Pretika › Jinn & Spirits › वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
अध्याय 8
Ballyansh · Jinn & Spirits · 5 मिनट
अध्याय 8
ट्रेन सामान्य रफ़्तार से चल रही थी। मीरा अपने प्रोजेक्ट की फाइल में कुछ नोट कर रही थी। दिया अपने फोन में व्यस्त थी।
दोनों आमने-सामने खिड़की वाली सीट पर बैठी थीं।
दोनों शहर की भीड़-भाड़ से कोसों दूर, खूबसूरत पहाड़ी नज़ारों के बीच थीं। हवा के एक ठंडे झोंके से मीरा की फाइल के पन्ने उड़कर फर्श पर गिर गए। दिया ने उन्हें उठाने में उसकी मदद की।
दोनों की नज़रें बाहर के कुदरती नज़ारों पर पड़ीं।
दिया: हाय! क्या नज़ारे हैं यार! मन करता है अभी ट्रेन से कूदकर इन पहाड़ों में खो जाऊँ।
मीरा: सही कहा। ये सब स्वर्ग जैसा है।
कुछ पलों बाद—
दिया: मीरा! कल जो अंकल ने कहानी सुनाई थी... क्या तुझे उस पर सच में यकीन नहीं है?
मीरा: क्या तुझे है?
दिया: पता नहीं। पर जैसा अंकल ने कहानी में उस मॉन्स्टर के बारे में बताया न... सच कहूँ तो ऐसे हैंडसम हीरो से तो मैं चुटकी में शादी कर लूँ।
मीरा: तू पागल है क्या? इसी लिए कहती हूँ, ये फिल्में मत देखा कर। तेरा दिमाग फिर गया है।
दिया हँस पड़ी।
ट्रेन कुछ पल के लिए एक गाँव के स्टेशन पर रुकी। स्टेशन पर इक्का-दुक्का लोग ही थे।
एक बुज़ुर्ग आदमी उन दोनों के डिब्बे में चढ़ गया।
पूरा कम्पार्टमेंट खाली था। बुज़ुर्ग उन दोनों के पास आया।
बुज़ुर्ग: क्या मैं यहाँ बैठ जाऊँ, बच्चों?
मीरा: जी, काका! ज़रूर बैठिए।
बुज़ुर्ग: (मुस्कुराकर बैठते हुए) शुक्रिया बेटा! वैसे तो इस गाँव तक आते-आते ट्रेन खाली हो जाती है। जगह की कमी नहीं। पर मैंने सोचा, अकेले क्यों बैठना? बच्चों के साथ बैठ जाता हूँ।
मीरा: जी, काका! आप पानी लेंगे?
बुज़ुर्ग: हाँ। अगर हो सके तो पिला दो, बेटा!
मीरा ने अपनी बोतल से गिलास भरकर पानी दिया। वो पानी पीने लगा।
बूढ़े की हालत काफी फटेहाल थी। उसके पास एक लाठी और फटा हुआ झोला था, जिसमें शायद कोई शॉल या दो-एक कपड़े थे।
दिया उसे देखकर मुँह बना रही थी। पर मीरा को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो बहुत नरमदिल थी।
बुज़ुर्ग: क्या तुम दोनों भी सोनपुर जा रही हो?
दिया: जी नहीं, काका!
बुज़ुर्ग: ये तो आखिरी स्टॉप है। फिर कहाँ जाओगी?
दिया: हम एड्रेस लिखकर देते हैं, पिनकोड के साथ।
मीरा: दिया! चुप कर।
दिया चुप रही और अपने फोन में घुस गई।
मीरा: माफ़ करना, काका! ये ऐसी ही है। वैसे हम चंद्रगढ़ जा रहे हैं।
बूढ़े के हाथ से उसकी छड़ी छूटकर गिर गई।
बूढ़ा: क्यों? वहाँ क्यों जा रही हो? वहाँ बच्चों का अकेले जाना ठीक नहीं। तुम्हारे माता-पिता ने तुम लोगों को रोका नहीं?
मीरा: वहाँ हमारी पुश्तैनी ज़मीन है। मुझे वहाँ काम करना है।
बूढ़ा ना में सिर हिलाने लगा। वो परेशान था।
ट्रेन तेज़ रफ़्तार से चल रही थी।
बूढ़ा: मैं तुम दोनों को चेतावनी दे रहा हूँ। मत जाओ वहाँ। वो गाँव शापित है। वहाँ कोई नहीं जाता। सब सोनपुर में ही रहते हैं। ये ट्रेन भी वहीं तक जाएगी, क्योंकि चंद्रगढ़ में कोई घर नहीं है। कहाँ रहोगी?
दिया: क्या वहाँ कोई घर नहीं है?
बूढ़ा: सदियों पहले की बात है। लोग वहाँ से सोनपुर आकर बस गए थे। सब श्राप से डरते हैं। मैं पास के गाँव में गया था, सरपंच के काम से। मैं उनके घर काम करता हूँ। आज वापस जा रहा हूँ। शाम हो रही है। सोनपुर में ही रुक जाओ। रात को कहाँ जाओगी दोनों?
मीरा ने दिया की तरफ देखा।
मीरा: दिया! काका ठीक कह रहे हैं। सोनपुर में ही रुकते हैं। सुबह देखेंगे आगे का। काका! आपके गाँव में गेस्ट हाउस है?
बूढ़ा: गेस्ट... क्या? ये समझा नहीं।
दिया: काका! हमारा मतलब मुसाफिरखाना! धर्मशाला?
बूढ़ा: हाँ, हाँ। धर्मशाला है। मेरे घर के रास्ते में ही है। मैं छोड़ दूँगा।
दोनों चुप रहीं।
मीरा के मन में रह-रहकर चंद्रगढ़ ही चल रहा था।
शाम हो गई।
ट्रेन सोनपुर स्टेशन पर रुक गई। वहाँ भी काफी कम चहल-पहल थी।
तीनों नीचे उतरे।
दिया ने अपना बैग पीठ पर लटका रखा था। मीरा का छोटा बैग उसकी पीठ पर था और बड़ा ट्रॉली बैग वो खींचकर स्टेशन के बाहर ले जा रही थी।
बाहर दो-तीन घोड़ागाड़ियाँ खड़ी थीं। सब काका को जानते थे।
एक टाँगे वाले ने भागकर काका के पैर छुए।
टाँगे वाला: अरे! कैसे हो सुखी चाचा?
सुखी चाचा: मैं ठीक हूँ, राजू बेटा! सुन, धर्मशाला तक चलेगा? मेरे साथ ये दो बच्चियाँ हैं।
राजू: जी, बिल्कुल चलूँगा। अब तो घर जाने का वक्त हो गया है। आइए, चलें।
राजू ने मीरा और दिया के बैग उठाकर टाँगे में रख दिए।
चारों बैठ गए।
राजू उन दोनों की उम्र का ही था। देखने में बहुत हट्टा-कट्टा, सुंदर नौजवान था।
उसे पहली नज़र में दिया बहुत अच्छी लगी।
दिया ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
धर्मशाला आ गई।
दोनों का सामान वहाँ कमरे में रखकर राजू जाने लगा, तो मीरा ने उसे पैसे दिए।
राजू: आप सुखी चाचा की मेहमान हैं। आपसे पैसे नहीं ले सकता। चलता हूँ। शुक्रिया।
दिया हैरान थी।
मीरा: शुक्रिया, राजू! पर सुनो, कल हमें कहीं जाना है। क्या तुम...
राजू: बताइए। कब निकलना है? मैं आ जाऊँगा।
दिया: सुबह दस बजे।
राजू: मैं पहुँच जाऊँगा।
कहकर वो मुस्कुराया और चला गया।
- Writer
- Ballyansh
- Story
- वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
- Chapter
- 8 of 8
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 5 min
- Words
- 847
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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