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भाग 5: सर्वे चौक का मायाजाल, नंदा राजजात का मार्ग और रूपकुंड का खूनी बुग्याल
Piyashi Atma · Paranormal · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
- Chapter
- 5 of 6
- Category
- Paranormal
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3884
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भाग 5: सर्वे चौक का मायाजाल, नंदा राजजात का मार्ग और रूपकुंड का खूनी बुग्याल
1. सर्वे चौक का विध्वंस और सरकारी फ़ाइलों का नरक
देहरादून के सर्वे चौक पर दोपहर की मूसलाधार बारिश खिड़कियों के काँच से टकरा रही थी, लेकिन लोक निर्माण विभाग के उस बंद केबिन के भीतर की हवा किसी प्राचीन श्मशान की तरह ठंडी और स्थिर हो चुकी थी।
चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल की मेज़ के नीचे से निकली वे सात उंगलियों वाली नीली जड़ें... किसी जीवित अजगर की तरह आदित्य के जूतों और पतलून को जकड़ चुकी थीं। वे केवल जड़ें नहीं थीं; उन पर इंसानी नसों की तरह नीला ख़ून दौड़ रहा था और उनकी नोक से तीखे, कांटेदार नाख़ून निकलकर आदित्य के टखनों के माँस में धँसने लगे थे।
"छोड़ मुझे!" आदित्य ने दर्द और घिन से चिल्लाते हुए अपनी पीठ मेज़ के किनारे पर दे मारी।
नौटियाल की कुर्सी धीरे-धीरे हवा में उठ रही थी। उसके चेहरे की चमड़ी किसी फटे हुए काग़ज़ की तरह लटक चुकी थी, जिसके भीतर से सड़ा हुआ पीला माँस और काले कीड़े दिखाई दे रहे थे। उसकी आँखों के गड्ढों से वही नीली, फॉस्फोरस जैसी रूहानी ज्वाला निकल रही थी।
नौटियाल के सूखे, काले होंठ हिले और वही तीखी, पराश्रव्य सीटी की धुन कमरे में गूँज उठी:
फ़ूऊऊऊ... फ़ू-फ़ू-फ़ू...
"कहाँ भागेगा, आदित्य रावत?" नौटियाल की आवाज़ अब किसी एक बूढ़े की नहीं थी; ऐसा लग रहा था मानो दफ़्तर की दीवारों, अलमारियों में रखी सैकड़ों लाल फ़ाइलों और छत के घूमते हुए पंखे से हज़ारों मरे हुए सरकारी कर्मचारियों की रूहें एक साथ बोल रही हों:
"तूने समझा कि तू उस डाक-बंगले के पहरेदारों को मारकर जीत गया?
अरे नादान लड़के... 1962 से लेकर आज तक, इस हिमालयी राज्य की जितनी भी सीमावर्ती सड़कें बनी हैं, जितने भी पुल इन घाटियों पर खड़े किए गए हैं... वे किसी इंसानी हुकूमत के लिए नहीं बने हैं!
वे तो उन प्राचीन शक्तियों के आवागमन के लिए बनाए गए 'पिशाच-मार्ग' हैं जिन्हें तुम अपनी फाइलों में 'राष्ट्रीय राजमार्ग' कहते हो!
और इस पूरे विभाग का काम केवल एक है—तुम्हारे जैसे रावत, नेगी और बिष्ट ख़ानदानों के उन नौजवानों को ढूँढकर इन घाटियों में बलि के लिए भेजना, जिनके पुरखों ने कभी इन पहाड़ों के कुलदेवताओं से सौदे किए थे!"
नौटियाल ने अपनी एक सड़ी हुई उंगली उठाई।
कमरे में रखी लोहे की भारी अलमारियों के ताले अपने आप टूट गए।
सैकड़ों पुरानी, पीले पड़ चुके काग़ज़ों वाली सरकारी फ़ाइलें हवा में फड़फड़ाने लगीं। उन फ़ाइलों के पन्नों पर लिखे नाम... काले ख़ून में बदलने लगे। 1971, 1984, 1999, 2013 की आपदाओं में लापता हुए इंजीनियरों और मज़दूरों की तस्वीरें उन फ़ाइलों से बाहर निकलकर हवा में रोने लगीं!
आदित्य के टखनों की हड्डियाँ चरमराने लगी थीं। वह नीला ज़हर उसकी पिंडलियों की नसों में चढ़ रहा था।
"अगर आज मरना ही है..." आदित्य के दिमाग़ में बिजली सी कौंधी, "...तो इन दरिंदों के आगे घुटने टेक कर नहीं!"
उसने अपनी डाउन-जैकेट की अंदरूनी जेब में हाथ डाला।
उसकी उंगलियाँ उस तांबे के 'महासू-शंख' और उस पवित्र 'अष्टधातु के खड्ग' से टकराईं, जिसे वह उस कालिंदी हिम-गुफ़ा से अपने बैग में समेटकर लाया था।
जैसे ही उसकी हथेली ने उस अष्टधातु के मुठिये को छुआ—
ॐ महासू भैरवाय नमः!
आदित्य की नसों में एक बार फिर उस पहाड़ी देवता की धधकती हुई सुनहरी अग्नि दौड़ गई!
उसने अपनी जेब से उस अष्टधातु के खड्ग को बाहर खींचा और बिना एक सेकंड गँवाए, नीचे झुककर अपने दोनों पैरों को जकड़े हुए उन नीले पंजों की जड़ों पर पूरी ताक़त से वार कर दिया!
खचाक! भभक!
खड्ग की दिव्य धार लगते ही उन जड़ों से इंसानी चीख़ निकली और उनमें से गाढ़ा, बदबूदार काला ख़ून फव्वारे की तरह छूटा। जड़ें जलकर राख होने लगीं।
नौटियाल का विकृत चेहरा दर्द से तड़प उठा: "महासू का अस्त्र?! यह तेरे पास कहाँ से आया?!"
आदित्य को संभलने का एक मौका मिल गया।
उसने पीछे मुड़कर देखा। केबिन का लकड़ी का दरवाज़ा बाहर से सीलबंद था, और बाहर के गलियारे में विभाग के अन्य कर्मचारियों के पैर भी उल्टे मुड़ चुके थे और वे सब अपने सड़े हुए हाथों से दरवाज़े को पीट रहे थे।
एक ही रास्ता बचा था।
आदित्य ने कमरे के भारी महोगनी के सोफे को दोनों हाथों से उठाया और सीधे केबिन की बड़ी, शीशे की खिड़की पर दे मारा!
तड़ाक! छनन्न्र!
खिड़की का शीशा टूटकर चकनाचूर हो गया।
आदित्य ने आँखें बंद कीं और दूसरी मंज़िल की उस खिड़की से सीधे नीचे सर्वे चौक की गीली, पक्की सड़क पर छलांग लगा दी!
2. ऋषिकेश का किनारा और पिता का टूटा हुआ मौन
धड़ाम!
आदित्य नीचे सड़क पर खड़ी एक सरकारी जिप्सी की छत पर गिरा।
धातु की छत उसके वज़न से पिचक गई, लेकिन उसकी कोई हड्डी नहीं टूटी। महासू के उस खड्ग की रूहानी ऊर्जा ने उसके शरीर पर एक अदृश्य ढाल बना रखी थी।
सड़क पर मूसलाधार बारिश हो रही थी। लोग छाते लिए इधर-उधर भाग रहे थे।
आदित्य ने हांफते हुए ऊपर देखा। दूसरी मंज़िल की उस टूटी हुई खिड़की के अंधेरे में हरीश नौटियाल का वह सड़ा हुआ, कटा-फटा चेहरा खड़ा था। वह अपनी उस एक बची हुई आँख से आदित्य को घूर रहा था और उसकी उंगलियाँ खिड़की के टूटे हुए शीशे पर ख़ून से एक नाम लिख रही थीं:
‘रू-प-कुं-ड’
आदित्य एक पल भी नहीं रुका।
उसने भीड़ को चीरते हुए दौड़ लगाई। वह अपनी स्प्लेंडर बाइक पर बैठा, किक मारी और देहरादून के उस मनहूस दफ़्तर को पीछे छोड़ते हुए सीधे हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे की तरफ़ गाड़ी दौड़ा दी।
उसे अब एक ही इंसान से सच जानना था।
वह इंसान, जिसने बासठ साल तक अपनी ज़बान पर ताला लगा रखा था—उसका अपना पिता, राजीव रावत।
शाम के सात बजते-बजते आदित्य ऋषिकेश से आगे, रायवाला के पास बने अपने पैतृक, छोटे से मकान के सामने पहुँचा।
गंगा की तेज़, गरजती हुई जलधारा की आवाज़ घर के पिछवाड़े से आ रही थी।
घर के आंगन में तुलसी के चौरे पर एक पुराना, पीतल का दीया टिमटिमा रहा था।
कमरे के भीतर, लकड़ी के तख़्त पर एक तिरेसठ वर्षीय, सफ़ेद बालों वाला, दुबला-पतला इंसान बैठा था। उसने आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ा रखा था और उसके कांपते हाथों में श्रीमद्भगवद्गीता की एक पुरानी प्रति थी।
"पिताजी!"
आदित्य ने हांफते हुए, बदहवास हालत में दरवाज़ा खोला। उसके कपड़े बारिश और ख़ून से भीगे थे, चेहरे पर घाव थे और हाथ में वह अष्टधातु का खड्ग था।
राजीव रावत ने अपनी आँखें उठाईं।
लेकिन उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
कोई घबराहट नहीं थी।
उनकी बूढ़ी आँखों से केवल दो बूँद आँसू चुपचाप लुढ़ककर उनकी दाढ़ी में समा गए।
उन्होंने गीता को एक लाल रेशमी कपड़े में लपेटा और बहुत धीमी, टूटी हुई आवाज़ में बोले:
"तू लौट आया, आदित्य...
लेकिन तू अकेला नहीं लौटा है। तेरे पीछे उस अंधार-चौकी की मिट्टी और तेरे दादा की अंतिम साँसें चलकर आई हैं।"
"पिताजी!" आदित्य घुटनों के बल उनके कदमों में गिर पड़ा। उसका गला रुंध गया था।
"मुझे सच बताइए!
नौटियाल कौन है?
मेरे दादा त्रिलोक सिंह ने 1962 में क्या किया था?
और यह पूरा विभाग... यह पूरी सरकार मुझे उस 'रूपकुंड' के ताल की तरफ़ क्यों धकेल रही है?!"
राजीव रावत ने अपनी कांपती हुई हथेली आदित्य के माथे पर रखी।
उन्होंने एक गहरी, ठंडी साँस ली:
"बैठ, आदित्य। आज उस पर्दे को गिरना ही होगा जिसे मैंने तिरेसठ साल तक अपनी छाती के घाव की तरह छुपाए रखा।"
3. राजजात का महा-शाप और कन्नौज के राजा का अहंकार
राजीव रावत उठे।
उन्होंने कमरे के कोने में रखी लोहे की एक पुरानी, जंग लगी संदूक की कुंडी खोली।
उस संदूक के भीतर से उन्होंने लाल कपड़े में लिपटा हुआ एक प्राचीन, भोजपत्र पर लिखा ताम्र-पत्र (Copper Plate Inscription) निकाला। उस पर 12वीं सदी की कुटिला लिपि में अक्षर खुदे थे।
"आदित्य," राजीव जी ने उस ताम्र-पत्र को मेज़ पर रखते हुए कहा,
"दुनिया केवल इतना जानती है कि चमोली ज़िले में सोलह हज़ार फीट की ऊँचाई पर स्थित 'रूपकुंड' एक रहस्यमयी झील है, जहाँ 1942 में एक वन-रक्षक ने पाँच सौ से अधिक प्राचीन इंसानी कंकाल, खोपड़ियाँ और हड्डियाँ बर्फ़ में तैरती हुई देखी थीं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि वे 9वीं सदी के किसी राजा के सैनिक या तिब्बती व्यापारी थे जो ओलावृष्टि (hailstorm) में मारे गए थे।
लेकिन वह विज्ञान का आधा सच है, बेटा!"
राजीव रावत की आवाज़ में भयानक सिहरन दौड़ गई:
"असली सच यह है कि वे कंकाल कन्नौज के अहंकारी राजा जसधवल (King Jasdhawal), उसकी गर्भवती रानी बल्लभा (Queen Balampa), और उनकी पूरी सेना के हैं!
राजा जसधवल हिमालय की कुलदेवी—माँ नंदा देवी की बारह वर्ष में एक बार होने वाली पवित्र 'नंदा राजजात यात्रा' में शामिल हुआ था।
लेकिन अपने राजसी घमंड में चूर होकर, उसने उस पवित्र, निर्जन बुग्यालों में अपनी नर्तकियों (पातरों) को नचाया, शराब के दौर चलाए और उस तपोभूमि की मर्यादा को भ्रष्ट कर दिया!
क्रोधित होकर माँ नंदा ने आकाश से लोहे और पत्थर के विशाल ओलों की ऐसी प्रलयंकारी वर्षा की कि राजा, रानी, उनकी नर्तकियाँ और पूरी सेना उस ताल के किनारे तड़प-तड़प कर वहीं जम गई!"
आदित्य ने चौंककर पूछा: "लेकिन पिताजी, उस 9वीं सदी के राजा के पाप से हमारे रावत ख़ानदान का क्या संबंध है?"
राजीव रावत की आँखें लाल हो गईं:
"संबंध है, आदित्य!
क्योंकि उस राजा जसधवल का जो प्रधान सेनापति और राज-पुरोहित था... जिसने राजा को उस अपवित्र कृत्य से रोकने के बजाय उस पाप में उसका साथ दिया था...
वह कोई और नहीं था, आदित्य...
वह हमारे ही ख़ानदान का आदि-पुरुष—सेनापति वीरभान रावत था!"
आदित्य के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
"जब देवी नंदा का कोप बरसा था," राजीव जी ने थरथराते हुए कहा,
"तो देवी ने राजा को तो तुरंत मार दिया, लेकिन हमारे आदि-पुरुष वीरभान को एक ऐसा शाप दिया जो सात कल्पों तक नहीं कट सकता था!
देवी ने कहा था:
'तेरी आने वाली हर सातवीं पीढ़ी का सबसे योग्य रक्त... इस हिमालय की किसी न किसी शापित घाटी में भटककर मरेगा... और अंत में, तेरे ही वंश का एक बालक रूपकुंड के उस ताल में उतरकर उन पाँच सौ कंकालों के पाप का अंतिम लेखा-जोखा अपनी देह से चुकाएगा!'
तेरे दादा त्रिलोक सिंह उस शाप की छठवीं कड़ी थे, आदित्य!
और तू...
तू उस शाप की सातवीं और अंतिम कड़ी है!"
राजीव जी ने आदित्य के हाथों को पकड़ लिया:
"वह हरीश नौटियाल कोई इंसान नहीं है, बेटा!
वह राजा जसधवल के उस शापित खज़ाने का प्रेत-रक्षक है! वह चाहता है कि तू रूपकुंड के उस पाताल-ताल में उतरे... क्योंकि जब तक वीरभान का सातवाँ वंशज उस झील के पानी में अपना जीवित रक्त नहीं गिराता... तब तक राजा जसधवल और उसकी उस पाँच सौ कंकालों की प्रेत-सेना को मुक्ति नहीं मिल सकती!"
4. वाण गाँव की अंतिम सीमा और लाटू देवता का रहस्य
पिता के इस भयानक खुलासे ने आदित्य के भीतर के सारे संशयों को मिटा दिया था।
अब भागने का कोई रास्ता नहीं था।
अगर वह भागता, तो वह शाप उसके पिता को निगल जाता, और उसके बाद उसकी आने वाली पीढ़ियों का नामोनिशान मिट जाता। इस चक्रव्यूह का अंत केवल वहीं हो सकता था जहाँ से यह शुरू हुआ था—सोलह हज़ार फीट की ऊँचाई पर जमी उस 'कंकालों की झील' में!
अगली सुबह, आदित्य ने अपने पिता के चरण छुए।
राजीव जी ने उसे वह प्राचीन ताम्र-पत्र, एक छोटी कटोरी में बद्रीनाथ के महा-अभिषेक का सूखा चंदन, और अपनी कुल-परंपरा का वह अष्टधातु खड्ग थमा दिया।
दो दिन की अत्यंत कठिन यात्रा।
ऋषिकेश से कर्णप्रयाग, फिर थराली, देवाल, मुंदोली और अंत में... चमोली ज़िले का वह अंतिम मानवीय गाँव जहाँ के बाद इंसानी बस्तियाँ हमेशा के लिए समाप्त हो जाती थीं—'वाण गाँव' (Wan Village)।
वाण गाँव समुद्र तल से आठ हज़ार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर, विशाल अखरोट और देवदार के घने जंगलों के बीच बसा एक शांत, रहस्यमयी पहाड़ी गाँव था।
यहाँ के घरों की दीवारें लकड़ी और पत्थरों की थीं, जिन पर नंदा देवी के पवित्र त्रिशूल बने थे।
गाँव के मुहाने पर ही एक विशाल, प्राचीन देवदार के पेड़ के नीचे 'लाटू देवता' (Latu Devta Temple) का ऐतिहासिक मंदिर खड़ा था।
लाटू देवता को माँ नंदा का धर्म-भाई माना जाता है। इस मंदिर का एक ऐसा कड़ा और रूह-कँपा देने वाला नियम है जो पूरी दुनिया में कहीं नहीं है:
इस मंदिर के गर्भगृह में कोई भी पुजारी या भक्त खुली आँखों से नहीं जा सकता!
पुजारी अपने मुँह और आँखों पर काली पट्टी बाँधकर, कई फीट दूर से गर्भगृह का दरवाज़ा खोलता है, क्योंकि मान्यता है कि मंदिर के भीतर साक्षात नागराज तक्षक और लाटू देवता अपने महा-विषैले और रौद्र रूप में विराजमान हैं, जिनकी एक दृष्टि भी किसी इंसान को अंधा या भस्म कर सकती है!
शाम के पाँच बज रहे थे।
मंदिर के चबूतरे पर एक अस्सी वर्षीय, सफ़ेद दाढ़ी और तांबे जैसी आँखों वाला वृद्ध लामा-पुजारी बैठा था—दीवान सिंह दानू।
जब आदित्य ने अपनी भारी पदचाप से उस चबूतरे पर कदम रखा, तो उस अंधे पुजारी ने बिना आँखें खोले, केवल हवा की गंध सूंघकर अपना सिर उठाया।
"आ गए, वीरभान के ख़ून..." दीवान सिंह की आवाज़ किसी सूखी पहाड़ी नदी के पत्थरों जैसी खड़खड़ाई।
"तुम्हारी देह से उस कालिंदी घाटी की सर्प-शिला और महासू के खड्ग की गंध आ रही है।"
आदित्य ने हाथ जोड़ लिए: "बाबा, मुझे रूपकुंड जाना है। मुझे उस शाप की अंतिम ग्रंथि को खोलना है।"
दीवान सिंह ने एक ठंडी, कांपती हुई हँसी हँसते हुए अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी:
"रूपकुंड कोई सैरगाह नहीं है, बालक!
वाण गाँव से आगे रौंकेबगड़, फिर गेरोली पाताल, और फिर शुरू होता है वह 'बेदनी बुग्याल'—एशिया का सबसे विशाल, मखमली घास का मैदान!
दिन में वह स्वर्ग जैसा दिखता है, लेकिन रात होते ही... राजा जसधवल की वे अभागी नर्तकियाँ (पातर) उस घास के मैदान में अपने कटे हुए पैरों के घुंघरू बाँधकर नाचती हैं!
और बेदनी से आगे... घोड़ा लौटानी, पातर नचौनियां, और 'कालवा विनायक' का वह भयानक दर्रा है जहाँ हवा में ऑक्सीजन इतनी कम हो जाती है कि इंसान का दिमाग़ अपने ही मरे हुए पुरखों की आवाज़ें सुनने लगता है!
अगर तू कल सुबह की पहली किरण से पहले बेदनी पार नहीं कर पाया... तो उस ताल तक पहुँचने से पहले ही यह घाटी तेरी हड्डियों का चूरा बना देगी!"
दीवान सिंह ने अपनी झोली से एक छोटा सा कस्तूरी मृग का सूखा नाभि-पाउच निकाला:
"इसे अपने गले में बाँध ले। जब उस बुग्याल की आंछरियां और पातरें तुझे सम्मोहित करने के लिए अपनी सीटी बजाएँगी... तो यह कस्तूरी की तीखी गंध तेरी चेतना को सोने नहीं देगी!"
5. बेदनी बुग्याल का कोहरा और पातर नचौनियों का तांडव
अगली भोर, जब तारे अभी भी आसमान में चमक रहे थे, आदित्य अकेला उस निर्जन, संकरे पथरीले ट्रैक पर बढ़ चला।
वाण गाँव के घने बांझ के जंगल पीछे छूट चुके थे।
ग्यारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर पहुँचते ही पेड़ पूरी तरह ग़ायब हो गए।
सामने मीलों दूर तक फैला हुआ था—'बेदनी बुग्याल'।
हवा में इतनी भयानक, चुभने वाली ठंड थी कि आदित्य की हर साँस हवा में सफ़ेद बादलों की तरह जम रही थी।
सामने क्षितिज पर त्रिशूल (7,120 मीटर) और नंदा घुंटी (6,309 मीटर) की दो विशाल, बर्फ़ से ढकी सफ़ेद-नीली चोटियाँ किसी आकाश छूते हुए त्रिशूल की तरह खड़ी थीं। उनकी चोटियों पर सुबह की पहली लाल-नारंगी किरणें पड़ रही थीं, जैसे पर्वत-शिखरों पर ताज़ा ख़ून छिड़क दिया गया हो।
दोपहर के दो बजते-बजते मौसम ने अचानक भयानक पलटा खाया।
पहाड़ों पर मौसम का कोई भरोसा नहीं होता।
कुछ ही मिनटों में उन बर्फ़ीली चोटियों के पीछे से गहरे काले, स्लेटी बादलों का एक ऐसा विशाल बवंडर उठा जिसने पूरे बुग्याल को अपनी चपेट में ले लिया।
तापमान माइनस पंद्रह डिग्री तक गिर गया।
और उसके साथ ही—
घास के मैदान के ऊपर ज़मीन से चार फीट ऊँचा, एक अत्यंत गाढ़ा, दूधिया सफ़ेद 'ज़हरीला कोहरा' रेंगने लगा!
उस कोहरे में दृश्यता (visibility) शून्य हो गई। आदित्य को अपने आगे का अगला कदम भी दिखाई नहीं दे रहा था।
वह 'पातर नचौनियां' (Patar Nachauniya) के उस वीरान, पथरीले ढलान पर पहुँच चुका था।
लोक-कथाओं के अनुसार, यही वह जगह थी जहाँ राजा जसधवल ने अपनी रूपवती नर्तकियों को नाचने का आदेश दिया था, और देवी के क्रोध से वे नर्तकियाँ इसी ढलान पर पत्थर बन गई थीं।
यहाँ ज़मीन पर आज भी दर्जनों चौकोर, गोल, अजीब आकार के काले पत्थर गड़े थे जो दूर से देखने पर ऐसा लगता था मानो औरतें घूंघट निकाले बैठी हों।
अचानक—
उस सन्नाटे को चीरती हुई पत्थरों के बीच से एक बहुत बारीक, सुरीली झंकार उठी:
छन... छन-छन... छनन्र!
घुंघरू!
आदित्य के कदम वहीं जम गए।
उसने अपनी डाउन-जैकेट के कॉलर को भींच लिया। उसने अपने गले में बंधे उस कस्तूरी पाउच को अपनी नाक से सटाया। कस्तूरी की तीखी, कड़वी गंध ने उसके दिमाग़ को सुन्न होने से बचा लिया।
लेकिन आवाज़ रुक नहीं रही थी।
कोहरे के भीतर से...
सैकड़ों की तादाद में बिना सिर वाली, रेशमी लहंगे और सोने के आभूषण पहने औरतों के साए उस घास के मैदान पर थिरकने लगे!
उनके हाथों में जलती हुई मशालें थीं।
उनके पैरों की एड़ियाँ... आगे की तरफ़ थीं और उंगलियाँ पीछे मुड़ी थीं!
वे सब एक घेरा बनाकर आदित्य की तरफ़ बढ़ रही थीं।
और उनके उन कटे हुए धड़ों के गलों से... एक साथ वही भयानक कोरस गूँज रहा था:
"आ गया रे... वीरभान का जाया आ गया!
नौ सौ साल की प्यास बुझाने...
हमारा मुक्तिदाता आ गया!
चल रूपकुंड... राजा तेरा इंतज़ार कर रहा है!"
वे साए इतने करीब आ गए कि उनके ठंडे, बर्फीले हाथों के पंजों ने आदित्य के कंधों और बैग को छूना शुरू कर दिया।
आदित्य ने अपनी कमर से वह अष्टधातु का खड्ग निकाला।
उसने हवा में खड्ग का एक विशाल चक्र घुमाया:
"हटो पीछे! मैं माँ नंदा के त्रिशूल की छत्रछाया में हूँ!"
खड्ग से निकली पवित्र सुनहरी लपटों ने उन प्रेत-नर्तकियों के घेरे को चीर दिया।
वे साए चीख़ते हुए कोहरे में बिखर गए।
आदित्य रुका नहीं।
वह पागलों की तरह उस पथरीले, तीखे ढलान पर दौड़ता रहा।
घोड़ा लौटानी, फिर 'कालवा विनायक' का भयानक पथरीला दर्रा जहाँ भगवान गणेश की एक प्राचीन स्वयंभू काली मूर्ति स्थापित थी। आदित्य ने उस मूर्ति पर बद्रीनाथ का वह सूखा चंदन अर्पित किया और बिना पीछे मुड़े, सीधे उस अंतिम, बर्फीले गर्त की तरफ़ उतर गया!
6. रूपकुंड का महा-श्मशान: सोलह हज़ार फीट का पाताल-ताल
शाम के ठीक पाँच बजकर दस मिनट।
आदित्य उस अंतिम कगार पर पहुँचा जहाँ दुनिया समाप्त हो जाती है।
त्रिशूल पर्वत के विशाल, ऊँचे, नंगे पत्थरों के परकोटे के ठीक बीचों-बीच...
एक गहरी, कटोरे के आकार की, रहस्यमयी झील फैली हुई थी।
'रूपकुंड' (The Mystery Skeleton Lake — 16,499 Feet)।
चारों तरफ़ केवल नंगी, भूरी-काली चट्टानें और ज़मी हुई सदियों पुरानी बर्फ़ थी। हवा इतनी पतली थी कि हर साँस के साथ छाती में खंजर घोंपने जैसा दर्द हो रहा था।
झील की सतह पूरी तरह जमी हुई थी।
लेकिन वह बर्फ़ सफ़ेद नहीं थी; वह एक अजीब, पारदर्शी, गहरे पन्ना-हरे (emerald green) रंग के शीशे जैसी थी।
और उस काँच जैसी बर्फ़ के भीतर...
जो दृश्य आदित्य की आँखों के सामने फैला था... उस दृश्य ने उसके रक्त के एक-एक कण को जमाकर रख दिया।
झील के किनारे, उथले पानी में और बर्फ़ की परतों के नीचे...
सैकड़ों की तादाद में इंसानी कंकाल, खोपड़ियाँ, पसलियाँ और हाथ-पैर बिखरे पड़े थे!
वे कंकाल किसी आम मुर्दे जैसे नहीं थे।
बर्फ़ के उस अत्यधिक कम तापमान और शुष्क हवा की वजह से, नौ सौ साल बाद भी कई खोपड़ियों पर उनके काले-भूरे बाल सलामत थे!
कई कंकालों के बदन पर चमड़े के फटे हुए जूते, बांस के टूटे हुए छाते, लोहे के भालों की नोकें और सोने-चांदी के पुराने कंगन आज भी चिपके हुए थे!
उनकी खोपड़ियों की एक ख़ास बात थी—
हर एक खोपड़ी के ठीक शीर्ष (crown of the skull) पर... एक गहरा, गोल, क्रिकेट की गेंद के आकार का हड्डी टूटने का गड्ढा (Fracture Depression) बना हुआ था!
यह इस बात का मूक और भयानक गवाह था कि 9वीं सदी में आकाश से गिरे उन लोहे जैसे विशाल ओलों ने सीधे ऊपर से वार करके एक ही पल में इन पाँच सौ इंसानों का भेजा उड़ा दिया था!
हवा में इतनी भयानक, श्मशानी शांति थी कि आदित्य को अपनी ही पलकों के झपकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
तभी—
झील के ठीक केंद्र में... जहाँ बर्फ़ की परत सबसे मोटी थी...
एक भारी, पत्थरों के हिलने की आवाज़ हुई।
कड़-कड़-कड़... चर्र्र्र्क!
झील की उस हरी बर्फ़ में एक विशाल दरार पड़ी।
और उस दरार के भीतर से...
बर्फ़ और पानी के फव्वारे को चीरता हुआ... सोने का एक विशाल, प्राचीन राज-सिंहासन ऊपर उठने लगा!
7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: राजा का जीवित मुखौटा (The Twist)
उस सिंहासन के ऊपर...
एक नौ सौ साल पुराना, विशालकाय, सात फीट लंबा कंकाल बैठा था।
उस कंकाल ने 9वीं सदी के कन्नौज के सम्राट का भारी, सोने का मुकुट और रत्नों से जड़ा हुआ ज़िरह-बख्तर पहन रखा था।
उसकी खोपड़ी पर भी वही ओले का भयानक छेद था।
वह कोई और नहीं था... वह स्वयं कन्नौज का राजा जसधवल था!
और उस राजा के कंकाल के दोनों तरफ़...
दो साए खड़े थे।
एक साया... चीफ इंजीनियर हरीश नौटियाल का था, जो अब अपने पूरे पिशाच-रूप में था!
और दूसरा साया...
जब आदित्य की नज़र उस दूसरे साए पर पड़ी...
तो आदित्य के मुँह से निकली चीख़ हवा में ही जम गई।
उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसका पूरा वजूद पाताल में गिर गया।
राजा के बायीं तरफ़, हाथ में वही 1962 की ब्रिटिश संगीन लिए जो इंसान खड़ा था...
वह कोई और नहीं था...
वह स्वयं उसका अपना पिता—राजीव रावत था!
वही राजीव रावत, जिसे वह अभी कुछ घंटे पहले ऋषिकेश के घर में छोड़कर आया था!
राजीव रावत के चेहरे पर अब कोई बुढ़ापा, कोई लाचारी या कोई आँसू नहीं थे।
उनके चेहरे पर एक अत्यंत क्रूर, भयानक, 9वीं सदी के क्षत्रिय सेनापति का अहंकार नाच रहा था। उनकी आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह सफ़ेद हो चुकी थीं!
राजीव रावत ने आगे बढ़कर उस अष्टधातु के खड्ग की तरफ़ इशारा किया जो आदित्य के हाथ में था:
"शाबाश, मेरे बेटे... शाबाश!"
राजीव की आवाज़ में किसी बूढ़े पिता की नहीं, बल्कि नौ सौ साल पुराने उस सेनापति वीरभान रावत की गगनभेदी गर्जना थी:
"तू सचमुच समझा कि तेरे पिता को उस शाप से मुक्ति चाहिए थी?
अरे मूर्ख बालक!
मैं बासठ साल से ऋषिकेश के उस कमरे में बैठकर इस दिन का इंतज़ार कर रहा था!
जब 1962 में तेरे दादा त्रिलोक सिंह ने उस डाक-बंगले में कायरों की तरह अपनी जान दे दी थी...
तो उसने हमारे इस महा-अनुष्ठान को अधूरा छोड़ दिया था!
देवी नंदा ने हमें मारा नहीं था, आदित्य...
देवी ने हमें इस सोलह हज़ार फीट की बर्फ़ के नीचे इसलिए क़ैद किया था क्योंकि हमारे पास 'अमृत-शिला' का वह रहस्य था!
और उस रहस्य का ताला केवल एक ही चीज़ से खुल सकता था—
महासू देवता का वह अष्टधातु खड्ग... जो केवल एक ऐसा रावत उठा सकता था जिसके मन में अपने पिता और दादा के लिए सच्चा, निष्पाप प्रेम हो!
तूने वह खड्ग उस हिम-गुफ़ा से निकालकर... यहाँ लाकर... हमारे हाथों में सौंप दिया है!
अब इस झील के पानी में किसी और की बलि नहीं होगी, आदित्य...
आज यहाँ... इस पाँच सौ कंकालों के सामने...
तेरा सगा बाप... अपने ही बेटे का गला काटकर... इस रूपकुंड के पाताल-द्वार को खोलेगा!"
राजीव रावत ने अपनी कमर से एक खूनी कटार खींच ली।
और उस जमी हुई झील के नीचे से...
वे पाँच सौ प्राचीन कंकाल... एक साथ अपनी बर्फ़ की क़ब्रों को फाड़कर... अपने कंकाल-हाथों में टूटे हुए भाले और तलवारें लिए... बर्फ़ की सतह पर रेंगने लगे!
[भाग 5 समाप्त — जारी रहेगा भाग 6 में...]
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