Pretika › Jinn & Spirits › वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
अध्याय 7
Ballyansh · Jinn & Spirits · 5 मिनट
- Writer
- Ballyansh
- Story
- वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
- Chapter
- 7 of 7
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 5 min
- Words
- 866
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अध्याय 7
महेश चारों तरफ देखने लगा।
दोनों को ठंड लगने लगी। धीरे-धीरे हाड़ कंपा देने वाली ठंड होने लगी। उनके जिस्म सुन्न से होने लगे। उनकी पलकों पर सफेद बर्फ-सी जमने लगी। होंठ नीले पड़ गए।
अचानक महेश की नज़र सामने से आ रहे किसी शख्स की आँखों पर पड़ी। उसकी आँखें चमक रही थीं।
उसकी चाल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। उसके कदम बेहद धीमे और आत्मविश्वास से भरे थे।
वो शख्स बस कुछ ही कदम दूर था।
महेश और दीपक पुतलों की तरह एकटक उसे देख रहे थे।
उनके सामने करीब छह फुट चार इंच लंबा जवान आदमी था। चौड़े कंधे, मजबूत और गठीला शरीर और ऐसा व्यक्तित्व, जिससे नज़रें हटाना आसान नहीं था।
उसके घने, काले बाल कंधों तक आते थे और हवा के साथ धीरे-धीरे उसके चेहरे पर बिखर रहे थे।
उसके चेहरे की बनावट बेहद आकर्षक थी। तीखा जबड़ा, उभरी हुई गालों की हड्डियाँ, सीधी नाक और बेहद संतुलित नैन-नक्श।
उसकी खूबसूरती में कुछ ऐसा था, जिसे देखकर कोई भी अनायास उसकी ओर खिंचा चला जाए।
उसकी त्वचा बेहद साफ और हल्की थी, जो जंगल की धुंधली रोशनी में और भी रहस्यमयी दिखाई दे रही थी।
लेकिन उसकी सबसे सम्मोहक चीज़ थीं उसकी आँखें।
गहरी, काली और असाधारण रूप से शांत।
उसकी आँखों में एक अजीब-सा आकर्षण था। जो भी उसकी आँखों में देखता, कुछ पल के लिए जैसे अपनी सुध-बुध खो देता।
ऐसा लगता था, मानो उसकी नज़रें सामने वाले के मन पर अपना हक जमा लेंगी।
उसने घुटनों तक आने वाला एक लंबा काला कोट पहन रखा था, जिसके नीचे काली शर्ट और फिटिंग वाली काली पैंट थी।
ऐसा लग रहा था, जैसे पूरा जंगल उसके आने का इंतज़ार कर रहा हो।
उसकी खूबसूरती में छिपी सबसे खतरनाक बात यह थी कि उसे देखकर इंसान भागना ही भूल जाता था।
यही हाल उन दोनों का था।
दीपक ने लड़खड़ाते हुए पूछा।
दीपक: तुम वेद्रान हो?
सामने खड़े शख्स के होंठों पर छोटी-सी, मगर ठंडी मुस्कान तैर गई।
शख्स: बिल्कुल। मैं वेद्रान हूँ।
दीपक के तो मानो प्राण ही निकल गए थे। वो काँप रहा था। उसके दाँतों की किटकिट ठंड की वजह से थी या डर की, कहना मुश्किल था।
दीपक: मेरे दोस्तों के साथ जो भी हुआ... वो तुमने किया न?
कोई जवाब न पाकर वह घबराकर बोला।
दीपक: मुझे माफ़ कर दो। मैंने गलती की। नहीं... नहीं। गुनाह किया है। तुम देविका के राजा हो, है न? माफ़ कर दो मुझे। मैं कभी किसी असहाय लड़की को, किसी जानवर को भी परेशान नहीं करूँगा।
वेद्रान ने शांत भाव से उसकी तरफ देखा।
वेद्रान: मुर्दे कुछ नहीं करते।
कहते ही उसने अपना हाथ उठाया और मुट्ठी कस ली।
इधर दीपक बर्फ से जम गया और टूटकर बिखर गया।
महेश की आवाज़ उसके गले में ही अटक गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
वेद्रान उसे देख रहा था।
महेश गिड़गिड़ाया नहीं। उसने मौत को सामने देखकर उसे स्वीकार कर लिया था।
महेश: मैं तुमसे माफ़ी माँगता हूँ। और अपने गुनाह की सज़ा भी माँग रहा हूँ।
वेद्रान ने ठंडी नज़रों से उसे देखा और अपनी मनमोहक आवाज़ में कहा।
वेद्रान: देविका ने तुम्हें श्राप दिया था। उसे तुम पूरा करोगे। मैं यहीं पर अपनी रानी का इंतज़ार करूँगा।
कहते ही घुप्प अंधेरा छा गया।
महेश ठंड के कारण बेहोश हो गया।
सुबह हो गई।
गाँव वाले झील पर जमा हो गए। उन पाँचों की लाशें सबने देखीं। सबकी हालत खराब थी।
महेश को एक हफ्ते बाद होश आया।
उसने सबको सब कुछ बताया। किसी ने यकीन किया, तो किसी ने महेश को पागल कहा।
धीरे-धीरे सालों बीत गए।
महेश के परिवार ने उसकी शादी कर दी। पर महेश वेद्रान को नहीं भूला। न ही देविका और वेद्रान की बातों को।
उसने सब कुछ एक किताब में लिखा था। वो किताब गाँव वाली हवेली में अब भी थी।
उम्र के साथ-साथ महेश की हालत और बिगड़ती रही। वो पागल हो गया था और देविका से माफ़ी माँगता रहता था।
इसी दुख में वो दुनिया से चला गया।
इतनी कहानी सुनकर विशम्बर चुप हो गया।
हरीश की आँखें फैल गई थीं। मीरा और दिया खामोश थीं। गीता काकी भी पुतला बनी बैठी थी।
मीरा अपने सेंस में आई। उसने हैरानी से पूछा।
मीरा: फिर क्या हुआ, पापा?
हरीश: क्या उस मॉन्स्टर को उसकी रानी मिली?
विशम्बर: महेश के दो बेटे थे। तो रानी कैसे मिलती?
गीता काकी ने धीमी आवाज़ में कहा।
गीता काकी: भाई साहब के पूरे खानदान में कभी किसी के घर बेटी हुई ही नहीं।
मीरा: फिर मैं क्यों?
हरीश: ये सब मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जो गाँव वाले अक्सर सुनाते रहते हैं। ये सब कोरी बकवास है।
गीता काकी बोली।
गीता काकी: मेरे खानदान में कोई उस गाँव में जाए भी तो झील के इलाके में नहीं जाता।
मीरा: काकी! ऐसी अफ़वाहों पर ध्यान देकर मैं अपनी ज़मीन और प्रोजेक्ट को बर्बाद नहीं करूँगी।
गीता काकी: मीरा बेबी! मेरा गाँव चंद्रगढ़ के पड़ोस में है। मैंने आज तक अपने परिवार को उधर जाने नहीं दिया। मेरे बेटा-बहू और पोता वहाँ नहीं जाते।
मीरा: Whatever, काकी! वो नहीं जाते तो क्या? मैं जाऊँगी और अपना प्रोजेक्ट पूरा करूँगी।
दिया: मैं भी साथ हूँ। भूलना मत।
मीरा मुस्कुराई।
विशम्बर और गीता ने बहुत समझाया, पर मीरा नहीं मानी।
अगली सुबह दोनों ट्रेन में बैठकर रवाना हो गईं।
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