Pretika › Jinn & Spirits › वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
Ep 6
Ballyansh · Jinn & Spirits · 6 मिनट
- Writer
- Ballyansh
- Story
- वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
- Chapter
- 6 of 6
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1038
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अध्याय 6
जादुई, फूलों से लदे पेड़ से एकाएक सारे फूल झड़कर हवा में उड़ने लगे। दिन के वक्त अंधेरा छाने लगा। हवा चलने की आवाज़ ने माहौल को बेहद भयावह बना दिया।
आसमान में काले घने बादल छा गए। कोई पंछी, कोई जानवर—किसी का भी नामोनिशान नहीं था। वे लोग देविका के पार्थिव शरीर के पास खड़े थे।
अचानक वह पेड़ जिस ज़मीन के टुकड़े पर था, वह हिलने लगा। ऐसा लग रहा था, जैसे उस छोटे से टापू पर कोई जलज़ला आ गया हो। वह ज़मीन का टुकड़ा पानी में समाने लगा। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह डूब गया।
पानी में तेज़ लहरें उठने लगीं और भँवर बनने लगा।
महेश: पानी से बाहर निकलो। फ़ौरन!
वे लोग किनारे की तरफ तैरने लगे। पर ऐसा लग रहा था, जैसे पानी ज़िंदा हो गया हो।
लहरें सौ फीट से भी ज़्यादा ऊँची हो गई थीं।
आसमान में बादलों के बीच एक अजीब-सी आकृति बन रही थी। मानो दो ख़ौफ़नाक आँखें उन पर कहर बरपा रही हों।
अंगद: हम तैरते जा रहे हैं। किनारा तो अब भी वहीं का वहीं है।
वीर: ये हो क्या रहा है?
वह अभी इतना ही बोला था कि वह पानी के अंदर खींच लिया गया।
पाँचों साथी कुछ समझ पाते, तभी उनकी नज़र एक बड़े, विशालकाय काले साँप पर पड़ी, जिसने वीर को दबोचकर निगलना शुरू कर दिया था।
वीर चिल्ला रहा था। पर अब उसकी कोई क्या ही मदद कर सकता था?
महेश ने उस साँप पर गोली चलाई, पर सब नाकाम रहा।
दीपक: चलो! सब निकलो। जल्दी!
वे लोग किनारे पर पहुँच गए। वे बुरी तरह हाँफ रहे थे और बहुत ज़्यादा पैनिक कर रहे थे।
महेश रोने लगा।
महेश: मना किया था। चिल्ला-चिल्लाकर रोक रहा था। पर नहीं! पता नहीं क्या सनक सवार थी तुम लोगों पर। देख लिया नतीजा?
दीपक: ये भाषण देने का वक्त नहीं है, महेश! हमें भागना होगा।
पंकज: ज़रा आसपास देखो। ये वो जंगल नहीं है, जहाँ हम आए थे। ये कुछ और ही लग रहा है।
वाकई में उनकी बात सही थी। ये वो जंगल था भी नहीं। ऐसा लग रहा था, जैसे वे लोग किसी नर्क में पहुँच गए हों। आसपास के पेड़ बहुत बड़े और भयानक थे।
अंगद एक पेड़ के नीचे बैठ गया। वह बहुत डरा हुआ था।
अंगद: मुझे मेरी माँ-बाबा के पास जाना है। चलो, यहाँ से।
शरण: तुम्हें रास्ता दिखाई दे रहा है? कैसे जाएँ?
इतना कहते ही शरण के पैरों के नीचे की ज़मीन धँस गई। वह चीखा और गड्ढे में जा गिरा।
उसके साथी डरकर कुछ कदम पीछे हट गए। शरण की कोई आवाज़ नहीं आई। उन्होंने गड्ढे के पास जाकर देखा तो नीचे शरण दम तोड़ चुका था। एक पेड़ का सूखा, नुकीला तना उसकी छाती के आर-पार हो चुका था।
अब चारों की हालत और खराब हो गई।
पंकज: कोई हमें मार रहा है। कोई नहीं बचेगा।
अंगद: तुम्हारा मतलब वो, जिसका नाम देविका ने बताया था। वो... वेद्रान!
सब चुप थे।
अचानक तेज़ बारिश होने लगी। भयानक बिजली चमकने लगी।
अंगद पैनिक करते हुए खड़ा हो गया और चिल्लाकर बोला—
अंगद: मैं जा रहा हूँ। मुझे नहीं मरना!
कहते हुए वह अपने दोस्तों से दूर दूसरी तरफ भागने लगा।
महेश: नहीं! रुको, अंगद! रुक जाओ!
पर अंगद ने अनसुना कर दिया। वह अपनी धुन में भाग रहा था।
तभी एक तेज़ गड़गड़ाहट की आवाज़ हुई। तेज़ बिजली कड़की और अंगद पर गिर पड़ी। तेज़ रोशनी के साथ एक धमाका हुआ।
तीनों के होश फ़ाख्ता हो गए।
अंगद का जिस्म जलकर राख का ढेर हो चुका था।
महेश और पंकज के सब्र का बाँध टूट गया। दोनों फूट-फूटकर रोने लगे।
दीपक ने गुस्से में महेश को देखा और उसका कॉलर पकड़ लिया। महेश की आँखें हैरानी से फैल गईं।
महेश: ये क्या कर रहे हो?
दीपक: सारे फ़साद की जड़ तुम हो। न... हम तुम्हारे साथ यहाँ आते? और न ये झंझट होता! मरना तुम्हें चाहिए था। उस कामिनी अप्सरा को तुमने गोली मारी थी और मर हम रहे हैं।
महेश खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। पंकज ने दीपक को दूर हटाया।
पंकज: पागल हो गए हो, दीपक! दिमाग से काम लो। गलती हमारी है। हम अंधे हो गए थे। महेश हमें बचाने की कोशिश कर रहा था।
दीपक: अच्छा! देविका को मारकर?
महेश: वो एक हादसा था। मैं तुम लोगों के पैरों के पास ज़मीन पर गोली चला रहा था। पर मेरी बुरी किस्मत! मुझसे गुनाह हो गया।
पंकज: इस वक्त हमें सिर्फ इस मौत की वादी से निकलने का सोचना चाहिए। ये बातें बाद में होती रहेंगी। चलो, साथियों!
दीपक ने पंकज को देखा और उसकी बात मानते हुए उसके साथ हो गया। महेश भी उनके साथ था।
बारिश कुछ कम हो गई थी, पर रुकी नहीं थी।
तीनों डरे-सहमे, कीचड़ भरे रास्ते पर चल रहे थे। पंकज एकाएक रुक गया।
महेश ने उसे पुकारा।
महेश: चल, पंकज! जल्दी चल। क्या हुआ?
पंकज किसी पुतले की तरह खड़ा था।
दीपक: क्या हुआ तुम्हें?
दीपक की आवाज़ में चिढ़ और गुस्सा भरा हुआ था।
पंकज रोने लगा।
महेश: पंकज!
कहते हुए वह उसके पास आने लगा, तो पंकज ने हाथ के इशारे से उसे दूर रहने को कहा। महेश और दीपक कुछ नहीं बोले।
पंकज ने ज़मीन पर से नुकीले पत्थर उठाए और खुद को कुरेदना शुरू कर दिया।
महेश और दीपक उसे रोकने के लिए आवाज़ें देने लगे। वे उसके नज़दीक आने लगते, तो वह उन्हें वहीं रुकने का इशारा करता।
पंकज तड़प-तड़पकर रोते हुए खुद को ज़ख्मी कर रहा था। उसने अपनी बाँहें, हाथ और टाँगें छलनी कर ली थीं।
पंकज: (आँखें बंद करके) वेद्रान किसी को नहीं छोड़ता। सबको सज़ा मिलेगी।
कहते हुए वह धड़ाम से गिरा और दम तोड़ गया।
ये भयानक नज़ारा देखकर दीपक काँप रहा था। महेश की हालत भी ऐसी ही थी। लग रहा था, जैसे दोनों अपने आपे में न हों।
अब उन्हें अपनी परछाई से भी डर लग रहा था।
रात गहरा गई।
दोनों ज़मीन पर सिकुड़कर बैठे थे। न तो वे एक-दूसरे को देख रहे थे, न कोई बात कर रहे थे।
अब उनमें इतनी हिम्मत ही नहीं बची थी। वे यह भूल रहे थे कि देविका ने मरने से पहले उन्हें हिम्मत से सामना करने की बात कही थी।
कुछ पलों बाद...
उन्हें किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
चारों तरफ एक ठंडी लहर-सी फैल गई।
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