PretikaParanormalदेवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य

भाग 6: सोलह हज़ार फीट पर पितृ-युद्ध, रानी बल्लभा का विलाप और नंदा-त्रिशूल का जागरण

Piyashi Atma · Paranormal · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
Chapter
6 of 6
Category
Paranormal
Reading time
17 min
Words
3273
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
​भाग 6: सोलह हज़ार फीट पर पितृ-युद्ध, रानी बल्लभा का विलाप और नंदा-त्रिशूल का जागरण
​1. कंकालों का हिम-तांडव और पिता की रक्त-पिपासा
​सोलह हज़ार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर रात का उतरना किसी भयानक कफ़न के खिंच जाने जैसा होता है।
​त्रिशूल और नंदा घुंटी की नंगी, बर्फीली चोटियों के बीच घिरी रूपकुंड की उस अंडाकार झील के ऊपर शून्य से पच्चीस डिग्री नीचे की ऐसी हवा बह रही थी, जो साँस की नली में पहुँचते ही फेफड़ों को शीशे की तरह तोड़ रही थी। झील की हरी, पारदर्शी बर्फ़ पर हज़ारों दरारें पड़ चुकी थीं। उन दरारों से नौ सौ साल से दबे हुए काले, चिपचिपे, गंधक-युक्त पानी के फव्वारे फूट रहे थे।
​और उस उबलते-जमे पानी के बीच से... पाँच सौ कंकाल बाहर निकल आए थे।
​उनकी हड्डियों की पसलियाँ चरमरा रही थीं। खोपड़ियों के शीर्ष पर बने वे गोल गड्ढे—जो 9वीं सदी के दैत्याकार ओलों से हुए थे—उनसे नीली और मटमैली रूहानी रोशनी रिस रही थी। किसी के हाथ में जंग लगा लोहे का भाला था, किसी के पंजे में मुड़ी हुई तलवार थी, और वे सब एक तालबद्ध, अमानवीय खड़खड़ाहट के साथ आदित्य की तरफ़ बढ़ रहे थे:
​खड़-खड़-खड़... चर्र्र्र्क...
​सामने, सोने के उस नक्काशीदार प्राचीन सिंहासन पर राजा जसधवल का मुकुटधारी कंकाल बैठा था।
​और उसके ठीक आगे खड़ा था... राजीव रावत।
​आदित्य का अपना सगा पिता। वह पिता, जिसकी उंगली पकड़कर उसने देहरादून के परेड ग्राउंड में चलना सीखा था। वह पिता, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक मामूली क्लर्क की तरह, सिर झुकाकर, गीता के पन्नों में मुँह छुपाकर गुज़ार दी थी।
​लेकिन आज उस शरीर के भीतर वह बूढ़ा, लाचार राजीव नहीं था।
​उसके चेहरे की त्वचा खींचकर हड्डियों से चिपक गई थी। माथे की नसें काले साँपों की तरह फूल चुकी थीं। आँखें पूरी तरह पुतली-विहीन, धधकते हुए चूने की तरह सफ़ेद थीं। उसके दाएँ हाथ में वही 1962 की भारी, ज़हरीली ब्रिटिश संगीन थी, जिससे गाढ़ा, काला ख़ून टपक रहा था।
​"पिताजी..." आदित्य के होंठ ठंड और असहनीय आघात से थरथरा रहे थे। उसकी छाती में ऐसा दर्द उठा मानो किसी ने नंगी तलवार से उसका सीना चीर दिया हो।
​"यह आप नहीं हो सकते... आप मेरे पिता हैं... आपने मुझे सिखाया था कि हिमालय की भूमि पर धर्म ही सबसे बड़ा सत्य है!"
​"धर्म?!"
​राजीव रावत के मुँह से निकली आवाज़ किसी गहरे कुएँ में लोहे के भारी पत्थरों के टकराने जैसी गूँजी।
​वह आवाज़ राजीव की नहीं थी; वह नौ सौ साल पुराने उस क्रूर, शापित सेनापति वीरभान रावत की गगनभेदी गर्जना थी:
​"अरे अबोध बालक! धर्म केवल उन कमज़ोरों का झुनझुना है जो पराजय को अपनी तक़दीर मान लेते हैं!
​1192 में जब नंदा देवी के उस भयानक कोप ने हमारे राजा जसधवल और हमारी सेना को इस झील के तलवे में पीस डाला था, तब तेरे इस आदि-पुरुष वीरभान ने अपने घुटनों के बल बैठकर देवी से दया की भीख नहीं माँगी थी!
​मैंने अपनी तलवार की नोक से इस पाताल की बर्फ़ पर यह शपथ ली थी कि मैं अपने ही ख़ून की सातवीं पीढ़ी को इस सिंहासन तक खींच कर लाऊँगा!
​तू क्या समझता है कि मैंने तुझे पैदा किया?
​नहीं!
​मैंने ऋषिकेश के उस कमरे में बैठकर तीस साल तक महा-श्मशान तंत्र की वह साधना की थी, जिससे मेरी ही रूह मेरे इस बेटे राजीव के शरीर में सुप्त होकर बैठ सके!
​और आज... जब तू उस कालिंदी घाटी से महासू देवता का वह दिव्य अष्टधातु खड्ग लेकर आ चुका है... तो हमारे इस नौ सौ साल के कारावास का ताला टूट चुका है!"
​वीरभान (राजीव) ने अपनी संगीन की नोक सीधे आदित्य के गले की तरफ़ तान दी:
"उस खड्ग को इस सिंहासन की वेदी पर रख दे, आदित्य... और चुपचाप अपनी बलि स्वीकार कर! तेरे ख़ून की पहली बूँद इस हरी बर्फ़ पर गिरते ही, यह पूरी कंकाल-सेना जीवित होकर इस आर्यावर्त पर अपना साम्राज्य फिर से स्थापित करेगी!"
​2. ममता की राख और चीफ़ इंजीनियर का छल
​"कभी नहीं!" आदित्य ने अपने दाँत भींचते हुए चिल्लाया।
​उसकी आँखों के आँसू बहकर उसके गालों पर ही बर्फ़ बनकर जम चुके थे। उसने अपने दोनों हाथों से उस अष्टधातु के खड्ग को कसकर पकड़ लिया।
​खड्ग की धार से निकलती हुई सुनहरी-श्वेत लपटें उस शून्य से पच्चीस डिग्री नीचे की ठंड में भी धधक रही थीं।
​"मैं अपने पिता के शरीर को इस शैतान का बर्तन नहीं बनने दूँगा!"
​तभी, राजा के सिंहासन के दायीं तरफ़ खड़ा हरीश नौटियाल आगे बढ़ा।
​नौटियाल का शरीर अब कोई सरकारी अफ़सर जैसा नहीं लग रहा था। उसकी गर्दन मुड़कर एक तरफ़ लटक चुकी थी, और उसकी पीठ से सात फीट लंबे, काले, कांटेदार पंख बाहर निकल आए थे। वह रूपकुंड के उस प्राचीन पिशाच-पहरेदार—'यक्ष-वेताल' के रूप में प्रकट हो चुका था!
​"वीरभान!" नौटियाल ने अपनी फटी हुई, सीटी जैसी आवाज़ में कहा।
​"बातों का वक़्त ख़त्म हो चुका है! आसमान में देख... 'कालवा विनायक' का तारा सीधे त्रिशूल पर्वत की चोटी के ऊपर आ चुका है!
​अगर अगले बारह मिनट के भीतर इस लड़के के दिल का ताज़ा ख़ून उस अमृत-शिला पर नहीं गिरा, तो नंदा देवी का भोर-चक्र शुरू हो जाएगा और यह झील फिर से एक हज़ार साल के लिए पाताल में धँस जाएगी!"
​नौटियाल ने अपने दोनों पिशाच-हाथ हवा में उठाए।
​सननन्र!
​झील के किनारे खड़े पचास कंकाल-धनुर्धरों ने एक साथ अपनी बर्फ़ीली, सड़ी हुई प्रत्यंचाएँ खींच लीं।
​उनकी हड्डियों के तीरों की नोक पर नीले ज़हर की आग जल रही थी।
​तड़ातड़! सन-सन-सन!
​पचास तीरों की एक भयानक बौछार आदित्य की तरफ़ हुई!
​आदित्य ने अपनी पूरी देह को सिकोड़ते हुए, उस अष्टधातु के खड्ग को हवा में बिजली की तेज़ी से घुमाया।
​झन-झन-झन! चिनगारियों की बारिश!
​दिव्य खड्ग की पवित्र अग्नि ने उन तीरों को हवा में ही काटकर राख कर दिया।
​लेकिन उन तीरों की आड़ में—
​राजीव रावत (वीरभान) ने एक अमानवीय, चीते जैसी छलांग लगाई!
​धड़ाम!
​राजीव की भारी संगीन सीधे आदित्य के खड्ग के मुठिये से टकराई।
​धातु के आपस में टकराने का ऐसा भयानक धमाका हुआ जिसने झील की बर्फ़ को तीन फीट गहरा फाड़ दिया।
​आदित्य फिसलकर घुटनों के बल गिरा।
​सामने उसका अपना पिता खड़ा था। पिता का चेहरा केवल चार इंच दूर था। आदित्य अपने पिता की साँसों की वह जानी-पहचानी, बीड़ी और इलायची की गंध को महसूस कर सकता था, लेकिन उन आँखों में... केवल नौ सौ साल पुराना पिशाच-अंधकार था।
​"मार मुझे, आदित्य!" वीरभान ने अट्टहास करते हुए कहा। उसकी संगीन आदित्य के कंधे के माँस में एक सेंटीमीटर धँस चुकी थी।
​"चला अपना यह पवित्र खड्ग! काट अपनी ही माँ के सिंदूर को!
​तू अपने ही बाप की छाती में यह खंजर घोंपेगा?
​तू पितृहत्या का पाप अपने सिर लेगा?
​चला...!"
​आदित्य का हाथ कांप गया।
​यही थी वह सबसे भयानक, मनोवैज्ञानिक फाँसी!
​अगर वह वार करता है, तो वह अपने ही सगे, निर्दोष पिता के शरीर को काट डालेगा; और अगर वह वार नहीं करता, तो वह दानव उसकी बलि चढ़ाकर पूरी दुनिया में प्रलय ला देगा!
​3. रूपकुंड का पाताल-गर्त और रानी बल्लभा का प्रकट होना
​"नहीं... मैं आपको नहीं मारूँगा, पिताजी..." आदित्य की आवाज़ रुलाई में डूब गई। "लेकिन मैं इस शैतान को भी जीतने नहीं दूँगा!"
​आदित्य ने अपने खड्ग से पलटवार नहीं किया।
​उसने अचानक अपने दोनों पैरों को मोड़ा और अपने पूरे शरीर के वज़न के साथ... झील की उस टूटी हुई, पतली बर्फ़ीली परत पर अपनी पीठ दे मारी!
​कड़कड़ाती बर्फ़! चटक! छपाक!
​झील की पन्ना-हरी बर्फ़ का वह पूरा हिस्सा टूट गया।
​आदित्य और राजीव रावत दोनों एक साथ उस खौलते हुए, काले, शून्य से तीस डिग्री नीचे के बर्फीले पानी के भीतर समा गए!
​पानी इतना ठंडा था कि आदित्य की नसों का ख़ून एक ही सेकंड में जमने लगा। उसकी आँखें पानी के भीतर फटी रह गईं।
​लेकिन यह कोई साधारण झील का पानी नहीं था।
​यह रूपकुंड का वह अथाह पाताल-गर्भगृह था, जिसे नौ सौ साल से किसी जीवित मनुष्य ने नहीं देखा था!
​झील के पंद्रह फीट नीचे... पत्थरों का एक विशाल, गोलाकार वैदिक हवन-कुंड बना हुआ था।
​और उस हवन-कुंड के बीचों-बीच...
​काले संगमरमर की एक विशाल शिला पर रानी बल्लभा (Queen Balampa) का नौ सौ साल पुराना, पूरी तरह सुरक्षित, बर्फ़ में जमा हुआ शरीर लेटा था!
​रानी के रेशमी शाही वस्त्र आज भी उसी तरह चमकदार थे। उसके माथे पर नौलखा टीका था।
​और रानी के उस जमे हुए, सुंदर लेकिन भयानक चेहरे के पेट पर... एक विशाल, सोने का 'भ्रूण-कवच' बंधा था, जिसके भीतर उस अभागे, अजन्मे शिशु की रूह नौ सौ साल से तड़प रही थी!
​पानी के भीतर राजीव (वीरभान) ने आदित्य की गर्दन को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया था। वह आदित्य का सिर उस रानी की वेदी पर पटकने की कोशिश कर रहा था ताकि ख़ून उस पत्थर पर फैल सके।
​आदित्य का दम घुट रहा था। फेफड़ों में पानी भरने लगा था।
​तभी—
​आदित्य की जेब में रखा वह कस्तूरी मृग का नाभि-पाउच... जो वाण गाँव के अंधे लामा दीवान सिंह ने दिया था... पानी के भीतर अपने आप खुल गया!
​कस्तूरी की वह तीव्र, पवित्र, दिव्य सुगंध पानी के एक-एक अणु में फैल गई।
​और उस गंध के फैलते ही—
​उस वेदी पर लेटी हुई रानी बल्लभा की आँखें... नौ सौ साल बाद... अचानक पानी के भीतर ही खुल गईं!
​वे आँखें क्रोध से नहीं, बल्कि एक माँ के उस असीम, प्रलयंकारी दर्द से भरी थीं जिसे नौ सौ साल पहले इन अहंकारी पुरुषों ने अपनी हवस और घमंड की बलि चढ़ा दिया था!
​रानी के जमे हुए होंठ हिले।
​पानी के भीतर एक ऐसी पराश्रव्य, रूहानी लहर दौड़ी जिसने वीरभान के हाथ की पकड़ को एक ही झटके में छुड़ा दिया!
​रानी की रूह उस शव से बाहर निकली—एक विशाल, पचास फीट ऊँची, सफेद प्रकाश की देवी जैसी आकृति!
​उसकी आवाज़ पानी को चीरती हुई सीधे आदित्य के हृदय में गूँजी:
​*"आदित्य! सुन इस अभागी माँ की पुकार!
​उस राजा जसधवल और इस सेनापति वीरभान ने मुझे और मेरे अजन्मे बच्चे को इस निर्जन बुग्याल में अपनी अय्याशी का साधन बनाया था!
​यह कंकाल-सेना उनकी नहीं है...
यह पाँच सौ कंकाल उन बेकसूर सैनिकों और नर्तकियों के हैं जिन्हें इन दोनों पापियों ने नंदा देवी के कोप में झोंक दिया था!
​उठा उस वेदी के नीचे गड़े उस 'नंदा-त्रिशूल' को!
केवल एक सच्चा, निष्पाप पुत्र ही उस त्रिशूल को स्पर्श कर सकता है!"*
​4. नंदा-त्रिशूल का उत्खनन और पाताल की ज्वाला
​आदित्य ने पानी के भीतर अपनी आँखें घुमाईं।
​रानी की वेदी के ठीक नीचे...
​काले बेसाल्ट पत्थर की एक चौकोर दरार में... तीन फनों वाला, शुद्ध सोने और उल्कापिंडीय लोहे (Meteoric Iron) से बना एक विशाल त्रिशूल गड़ा हुआ था!
​उस त्रिशूल के मध्य-फन पर साक्षात माँ नंदा देवी का 'दुर्गा-बीज मंत्र' चमक रहा था:
"ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः!"
​आदित्य ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए।
​पानी के भीतर वीरभान फिर से झपटा। उसकी संगीन आदित्य की पीठ को चीरने ही वाली थी।
​लेकिन आदित्य ने दर्द की परवाह किए बिना, अपने दोनों हाथों से उस नंदा-त्रिशूल की मूठ को पकड़ लिया!
​कड़कड़ाती बिजली! तड़ाक!
​पूरे रूपकुंड की झील के भीतर एक ऐसा महा-विस्फोट हुआ मानो पानी के भीतर दस सूर्य एक साथ उग आए हों!
​त्रिशूल से निकली सुनहरी, दिव्य ज्वाला ने उस पूरे बर्फीले पानी को एक ही सेकंड में भाप बना दिया!
​बूम!
​झील की सतह की पचास फीट मोटी बर्फ़ एक विशाल ज्वालामुखी की तरह फट गई!
​आदित्य उस फटे हुए पानी और भाप के बवंडर के साथ... हाथ में वह धधकता हुआ नंदा-त्रिशूल लिए... हवा में बीस फीट ऊँचा उछला और सीधे झील के किनारे के उस पत्थरीले चबूतरे पर आ गिरा!
​उसके पीछे-पीछे, राजीव (वीरभान) और नौटियाल भी पानी से बाहर फिंक गए।
​5. राजा जसधवल के सिंहासन का दहन
​अब आदित्य कोई मामूली क्लर्क नहीं था।
​उसके शरीर से निकलने वाली सुनहरी रश्मियाँ उस सोलह हज़ार फीट की रात को दिन के उजाले में बदल रही थीं। त्रिशूल की नोक से अग्नि की ऐसी धाराएँ बह रही थीं जो ज़मीन के पत्थरों को पिघला रही थीं।
​राजा जसधवल का वह कंकाल अपने सिंहासन से उठ खड़ा हुआ।
​उसकी खोपड़ी के भीतर से वही 9वीं सदी का घमंडी, राक्षसी स्वर गूँजा:
"सैनिकों! मार डालो इसे! इसका रक्त मुझे दो!"
​लेकिन जैसे ही राजा ने आदेश दिया—
​वे पाँच सौ कंकाल... जो अब तक राजा के इशारे पर नाच रहे थे... अचानक रुक गए।
​रानी बल्लभा की वह विशाल, सफेद रूहानी आकृति हवा में प्रकट हो चुकी थी।
​रानी ने अपनी बाँह उन कंकालों की तरफ़ फैला दी:
"मेरी संतानों... पहचानो अपने असली हत्यारे को!
​इस राजा ने तुम्हें नंदा के कोप में मरने के लिए छोड़ दिया था!
​आज तुम्हारे प्रतिशोध का दिन है!"
​उन पाँच सौ कंकालों की खोपड़ियों में जल रही नीली आग... अचानक लाल प्रतिशोध की ज्वाला में बदल गई!
​चीत्कार! अस्थि-विस्फोट!
​वे पाँच सौ कंकाल मुड़े।
​वे आदित्य की तरफ़ नहीं... वे सीधे उस सोने के सिंहासन पर बैठे राजा जसधवल पर टूट पड़े!
​तड़ातड़! चटक! खचाक!
​हज़ारों हड्डियों के पंजों ने राजा जसधवल के उस नौ सौ साल पुराने कंकाल को पकड़ लिया।
​किसी ने उसका सोने का मुकुट नोच लिया, किसी ने उसकी पसलियों को तोड़ दिया, तो किसी ने उसकी रीढ़ की हड्डी को बीच से दो फाड़ कर दिया!
​राजा जसधवल का कंकाल अपनी ही सेना के हाथों पिसकर उस हरी बर्फ़ पर धूल का ढेर बन गया!
​और दूसरी तरफ़—
​हरीश नौटियाल (यक्ष-वेताल) अपनी जान बचाने के लिए अपने पंख फड़फड़ाकर आकाश की तरफ़ उड़ने ही वाला था कि...
​आदित्य ने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस नंदा-त्रिशूल को पूरी ताक़त से हवा में फेंक दिया!
​सननन्र! धाँय!
​त्रिशूल हवा को चीरता हुआ गया और सीधे नौटियाल की पीठ के आर-पार निकल गया!
​चीखखखखखख!
​नौटियाल का वह पिशाच-शरीर हवा में ही आग का एक विशाल गोला बनकर फटा और त्रिशूल पर्वत की गहरी खाई में गिरकर हमेशा के लिए भस्म हो गया!
​6. पिता की आत्मा का अंतिम युद्ध: राजीव की मुक्ति
​अब उस पूरे वीराने में केवल दो ही लोग बचे थे।
​आदित्य... और उसका पिता, राजीव रावत।
​वीरभान की रूह अब राजीव के शरीर में बुरी तरह छटपटा रही थी। उसका राजा मर चुका था, उसका वेताल जल चुका था, लेकिन उसकी नौ सौ साल की ज़िद अभी भी उस बूढ़े शरीर की नसों को खींच रही थी।
​"मैं नहीं हारूँगा!" वीरभान ने राजीव के मुँह से झाग फेंकते हुए चिल्लाया।
​उसने अपनी संगीन उठाई और सीधे आदित्य की छाती में घोंपने के लिए आगे दौड़ा।
​आदित्य भागा नहीं।
​उसने अपना कोई हथियार नहीं उठाया।
​उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए।
​जब राजीव की संगीन आदित्य के सीने से केवल एक इंच दूर थी...
​आदित्य ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथों से... अपने पिता के उस कांपते हुए, ठंडे चेहरे को थाम लिया!
​उसने अपनी आँखें अपने पिता की उन पुतली-विहीन सफ़ेद आँखों में गड़ा दीं।
​"पिताजी..." आदित्य की आवाज़ में किसी देवी के मंत्र से भी अधिक पवित्र, असीम पुत्र-प्रेम की शक्ति थी।
​"याद कीजिए!
​आप वीरभान नहीं हैं!
​आप राजीव रावत हैं!
​वही राजीव... जिसने मेरी माँ के मरने के बाद पूरी-पूरी रात जागकर मुझे अपनी छाती से चिपका कर पाला था!
​याद कीजिए उस दीवाली को, जब आपके पास नए जूते खरीदने के पैसे नहीं थे, लेकिन आपने मुझे वह खिलौना खरीद कर दिया था!
​उठिए, पिताजी!
​इस शैतान को अपनी आत्मा से बाहर फेंकिए! अपने बेटे के लिए वापस आइए!"
​उस एक निस्वार्थ, पवित्र मानवीय प्रेम के स्पर्श ने...
​उस नौ सौ साल पुराने काले जादू के बंधन को एक ही झटके में तोड़ दिया!
​राजीव रावत के शरीर में एक भयानक कंपन हुआ।
​उनकी आँखों की वह सफ़ेद पुतली अचानक घूम गई और उनकी सामान्य, बूढ़ी, भूरी आँखें वापस लौट आईं!
​राजीव के चेहरे पर अपने बेटे को देखकर पश्चाताप और ममता के आँसू फूट पड़े:
"आ... आदित्य... मेरे बच्चे..."
​और उसी क्षण—
​राजीव के मुँह, नाक और कानों से... काले, ज़हरीले धुएँ का एक विशाल बवंडर चीख़ता हुआ बाहर निकला!
​वह था सेनापति वीरभान का असली, नग्न प्रेत-स्वरूप!
​"नहीं! मेरा शरीर!" वीरभान का साया हवा में छटपटाया।
​आदित्य ने ज़मीन पर गिरे उस अष्टधातु के खड्ग को उठाया।
​उसने हवा में उछलकर, सीधे उस काले धुएँ के केंद्र में उस खड्ग को घोंप दिया!
​ॐ नंदा देव्यै नमः!
​खड्ग से निकली सुनहरी ज्वाला ने उस नौ सौ साल पुराने सेनापति की रूह को एक ही पल में जलाकर राख कर दिया!
​वीरभान का अंत हो चुका था।
​रावत ख़ानदान के माथे से वह नौ सौ साल पुराना शाप हमेशा के लिए धुल चुका था!
​राजीव रावत बेहोश होकर आदित्य की बाहों में गिर पड़े। उनकी नब्ज़ चल रही थी। वे पूरी तरह सामान्य, जीवित और उस पिशाच-मुद्रा से मुक्त हो चुके थे।
​रानी बल्लभा की रूह ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उठाया। उन पाँच सौ कंकालों की आत्माएं सफ़ेद प्रकाश में बदलकर आकाश की ओर मोक्ष पाकर उड़ गईं।
​रूपकुंड का ताल अब शांत हो चुका था।
​सुबह की पहली सुनहरी धूप त्रिशूल पर्वत की चोटी को छू रही थी।
​7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: नंदा देवी का अंतिम आदेश (The Twist)
​आदित्य ने अपने पिता को सहारा देकर उस चबूतरे पर बैठाया।
​राजीव जी ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने अपने बेटे के सिर को चूम लिया: "आदित्य... हम जीत गए, बेटा... वह नर्क ख़त्म हो गया..."
​आदित्य ने मुस्कुराते हुए उस नंदा-त्रिशूल को देखा, जो ज़मीन में गड़ा हुआ शांत हो चुका था।
​उसे लगा कि सब कुछ समाप्त हो चुका है। उसका परिवार बच गया, उसका ख़ानदान आज़ाद हो गया।
​तभी—
​उस शांत हो चुकी रूपकुंड की झील के बिल्कुल केंद्र में... जहाँ वह काला पानी था...
​पानी फिर से हिलने लगा।
​गुल-गुल-गुल...
​पानी की सतह पर एक बहुत विशाल, प्राचीन, चमड़े की जिल्द वाली अति-गोपनीय फ़ाइल तैरकर ऊपर आ गई।
​वह फ़ाइल आज की नहीं थी।
​उस फ़ाइल पर भारत सरकार के गृह मंत्रालय और सेना के सर्वोच्च गुप्त विंग की लाल मुहर लगी थी:
​TOP SECRET: OPERATION NANDA DEVI (1965)
विषय: गुरु शिखर पर खोया हुआ 'प्लूटोनियम न्यूक्लियर जनरेटर' (SNAP-19C)
स्थिति: सक्रिय (Active & Leaking)
​आदित्य का दिल एक भयानक झटके के साथ धड़कना भूल गया।
​उसने कांपते हाथों से उस तैरती हुई फ़ाइल को उठाया।
​इतिहास का एक और भयानक, अनसुलझा सच उसके सामने था।
​1965 में भारत और अमेरिका (CIA) ने चीन पर नज़र रखने के लिए नंदा देवी की चोटी पर एक गुप्त परमाणु-सेंसिंग उपकरण लगाने की कोशिश की थी, जो एक भयानक तूफ़ान में खो गया था और आज तक नहीं मिला!
​फ़ाइल के अंतिम पन्ने पर एक ताज़ा, लाल स्याही से लिखा संदेश था...
​और वह लिखावट किसी भूत या राजा की नहीं थी...
​वह लिखावट... आदित्य की अपनी स्वर्गीय माँ—शारदा रावत की थी!
​वही माँ, जिसके बारे में राजीव ने कहा था कि वह बीस साल पहले एक सड़क हादसे में मर चुकी थी!
​काग़ज़ पर लिखा था:
​*"आदित्य... मेरे लाल...
​तूने रूपकुंड के इन मुर्दों को तो आज़ाद कर दिया...
लेकिन जिस नंदा देवी को तू केवल एक पर्वत समझ रहा है...
​उस नंदा देवी के उस 'सैंक्चुअरी' (Nanda Devi Sanctuary) के भीतर...
उस 1965 के परमाणु जनरेटर के रेडिएशन ने...
उस हिमालय के सबसे भयानक, आदिम देवता—'नरसिंह' और 'महा-कालिका' को जगा दिया है!
​तुम्हारी माँ मरी नहीं थी, आदित्य...
तुम्हारी माँ पिछले बीस साल से उस नंदा देवी की सीलबंद घाटी के भीतर...
उस परमाणु-तांत्रिक रिएक्टर की मुख्य वैज्ञानिक बनकर...
तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही है!
​अगर तू अगले तीन दिनों में नंदा देवी के उस 'निषिद्ध आंतरिक घेरे' (Inner Ring) में नहीं पहुँचा...
तो वह परमाणु-दैत्य इस पूरे उत्तर भारत को एक ही सेकंड में राख बना देगा!"*
​आदित्य के हाथ से वह फ़ाइल छूटकर बर्फ़ पर गिर पड़ी।
​सामने, क्षितिज पर...
​नंदा देवी की वह 25,643 फीट ऊँची मुख्य चोटी... जो अब तक बादलों में छिपी थी...
​अचानक बादलों को चीरती हुई सामने आई।
​और उस पवित्र चोटी के ठीक पीछे से...
​एक गहरे हरे रंग का, विशालकाय रेडियोधर्मी धुआँ और सायरन की गूँज पूरे हिमालय के आकाश को चीरती हुई उठने लगी!

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