पुराने तांबे के सिक्के, और...

एक बहुत पुराना, 1962 का 'स्पूल-टू-स्पूल मैग्नेटिक वायर रिकॉर्डर' (Magnetic Wire/Tape Recorder) रखा था!

उस रिकॉर्डर के दोनों पहियों पर पतली, चुंबकीय धातु की तार लिपटी हुई थी।

रिकॉर्डर के ऊपर एक पीले पड़ चुके काग़ज़ पर ताज़ा ख़ून जैसी लाल स्याही से एक संदेश लिखा था।

आदित्य ने उस काग़ज़ को उठाया।

काग़ज़ के ऊपर मोटे, कांपते हुए अक्षरों में जो नाम लिखा था... उस नाम को देखकर आदित्य के हाथ से टॉर्च छूटकर पत्थरों पर गिर पड़ी।

उस काग़ज़ पर लिखा था:

"प्रिय पोते... आदित्य रावत के लिए।"

आदित्य का पूरा वजूद सुन्न पड़ गया।

1962?

बासठ साल पहले?

जब आदित्य के पिता राजीव केवल दो महीने के बच्चे थे... जब आदित्य के पैदा होने में भी तैंतीस साल का वक़्त बाकी था...

तब उसके दादा ने इस काग़ज़ पर 'आदित्य' का नाम कैसे लिख दिया था?!

6. 1962 का टेप और पिता का सच
क्लिक!

अचानक, उस बक्से के भीतर रखे उस बासठ साल पुराने रिकॉर्डर का यांत्रिक स्विच... अपने आप... बिना किसी इंसानी छुअन के नीचे दब गया!

चर्र्र्र... घर्र्र-घर्र्र-घर्र्र...

धातु की चुंबकीय तार के पहिये घूमने लगे।

एक बहुत पुरानी, भारी सरसराहट और वैक्यूम ट्यूब्स की भिनभिनाहट के बीच से... रिकॉर्डर के छोटे से स्पीकर से एक आवाज़ गूँज उठी।

वह आवाज़ त्रिलोक सिंह रावत की थी।

लेकिन यह कोई बूढ़ी, खांसती हुई आवाज़ नहीं थी; यह 1962 के एक बत्तीस वर्षीय, हट्टे-कट्टे, लेकिन आतंक और उन्माद के चरम पर पहुँचे हुए एक असहाय पिता की आवाज़ थी:

*"आदित्य... अगर तू यह टेप सुन रहा है, तो इसका मतलब है कि मेरी गणना सही थी।

तू सत्ताईस साल का हो चुका है... और विभाग ने तुझे इस डाक-बंगले में भेज दिया है।

रो मत, बेटा। और मुझे कोसना भी मत।

1962 की इस 17 नवंबर की रात, जब चीनी तोपें गरज रही थीं और इस कालिंदी घाटी के प्रेत मेरी खाल खींचने के लिए इस तहख़ाने के दरवाज़े को तोड़ रहे थे...
तब इस 'सर्प-शिला' के भीतर से उस आदिम क्षेत्रपाल की आवाज़ गूँजी थी।

उसने मुझसे कहा था:

'त्रिलोक सिंह! अगर तू अपने इस पूरे रावत ख़ानदान को इस रात ज़िंदा बचाना चाहता है... तो तुझे अपने वंश का सबसे कीमती रक्त मुझे सौंपना होगा!'

मेरे पास कोई चारा नहीं था, आदित्य!

अगर मैं सौदा नहीं करता, तो हम सब उसी रात इस बर्फ़ के नीचे सड़ जाते!"*

टेप पर त्रिलोक के रोने और उसकी सिसकियों की आवाज़ आने लगी:

*"मैंने उस शिला के आगे हाथ जोड़कर कहा था कि मेरे गाँव में मेरा दो महीने का बेटा—राजीव—सो रहा है... मैं उसकी जान की भीख माँगता हूँ!

तब उस क्षेत्रपाल ने एक भयानक हँसी के साथ कहा था:

'ठीक है! मैं तेरे बेटे राजीव के प्राण आज नहीं लूँगा...

लेकिन उसके बदले... राजीव का जो पहला बेटा पैदा होगा—आदित्य...

जब वह सत्ताईस साल का होगा... तो वह ख़ुद चलकर इस डाक-बंगले की चौखट पर आएगा!

और उस दिन... मैं उस सौदे की पूरी क़ीमत वसूल करूँगा!'

हाँ, आदित्य!

मैंने बासठ साल पहले... अपने बेटे को बचाने के लिए... अपनी आने वाली पीढ़ी... यानी तुझे इस डाक-बंगले के शैतान को गिरवी रख दिया था!"*

आदित्य के पैरों तले से पूरी कायनात खिसक गई।

उसकी ज़िंदगी... उसका यह देहरादून का दफ़्तर... उसका यह सर्वे... कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था!

वह कोई नौकरी करने यहाँ नहीं आया था; वह तो बासठ साल पहले किए गए एक सौदे की 'क़िस्त' था, जिसे चुकाने के लिए उसे यहाँ बुलाया गया था!

7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-ट्विस्ट: पीछे की आहट (The Twist)
टेप पर त्रिलोक की आवाज़ अचानक बहुत धीमी, फुसफुसाहट जैसी हो गई:

*"आदित्य... अगर तू सोच रहा है कि बाहर जो खड़ा है, वह केवल मेजर थोर्न है या कोई छलावा है... तो तू ग़लत है।

जब 1962 में मैंने वह सौदा किया था, तो उस क्षेत्रपाल ने मुझे तुरंत नहीं मारा।

उसने मुझे इस तहख़ाने की चट्टानों में ज़िंदा चिनवा दिया था ताकि मैं तेरी बलि का साक्षी बन सकूँ!

और जो बाहर जगतू का सिर लिए खड़ा था...

वह कोई पराया राक्षस नहीं है, आदित्य...

वह तो..."*

कट!

टेप की तार अचानक टूट गई।

रिकॉर्डर का पहिया एक भयानक झटके के साथ रुक गया।

कमरे की वह नीली-हरी रोशनी अचानक बुझ गई। केवल उस सर्प-शिला के माथे पर जड़ा वह लाल रूबी पत्थर अंगारे की तरह दहक रहा था।

और उस सन्नाटे में...

आदित्य के ठीक पीछे...

पत्थरों के गीले फर्श पर किसी के नंगे, भारी कदमों की सरसराहट हुई:

छप... छप...

आदित्य की पूरी पीठ पर बर्फ़ का पहाड़ टूट पड़ा। उसका रोम-रोम कांप उठा।

उसने तो ऊपर का ट्रैपडोर अंदर से सीलबंद कर दिया था!

तो यह उसके पीछे कौन खड़ा था?

तभी—

एक बहुत ठंडी, गीली, चिपचिपी और बर्फ़ जैसी जमी हुई हथेली...

आदित्य के दाएँ कंधे पर आकर टिक गई।

उस हथेली की त्वचा पर माँस नहीं था; उस पर सूखी मिट्टी, सड़ी हुई कफ़न की पट्टियाँ और छह इंच लंबे, काले नाख़ून थे।

और आदित्य के ठीक कान के पीछे...
एक ऐसी साँस टकराई जिसमें सड़े हुए दूध और गंगाजल की गंध थी।
एक बहुत जानी-पहचानी, बूढ़ी, कंपकंपाती आवाज़ ने आदित्य के कान के पर्दों में अपनी ज़हरीली मिठास घोल दी:
**"टेप पूरा सुन लेता, मेरे बच्चे...

मैंने कहा था न...

कि जब तक तू नहीं आएगा... तब तक तेरे इस अभागे दादा को इस अंधेरे से मुक्ति कैसे मिलती?

देख... मैं बासठ साल से भूखा हूँ...

और आज कालिंदी के देवता ने तेरा यह ताज़ा ख़ून... मेरे ही हाथों में परोस दिया है!"**

आदित्य ने कांपते हुए, धीमी गति से अपनी गर्दन पीछे घुमाई।

और उस लाल रूबी की ख़ूनी रोशनी में...

उसने देखा कि उसके कंधे पर हाथ रखे जो वजूद खड़ा था...

वह कोई कंकाल या प्रेत नहीं था...

वह साक्षात उसका अपना दादा—त्रिलोक सिंह रावत था!

उसकी आँखें पूरी तरह बाहर लटकी हुई थीं, उसकी छाती पर 1962 की संगीन के घावों से काले कीड़े रेंग रहे थे, और उसके जबड़े में इंसानी दाँतों की जगह... काले साँपों के नुकीले ज़हरीले दाँत उग आए थे!

और त्रिलोक के दूसरे हाथ में...

वही 1962 की जंग लगी, भारी संगीन (Military Bayonet) थी, जिसकी नोक सीधे आदित्य के गले की नस पर आ टिकी थी!

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देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · सभी भाग →

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