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भाग 3: आंछड़ियों का घुंघरू, सर्प-शिला का रक्त और पाताल-दरार
Piyashi Atma · Paranormal · 13 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
- Chapter
- 3 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2544
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. संगीन का ठंडा लोहा और दादा के अश्रु
गले की त्वचा पर लोहे का स्पर्श केवल ठंडा नहीं था; वह उस बासठ साल पुरानी जंग और सूखे हुए ख़ून की पपड़ियों की चुभन थी जो इतिहास के किसी अनसुलझे घाव की तरह कुरेदी जा रही थी।
"दादाजी..."
आदित्य के होंठों से निकला यह शब्द किसी प्रार्थना जैसा नहीं, बल्कि एक अंतिम, असहाय सिसकी जैसा था। उसकी गर्दन की मुख्य नस (carotid artery) उस 1962 की ब्रिटिश-निर्मित संगीन की धार से मुश्किल से आधा मिलीमीटर दूर थरथरा रही थी।
त्रिलोक सिंह रावत के उस क्षत-विक्षत, पाषाण-समान चेहरे की पेशियाँ कांपीं।
उसकी आँखों के कोटरों में जो बाहर की तरफ़ लटकी हुई गंदली, मृत पुतलियाँ थीं, वे एक पल के लिए घूमीं। उसके काले, सांपों जैसे विष-दंतों के बीच से झागदार लार टपककर आदित्य के कॉलर पर गिरी। उस लार में फॉर्मेलिन, कस्तूरी और बासठ साल से ज़मीन के नीचे दबी सड़ी हुई मिट्टी की वही तीखी गंध थी।
"राजीव..." त्रिलोक के गले से एक भयानक, घुरघुराती आवाज़ निकली।
वह आवाज़ किसी टूटे हुए लाउडस्पीकर जैसी थी, जिसके भीतर दो अलग-अलग लोग एक साथ बोल रहे थे—एक वह हिंसक, आदिम पिशाच जो इस सर्प-शिला के रक्त का दास था, और दूसरा... वह अभागा गढ़वाली पिता जो 1962 की उस काली रात अपने दो महीने के बच्चे को छोड़कर इस बर्फ़ीले कफ़न में दफ़्न हो गया था।
"तू... तू राजीव का बेटा है?" संगीन की नोक ज़रा-सी हिली। त्रिलोक के हाथ की सूखी, छह इंच लंबी, काली हड्डियों जैसी उंगलियाँ थरथराईं।
"हाँ, दादाजी!" आदित्य ने अपनी आँखों से बहते आंसुओं को रोके बिना कहा। दर्द और भय की सीमा पार हो चुकी थी।
"मैं राजीव का बेटा हूँ। वही राजीव... जिसे आप धारकोट के गाँव में अपनी ऊनी लोई ओढ़ाकर छोड़ आए थे। पिताजी आज भी हर दीवाली पर आपकी उस पुरानी खाकी वर्दी की पेटी के आगे दीया जलाते हैं! वे कहते हैं कि उनके बापू देश की सरहद पर बर्फ़ में गुम हो गए थे... वे यह नहीं जानते कि उनका पिता यहाँ किसी पाताल-कुएँ में अपने ही ख़ून की बलि माँग रहा है!"
'राजीव' नाम सुनते ही त्रिलोक के भीतर कुछ भयानक घटा।
उसके सीने के उन संगीन के पुराने घावों से रेंगते हुए काले कीड़े अचानक तड़पकर गिरने लगे। उसके चेहरे की चमड़ी पर एक असहनीय, रूहानी दर्द की लकीरें खिंच गईं।
"नहीं... नहीं!"
त्रिलोक ने अपने ही बाएँ हाथ के पंजों से अपने सिर के बालों को नोच लिया।
उसकी चीख़ उस गुफ़ा की बेसाल्ट चट्टानों से टकराई:
"भाग जा, आदित्य! यह चट्टान मुझे खा रही है! वह क्षेत्रपाल... वह मेरी खोपड़ी के भीतर अपने फन फैला रहा है!
मैंने चाहा था कि तू न आए... मैंने उस लोक निर्माण विभाग के नक्शों में अपने ख़ून से 'ख़तरा' लिखा था... लेकिन वह अंग्रेज़... वह मेजर थोर्न तुझे खींच लाया!"
2. ऊपर का प्रलय: टूटी हुई सांकल और थोर्न की सेना
इससे पहले कि आदित्य कुछ समझ पाता, ठीक उनके सिर के ऊपर—उस भारी लकड़ी के ट्रैपडोर पर—एक ऐसा प्रलयंकारी प्रहार हुआ जिसने गुफ़ा की छत से पत्थरों के भारी टुकड़े गिरा दिए।
कड़कड़ाती बिजली! धाँय! चर्र्र्र्र्क!
वह छह इंच मोटा, देवदार की अभिमंत्रित लकड़ी का तख़्ता... जिसे आदित्य ने नीचे से लोहे की सांकल से बंद किया था... बीच से दो फाड़ हो गया था!
टूटे हुए तख़्ते के मुहाने से बाहर की वही शून्य से बीस डिग्री नीचे की बर्फीली आंधी, सड़ांध और चीत्कार नीचे तहख़ाने में उतर आई।
और उस टूटे हुए मुहाने से...
एक के बाद एक... कंकालों और छलावों का एक रेला नीचे सीढ़ियों पर रेंगने लगा!
सबसे आगे मेजर एडवर्ड थोर्न था।
उसकी खोपड़ी के भीतर से निकलती हुई बांझ के पेड़ों की वे काली जड़ें अब हवा में कोड़ों की तरह लहरा रही थीं। उसकी आधी सड़ी हुई आँख उस सर्प-शिला पर टिक गई।
और उसके पीछे...
1911 के वे छह अन्य ब्रिटिश सिपाही थे, जिनकी देहें केवल जंग लगे लोहे के कंकाल बन चुकी थीं। उनके हाथों में मुड़ी हुई राइफ़लें और कुल्हाड़ियाँ थीं। उनके जबड़े बिना किसी माँस के, केवल धातु के तारों से जुड़े हुए, एक साथ हवा में चबाने की आवाज़ें निकाल रहे थे—खट-खट-खट!
"The Stone!" थोर्न की उस दोहरी, अंग्रेज़ी-पिशाच आवाज़ ने उस गर्भगृह को कंपा दिया।
"The Naga-Ruby is mine! इस शिला का अमृत पीकर ही हम इस पूरे हिमालय की नसों में अपना साम्राज्य फैलाएँगे!"
थोर्न ने अपनी सूखी उंगलियों का इशारा किया।
वे छह कंकाल-सैनिक सीढ़ियों से कूदते हुए सीधे उस तीन-मंज़िला वेदी की तरफ़ झपटे!
3. घुंघरुओं की झंकार: कालिंदी की आंछड़ियाँ
लेकिन जैसे ही उन ब्रिटिश प्रेतों के बूटों ने उस गर्भगृह के फर्श को छुआ—
गुफ़ा के भीतर का वातावरण अचानक एक रूह-कँपा देने वाले, मादक और अमानवीय संगीत से भर गया।
छन... छन... छन...
घुंघरुओं की आवाज़।
वह कोई साधारण पायल की झंकार नहीं थी।
वह उस हिमालय की लोक-कथाओं में सबसे खौफ़नाक मानी जाने वाली 'आंछड़ियों' (The Phantom Nymphs of Garhwal) के नूपुरों की आवाज़ थी!
गढ़वाल के पुराने बुजुर्ग कहते हैं कि ऊँचे बुग्यालों और बंजर दर्रों में जो कुंवारी कन्याएं या अप्सराएं अकाल मृत्यु को प्राप्त होकर प्रेत-योनि में जाती हैं, वे 'आंछड़ी' बन जाती हैं। वे रूपवती होती हैं, लेकिन उनकी आत्मा में केवल पुरुषों के रक्त और चेतना को सोखने की प्यास होती है। वे कभी ज़मीन पर पाँव नहीं रखतीं; वे हवा में तैरती हैं, और उनके पैर... हमेशा पीछे की तरफ़ मुड़े होते हैं!
गुफ़ा की दीवारों के काले पत्थरों से...
सफ़ेद, घनी, बर्फीली धुंध रिसने लगी।
और उस धुंध के भीतर से... सात नर्तकियाँ प्रकट हुईं।
उनका रूप इतना अलौकिक और सम्मोहक था कि एक सामान्य इंसान अपनी जान की भीख भूलकर उनके कदमों में गिर जाए।
वे शुद्ध कश्मीरी पश्मीना और रेशम के पहाड़ी घाघरे पहने हुए थीं। उनके गले में सोने के भारी 'गलोबंद' और नाक में विशाल 'नथ' लटक रही थी। उनके बाल घुटनों तक काले नागों की तरह लहरा रहे थे।
लेकिन जब आदित्य की नज़र उनके चेहरों पर पड़ी—
उन सुंदर, गोरे गालों के बीच में... आँखें नहीं थीं!
वहाँ केवल बर्फ़ की सूखी, नीली पुतलियाँ थीं जो हिल नहीं रही थीं।
और उनके होंठों से... इंसानी बोली नहीं, बल्कि हवा में एक बहुत बारीक, सुरीली सीटी की धुन फूट रही थी:
फ़ूऊऊऊ... फ़ू-फ़ू-फ़ू...
वही सीटी!
जो डाक-बंगले के बाहर रात भर बज रही थी!
आंछड़ियों ने अपने हाथ हवा में लहराए।
उनके हाथों की उंगलियों से बर्फ़ के नुकीले, बर्छी जैसे त्रिशूल बाहर निकले।
वे मेजर थोर्न के उन ब्रिटिश कंकालों पर एक बर्फीले तूफ़ान की तरह टूट पड़ीं!
कड़कड़ाती बर्फ़! चटक! चीत्कार!
एक आंछड़ी ने अपने दोनों हाथों से एक ब्रिटिश सैनिक की खोपड़ी को पकड़ा और एक ही झटके में उसके कंकाल को कंक्रीट की तरह पीसकर रख दिया।
गुफ़ा में दो अलग-अलग कालखंडों के प्रेतों का महा-संग्राम शुरू हो चुका था—1911 का साम्राज्यवादी ब्रिटिश अहंकार, और इस हिमालय का अनादि, आदिम, प्रकृति-प्रेत का महा-क्रोध!
4. सर्प-शिला का महा-जागृति और त्रिलोक का अंतिम निर्णय
उस भयानक युद्ध के बीच, गुफ़ा के केंद्र में रखी वह 'सर्प-शिला' अब पूरी तरह जाग चुकी थी।
पत्थर की सतह पर रिसता हुआ वह चिपचिपा, गाढ़ा तेल अब खौलने लगा था।
उस शिला के सात फनों के बीच जड़ा हुआ वह लाल रक्त-मणि (Naga-Ruby) इतनी तीव्र, ख़ूनी लाल किरणें फेंक रहा था कि पूरी गुफ़ा ऐसा लग रहा था मानो किसी जलते हुए गर्भाशय के भीतर आ गई हो।
हिसस्स... फूँ!
शिला के भीतर से एक विशाल, काले, पारदर्शी नाग का साया बाहर निकला।
उस साए का फन तीस फीट चौड़ा था। उसकी लाल आँखें सीधे आदित्य पर जाकर टिक गईं।
क्षेत्रपाल का वह आदिम रूप अपनी 62 साल पुरानी बलि की मांग कर रहा था!
त्रिलोक सिंह रावत ने उस विशाल सर्प-साए को देखा।
फिर उसने आदित्य के उस मासूम, डरे हुए, लेकिन जीवित चेहरे को देखा।
त्रिलोक के पिशाच-शरीर के भीतर का वह अंतिम मानवीय पिता... अपने पूरे पौरुष और पश्चाताप के साथ जाग उठा।
"नहीं..." त्रिलोक दहाड़ा।
उसकी दहाड़ उन आंछड़ियों के घुंघरुओं और कंकालों की चीख़ों से भी ऊपर गूँजी:
"बासठ साल पहले मैंने अपनी कायरता से अपने बेटे को अनाथ किया था...
लेकिन आज... मैं अपने पोते के ख़ून की एक बूँद भी इस पाषाण को नहीं छूने दूँगा!"
त्रिलोक ने अपनी वह 1962 की भारी संगीन उठाई।
लेकिन उसने वह संगीन आदित्य पर नहीं चलाई।
उसने एक भयानक छलांग लगाई और सीधे उस तीन-मंज़िला वेदी पर कूद पड़ा!
खचाक!
त्रिलोक ने अपनी पूरी ताक़त से उस संगीन की स्टील की नोक को... सीधे उस सर्प-शिला के माथे पर जड़े उस लाल रक्त-मणि के ठीक केंद्र में घोंप दिया!
5. पाताल-दरार और महा-पतन
तड़ाक! बूम!
एक ऐसा अवर्णनीय, पृथ्वी-कँपा देने वाला धमाका हुआ जिसने कालिंदी घाटी की नींव को हिला दिया।
उस रक्त-मणि में एक विशाल दरार पड़ी।
उसमें से कोई रोशनी नहीं निकली, बल्कि हज़ारों सालों से दबा हुआ काले गंधक और बर्फीले पारे का एक खौलता हुआ फव्वारा छूटा!
जैसे ही वह पवित्र-अपवित्र ताला टूटा—
गुफ़ा का बेसाल्ट फर्श किसी काग़ज़ की तरह बीच से फट गया!
एक बीस फीट चौड़ी, अथाह, अँधेरी खाई खुल गई।
नीचे से बर्फीली हवा की ऐसी हिंसक लहर ऊपर आई मानो पाताल लोक ने अपने जबड़े खोल दिए हों।
त्रिलोक सिंह का शरीर उस पारे के फव्वारे में जलने लगा था। उसकी पिशाच-खाल पिघलकर गिर रही थी, और उसके भीतर से उसका वही 1962 का जवान, गढ़वाली सिपाही का रूप एक अंतिम बार प्रकट हुआ।
उसने अपने जलते हुए हाथों से आदित्य के कॉलर को पकड़ा।
"आदित्य!" त्रिलोक की आवाज़ में अब कोई पिशाच नहीं था; वह एक सच्चे, वीर दादा की आवाज़ थी:
"नीचे गिर!
इस खाई के नीचे 'कालिंदी का गुप्त सोता' है!
वहाँ महासू देवता की वह पहली गुफ़ा है जहाँ कोई प्रेत, कोई आंछड़ी कदम नहीं रख सकती!
जा... और अपने इस शापित ख़ानदान के माथे से इस कलंक को धो दे!"
त्रिलोक ने अपनी अंतिम बची हुई ताक़त से आदित्य को उस गहरी, अँधेरी खाई के मुहाने में धकेल दिया!
हवा में तैरना... और पतन!
आदित्य उस अनंत अंधकार में नीचे गिरता चला गया।
ऊपर, उसने देखा कि मेजर थोर्न का कंकाल उस सर्प-शिला को पकड़ने के लिए झपटा था, लेकिन त्रिलोक ने थोर्न की गर्दन को अपनी बाहों में जकड़ लिया।
और वे दोनों—1911 का अंग्रेज़ और 1962 का गढ़वाली—एक-दूसरे को नोचते हुए, उस खौलते हुए मलबे के साथ उसी वेदी पर भस्म हो गए!
धड़-धड़ाम!
ऊपर का डाक-बंगला पूरी तरह ढह गया।
लाखों टन बर्फ़ और पत्थरों ने उस तहख़ाने के मुहाने को हमेशा के लिए सीलबंद कर दिया।
6. कालिंदी की गुप्त हिम-गुफ़ा और पाषाण-दर्पण
गिरने का कोई अंत नहीं था।
आदित्य बर्फीली हवा के थपेड़े खाता हुआ, पत्थरों की नुकीली दीवारों से टकराता हुआ, नीचे एक बहुत गहरे, नरम और बर्फ़ीले ढलान पर जाकर गिरा।
छपाक! सर्र्र्र...
वह लगभग सौ मीटर तक ताज़ा, सूखी पाउडर-बर्फ़ पर फिसलता चला गया और अंत में एक विशाल, चौकोर, सपाट पत्थर के चबूतरे पर जाकर रुक गया।
आदित्य ने हांफते हुए अपना सिर उठाया।
उसकी पसलियों में भयानक दर्द था, दायाँ घुटना मुड़ चुका था, लेकिन चमत्कारिक रूप से उसकी कोई हड्डी नहीं टूटी थी। उस अथाह गहराई में जमी पचास फीट मोटी प्राचीन बर्फ़ ने उसके गिरने के झटके को सोख लिया था।
उसने अपनी जेब टटोली।
उसकी वह काँच टूटी हुई इमरजेंसी टॉर्च... चमत्कारिक रूप से अब भी जल रही थी!
उसने टॉर्च की रोशनी सामने फैलाई।
और जो दृश्य उसकी आँखों के सामने उभरा... उसने आदित्य की साँसों को हमेशा के लिए स्तब्ध कर दिया।
यह कोई साधारण गुफ़ा नहीं थी।
यह नीले, पारदर्शी ग्लेशियर-बर्फ़ से बनी एक विशाल, प्राकृतिक कैथेड्रल (Ice Cathedral) थी!
गुफ़ा की छत साठ फीट ऊँची थी, जिससे बर्फ़ के विशाल, नुकीले झूमर (stalactites) लटक रहे थे।
दीवारें पत्थरों की नहीं थीं; वे शुद्ध, शीशे जैसे पारदर्शी नीले ग्लेशियर की थीं, जिनके भीतर हज़ारों साल पुराने पौधे, विचित्र प्रागैतिहासिक जीव और...
प्राचीन मानव-शरीर बर्फ़ में उसी तरह जमे हुए खड़े थे जैसे वे कल ही सोए हों!
वे वैदिक काल के तपस्वी थे, तिब्बती लामा थे, और मध्यकालीन युद्धों के राजपूत योद्धा थे, जो इस कालिंदी दर्रे को पार करते समय इस गुप्त हिम-भंडार में समा गए थे।
लेकिन इस विशाल हिम-कक्ष के ठीक केंद्र में...
काले सालिगराम पत्थर का एक विशाल, प्राचीन महासू देवता का मंदिर खड़ा था!
मंदिर की स्थापत्य कला कत्यूरी और नागर शैली से भी हज़ारों साल पुरानी थी। मंदिर के दरवाज़े पर सोने और तांबे के विशाल कपाट लगे थे, जिन पर महासू देवता के चार वीर भाइयों—बासिक, पबासिक, बटिया और चालदा—के रौद्र रूप उकेरे गए थे।
और उस मंदिर के ठीक सामने...
बर्फ़ की दीवार को तराश कर बनाया गया एक विशाल, बारह फीट ऊँचा 'हिम-दर्पण' (Ice Mirror) खड़ा था!
वह बर्फ़ इतनी चिकनी, इतनी साफ़ और इतनी पॉलिश की हुई थी कि उसमें सामने खड़े व्यक्ति का अक्स किसी अत्याधुनिक शीशे से भी ज़्यादा साफ़ दिखाई दे रहा था।
आदित्य लड़खड़ाता हुआ, अपने मुड़े हुए घुटने को घसीटता हुआ उस हिम-दर्पण के सामने पहुँचा।
उसने सोचा था कि वह शीशे में अपना थका हुआ, ख़ून से सना, बदहवास चेहरा देखेगा।
लेकिन जैसे ही उसने उस दर्पण में अपनी आँखें उठाईं...
7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: दर्पण का अक्स (The Twist)
आदित्य के हलक़ से एक ऐसी दबी हुई, अमानवीय चीख़ निकली जिसने उस पूरी हिम-गुफ़ा की शांति को चीर डाला।
उसकी टॉर्च उसके हाथ से छूटकर बर्फ़ में धँस गई।
उस बारह फीट ऊँचे हिम-दर्पण के सामने...
आदित्य अकेला खड़ा था।
उसके शरीर पर वही नीली जींस थी, वही फटी हुई डाउन-जैकेट थी, उसके दाएँ हाथ में वही घाव था।
लेकिन उस दर्पण के भीतर दिख रहे अक्स में...
दर्पण के भीतर कोई सत्ताईस साल का नौजवान आदित्य रावत नहीं खड़ा था!
दर्पण के भीतर जो अक्स दिखाई दे रहा था...
उसने 1962 की भारतीय सेना की 4th ग्रेनेडियर्स की खाकी ऊनी वर्दी पहन रखी थी!
कंधों पर चौकीदार का वही पीतल का सरकारी बिल्ला लगा था!
और उस अक्स का चेहरा...
आदित्य का नहीं था!
वह चेहरा हूबहू त्रिलोक सिंह रावत का था—सत्ताईस साल की उम्र का त्रिलोक सिंह!
आदित्य ने दहशत के मारे अपना दायाँ हाथ उठाया।
दर्पण के भीतर उस 1962 के त्रिलोक सिंह ने भी अपना दायाँ हाथ उठाया!
आदित्य ने अपनी छाती को छुआ।
दर्पण के भीतर त्रिलोक सिंह ने भी अपनी छाती को छुआ!
तभी—
उस महासू मंदिर के भारी सोने के कपाट... अपने आप... एक गगनभेदी गर्जना के साथ खुल गए।
चर्र्र्र्र्क!
और मंदिर के गर्भगृह के भीतर से... एक शांत, प्राचीन, दिव्य लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ उस पूरे हिम-कक्ष में गूँज उठी:
**"पहचान लिया अपने आपको, त्रिलोक?
बासठ साल पहले... जब तूने उस सर्प-शिला पर अपने वंश को बचाने की भीख माँगी थी...
तो तूने सोचा था कि तूने अपने पोते को गिरवी रखा था?
अरे अज्ञानी जीव!
कोई पोता कभी पैदा ही नहीं हुआ था!
1962 की उस रात... जब चीनी तोपों ने अंधार-चौकी को उड़ाया था...
तो तेरी देह तो वहीं मर गई थी!
लेकिन तेरी आत्मा... अपने उस दो महीने के बेटे राजीव के मोह में इतनी अंधी हो चुकी थी कि तूने उस क्षेत्रपाल से एक नया जीवन माँगा था!
यह 'आदित्य रावत' कोई इंसान नहीं है...
यह तो त्रिलोक सिंह की वही भूली हुई, पश्चाताप में भटकती हुई रूह है जिसे यह भ्रम था कि वह सत्ताईस साल का एक मानचित्रकार है!
स्वागत है तुम्हारे अपने अंतिम पड़ाव में, त्रिलोक सिंह...
अब अपनी असली देह का दर्शन करो!"**
मंदिर के गर्भगृह के केंद्र में...
बर्फ़ के एक पारदर्शी ताबूत के भीतर...
सत्ताईस साल के आदित्य रावत की अपनी ही लाश बासठ साल से ताज़ी, बिना सड़ी, बर्फ़ में दफ़्न पड़ी थी!
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