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भाग 7: ऋषिगंगा की अभिशप्त गॉर्ज, 1965 का परमाणु प्रेत और माँ की रेडियोधर्मी प्रयोगशाला

Piyashi Atma · Paranormal · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य
Chapter
7 of 7
Category
Paranormal
Reading time
17 min
Words
3313
Language
Hindi (हिंदी)
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1. रूपकुंड का अवतरण और लाटा गाँव का गुप्त द्वार
रूपकुंड के उस सोलह हज़ार फीट ऊँचे पाताल-कटोरे से नीचे उतरना केवल शारीरिक थकावट का सफ़र नहीं था; वह मृत्यु के जबड़े से निकलकर एक और भी भयानक, आधुनिक नरक की ओर बढ़ने का सफ़र था।

सुबह की धूप जब त्रिशूल पर्वत की बर्फीली नोक पर चमक रही थी, तब आदित्य और उसके पिता राजीव रावत उस कंकालों वाली झील के पथरीले मलबे को पीछे छोड़कर नीचे 'बेदनी बुग्याल' और 'गेरोली पाताल' की ढलानों पर उतर रहे थे।

राजीव रावत के पाँव लड़खड़ा रहे थे। नौ सौ साल पुराने उस पिशाच-सेनापति वीरभान की रूह के निकलने के बाद उनका बूढ़ा शरीर किसी टूटे हुए तंबू की तरह चरमरा रहा था। लेकिन उनकी आँखों में अब वह पाषाण-क्रूरता नहीं थी; वहाँ केवल एक थके हुए, आहत पिता की वह असीम वेदना थी, जो हर कदम पर अपने बेटे के कंधे का सहारा ले रहा था।

"आदित्य..." राजीव ने अपनी कांपती उंगलियों से उस लाल सरकारी मुहर वाली फ़ाइल को कसकर पकड़ रखा था, जो रूपकुंड के काले पानी से तैरकर बाहर आई थी।

"तेरी माँ... शारदा... उसने कभी मुझे यह नहीं बताया था कि वह भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) और एविएशन रिसर्च सेंटर (ARC) के उस अति-गोपनीय विंग से जुड़ी थी।

2006 में जब मुझे बताया गया कि वह उत्तरकाशी के पास एक भूस्खलन में अपनी सरकारी गाड़ी समेत भागीरथी में समा गई... तो मैंने हफ़्तों तक नदी के पत्थरों पर उसकी लाश को ढूँढा था।

मुझे केवल उसकी एक फटी हुई शॉल और उसका टूटा हुआ चश्मा मिला था।

अगर वह बीस साल से उस नंदा देवी के निषिद्ध घेरे में ज़िंदा थी... तो उसने मुझे और तुझे उस भयानक अनाथपन की आग में क्यों झोंक दिया?"

आदित्य ने अपने पिता की बात का कोई उत्तर नहीं दिया।

उसकी नज़रें उस फ़ाइल के अंतिम पन्नों पर दर्ज उन सामरिक और वैज्ञानिक नक्शों पर टिकी थीं।

फ़ाइल में एक ऐसा सच दर्ज था जिसे भारत और अमेरिका के इतिहास में सबसे खौफ़नाक शीत-युद्ध रहस्य माना जाता था:

[OPERATION HAT: JOINT CIA-IB EXPEDITION (OCTOBER 1965)]

मिशन: नंदा देवी (25,643 फीट) के शिखर पर चीन के शिनजियांग (लोप नोर) परमाणु परीक्षणों की निगरानी के लिए एक ऑटोमेटेड रडार ट्रांससीवर और SNAP-19C रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर स्थापित करना।

परमाणु ईंधन: सात प्लूटोनियम-238 (Plutonium-238) कैप्सूल (कुल वज़न: 5 किलोग्राम — सक्रिय रेडियोधर्मिता अवधि: 87 वर्ष)।

परिणाम: एक भीषण बर्फीले तूफ़ान के कारण मिशन बीच में छोड़ा गया। मई 1966 में खोजी दल वापस पहुँचा तो जनरेटर, प्लूटोनियम छड़ें और रेडियो-एंटीना ग्लेशियर के हिमस्खलन में हमेशा के लिए ग़ायब हो चुके थे।

वर्गीकृत नोट (1988): वह प्लूटोनियम नंदा देवी ग्लेशियर में खोया नहीं था... उसे 'अज्ञात भूमिगत ताक़तों' द्वारा ऋषिगंगा के पाताल-गर्त में खींच लिया गया था!

आदित्य की उंगलियों ने अपनी कमर में बंधे उस अष्टधातु के खड्ग और उस प्राचीन नंदा-त्रिशूल को छुआ।

"पिताजी," आदित्य ने भारी, शांत स्वर में कहा,

"उस डाक-बंगले के पिशाच, भानगढ़ के तांत्रिक और रूपकुंड के राजा जसधवल केवल इस हिमालय की सतही रूहें थीं।

असली नासूर तो नंदा देवी के उस गर्भ में दबा है जहाँ आधुनिक विज्ञान के सबसे ज़हरीले परमाणु कचरे ने इस देवभूमि के आदिम, सोए हुए दानवों को एक नया, अजेय शरीर दे दिया है!

और मेरी माँ... उस वैज्ञानिक नरक की रानी बनकर बैठी है। हमें जोशीमठ से आगे नीति घाटी के 'लाटा गाँव' पहुँचना होगा। वहीं से ऋषिगंगा की उस अभिशप्त गॉर्ज का रास्ता खुलता है।"

2. लाटा-खरक की चढ़ाई और धारांसी पास का प्रेत-पहरा
दो दिन बाद।

जोशीमठ से आगे, धौलीगंगा के किनारे-किनारे चलने वाली संकरी सीमांत सड़क पर सेना की अंतिम चेकपोस्ट को पार करते हुए, वे लाटा गाँव पहुँचे।

यह वही गाँव था जहाँ 1974 में प्रसिद्ध 'चिपको आंदोलन' की वीरांगना गौरा देवी ने पेड़ों से चिपक कर जंगल बचाए थे। लेकिन लाटा गाँव से ऊपर उठने वाला वह संकरा, खड़ा, पथरीला ट्रैक... जिसे 'लाटा-खरक' और फिर 'धारांसी पास' (Dharansi Pass — 14,000 फीट) कहा जाता था... वहाँ 1982 से भारत सरकार ने आम इंसानों, पर्वतारोहियों और चरवाहों के जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा था।

पूरा नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान (Nanda Devi Sanctuary) एक 'बायोस्फीयर रिज़र्व' के नाम पर सीलबंद था। बाहर लोहे के कटीले तारों की तीन परतें थीं, जिन पर बड़े-बड़े अक्षरों में लाल चेतावनी लिखी थी:

निषिद्ध क्षेत्र: आगे बढ़ना मृत्यु को निमंत्रण देना है!

(STRICTLY FORBIDDEN: CBRN THREAT & TREACHEROUS TERRAIN)

शाम के चार बज रहे थे।

आदित्य और राजीव लाटा-खरक के उस वीरान, ढलवां देवदार के जंगल को पार करके धारांसी पास की उस नंगी, पथरीली कगार पर पहुँचे।

यहाँ पहुँचते ही हवा का मिज़ाज पूरी दुनिया से अलग हो गया।

तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे था, लेकिन हवा में कोई शुद्ध पहाड़ी ठंडक नहीं थी।

हवा में ओजोन, सड़े हुए गंधक और एक अत्यंत बारीक, धातु जैसी कड़वी महक घुली थी—वह महक जो केवल अत्यधिक रेडियोधर्मी आयनीकरण (radiation ionization) के कारण पैदा होती है!

सामने, बादलों के बीच से नंदा देवी की दोनों जुड़वां चोटियाँ—नंदा देवी मुख्य (7,816 मीटर) और नंदा देवी पूर्व (7,434 मीटर)—आसमान को चीरती हुई खड़ी थीं।

लेकिन उन चोटियों का रंग सफ़ेद नहीं था।

शाम की धूप में उन बर्फीले शिखरों से एक अजीब, चमकता हुआ, फ्लोरोसेंट हरा (Fluorescent Green) और पराबैंगनी (Ultraviolet) धुआँ रिसकर नीचे उस अगाध, संकरी और भयानक खाई में गिर रहा था जिसे दुनिया 'ऋषिगंगा गॉर्ज' (Rishi Ganga Gorge) कहती है!

"यह... यह रेडिएशन का स्तर बहुत भयानक है," राजीव ने अपनी छाती को दबाते हुए कहा।

उनकी आँखों के कोटरों में जलन होने लगी थी। उनकी त्वचा पर बारीक, लाल चकत्ते उभरने लगे थे।

तभी—

उस संकरे दर्रे के पत्थरों के पीछे से... कुछ हिलने की आहट हुई।

खुरच... खुरच... खट!

आदित्य ने बिजली की फुर्ती से अपने बैग से वह अष्टधातु का खड्ग निकाला।

चट्टानों की ओट से जो चीज़ बाहर निकली... उस दृश्य ने आदित्य और राजीव की रीढ़ की हड्डी को सुन्न कर दिया।

वह 'भरल' (Himalayan Blue Sheep) का एक झुंड था।

लेकिन वे साधारण जंगली भेड़ें नहीं थीं!

उन भेड़ों के शरीरों की खाल झड़ चुकी थी। उनकी पसलियों की नंगी हड्डियों के बीच से हरी, चमकती हुई नसें बाहर लटकी हुई थीं। उनके सींग सामान्य घुमावदार नहीं थे; वे सींग लोहे और पके हुए रेडियोधर्मी कांच की तरह पिघलकर नुकीले भालों में बदल चुके थे!

और सबसे भयानक बात—

उन भेड़ों के जबड़ों में घास खाने वाले दाँत नहीं थे; उनके जबड़ों में इंसानी माँस नोचने वाले, शार्क जैसे तीन-तीन इंच लंबे खूनी दाँत लगे थे!

उनकी आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह जलकर हरी बत्तियों की तरह चमक रही थीं।

वे साठ साल से उस प्लूटोनियम के रिसाव वाले पानी को पीकर जीवित रहने वाले 'म्यूटेंट पिशाच-जीव' (Radiological Chimeras) थे!

गुर्र्र्र्र्र्क!

उस झुंड के सबसे बड़े नर-भरल ने अपनी लोहे जैसी खुरों को पत्थर पर मारा और एक ही झटके में सीधे आदित्य के सीने की तरफ़ सींग तानकर छलांग लगा दी!

3. धारांसी की खूनी लड़ाई और ऋषिगंगा का पाताल-पुल
सननन्र!

वह दैत्याकार म्यूटेंट भरल हवा में उड़ा।

आदित्य ने एक सेकंड भी नहीं गँवाया।

उसने ज़मीन पर घुटने टेकते हुए, नीचे से उस अष्टधातु के खड्ग का एक आकाशीय वार किया।

खचाक! भभक!

खड्ग की दिव्य धार ने उस जीव के दोनों सींगों को बीच से काट दिया।

जीव के शरीर से लाल ख़ून नहीं, बल्कि गहरा हरा, चमकता हुआ, खौलता हुआ रेडियोधर्मी मवाद छूटा जिसने ज़मीन के काले ग्रेनाइट को तेज़ाब की तरह पिघला दिया!

जीव चीख़ता हुआ खाई में गिर पड़ा।

लेकिन बाकी बीस म्यूटेंट भेड़ें चारों तरफ़ से राजीव रावत की तरफ़ झपटीं।

"पिताजी! पीछे हटिए!" आदित्य चिल्लाया।

आदित्य ने अपनी कमर से वह नंदा-त्रिशूल खींचा।

उसने त्रिशूल के निचले हिस्से को उस दर्रे की पथरीली ज़मीन पर पूरी ताक़त से ठोक दिया:

ॐ ह्रीं क्लीं महा-रुद्राय नमः!

त्रिशूल से निकली सुनहरी ज्वाला ने ज़मीन पर एक दस फीट चौड़ा अग्नि-चक्र बना दिया।

जो भी म्यूटेंट जीव उस अग्नि-चक्र की सीमा में घुसा, वह एक ही पल में जलकर कोयले का ढेर बन गया।

बचे हुए जीव डरकर उस ज़हरीले कोहरे में भाग खड़े हुए।

"आदित्य... हमें नीचे उस गॉर्ज में उतरना होगा," राजीव ने अपनी हाँफती हुई साँसों के बीच कहा।

"ऋषिगंगा का यह संकरा रास्ता दुनिया की सबसे अभेद्य चट्टानी दीवार है।

1934 में जब एरिक शिप्टन और बिल टिलमैन ने पहली बार इस रास्ते को खोजा था, तो उन्होंने लिखा था कि यहाँ पैर फिसलने का मतलब है सीधे तीन हज़ार फीट नीचे पत्थरों पर गिरकर शरीर का पानी बन जाना!"

वे दोनों उस संकरे, बर्फीले, नम ट्रैक पर नीचे उतरने लगे।

रास्ता इतना भयानक था कि कई जगहों पर केवल चार इंच चौड़ी पत्थरों की मुंडेर थी, जिस पर उंगलियों के सहारे लटक कर आगे बढ़ना पड़ रहा था। नीचे, तीन हज़ार फीट की गहराई में ऋषिगंगा की जलधारा किसी खौलते हुए पारे के अजगर की तरह गरज रही थी।

दो घंटे की उस जानलेवा उतराई के बाद, वे 'देवदामन' और फिर उस भयानक 'पाताल-पुल' (The Abyssal Wire Bridge) के मुहाने पर पहुँचे।

यह पुल अंग्रेज़ों या सरकार का बनाया हुआ नहीं था।

यह 1965 के उस गुप्त सीआईए मिशन द्वारा ऋषिगंगा के दो विशाल, ऊर्ध्वाधर ग्रेनाइट क्लिफ़्स के बीच बाँधा गया मोटा, स्टील-केबल का सस्पेंशन ब्रिज था!

पुल की पटरियाँ पुरानी, सड़ी हुई देवदार की पट्टियों से बनी थीं, जो नीचे की आँधी में झूल रही थीं—कड़-कड़... चर्र्र्र्क!

और उस झूलते हुए पुल के ठीक बीचों-बीच...

सामने की तरफ़...

धुंध को चीरती हुई रोशनी की एक सफ़ेद, आधुनिक, हाई-इंटेंसिटी हैलोजन बीम सीधे आदित्य और राजीव की आँखों पर आकर टिक गई!

4. 1965 का अमर स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स (SFF) दस्ता
"हाल्ट! हू गोज़ देयर?!"

एक अत्यंत भारी, धातुई और रेडियो-फ़िल्टर वाली आवाज़ उस गरजती हुई नदी के शोर को चीरती हुई आई।

पुल के दूसरे छोर पर, जहाँ पहाड़ को अंदर से काटकर एक भारी, कंक्रीट का बंकर-गेट बनाया गया था... वहाँ चार सैनिक खड़े थे।

लेकिन वे सामान्य सैनिक नहीं थे।

उन्होंने 1960 के दशक की भारी, लेड-लाइन्ड (lead-lined) रबर की रेडिएशन कॉम्बैट वर्दी पहन रखी थी।

उनके चेहरों पर भारी, गोल शीशे वाले पुराने गैस-मास्क लगे थे।

उनके हाथों में 1965 के दौर की अमेरिकी एम-16 (M-16A1) राइफ़लें थीं, जिनकी नलियों पर आज भी 'प्रॉपर्टी ऑफ यूएस गवर्नमेंट' का ठप्पा लगा था।

और उनके कंधों पर जो रेजिमेंटल बैज लगा था... वह भारत के सबसे गुप्त तिब्बती दस्ते का था:

ESTABLISHMENT 22 — SPECIAL FRONTIER FORCE (SFF)

'विकास बटालियन — मिशन नंदा (1965)'

आदित्य ने हाथ जोड़ते हुए आगे कदम बढ़ाया: "हम जीवित इंसान हैं! मैं आदित्य रावत हूँ, और ये मेरे पिता राजीव रावत हैं! हम डॉ. शारदा रावत से मिलने आए हैं!"

उन चारों सैनिकों में से जो आगे था—जिसकी वर्दी पर सूबेदार के फीते लगे थे—उसने अपनी राइफ़ल नीचे नहीं की।

उसने अपने चेहरे से उस भारी, रबर के गैस-मास्क की सील को खोला।

हिसस्स... (प्रेशराइज्ड हवा की आवाज़)

जब उस सूबेदार का चेहरा सामने आया...

तो राजीव रावत के मुँह से एक दबी हुई चीख़ निकली:

"तेनज़िंग...? सूबेदार तेनज़िंग नोरबू?!"

राजीव ने कांपती उंगलियों से उस अफ़सर के चेहरे को देखा:
"तुम... तुम 1965 में उस सीआईए मिशन के लीड गाइड थे! रिकॉर्ड में लिखा है कि तुम साठ साल पहले उस हिमस्खलन में अपने पूरे दस्ते के साथ मारे गए थे!"

तेनज़िंग नोरबू के चेहरे की चमड़ी सामान्य इंसानी माँस की नहीं थी।

उसकी चमड़ी पूरी तरह नीली-हरी, पारदर्शी प्लास्टिक जैसी हो चुकी थी, जिसके भीतर से उसकी खोपड़ी की हड्डियाँ और दाँत साफ़ दिखाई दे रहे थे! वह न जीवित था, और न मरा हुआ; वह उस प्लूटोनियम-238 के रेडिएशन और नंदा देवी के तंत्र से बंधा हुआ एक अमर 'साइबोर्ग-पिशाच' (Radiological Ghoul) बन चुका था!

"मारे गए थे...?" तेनज़िंग के होंठ एक भयानक, पथरीली मुस्कान में खिंच गए।

"हम मरे नहीं थे, राजीव बाबू!

जब वह परमाणु जनरेटर उस बर्फ़ के नीचे फटा था... तो उसने हमारी नश्वर साँसों को छीनकर हमें इस घाटी का शाश्वत पहरेदार बना दिया!

साठ साल से हम इस पुल पर खड़े हैं ताकि कोई बाहर की दुनिया का इंसान इस निषिद्ध घेरे में न घुस सके!

लेकिन तुम दोनों..."

तेनज़िंग ने आदित्य के हाथ में पकड़े उस अष्टधातु खड्ग और नंदा-त्रिशूल को देखा। उसकी सफ़ेद, लेंस जैसी आँखों में एक अजीब, विवश आदर का भाव उभरा:

"डॉ. शारदा पिछले सात दिनों से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही हैं, आदित्य।

अंदर चलो...

क्योंकि रिएक्टर का तापमान अब क्रिटिकल लिमिट पार कर चुका है!"

5. नंदा देवी का आंतरिक गर्भगृह: विज्ञान और महा-तंत्र का संगम
तेनज़िंग ने उस कंक्रीट के भारी बंकर के स्टील-डोर का व्हील घुमाया।

घड़-घड़-घड़... धाँय!

दरवाज़ा खुला।

भीतर जो दुनिया थी... वह किसी भी आधुनिक मनुष्य की कल्पना से परे थी।

यह नंदा देवी पर्वत के बिल्कुल आधार (Base of Nanda Devi Peak) के भीतर, ठोस ग्रेनाइट को खोखला करके बनाई गई एक विशाल, पाँच-मंज़िला 'पाताल-प्रयोगशाला' (Underground Nuclear-Occult Complex) थी!

चारों तरफ़ आधुनिक बोरॉन-कंक्रीट और सीसे (lead) की छह-छह फीट मोटी दीवारें थीं।

दीवारों पर बड़े-बड़े लिक्विड-नाइट्रोजन के कूलिंग पाइप्स दौड़ रहे थे, जिनसे लगातार सफ़ेद, बर्फीली गैस रिस रही थी।

सैकड़ों कंप्यूटर टर्मिनल्स और गीगर काउंटर्स (Geiger Counters) की टिक-टिक की आवाज़ उस सन्नाटे को भर रही थी:

टिक-टिक-टिक-टिक... (खतरनाक रेडिएशन का संकेत)

लेकिन उस अत्याधुनिक परमाणु लैब के ठीक बीचों-बीच...

जहाँ एक विशाल, बीस फीट ऊँचा 'थर्मो-न्यूक्लियर चैंबर' बना था...

उस चैंबर की टाइटेनियम दीवारों पर प्राचीन कत्यूरी और तिब्बती भाषा के 'महा-कालिका संहार यंत्र' शुद्ध सोने के तारों से उकेरे गए थे!

उस रिएक्टर के भीतर... भारी पानी (D2O) के खौलते हुए नीले कुंड के बीच में...

वही 1965 का SNAP-19C जनरेटर स्थापित था!

उस जनरेटर के सात प्लूटोनियम कैप्सूल अब किसी धातु के बक्से में नहीं थे; वे सात कैप्सूल एक प्राचीन, काले पत्थर के 'रुद्र-लिंगम' के सातों चक्रों में जड़े हुए थे!

प्लूटोनियम का वह नर्क-तुल्य रेडिएशन और उस शिवलिंग की आदिम रूहानी ऊर्जा आपस में मिलकर एक ऐसी अंधी कर देने वाली, गहरी बैंगनी-हरी प्लाज़्मा ज्वाला पैदा कर रही थी, जो हर दस सेकंड में एक विशाल शॉकवेव की तरह धड़क रही थी:

धूं... धूं... धूं...

उस विशाल हॉल में दर्जनों वैज्ञानिक सफ़ेद हेज़मैट-सूट पहने काम कर रहे थे।

लेकिन उनके सूटों के पीछे से जब उन्होंने अपने हेलमेट हटाए...

आदित्य ने देखा कि वे कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं थे; वे पिछले पचास सालों में हिमालय के विभिन्न अभियानों में लापता हुए भारतीय, अमेरिकी और रूसी भूवैज्ञानिक और तंत्र-साधक थे, जिनकी देहें उस रेडिएशन से अमर होकर इस तंत्र की गुलाम बन चुकी थीं!

और उस रिएक्टर के मुख्य कंट्रोल-डेक पर...

शीशे के एक सीलबंद, प्रेशराइज्ड केबिन के भीतर...

एक महिला खड़ी थी।

6. शारदा रावत का साक्षात दर्शन: मातृत्व का क्रूर रूपांतरण
वह महिला लगभग पचास वर्ष की दिख रही थी।

उसने सफ़ेद रंग का अत्याधुनिक, सैन्य वैज्ञानिकों वाला लैब-कोट पहन रखा था।

उसके बाल कंधों तक कटे हुए थे, जिनमें कुछ लटें चांदी जैसी सफ़ेद थीं। उसकी आँखों पर वही फ्रेम-लेस चश्मा था जिसे आदित्य ने बचपन की तस्वीरों में देखा था।

उसका चेहरा...

हूबहू आदित्य की माँ—शारदा रावत का था!

वही माँ, जिसकी लोरी सुनकर आदित्य बचपन में सोता था। वही माँ, जिसके हाथों की बनी रोटियों का स्वाद आदित्य आज सत्ताईस साल की उम्र में भी नहीं भूला था!

"माँ..." आदित्य का गला पूरी तरह सूख गया।

उसके हाथ से वह अष्टधातु का खड्ग छूटने ही वाला था।

राजीव रावत घुटनों के बल उस कंक्रीट के फर्श पर गिर पड़े: "शारदा... यह... यह तू है? तू सचमुच ज़िंदा है?"

केबिन का कांच का भारी दरवाज़ा 'हिसस्स' की आवाज़ के साथ खुला।

शारदा रावत बाहर निकलीं।

उनके बूटों की आवाज़ उस खामोश, टिक-टिक करती लैब में गूँज उठी।

लेकिन जब शारदा ने अपना चश्मा उतारा...

तो जो आँखें सामने आईं...

उन आँखों में किसी बिछड़े हुए बेटे को देखकर छलकने वाले आँसू नहीं थे।

उन आँखों में किसी बूढ़े पति के लिए कोई ममता या अपराध-बोध नहीं था।

शारदा की आँखों की पुतलियाँ सामान्य काली या भूरी नहीं थीं; वे रेडियोधर्मी प्लूटोनियम की तरह शुद्ध, ज़हरीली पन्ना-हरी थीं!

उनकी गर्दन की नसों में लाल ख़ून नहीं, बल्कि नीले-बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ तरल पदार्थ दौड़ रहा था!

"आ गए, आदित्य..." शारदा की आवाज़ में किसी अस्पताल के आईसीयू के मॉनिटर जैसी ठंडी, सपाट और निर्मम एकरसता थी।

"और तुम भी, राजीव...

तुमने बासठ साल तक जिस रावत वंश के शाप का रोना रोया, वह शाप कोई ईश्वरीय लीला नहीं थी।

वह केवल एक 'बायो-इंजीनियर्ड जेनेटिक कोड' (Genetic Code) था जिसे 1965 में इस नंदा देवी के पाताल में सिद्ध किया गया था!"

आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले: "माँ! आप यह क्या कह रही हैं?

क्या आपको मेरी याद नहीं आई?

क्या बीस साल तक आपको एक बार भी अपने उस मासूम बेटे का चेहरा याद नहीं आया जिसे आप सात साल की उम्र में अकेला छोड़ गई थीं?!"

शारदा के चेहरे की एक भी मांसपेशी नहीं हिली।

उसने अपनी जेब से एक डिजिटल टैबलेट निकाला और उस पर एक ग्राफ दिखाया:

"आदित्य... मातृत्व केवल नश्वर जीवों का एक हार्मोनल असंतुलन है।

प्रकृति इससे बहुत बड़ी है।

1965 में जब अमेरिकी सीआईए इस जनरेटर को यहाँ छोड़कर भागी थी, तब भारत के तत्कालीन नेतृत्व को समझ आ गया था कि चीन और पश्चिम की ताक़तों से इस देश को केवल पारंपरिक सेनाएँ नहीं बचा सकतीं।

हमें चाहिए था एक ऐसा 'परम-अस्त्र' (Cosmic-Nuclear Deterrent) जो हिमालय की रूहानी ऊर्जा को परमाणु विखंडन के साथ जोड़ सके!

मैंने बीस साल पहले अपनी नश्वर ज़िंदगी का त्याग इसलिए किया था, आदित्य...

ताकि मैं इस 'प्रोजेक्ट अमृता' की मुख्य वास्तुकार बन सकूँ!

और उस प्रोजेक्ट का अंतिम चरण... तुम हो!"

7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: हृदय का ईंधन (The Twist)
आदित्य का पूरा वजूद कांप उठा: "मैं? मैं आपका प्रोजेक्ट कैसे हो सकता हूँ?!"

शारदा ने एक कदम आगे बढ़ाया।

उसने अपनी उंगली से उस खौलते हुए रिएक्टर के केंद्र में स्थापित उस 'रुद्र-लिंगम' की तरफ़ इशारा किया:

"आदित्य...

उस प्लूटोनियम-238 की सक्रिय आयु (half-life) अब समाप्त होने वाली है।

उसका परमाणु कोर ठंडा पड़ रहा है।

और जैसे ही वह ठंडा पड़ेगा... नंदा देवी के गर्भ में दबा हुआ वह 'आदिम प्रलय-ज्वालामुखी' फट पड़ेगा, जो पूरे उत्तर भारत को एक ही झटके में राख बना देगा!

उस कोर को अगले एक हज़ार साल तक जीवित रखने के लिए...

मुझे न यूरेनियम चाहिए, और न थोरियम..."

शारदा ने अपनी जेब से एक टाइटेनियम सर्जिकल स्कैल्पल (Surgical Scalpel) निकाला।

उसने अपने ही लैब-कोट के बटनों को खोला।

और जो दृश्य सामने आया...

उस दृश्य ने आदित्य और राजीव के मस्तिष्क की अंतिम नस को भी फाड़ कर रख दिया।

शारदा के सीने पर कोई इंसानी चमड़ी नहीं थी!

उसकी पसलियों को काटकर, उसकी छाती के ठीक बीचों-बीच... शीशे और लेड का एक पारदर्शी सिलिंडर (Biochemical Chamber) जड़ा हुआ था!

और उस सिलिंडर के भीतर... दिल की जगह...

प्लूटोनियम-238 की मुख्य कोर-रॉड (Plutonium Core Rod) धड़क रही थी!

शारदा कोई इंसान नहीं बची थी; वह स्वयं उस परमाणु रिएक्टर की जीवित, जैविक बैटरी बन चुकी थी!

शारदा ने वह स्कैल्पल आदित्य की तरफ़ नहीं...

बल्कि अपने ही पति—राजीव रावत के सीने की तरफ़ तान दिया!

शारदा के चेहरे पर एक ऐसी भयानक, अमानवीय मुस्कान उभरी जिसने नर्क के सारे दरवाज़े खोल दिए:

**"आदित्य...

इस रिएक्टर को स्थिर करने के लिए मुझे केवल एक ही चीज़ चाहिए—

उस वीरभान के नौ सौ साल पुराने उस रक्त का 'एंटी-मैटर' (Anti-Matter Catalyst)...

जो पिछले तीस साल से तुम्हारे इस बूढ़े पिता—राजीव रावत के हृदय में पक रहा था!

मैंने तुझे यहाँ अपनी ममता के लिए नहीं बुलाया था, आदित्य...

मैंने तुझे इसलिए बुलाया था ताकि तू अपने इस बाप को अपनी पीठ पर लादकर मेरी इस लैब की मेज़ तक पहुँचा सके!

अब चुपचाप एक तरफ़ हट जा, मेरे बेटे...

क्योंकि आज...

तेरी यह वैज्ञानिक माँ... तेरे इस सगे बाप की छाती चीरकर...

उसका धड़कता हुआ दिल इस परमाणु-कुंड में होम करने जा रही है!"**

शारदा के एक इशारे पर...

तेनज़िंग नोरबू और उन बीस अमर SFF कमांडोज़ ने अपनी राइफ़लों के बट से आदित्य को ज़मीन पर गिरा दिया और राजीव रावत को पकड़कर सीधे उस टाइटेनियम ऑपरेशन टेबल पर बाँध दिया!

रिएक्टर का सायरन पागलों की तरह चीत्कार कर उठा:

[CRITICAL WARNING: CORE MELTDOWN IN T-MINUS 15 MINUTES]

[EXTRACTION PROTOCOL READY]

आदित्य ज़मीन पर गिरा पड़ा था...

उसके सामने उसकी अपनी माँ... उसके अपने पिता की छाती पर वह खूनी ब्लेड रखने जा रही थी!

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