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अध्याय 12
Ballyansh · Jinn & Spirits · 6 मिनट
वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
अध्याय 12
कबीर: तूने मुझे कहाँ फँसा दिया?
राजू: चुप रह और जल्दी से बैठ। दिया और मीरा मैडम के पास पहुँचना है।
कबीर: कौन मीरा और कौन दिया? पहले ये तो बता।
राजू: शहर से आई लड़कियाँ हैं। गेस्ट हाउस में ठहरी हैं।
कहते हुए वह कबीर को सब कुछ बताने लगा। थोड़ी देर बाद दोनों वहाँ पहुँच गए।
मीरा और दिया तैयार थीं। दरवाज़े पर दस्तक हुई तो दिया ने दरवाज़ा खोला।
बाहर राजू और कबीर खड़े थे। दिया को देखते ही राजू के चेहरे पर चमक आ गई। कबीर उसे देखकर हैरान था।
दिया: ये कौन है?
कबीर: मेरा नाम कबीर है। मैं राजू का असिस्टेंट हूँ।
कबीर का यह जवाब सुनकर दिया अपनी हँसी रोक नहीं पाई।
दिया: राजू! क्या तुम किसी कंपनी के डायरेक्टर हो? I mean… चेयरमैन हो? जो असिस्टेंट रख लिया?
कहकर वह फिर हँस पड़ी। राजू चुप था। उसका चेहरा उतर गया।
कबीर: जी, राजू ने मुझे बताया कि आप और आपकी दूसरी मैडम यहाँ बहुत बड़ा स्टार्टअप प्रोजेक्ट करने आई हैं। आपका स्टाफ कहाँ है, मैडम जी?
कहते हुए उसने अपने शब्दों को तंज भरे लहज़े में बोला।
दिया को पहली नज़र में ही कबीर खटक गया। वह चुप थी।
तभी मीरा आ गई। उसने राजू और कबीर को देखा। कबीर देखने में बहुत हट्टा-कट्टा, लंबा-चौड़ा और सुंदर नौजवान था।
मीरा: राजू भैया! ये मेहमान कौन हैं?
राजू: मीरा मैडम! ये मेरा बचपन का दोस्त है, कबीर!
मीरा: तुम्हारा स्वागत है। राजू भैया! हमें आज फिर से वहीं जाना है।
राजू: कल क्या हालत हुई थी आप दोनों की? क्या याद नहीं है?
मीरा: मैं कुछ नहीं भूली, पर मुझे अपना काम करना है।
तभी मीरा का फोन बज उठा। फोन की स्क्रीन पर पापा लिखा था।
मीरा: पापा का फोन है।
कहकर वह कमरे में चली गई।
दिया वहीं खड़ी थी। वह कबीर को घूर रही थी। कबीर भी कहाँ कम था! वह भी उसी तरह तंज भरी नज़रों से उसे घूर रहा था। राजू ने यह बात नोटिस कर ली थी।
मीरा बात करते हुए बाहर आई।
मीरा: राजू भैया! आप ज़रा बात कीजिए।
कहते हुए उसने फोन राजू की तरफ बढ़ा दिया।
राजू: बात करूँ?
हैरानी से उसने फोन लिया और हेलो बोलकर बात करने लगा। वह खुशी से उछल पड़ा और हँसकर बातें करने लगा।
दिया और कबीर हैरान थे।
दिया: ये अंकल से बात करके इतना खुश क्यों है?
मीरा: पापा से मैंने बात की थी। ये तो अपनी दादी, मतलब गीता काकी से बात कर रहा है।
वे दोनों चौंक गए। दिया उसे देख रही थी।
कबीर: अच्छा! तो गीता दादी आपके घर काम करती हैं?
मीरा: हाँ। मुझे बचपन से उन्होंने ही पाला है। वो मेरे लिए नानी भी हैं, दादी भी और बुआ भी।
कबीर मुस्कुराया। दिया उसे घूरने लगी।
राजू: आप बिल्कुल चिंता मत कीजिएगा, दादी! मीरा मैडम की ज़िम्मेदारी हमारी है। हम उनका ख्याल रखेंगे। उन्हें अकेले जाने नहीं देंगे। अच्छा, रखते हैं।
कहकर उसने फोन काट दिया।
मीरा ने फोन अपने पर्स में रख लिया।
मीरा: काकी ने बताया था कि उनका परिवार यहाँ रहता है, पर मैंने सोचा नहीं था कि मुलाकात भी होगी। सुखी चाचा की वजह से हम लोग मिल पाए।
कबीर: वो मेरे दादाजी हैं। सारा गाँव उन्हें चाचा कहता है, सिवाय मेरे।
मीरा उसकी बात पर मुस्कुराई। कबीर भी मुस्कुराया।
राजू: ठीक है फिर, मैडम! चलिए। हम दोपहर तक वापस आ जाएँगे। हवेली मिल गई तो ठीक, वरना कल ढूँढ़ेंगे। आइए।
दोनों उसके और कबीर के साथ चल दीं।
ताँगा चलने लगा। इस बार कबीर ताँगा चला रहा था और राजू उसके पास ही बैठा था।
चंद्रगढ़ की सरहद पर पहुँचकर ताँगा रुक गया। कबीर सबसे पहले नीचे कूदा और तनकर खड़ा हो गया।
वे तीनों भी उतर गए। चारों ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई।
मीरा आगे चलने लगी। कबीर उसके साथ आगे था। दिया दो कदम पीछे राजू के साथ चल रही थी।
राजू: क्या कोई टेंशन है?
दिया: राजू! यहाँ आते ही मेरे मन पर एक तनाव-सा हावी होने लगता है। यहाँ का माहौल जितना खूबसूरत है, उतनी ही इसकी वाइब्स नेगेटिव हैं।
राजू: हाँ, मुझे भी ऐसा ही अनुभव होता है। पर ज़रा मीरा मैडम पर गौर कीजिए। उनके चेहरे पर यहाँ आने के बाद मैंने जो सुकून देखा है, वो अपने गाँव में नहीं देखा।
दिया चुप रही।
कबीर बातूनी था। मीरा उसकी बातों का जवाब तो दे रही थी, पर उसकी नज़रें किसी को ढूँढ़ रही थीं।
मीरा (मन में): शायद आज भी वो कहीं दिख जाए?
कबीर: आप किसी को खोज रही हैं?
मीरा: कबीर! कल मुझे यहाँ एक लंबा-चौड़ा लड़का मिला था। उसने मेरी मदद की थी। मैंने उसका शुक्रिया भी अदा नहीं किया। यहाँ तक कि उसका नाम भी नहीं पता मुझे।
दिया: सुनसान जगह पर कोई नहीं था। वो तुम्हारा वहम था।
मीरा: दिया! वो मेरा वहम नहीं था। पता नहीं, वो था कौन?
कबीर: कहीं समीर तो नहीं?
मीरा: समीर? कौन समीर?
राजू: कुछ महीनों पहले एक फॉरेस्ट ऑफिसर यहाँ इंस्पेक्शन करने आया था। हर वक्त यहीं रहता था। कहता था, अब ये जंगल ही मेरा घर है। पता नहीं, अब कहाँ है? वो गाँव में दोबारा लौटा ही नहीं।
दिया: किसी ने उसकी तलाश नहीं की?
कबीर: कोई यहाँ आता तो तलाश करता? सबको डर लगता है। मरना कौन चाहता है?
मीरा चुप हो गई। वह मन ही मन सोच रही थी।
मीरा (मन में): क्या वो कोई आत्मा थी? तभी दिया को दिखाई नहीं दी। पर मुझे क्यों दिखाई दी? नहीं, भूत-वूत नहीं होते। पर हुए तो…?
सोचते हुए वह चलती रही।
उन्हें न तो हवेली मिली, न कोई और। दोपहर के बाद वे लोग वापस आ गए।
मीरा बेहद उदास थी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह हवेली और ज़मीन न मिलने के कारण दुखी थी या उस अजनबी से दोबारा न मिल पाने के कारण।
दोनों खाना खाकर सो गईं।
शाम का वक्त था। मीरा जंगल में अकेली खड़ी थी और उसी अजनबी को पुकार रही थी। उसने रोनी-सी सूरत बना रखी थी।
तभी उसे सामने वही खड़ा दिखाई दिया।
वह बिल्कुल शांत था और ठंडी नज़रों से मीरा को देख रहा था।
मीरा: तुम आ गए! मैं कब से तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ।
मीरा की आवाज़ में खुशी भी थी और शिकायत भी।
उसकी चुप्पी पर मीरा हैरान थी। वह कुछ कहती, इससे पहले ही चारों तरफ धुएँ-सा फैल गया।
- Writer
- Ballyansh
- Story
- वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
- Chapter
- 12 of 12
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1048
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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