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भाग 4: हिम-समाधि का छल, महासू का न्याय और किरमीर का शीश
Piyashi Atma · Paranormal · 18 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
- Chapter
- 4 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3482
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भाग 4: हिम-समाधि का छल, महासू का न्याय और किरमीर का शीश
1. अस्तित्व का महा-विखंडन और बर्फ़ीले ताबूत की छांव
मनुष्य के जीवन में सबसे भयानक क्षण वह नहीं होता जब उसके सामने कोई साक्षात मृत्यु या दानव खड़ा हो। सबसे रूह-कँपा देने वाला क्षण वह होता है जब मनुष्य के पैरों के नीचे से उसकी अपनी 'पहचान' की ज़मीन खींच ली जाए, जब उसे यह बता दिया जाए कि जिस ज़िंदगी को वह जीता आया है—जिन गलियों में वह चला, जिन आंसुओं को उसने अपनी पलकों पर महसूस किया, और जिस सीने में वह धड़कन सुनता रहा—वह सब कुछ केवल एक प्रेत का सपना था, एक मरे हुए सिपाही के अपराध-बोध से जन्मी एक मरीचिका!
आदित्य उस बारह फीट ऊँचे हिम-दर्पण के सामने घुटनों के बल बैठा था।
उसकी आँखें फटी की फटी थीं। दर्पण के भीतर दिख रहा वह 1962 की ऊनी खाकी वर्दी वाला छब्बीस-सत्ताईस साल का त्रिलोक सिंह रावत... ठीक उसी तरह कांप रहा था, ठीक उसी तरह अपनी छाती पर हाथ फेर रहा था।
और उसके ठीक सामने—महासू मंदिर के उस खुले हुए, सोने और तांबे के विशाल कपाटों के भीतर—बर्फ़ के उस पारदर्शी, छह फीट लंबे ताबूत के भीतर...
एक मृत देह सो रही थी।
आदित्य लड़खड़ाता हुआ, अपने मुड़े हुए घुटने के असहनीय दर्द को भूलकर, उस ताबूत की तरफ़ बढ़ा।
बर्फ़ इतनी साफ़ थी जैसे शुद्ध पहाड़ी पानी को एक ही सेकंड में जमा दिया गया हो। और उस बर्फ़ के पार जो चेहरा लेटा था...
वह चेहरा हूबहू आदित्य का था!
वही बिखरे हुए काले बाल, वही बायीं भौंह पर बचपन में साइकिल से गिरने का आधा इंच लंबा कट, वही पतले होंठ। उसने वही नीली डेनिम जींस और वही पफर-जैकेट पहन रखी थी जो आदित्य इस वक़्त पहने हुए था!
उसकी छाती पर कोई सांस नहीं थी। उसकी आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर मृत्यु की वही सफ़ेद, जमी हुई, शांत और बर्फीली नीलिमा छाई थी जो केवल दशकों तक ग्लेशियर में दबे शवों पर होती है।
"नहीं... यह झूठ है..." आदित्य की आवाज़ उस विशाल हिम-कैथेड्रल की दीवारों से टकराकर टूटे हुए काँच की तरह बिखरी।
"मैं देहरादून में पैदा हुआ था! मेरी माँ ने मुझे कोरोनेशन अस्पताल में जन्म दिया था! मैंने कर्नलगंज के स्कूल में पढ़ाई की है, मैं राजपुर रोड के ढाबे पर चाय पीता था... मैं ज़िंदा हूँ! मैं एक भूत नहीं हो सकता!"
उसने पागलों की तरह अपनी जेबें टटोलीं।
उसकी जेब से उसका पर्स निकला। पर्स के भीतर उसका आधार कार्ड था—आदित्य रावत, जन्म तिथि: 14 जुलाई 1999। उसका लोक निर्माण विभाग का लेमिनेटेड संविदा परिचय-पत्र था, जिस पर चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल के ताज़ा दस्तख़त थे।
उसकी कलाई पर बंधी टाइटन की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
उसने अपनी डाउन-जैकेट की आस्तीन ऊपर खींची और अपनी कलाई की चमड़ी को अपने ही नाखूनों से बेरहमी से खुरच दिया।
चर्र्र्र्क!
त्वचा फटी।
और उस घाव से... गाढ़ा, लाल, खौलता हुआ गर्म मानवीय ख़ून रिसकर बाहर आ गया!
ख़ून की बूँदें नीचे उस नीली बर्फ़ पर टपकीं—टप... टप... टप...
और जैसे ही वह गर्म ख़ून बर्फ़ की सतह को छुआ, बर्फ़ से सुलगती हुई सफ़ेद भाप उठी और बर्फ़ के भीतर एक छोटा सा गड्ढा बन गया।
मरे हुओं का ख़ून गर्म नहीं होता!
प्रेतों की नसों में लाल रक्त नहीं दौड़ता; उनकी नसों में केवल बर्फीला पानी और काली धूल बहती है!
आदित्य की आँखों में एक बिजली सी कौंधी। उसका मस्तिष्क, जो भय के पाताल में डूब चुका था, अचानक एक झटके में जाग उठा।
"अगर मैं 1962 में मरा हुआ त्रिलोक सिंह हूँ... तो मेरे पास 2026 का आधार कार्ड कैसे है?
मेरी नसों में यह गर्म ख़ून कैसे खौल रहा है?
और यह घड़ी... यह घड़ी इस आधुनिक समय को कैसे नाप रही है?"
2. महासू के गर्भगृह का मायाजाल और छल-नरेश की चाल
आदित्य ने अपनी नज़रें उस बर्फ़ के ताबूत से उठाकर उस मंदिर के गर्भगृह के गहरे अंधकार की तरफ़ गड़ाईं।
गर्भगृह के भीतर से वही शांत, गंभीर, ईश्वरीय आवाज़ फिर से गूँजी—वही आवाज़ जिसने कुछ देर पहले उससे कहा था कि वह त्रिलोक सिंह की भटकती हुई रूह है:
*"रक्त का मोह छोड़ दे, त्रिलोक...
यह गर्म ख़ून केवल तेरी उस अधूरी वासना की अग्नि है जो अभी तक बुझी नहीं है!
उस ताबूत पर अपना सिर टेक दे...
और इस बासठ साल के भटकाव को विराम देकर महासू के चरणों में अपनी आत्मा विसर्जित कर!"*
आदित्य पीछे हटा।
उसने उस आवाज़ को बहुत ध्यान से सुना।
पहली बार में वह आवाज़ इतनी पवित्र, इतनी भव्य और इतनी चुंबकीय लगी थी कि कोई भी इंसान बिना सोचे-समझे अपना माथा टेक देता।
लेकिन अब... जब आदित्य के भीतर का तर्कवादी मानचित्रकार जाग चुका था... उसने उस आवाज़ के पीछे छिपी एक बहुत बारीक, लगभग अदृश्य 'विसंगति' (Dissonance) को पकड़ लिया।
उस आवाज़ के हर एक शब्द के गूँजने के ठीक बाद...
गुफ़ा की दीवारों के कोनों से एक बहुत हल्की, सूखी सीटी की प्रतिध्वनि आ रही थी!
...फ़ूऊऊऊ!
वही सीटी!
जो उस डाक-बंगले के बाहर रात भर बज रही थी! वही सीटी, जो मेजर थोर्न के कंकाल के पीछे चल रही थी!
आदित्य का माथा ठनका।
उसने बचपन में अपने गाँव के सयानों (बुजुर्गों) से सुनी वह बात याद की जो महासू देवता के बारे में कही जाती थी:
‘महासू देवता जब भी अपने भक्त से बात करते हैं, तो मंदिर की घंटियों और नगाड़ों की ध्वनि अपने आप गूँजती है... महासू कभी अंधेरे में, सीटी बजाकर किसी की आत्मा का सौदा नहीं करते!’
"तू महासू नहीं है!"
आदित्य की आवाज़ में अब कोई भय नहीं था; उसकी आवाज़ में उस अपमानित, ठगे गए इंसान का भयानक आक्रोश था।
उसने अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाली और सीधे उस गर्भगृह के काले मुहाने पर तान दी:
"तू महासू देवता के नाम पर ढोंग कर रहा है, छलावे!
तूने उस डाक-बंगले के शीशे पर मेरे दादा का चेहरा बनाया... तूने नीचे इस बर्फ़ के दर्पण में मेरा अक्स बदल दिया... और तूने इस बर्फ़ के भीतर मेरी यह नकली लाश गढ़ दी...
ताकि मैं ख़ुद यह मान लूँ कि मैं मर चुका हूँ!
क्योंकि गढ़वाल का नियम है—जब तक कोई आत्मा ख़ुद अपने जीवन को त्यागकर प्रेत-योनि को स्वीकार नहीं करती, तब तक कोई छलावा उसकी जीवित देह पर कब्ज़ा नहीं कर सकता!"
कमरे का तापमान अचानक पचास डिग्री नीचे गिर गया।
वह 'ईश्वरीय' आवाज़ अचानक एक सेकंड में ग़ायब हो गई।
और उस मंदिर के गर्भगृह के उस काले, अथाह अंधकार के भीतर से...
एक ऐसी भयानक, कर्कश, राक्षसी और हज़ारों गीदड़ों के एक साथ रोने जैसी हँसी निकली जिसने गुफ़ा की छत के बर्फ़ीले झूमरों को हिलाकर नीचे गिरा दिया:
खे-खे-खे-खे! हाहाहाहाहा!
3. किरमीर का शीश और छलावा-सम्राट का प्रकटीकरण
"पहचान गया...? अरे चतुर बालक... तू तो अपने उस कायर दादा से भी ज़्यादा चालाक निकला!"
गर्भगृह के काले पत्थरों के फर्श पर एक भयानक हलचल हुई।
मंदिर की वेदी पर जो सोने और तांबे का आवरण चढ़ा था, वह किसी फटे हुए काग़ज़ की तरह फट गया।
और उस वेदी के नीचे से...
एक ऐसा वजूद बाहर निकला जिसे देखकर किसी भी कमज़ोर दिल वाले इंसान की नसें वहीं फट जातीं।
वह कोई देवता नहीं था।
वह एक विशालकाय, कटा हुआ इंसानी सिर था!
वह सिर सामान्य इंसान के सिर से कम से कम बीस गुना बड़ा था—लगभग एक छोटे हाथी के आकार का!
उसकी त्वचा काले, पपड़ीदार मगरमच्छ जैसी थी, जिस पर हज़ारों ज़हरीले बिच्छू और कनखजूरे रेंग रहे थे। उसके सिर पर भैंसे के दो विशाल, मुड़े हुए काले सींग थे, जिनके ऊपर सैकड़ों इंसानी खोपड़ियाँ मोतियों की तरह पिरोई गई थीं।
उसकी नाक कटी हुई थी, और उसके चौड़े, वीभत्स मुँह में तीन कतारों में शार्क जैसे नुकीले दाँत लगे थे, जिनसे गहरा पीला, ज़हरीला मवाद टपक रहा था।
उसका कोई धड़ नहीं था!
वह केवल एक कटा हुआ, जीवित शीश था, जो ज़मीन पर अपनी ही दाढ़ी के काले, चिपचिपे बालों और सैकड़ों पतली, केंचुए जैसी जड़ों के सहारे रेंग रहा था!
यह था गढ़वाल और जौनसार-बावर की प्राचीन पौराणिक गाथाओं का वह सबसे भयानक, आदिम दानव—'किरमीर दानव' (The Demon Kirmir) का कटा हुआ अमर शीश!
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग के अंत में जब किरमीर दानव ने टोंस और यमुना की घाटियों में हाहाकार मचाया था, तब कश्मीर के हनोल से महासू देवता के चार भाइयों (बासिक, पबासिक, बूटिया और चालदा) ने आकर उसका संहार किया था। चालदा महासू ने अपने दिव्य खड्ग से किरमीर का शीश काटकर इसी कालिंदी दर्रे के नीचे दबा दिया था और उसके ऊपर महासू की तांबे की मुहर लगा दी थी!
"1911 में..." किरमीर के उस कटे हुए विशाल शीश ने अपनी दोनों रक्त-वर्ण आँखों को घुमाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में लाखों पत्थरों के पिसने की गूँज थी:
"उस मूर्ख अंग्रेज़—मेजर थोर्न—ने सोने के लालच में मेरी उस समाधि पर डायनामाइट चला दिया था!
उस धमाके ने महासू के उस वज्र-कवच को चटका दिया!
मैं पूरी तरह आज़ाद तो नहीं हो सका... लेकिन मेरी रूह इस घाटी के पत्थरों में रिस गई!
मैंने इस पूरे क्षेत्र के छलावों, आंछरियों और पिशाचों को अपनी सेना बना लिया!
1962 में तुम्हारे दादा त्रिलोक सिंह ने उस सर्प-शिला को तोड़कर मुझे लगभग बाहर निकाल ही लिया था... लेकिन उसने अंतिम क्षण में अपनी आत्मा को चट्टान में बाँध दिया और मुझे एक जीवित शरीर मिलने से रोक दिया!"
किरमीर के उस कटे हुए सिर के नीचे से हज़ारों काली, कांटेदार जड़ें बाहर निकलीं और वे मकड़ी के जाले की तरह उस हिम-गुफ़ा के फर्श पर फैलने लगीं:
"बासठ साल से मैं इस बर्फीले कुएँ में सड़ रहा हूँ, आदित्य!
मुझे इस पाताल से बाहर निकलने के लिए... उस नंदा देवी और बद्रीनाथ की पवित्र घाटी पर अपना तांडव मचाने के लिए... एक ऐसा जीवित शरीर चाहिए जो त्रिलोक सिंह के ख़ून का हो... जिसके पुरखों ने कभी इस ज़मीन की रक्षा की थी!
अगर तू अपनी मर्ज़ी से यह शरीर नहीं देता...
तो मैं तेरी हड्डियों का एक-एक जोड़ तोड़कर, तेरी इस जीवित खाल को अपने इस सड़े हुए सिर पर सील लूँगा!"
4. बर्फ़ीले ताबूत का विध्वंस और असली विरासत
किरमीर का वह विशाल शीश अपनी दाढ़ी के बालों के बल उछला।
उसकी वे सैकड़ों कांटेदार जड़ें चाबुकों की तरह हवा में लहराईं और सीधे आदित्य की तरफ़ झपटीं!
तड़ातड़! धाँय!
आदित्य ने अपनी बची हुई गोलियों से उस विशाल चेहरे पर फ़ायर किया।
गोलियाँ किरमीर के उस मगरमच्छ जैसी चमड़ी वाले गालों में धँसीं, लेकिन वहाँ से कोई ख़ून नहीं निकला; केवल सड़े हुए कोयले की राख उड़ी। दानव को गोलियों से कोई दर्द नहीं हुआ; वह केवल और हिंसक होकर हँसा।
एक मोटी, लोहे जैसी सख्त जड़ आदित्य की कमर के चारों तरफ़ लिपट गई!
चर्र्र्र्र्क!
उस जड़ ने आदित्य को हवा में दस फीट ऊपर उठा लिया। उसकी पसलियों की हड्डियाँ चरमराने लगीं। हवा उसके फेफड़ों से बाहर निकल गई।
दानव उसे सीधे अपने उस तीन कतारों वाले, खौलते हुए दाँतों के जबड़े की तरफ़ खींच रहा था!
"आदित्य!"
अचानक, उस बर्फ़ के ताबूत के भीतर से... एक आवाज़ आई।
वह कोई भ्रम नहीं था।
आदित्य ने तड़पते हुए नीचे देखा।
वह बर्फ़ का ताबूत... जिसे किरमीर ने आदित्य का भ्रम बनाने के लिए रचा था...
उस नकली शव की छाती पर बंधी वह पफर-जैकेट अपने आप फट गई थी।
और उस जैकेट के भीतर... बर्फ़ की सिल्लियों के बीच दबा हुआ... एक बहुत पुराना, 1962 का तांबे का नक्काशीदार 'महासू-शंख' (The Mahasu Conch) और एक तीन फीट लंबी, जंग-मुक्त अष्टधातु की 'महासू-संगीन' (Divine Bayonet) रखी हुई थी!
त्रिलोक सिंह 1962 में पागल नहीं हुआ था!
त्रिलोक सिंह जानता था कि एक दिन किरमीर का यह छलावा उसके वंशज को इस पाताल में खींचेगा। इसलिए त्रिलोक ने मरने से पहले इस बर्फ़ के गर्भगृह में महासू देवता के उस अष्टधातु के हथियार को इस तरह छुपा दिया था कि जब किरमीर किसी जीवित रावत को यहाँ लाएगा, तो वह हथियार ख़ुद-ब-ख़ुद जाग्रत हो जाएगा!
वह बर्फ़ का ताबूत कोई क़ब्र नहीं थी; वह त्रिलोक सिंह रावत का छोड़ा हुआ शस्त्रागार था!
"महासू की आण!"
आदित्य ने अपनी पूरी चेतना, अपने पिता के दिए संस्कारों और अपने दादा के उस अंतिम बलिदान को अपनी आत्मा में समेट लिया।
उसने हवा में झूलते हुए, अपने दोनों पैरों को सिकोड़ा और अपनी पूरी ताक़त से उस बर्फ़ के ताबूत के ढक्कन पर एड़ियों से प्रहार किया!
कड़कड़ाती बर्फ़! चटक! शीशा-विस्फोट!
ताबूत का ढक्कन चकनाचूर हो गया।
आदित्य का हाथ नीचे लपका।
उसकी उंगलियों ने उस ठंडे, पवित्र अष्टधातु के महासू-खड्ग (संगीन) के मुठिये को जकड़ लिया!
5. अष्टधातु का महा-प्रहार और किरमीर का दहन
जैसे ही आदित्य की जीवित, लहूलुहान हथेली ने उस अष्टधातु के खड्ग को छुआ—
उस हथियार की धार पर जड़े हुए नौ तांत्रिक अक्षरों से सूर्य जैसी धधकती हुई सुनहरी-श्वेत ज्वाला फूट पड़ी!
ॐ महासू भैरवाय नमः!
वह आग कोई साधारण आग नहीं थी; वह महासू देवता के उस दिव्य वज्र की आग थी जिसने सतयुग में इस राक्षस का वध किया था।
उस ज्वाला के छूते ही—
वह कांटेदार जड़, जिसने आदित्य की कमर को जकड़ रखा था, चीख़ती हुई जलकर राख हो गई!
आदित्य हवा से नीचे ज़मीन पर उतरा।
उसके हाथ में वह धधकता हुआ खड्ग था। उसकी आँखों में अब किसी भयभीत क्लर्क का डर नहीं था; उसकी आँखों में उस 'गढ़वाल राइफ़ल्स' और उस 'महासू-पुत्र' का वह पराक्रम दहक रहा था जो पीढ़ियों से उसकी नसों में सोया हुआ था!
"किरमीर!" आदित्य की गर्जना उस पूरे पाताल में गूँजी।
"तूने साठ साल तक मेरे दादा की आत्मा को तड़पाया... तूने इस पूरी घाटी के मुसाफ़िरों को छलावे से मारा...
आज महासू की अदालत में तेरा अंतिम हिसाब होगा!"
किरमीर का वह विशाल शीश दहशत से कांप उठा।
उसकी दोनों आँखों में सतयुग का वही प्राचीन भय लौट आया। उसने अपने सींगों को आगे करके आदित्य को कुचलने के लिए एक अंतिम छलांग लगाई।
लेकिन आदित्य बिजली की तरह घूमा।
उसने ज़मीन पर घुटने टेकते हुए, नीचे से ऊपर की ओर, उस अष्टधातु के धधकते हुए खड्ग का एक ऐसा गगनभेदी वार किया जिसने हवा को चीर दिया!
खचाक! भभक!
खड्ग की दिव्य धार सीधे किरमीर के उस विशाल शीश के दोनों सींगों के ठीक बीच में... उस खोपड़ी के मर्म-स्थल में धँस गई!
चीखखखखखख!
एक ऐसी अमानवीय, नरक-कँपा देने वाली चीख़ उस दानव के मुँह से निकली जिसने उस पूरी हिम-गुफ़ा की दीवारों को हिलाकर रख दिया।
खड्ग से निकली उस सुनहरी आग ने किरमीर के उस विशाल शीश को अंदर से जलाना शुरू कर दिया।
उसकी आँखों से काला धुआँ और पिघला हुआ सीसा बहने लगा। उसकी पपड़ीदार चमड़ी जलकर भस्म होने लगी।
कुछ ही सेकंडों में, वह विशालकाय शीश जलकर काले कोयले और भस्म के एक छोटे से ढेर में तब्दील हो गया!
किरमीर का अंत हो चुका था।
उस घाटी का सबसे बड़ा, सदियों पुराना छलावा हमेशा के लिए भस्म हो चुका था!
6. मोक्ष का प्रभात और दादा की विदाई
जैसे ही किरमीर भस्म हुआ, उस हिम-गुफ़ा के भीतर छाई वह मनहूस, सड़ी हुई गंध एक ही पल में ग़ायब हो गई।
हवा में देवदार, कस्तूरी और पवित्र गंगाजल की एक असीम, दिव्य सुगंध फैल गई।
वह जो बारह फीट ऊँचा हिम-दर्पण था...
उस दर्पण की सतह पर अब कोई भयानक पिशाच नहीं था।
उस दर्पण के भीतर से...
त्रिलोक सिंह रावत का साया बाहर निकला।
लेकिन अब उसके बदन पर कोई घाव नहीं थे, कोई कीड़े नहीं थे, कोई संगीन का निशान नहीं था।
वह अपनी वही 1962 की साफ़-सुथरी खाकी वर्दी पहने हुए था। उसके चेहरे पर एक असीम, अवर्णनीय शांति और तृप्ति की मुस्कान थी।
और उसके पीछे...
मेजर एडवर्ड थोर्न और वे छह ब्रिटिश सिपाही भी खड़े थे—अब वे कोई कंकाल नहीं थे; वे अपनी सामान्य इंसानी रूहों के रूप में हाथ जोड़े खड़े थे।
और वे सात आंछरियां... अपने भयानक पंजों को खोकर, अब देवलोक की सुंदर, पवित्र अप्सराओं की तरह हाथ में श्वेत कमल के फूल लिए मुस्कुरा रही थीं।
त्रिलोक सिंह ने आगे बढ़कर अपना हाथ उठाया।
उसने उस रूहानी स्पर्श से आदित्य के सिर पर अपना हाथ रख दिया।
आदित्य को लगा मानो किसी ने उसकी आत्मा के सारे घावों पर अमृत उड़ेल दिया हो। उसके मुड़े हुए घुटने का दर्द, उसकी पसलियों की टूटन एक ही सेकंड में पूरी तरह ठीक हो गई।
"शाबाश, मेरे पोते..." त्रिलोक की आवाज़ किसी ठंडी, पहाड़ी सुबह की धूप जैसी मीठी थी।
"तूने अपने इस अभागे दादा को उस बासठ साल के नर्क से आज़ाद कर दिया।
तूने इस पूरी कालिंदी घाटी के माथे से उस शाप को पोंछ दिया।
अब न कोई छलावा यहाँ किसी मुसाफ़िर को पुकारेगा, न कोई डाक-बंगला किसी निर्दोष का ख़ून पिएगा।"
त्रिलोक ने पीछे मुड़कर देखा।
गुफ़ा की छत से बर्फ़ पिघलने लगी थी और ऊपर से सुबह के असली, तेजस्वी सूर्य की सुनहरी किरणें उस पाताल के भीतर सीधे उस महासू मंदिर की वेदी पर गिर रही थीं।
"जा, आदित्य..." त्रिलोक ने कहा।
"राजीव को मेरा प्रणाम कहना। उससे कहना कि उसका बापू कभी कायर नहीं था... उसका बापू सरहद की उस सबसे भयानक जंग को जीतकर आज अपने घर लौटा है!"
त्रिलोक सिंह का साया, मेजर थोर्न और वे सारी भटकती हुई आत्माएं... उस सूर्य की सुनहरी किरणों के साथ मिलकर, आकाश की ओर मोक्ष पाकर विलीन हो गईं।
7. वह भयानक, रोंगटे खड़े कर देने वाला अंतिम महा-ट्विस्ट: दफ़्तर की वापसी (The Ultimate Twist)
आदित्य ने अपनी आँखें खोलीं।
चारों तरफ़ चिड़ियों के चहचहाने की मीठी आवाज़ आ रही थी।
बर्फीली आंधी पूरी तरह थम चुकी थी।
आदित्य डाक-बंगले के उसी पुराने, टूटे हुए अहाते में खड़ा था।
वह 1898 का भयानक 'अंधार-चौकी' डाक-बंगला... अब कोई खौफ़नाक खंडहर नहीं लग रहा था। सुबह की ताज़ी, सुनहरी धूप में वह एक बहुत खूबसूरत, शांत, ऐतिहासिक लकड़ी की पहाड़ी धरोहर जैसा दिख रहा था।
और उसके सामने—
अस्तबल के पास... जगतू जीवित खड़ा था!
उसके दोनों खच्चर शांति से घास चर रहे थे। जगतू अपनी बीड़ी सुलगा रहा था। उसकी गर्दन पर कोई कटने का निशान नहीं था; वह पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य था!
"अरे रावत जी!" जगतू ने मुस्कुराते हुए आवाज़ दी।
"कमाल कर दिया बाबूजी! मैंने सोचा था कि आप रात के सन्नाटे में डर के मारे बेहोश हो जाएँगे, लेकिन आप तो बड़े पक्के निकले! चलिए, सामान बांधिए, धूप खिल गई है। जोशीमठ के लिए निकलना है!"
आदित्य मुस्कुराया।
उसे लगा कि वह उस रात के भयानक छलावे से पूरी तरह बाहर आ चुका है। जो कुछ भी उसने देखा था—जगतू का कटा सिर, वह सब किरमीर का रचा हुआ मानसिक भ्रम (hallucination) था!
उसने अपना बैग उठाया। उसका सर्वे का काम पूरा हो चुका था।
वे दोनों उस खूबसूरत, शांत घाटी को पार करते हुए वापस जोशीमठ और फिर दो दिन बाद देहरादून पहुँच गए।
लोक निर्माण विभाग (PWD) का वही ज़िला कार्यालय।
आदित्य ने चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल के केबिन का दरवाज़ा खटखटाया।
"कम इन!" नौटियाल जी की आवाज़ आई।
आदित्य अंदर दाख़िल हुआ। उसने अपनी पूरी की हुई सर्वे रिपोर्ट और वह जीपीएस डेटा नौटियाल जी की मेज़ पर रख दिया।
"सर, अंधार-चौकी डाक-बंगले का सर्वे पूरा हो गया है," आदित्य ने गर्व और राहत के साथ कहा।
"वहाँ अब कोई ख़तरा नहीं है। वह जगह पूरी तरह शांत और सुरक्षित है।"
नौटियाल जी ने चश्मे के ऊपर से आदित्य को देखा।
लेकिन उनके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी।
कोई प्रशंसा नहीं थी।
नौटियाल जी ने मेज़ पर रखी उस रिपोर्ट को छुआ तक नहीं।
उन्होंने बहुत धीमी गति से अपने दराज़ से एक दूसरा सरकारी लिफ़ाफ़ा निकाला।
और उस लिफ़ाफ़े से एक काले-सफ़ेद रंग की पुरानी तस्वीर बाहर निकाली।
नौटियाल जी ने वह तस्वीर आदित्य की तरफ़ सरका दी।
उनकी आवाज़ में एक अजीब, बर्फीली और अमानवीय ठंडक थी:
"आदित्य... तुमने बहुत अच्छा काम किया।
लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आई..."
आदित्य ने झुककर उस पुरानी तस्वीर को देखा।
वह तस्वीर 1962 की थी—4th ग्रेनेडियर्स के सैन्य अधिकारियों और अंधार-चौकी के कर्मचारियों का सामूहिक फ़ोटो!
उस तस्वीर में सबसे आगे...
उसके दादा त्रिलोक सिंह रावत खड़े थे।
और त्रिलोक सिंह के ठीक बगल में...
खाकी वर्दी पहने, हाथ में वही 1911 की फ़ाइल लिए... जो दूसरा अफ़सर खड़ा था...
उसका चेहरा...
हूबहू चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल का था!
वही आँखें, वही नाक, वही मुस्कान—बासठ साल पहले भी बिल्कुल वैसी ही, बिना एक भी दिन बूढ़ी हुए!
आदित्य का पूरा बदन काठ मार गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
तभी—
हरीश नौटियाल ने अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए, अपने दोनों हाथ मेज़ पर टिकाए।
और उन्होंने अपनी जीभ से... अपने दाँतों के बीच से... एक बहुत बारीक, जानी-पहचानी सीटी की धुन बजा दी:
फ़ूऊऊऊ... फ़ू-फ़ू-फ़ू...
नौटियाल जी के चेहरे की चमड़ी धीरे-धीरे खिंचने लगी, और उनकी आँखों की पुतलियाँ सफ़ेद पत्थरों में बदलने लगीं।
उनकी आवाज़ सीधे आदित्य के दिमाग़ के भीतर गूँजी:
"तूने क्या सोचा था, आदित्य रावत...
कि तू उस कालिंदी घाटी के पाताल से बचकर निकल आया?
अरे नादान लड़के...
वह डाक-बंगला तो केवल एक कमरा था...
यह पूरा देहरादून...
यह पूरा दफ़्तर...
और यह पूरी दुनिया...
पिछले बासठ साल से...
हमारे ही छलावे के भीतर साँस ले रही है!
और अब...
तुम्हारी अगली पोस्टिंग...
सीधे 'रूपकुंड' के उस कंकालों वाले ताल पर होने जा रही है!"
नौटियाल जी की मेज़ के नीचे से... सात उंगलियों वाले नीले पंजों की जड़ें बाहर निकलकर आदित्य के पैरों को जकड़ने लगीं!
[भाग 4 समाप्त — जारी रहेगा भाग 5 में..
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