Pretika › Jinn & Spirits › वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप

अध्याय 11

Ballyansh · Jinn & Spirits · 5 मिनट

वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप

अध्याय 11

वेद्रान बहुत आराम से, धीरे-धीरे चल रहा था। मीरा उसके साथ चल रही थी।

मीरा: मेरा नाम मीरा मल्होत्रा है। तुम्हारा नाम क्या है?

वेद्रान: जानकर क्या करोगी? हम दोबारा नहीं मिलने वाले।

यह सुनकर मीरा के दिल में टीस उठी। उसका चेहरा उदासी से भर गया। वह अचानक वेद्रान के सामने आ गई और तपाक से बोली।

मीरा: क्यों? हम दोबारा क्यों नहीं मिलेंगे?

वेद्रान: तुम मुझसे दोबारा मिलना चाहती हो?

मीरा: हाँ, बिल्कुल! अ… मेरा मतलब, हम दोस्ती कर सकते हैं।

(मन में)

मीरा: मीरा! तू पागल हो गई है क्या? यह अनजान लड़का है और तू क्या बकवास कर रही है?

वेद्रान के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई, क्योंकि वह तो उसके मन के विचार सुन रहा था।

वेद्रान: मुझे देखना छोड़कर उस तरफ देखो। तुम्हारी दोस्त वहाँ है।

उसकी बात सुनकर मीरा झेंप गई।

मीरा ने उस तरफ देखा तो वहाँ दिया और राजू थे, जो उसी तरफ आ रहे थे। मीरा खुश हो गई।

मीरा: शुक्रिया! मदद के लिए।

वेद्रान चुप था। वह जाने लगा तो न जाने मीरा को क्या सूझा कि उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

वेद्रान ने एक नज़र अपने हाथ को देखा, फिर मीरा को।

मीरा: हमारे साथ चलो। यह जगह सुरक्षित नहीं है।

वेद्रान: यह मेरा घर है।

कहकर उसने अपना हाथ छुड़ा लिया।

मीरा पुतले की तरह बेसुध-सी उसे देखती रही।

राजू और दिया भागकर उसके पास आ गए। दिया ने मीरा को पकड़ लिया। मीरा बेहोश हो चुकी थी।

दोनों उसे जंगल से बाहर ले गए।

अगले दिन सुबह मीरा की आँख खुली। उसने खुद को अपने कमरे में पाया।

दिया उसके पास आ गई। वह मुस्कुराई।

दिया: शुक्र है! तुम ठीक हो। मेरी जान ही निकाल दी थी तुमने।

मीरा इधर-उधर देख रही थी। दिया उससे गले मिली। मीरा हल्का-सा मुस्कुराई।

दिया: तू खड़े-खड़े बेहोश कैसे हो गई थी?

मीरा: पता नहीं। हम यहाँ कैसे आए?

दिया: राजू और मैं तुम्हें लेकर आए। मेरी तो खुद की हालत खराब थी। मीरा! छोड़ उस हवेली और ज़मीन को। हम कुछ और देख लेंगे। वह जंगल अजीब है।

मीरा नाराज़ हो गई।

मीरा: यह तू क्या कह रही है? मैं अपनी पुश्तैनी ज़मीन छोड़ दूँ? कल जो कुछ भी हुआ, वह सब हमारा वहम था।

दिया: क्या? वहम?

मीरा: और नहीं तो क्या? हमने वहाँ कुछ नहीं देखा। सिर्फ पेड़, पौधे और जानवर ही तो थे। यह कोई बड़ी बात नहीं है। हम बस अकेली थीं, इसलिए डर गईं। और कुछ नहीं।

दिया चुप हो गई। उसने कुछ नहीं कहा।

मीरा: वह दूसरा लड़का कहाँ है?

दिया: कौन-सा दूसरा लड़का? मैं तो राजू के अलावा किसी से नहीं मिली अभी तक!

मीरा: बुद्धू! जो मेरे साथ खड़ा था। ब्लैक लॉन्ग कोट में। याद आया कुछ?

दिया: मीरा! तू अभी नींद में है। जाकर फिर से सो जा। पता नहीं क्या बोले जा रही है!

कहते हुए वह टेबल पर रखे फल काटने लगी।

मीरा (मन में): दिया ने तुम्हें क्यों नहीं देखा? क्या तुम मेरा वहम थे?

सोचते हुए वह फिर से लेट गई।

उधर सुखी चाचा सुबह मंदिर होकर अपने घर आया। उसके घर में उसके अलावा उसका पोता ही था, जो राजू का हमउम्र और अच्छा दोस्त था।

वह भी पहलवानी में चैंपियन था और कई जगह अखाड़ों में हाथ आज़माता रहता था। पर उसकी हालत भी राजू जैसी ही थी।

वह बिस्तर पर फैलकर सो रहा था। सुखी चाचा ने उसे पुकारा, पर वह नहीं उठा।

सुखी चाचा उसके पास आया और उसने अपनी छड़ी हल्के से उसे दे मारी।

वह चिल्लाता हुआ उठकर बैठ गया।

सुखी चाचा: उठ, निकम्मे! आवारा! सूरज सिर पर चढ़ गया है और तेरी नींद नहीं खुली!

कबीर: आपकी खुल गई। आ गए सुबह-सुबह मेरी नींद उजाड़ने! मैं ओलंपिक चैंपियन बनने ही वाला था!

सुखी चाचा: सपने ही देखता रह, नालायक! कितने चाव से तेरा नाम कबीर रखा था। सोचा था, संत कबीर की तरह तू समझदार होगा। पर नहीं!

तू…!

कहकर उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और मुँह फेर लिया।

कबीर: वाह! कबीर नाम रखने से मैं संत कबीर जैसा हो जाता? अगर आप मेरा नाम हेलीकॉप्टर रखते, तो मैं तो उड़ ही जाता। है ना?

सुखी चाचा ने छड़ी उठाई। वह कबीर को मारने बढ़ा ही था कि राजू आ गया।

राजू: सुखी चाचा! क्या कर रहे हो? शांत हो जाओ।

सुखी चाचा: यह नालायक मुझसे ज़बान लड़ा रहा है!

राजू: जाने दीजिए, चाचा! अपने आप सुधर जाएगा। आप लीजिए, ये दाल-चावल खाइए। माँ ने भेजे हैं।

कबीर (खुशी से): मौसी ने नाश्ता भेजा है! लाओ, मुझे दो। ये क्या इस उम्र में खाएँगे?

कहकर वह बेशर्मी से राजू से डिब्बा लेकर खाने लगा।

सुखी चाचा: देखा इस निर्लज्ज को! कितनी बार कहा है कि कोई काम-धंधा कर ले। कब तक पड़ा रहेगा? पढ़-लिखकर ऐसे ही बैठा है। इसकी पहलवानी को सरपंच ने खुद पसंद किया है और खुद इसे अपने यहाँ काम देने की बात कही है। पर यह माने तब न!

कबीर: राजू! मैं सरपंच का नौकर नहीं बनूँगा। उसका बेटा गुंडे पालता है। मैं गुंडा नहीं हूँ।

राजू: ठीक है, मत कर।

सुखी चाचा: तू भी तो पहलवानी छोड़कर ताँगा चलाने लगा न। यह कुछ क्यों नहीं करता?

राजू: चाचा! सुनिए, आज से यह मेरे साथ ताँगा चलाना सीखेगा। चल, कबीर! तैयार हो जा।

कबीर: मुझसे कुछ नहीं होगा, समझा!

कहकर वह हाथ धोने चला गया।

सुखी चाचा: देख लिया! यह निकम्मा कुछ नहीं करेगा।

राजू: मैं देख लूँगा उसे। वह थोड़ा चंचल और शरारती है। आपको पता तो है। मैं कुछ करता हूँ।

कहकर वह कबीर के पीछे गया और उसने कबीर को तैयार करवाया। दोनों ताँगे के पास आ गए।

राजू ने कबीर को देखा।

Writer
Ballyansh
Story
वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
Chapter
11 of 12
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
931
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories