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Ep 3

Ballyansh · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Ballyansh
Story
वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
Chapter
3 of 4
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
760
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अध्याय 3

दो दिन बीत गए। बिशम्बर को अब घर पर लाया गया था। वह बिस्तर पर ही था, पर मानसिक तौर पर टूट-सा गया था।

मीरा उसकी देखभाल खुद ही करती थी।

सुबह के 11 बज रहे थे। अपने पिता को दवा देकर गीता काकी से कहकर मीरा दिया से फोन पर बात करते हुए घर से बाहर निकल गई। उसने उसे अभिषेक के ऑफिस के बाहर मिलने बुलाया।

कुछ ही पलों में दोनों वहाँ पहुँच गईं।

दिया: क्या बात है? तू ठीक तो है? परेशान लग रही है।

मीरा: दिया! हमारी कंपनी खत्म हो गई। सारे शेयर्स कंपनी के बोर्ड मेंबर्स वापस ले रहे हैं या फिर बेच रहे हैं। उनमें से एक अभिषेक भी है।

दिया चौंक गई। मीरा के चेहरे पर परेशानी की लकीरें थीं।

दिया: तू चिंता मत कर। हम अभिषेक से बात करेंगे। चलो।

दोनों सीधे ऑफिस के अंदर पहुँचीं। मीरा पहले भी कई बार आ चुकी थी, तो किसी ने उसे रोका नहीं।

अभिषेक अपने केबिन में बैठा था। दोनों उसके पास आईं।

अभिषेक (चौंककर): मीरा! तुम यहाँ क्या कर रही हो? ये मेरा ऑफिस है।

मीरा उसकी बात और आवाज़ में भरी तल्खी पर हैरान थी।

मीरा: मैं क्या सुन रही हूँ? तुम मेरे पापा की कंपनी के शेयर्स…

बात काटकर अभिषेक बोला।

अभिषेक: So what? हाँ, मैं कर रहा हूँ। मैं एक बिजनेसमैन हूँ, कोई बेवकूफ नौसिखिया नहीं, जो घाटे का सौदा करूँ। डूबी हुई कंपनी से मेरा नाम जुड़ा रहा, तो मार्केट में मेरी क्या image रह जाएगी?

मीरा दंग रह गई। दिया भड़क उठी।

दिया: कितने घटिया आदमी हो तुम। तुम्हारी image तो अब हमारे सामने आई है।

अभिषेक: तमीज़ से बात करो, दिया! ये मेरा ऑफिस है।

मीरा: तुमने कहा, ये घाटे का सौदा है। तुम्हें हमारा रिश्ता घाटे का…

कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

अभिषेक खामोश था। वह मीरा से नजरें चुरा रहा था।

दिया अभिषेक को उंगली दिखाते हुए उसकी तरफ कुछ कहने को हुई, पर मीरा ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया।

मीरा: दिया! चल यहाँ से।

दिया: मीरा! ये आदमी…

मीरा: तू चल। बस। घर चल।

कहकर वह उसे ले जाने लगी, तो अभिषेक ने रोक लिया।

एक पल के लिए मीरा के कदम थम गए। उसे लगा, शायद अभिषेक को एहसास हो गया है। उसने पलटकर देखा।

अभिषेक: तुम्हारे पापा ने हम दोनों के नाम जो शेयर्स खरीदे थे, वो मैंने मेरे हिस्से के बेच दिए हैं। तुम इन पेपर्स पर साइन कर दो। मैं वो भी बेच दूँगा। Payment तुम्हारे account में आ जाएगी। अब रास्ते अलग हो ही गए हैं, तो partnership कैसी? मुझे loss नहीं चाहिए। लो, साइन कर दो।

मीरा और दिया की आँखों में नफरत भरी हुई थी।

मीरा दाँत पीसकर रह गई। वह आगे बढ़ी और सामने टेबल पर रखे documents पर sign करने लगी।

उसने वो पेपर्स अभिषेक के मुँह पर फेंककर उड़ा दिए।

उसने अपनी उंगली में पहनी सगाई की अंगूठी उतारी और वो भी उसके मुँह पर फेंक दी।

और दिया का हाथ थामकर चली गई।

अभिषेक चुप रहा।

मीरा रोते हुए दिया के साथ टैक्सी में बैठी। दिया उसे चुप कराने की कोशिश करती रही।

दोनों घर पहुँच गईं।

मीरा ने अपने पापा को कुछ नहीं बताया। पर वह उदास थी।

एक हफ्ता बीत गया। बैंक वालों के दबाव की वजह से उन्हें अपना घर भी खाली करना पड़ा।

हरीश ने उन्हें अपने घर ले जाना चाहा, पर मीरा नहीं मानी। हरीश ने उन्हें किराए के छोटे-से घर में ठहराया।

गीता काकी चाय बनाकर ले आई।

दिया और मीरा बैठी थीं। मीरा अपने पापा को सूप पिला रही थी। हरीश ने चाय ले ली।

हरीश: मीरा! बेटा! अब क्या करने का सोच रही हो? मैं अब भी कहता हूँ, शादी के लिए हाँ कहो। मैं अभिषेक से बात करता हूँ।

मीरा: अंकल, प्लीज़! मुझे न तो कोई शादी करनी है और न इस बारे में बात करनी है। जो हुआ, भूल जाइए। मेरे पापा बस ठीक हो जाएँ। सब ठीक हो जाएगा।

हरीश चुप हो गया।

वो करता भी क्या? अभिषेक की वजह से वह पहले ही शर्मिंदा था।

हरीश: अगर किसी भी तरह की मदद चाहिए, बेटा! तो प्लीज़ अपने अंकल को पराया मत करना। मैं अब भी वही हूँ, जिसकी गोद में तुम खेलती थीं।

मीरा हल्का-सा मुस्कुराई। दिया चुप थी।

मीरा: जी, अंकल। जरूर। वैसे आप यहाँ पापा के पास आते-जाते रहिएगा। क्योंकि मैं कुछ दिनों के लिए चन्द्रगढ़ जा रही हूँ।

ये सुनते ही गीता काकी, जो सूप के बर्तन उठाकर जा रही थी, उसके कदम वहीं थम गए।

और बर्तन फर्श पर गिर गए।

सब चौंककर उसे देखने लगे।

काकी के हाथ काँप रहे थे।

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