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एपिसोड 1 “वह घर जो इंतज़ार कर रहा था”
firoj saifi · Sci-Fi Horror · 12 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- THE HAUNTING OF BLACKWELL MANOR
- Chapter
- 1 of 2
- Category
- Sci-Fi Horror
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2362
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बारिश लगातार तीन घंटे से हो रही थी।
लंदन की सड़कें पानी से चमक रही थीं और आसमान में बिजली बार-बार चमक रही थी। हर बार जब बिजली आकाश को चीरती, माया कार्टर के छोटे से अपार्टमेंट की खिड़की पर बारिश की बूंदें कुछ क्षणों के लिए चांदी जैसी चमक उठतीं।
माया खिड़की के पास खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुराना लिफाफा था।
लिफाफे पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
माया।
उसकी मां की मृत्यु को आज सात दिन हुए थे।
पिछले सात दिनों में माया ने अपनी मां की चीजों को छूने की भी हिम्मत नहीं की थी। उसकी मां का कमरा अब भी वैसा ही था, जैसा मृत्यु से एक दिन पहले था। मेज पर आधी पढ़ी हुई किताब, खिड़की के पास रखा सूखा हुआ पौधा, अलमारी पर रखी पुरानी तस्वीरें और बिस्तर के पास रखा चश्मा।
माया हर बार उस कमरे के दरवाजे तक जाती, लेकिन भीतर कदम रखने से पहले ही लौट आती।
उसे लगता था कि कमरे में उसकी मां की मौजूदगी अब भी बाकी है।
जैसे वह किसी भी क्षण पीछे से आवाज देंगी—
“मायू, इतनी देर रात तक जागना ठीक नहीं।”
लेकिन अब वह आवाज कभी नहीं आएगी।
आज शाम उसे वकील का फोन आया था। उसने बताया कि उसकी मां ने मरने से पहले उसके लिए कुछ सामान छोड़ा है।
एक लकड़ी का छोटा संदूक।
माया ने संदूक अपने सामने रखा।
उस पर धूल जमी थी। लकड़ी जगह-जगह से घिस चुकी थी और ढक्कन के किनारों पर काले दाग थे। ताला पुराना था, लेकिन अजीब बात यह थी कि उस पर जंग नहीं लगी थी।
वकील ने कहा था कि उसकी मां ने विशेष रूप से निर्देश दिया था कि संदूक सिर्फ माया खोले।
माया ने धीरे से ताला खोला।
क्लिक।
ढक्कन खुला।
अंदर कुछ पुराने कपड़े थे।
एक चांदी की अंगूठी।
कुछ तस्वीरें।
और सबसे नीचे एक काली चमड़े की डायरी।
माया ने डायरी उठाई।
जैसे ही उसने उसे खोला, उसका दिल अचानक तेज धड़कने लगा।
पहले पन्ने पर एक तस्वीर बनी थी।
एक विशाल हवेली।
ऊंची मीनारें।
लोहे का गेट।
चारों ओर घना जंगल।
और तस्वीर के नीचे लिखा था—
ब्लैकवेल मैनर।
माया कुछ सेकंड तक तस्वीर को देखती रही।
फिर उसकी उंगलियां कांपने लगीं।
क्योंकि उसने उस हवेली को पहले देखा था।
कई बार।
अपने सपनों में।
हर बार वही हवेली।
हर बार वही लंबा रास्ता।
हर बार वही तीसरी मंजिल की खिड़की।
और हर बार उस खिड़की में खड़ी वही लड़की।
लड़की की उम्र दस या ग्यारह साल से अधिक नहीं थी। उसके बाल लंबे और बिखरे हुए थे। वह सफेद कपड़े पहने रहती थी और उसका चेहरा हमेशा आधा अंधेरे में छिपा रहता था।
माया ने डायरी तेजी से बंद कर दी।
उसने खुद को समझाया।
“यह सिर्फ संयोग है।”
लेकिन उसी क्षण उसके पीछे रखी दीवार घड़ी रुक गई।
समय था—
3:17।
माया धीरे-धीरे घड़ी की तरफ मुड़ी।
घड़ी की सुइयां स्थिर थीं।
कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे बाहर की बारिश भी रुक गई हो।
उसे अपनी मां की एक पुरानी बात याद आई।
बचपन में जब भी माया रात में डरकर उठती थी और अपनी मां के कमरे में जाती थी, उसकी मां हमेशा उसे वापस भेज देती थी।
एक रात माया ने पूछा था—
“मां, आप मुझे अपने कमरे में क्यों नहीं सोने देतीं?”
उसकी मां ने बहुत देर तक कोई जवाब नहीं दिया था।
फिर उसने माया के कंधे पर हाथ रखकर कहा था—
“अगर कभी रात में घड़ी 3:17 पर रुक जाए, तो किसी आवाज का जवाब मत देना।”
माया तब छोटी थी। उसे बात समझ नहीं आई थी।
आज अचानक सब याद आ गया।
उसने डायरी दोबारा खोली।
अंदर कई पन्ने खाली थे।
लेकिन बीच के एक पन्ने पर उसकी मां की लिखावट थी।
सिर्फ एक वाक्य—
“अगर मैं मर जाऊं, तो ब्लैकवेल मत जाना।”
माया ने पन्ने को घूरते हुए कहा,
“तो फिर आपने मुझे यह क्यों भेजा?”
कोई जवाब नहीं आया।
तभी उसके फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम था—
डेनियल।
माया ने कॉल उठाया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।
फिर डेनियल ने पूछा,
“तुम्हें संदूक मिल गया?”
माया चौंक गई।
“तुम्हें कैसे पता?”
“तुम्हारी मां ने मुझे एक संदेश भेजा था।”
“कब?”
“उनकी मौत से दो दिन पहले।”
माया के हाथ से डायरी लगभग गिर गई।
“उन्होंने क्या कहा था?”
डेनियल कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला,
“उन्होंने कहा था कि अगर तुम्हें डायरी मिले, तो मुझे तुरंत तुम्हारे पास आना है।”
“और?”
“उन्होंने कहा था कि तुम्हें अकेले ब्लैकवेल नहीं जाना चाहिए।”
माया की सांस रुक गई।
“मैंने अभी तुम्हें बताया भी नहीं कि डायरी में ब्लैकवेल मैनर लिखा है।”
फोन के दूसरी तरफ खामोशी छा गई।
डेनियल ने धीरे से कहा,
“मुझे पता था।”
---
अगली सुबह दोनों ने माया की मां के पुराने सामान की जांच की।
डायरी में कई जगह अजीब निशान बने थे। कुछ निशान गोलाकार थे, कुछ किसी प्राचीन भाषा के अक्षरों जैसे दिखाई देते थे। कई पन्नों के किनारे जले हुए थे।
कुछ पन्नों पर तारीखें थीं।
1889।
1890।
1891।
फिर अचानक एक तारीख—
17 अक्टूबर 1899।
उसके नीचे लिखा था:
“आज रात दरवाजा खुल गया।”
माया ने पूछा,
“कौन सा दरवाजा?”
डेनियल ने सिर हिलाया।
“पता नहीं।”
“तुम्हारी मां ने कभी इस हवेली का नाम लिया था?”
“नहीं।”
“क्या तुमने कभी उन्हें डरते हुए देखा था?”
डेनियल ने कुछ क्षण सोचा।
“तुम्हारी मां बहुत मजबूत थीं। लेकिन एक बार मैंने उन्हें रात में तुम्हारे कमरे के बाहर खड़े देखा था।”
“कब?”
“तुम लगभग दस साल की थीं।”
“वह क्या कर रही थीं?”
“तुम सो रही थीं। वह दरवाजे के बाहर खड़ी होकर तुम्हें देख रही थीं। उनके हाथ में चांदी की वही अंगूठी थी।”
माया ने संदूक में रखी अंगूठी की तरफ देखा।
“उन्होंने कुछ कहा था?”
डेनियल ने धीमे स्वर में कहा,
“उन्होंने कहा था—‘जब तक यह निशान उसके पास है, वह उसे छू नहीं पाएगी।’”
माया का चेहरा बदल गया।
“कौन उसे छू नहीं पाएगी?”
डेनियल ने उत्तर नहीं दिया।
डायरी के आखिरी हिस्से में एक नक्शा था।
नक्शे में जंगल, पहाड़ी रास्ता और एक हवेली दिखाई दे रही थी।
माया ने नक्शा मेज पर फैलाया।
“हमें वहां जाना होगा।”
डेनियल ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारी मां ने साफ कहा था कि वहां मत जाना।”
“और अगर मुझे जानना हो कि उन्होंने मुझे क्यों रोका?”
डेनियल ने उसकी तरफ देखा।
“तब भी नहीं।”
माया ने उसकी आंखों में देखा।
“डेनियल, मेरी मां ने अपनी पूरी जिंदगी मुझसे कुछ छिपाया। अब वह मर चुकी हैं। मेरे पास सवाल हैं और जवाब सिर्फ उस घर में हैं।”
डेनियल ने लंबी सांस ली।
“ठीक है।”
वह खड़ा हुआ।
“लेकिन हम अकेले नहीं जाएंगे।”
---
तीसरे व्यक्ति को उन्होंने उसी शाम ढूंढ लिया।
डॉ. एलियास वार्ड।
एक ऐसा आदमी जिसने बीस साल अलौकिक घटनाओं की जांच में बिताए थे।
उसका कार्यालय लंदन के पुराने हिस्से में एक संकरी गली के भीतर था। बाहर कोई नामपट्ट नहीं था। दरवाजे पर सिर्फ एक पीतल का छोटा चिह्न लगा था, जिस पर आंख के भीतर बना हुआ एक वृत्त दिखाई देता था।
एलियास ने डायरी देखी।
उसका चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।
“यह तुम्हें कहां मिली?”
माया ने जवाब दिया,
“मेरी मां के पास।”
एलियास ने धीरे से डायरी बंद कर दी।
“तुम्हारी मां ब्लैकवेल के बारे में कितना जानती थीं?”
“शायद आपसे ज्यादा।”
एलियास ने उसकी तरफ देखा।
फिर उसने एक पुरानी तस्वीर मेज पर रखी।
तस्वीर में पांच लोग एक हवेली के सामने खड़े थे।
पीछे वही ब्लैकवेल मैनर था।
माया ने तस्वीर उठाई।
“आप यहां हैं।”
एलियास चुप रहा।
तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
17 अक्टूबर 2004।
माया ने पूछा,
“यह कब की है?”
“बाईस साल पहले।”
“आप यहां क्यों आए थे?”
एलियास ने कहा,
“हम पांच लोग थे।”
“और?”
“मैं अकेला वापस आया।”
डेनियल ने पूछा,
“बाकी चार लोगों का क्या हुआ?”
एलियास ने खिड़की की तरफ देखा।
“तीन लोग हवेली के भीतर गायब हुए। चौथा मेरे साथ बाहर आया था।”
“फिर?”
“वह रास्ते में मर गया।”
“कैसे?”
एलियास ने अपनी उंगलियां मेज पर रखीं।
“उसने कहा था कि कोई उसके भीतर सांस ले रहा है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
माया ने तस्वीर को फिर देखा।
पांच लोगों में से एक महिला का चेहरा खरोंचा हुआ था।
“इसका चेहरा किसने मिटाया?”
एलियास ने कहा,
“उसने खुद।”
“क्यों?”
“क्योंकि हवेली से बाहर आने के बाद वह हर आईने में अपना चेहरा नहीं, किसी और का चेहरा देखती थी।”
माया ने पूछा,
“वह कौन थी?”
एलियास ने उत्तर नहीं दिया।
उसने सिर्फ इतना कहा,
“अगर हम ब्लैकवेल जाएंगे, तो वहां किसी भी आईने में ज्यादा देर तक मत देखना।”
---
दो दिन बाद तीनों ब्लैकवेल गांव पहुंचे।
गांव छोटा था।
इतना शांत कि अपनी गाड़ी के इंजन की आवाज भी असामान्य लग रही थी।
सड़क के दोनों ओर पुराने पत्थर के घर थे। कई खिड़कियों पर मोटे पर्दे लगे थे। कुछ घरों के दरवाजों पर सूखे हुए पौधे और लोहे के छोटे ताबीज लटके थे।
गांव के बीचोंबीच एक पुराना चर्च था, जिसकी घंटी टूटी हुई थी।
डेनियल ने गाड़ी धीमी की।
“यहां लोग रहते भी हैं?”
एलियास ने कहा,
“रहते हैं। लेकिन सूर्यास्त के बाद कोई बाहर नहीं निकलता।”
“क्यों?”
“क्योंकि ब्लैकवेल मैनर के आसपास की जमीन रात में सुरक्षित नहीं रहती।”
एक बूढ़ा आदमी सड़क किनारे बैठा था।
उसकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष रही होगी। उसने मोटा ऊनी कोट पहन रखा था और हाथ में लकड़ी की छड़ी थी।
डेनियल ने गाड़ी रोक दी।
“ब्लैकवेल मैनर किस रास्ते है?”
बूढ़े ने उनकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में अचानक डर आ गया।
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर उसने सिर्फ एक बात कही—
“सूरज डूबने से पहले लौट जाना।”
माया ने पूछा,
“क्यों?”
बूढ़ा खड़ा हुआ।
“क्योंकि अंधेरा होने के बाद रास्ता बदल जाता है।”
“आपको हवेली के बारे में क्या पता है?”
बूढ़े ने माया को ध्यान से देखा।
उसकी नजर माया की चांदी की अंगूठी पर टिक गई।
वह एक कदम पीछे हट गया।
“तुम्हें यह किसने दी?”
माया ने अंगूठी छिपा ली।
“मेरी मां ने।”
बूढ़े के चेहरे का रंग उड़ गया।
“तुम कार्टर की बेटी हो?”
माया ने चौंककर पूछा,
“आप मेरी मां को जानते थे?”
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह सड़क के किनारे बने एक छोटे से घर की ओर बढ़ गया।
दरवाजे तक पहुंचकर उसने पीछे मुड़कर कहा,
“अगर हवेली में कोई तुम्हारी मां की आवाज में तुम्हें पुकारे, तो जवाब मत देना।”
फिर उसने दरवाजा बंद कर लिया।
डेनियल ने हंसने की कोशिश की।
“बहुत बढ़िया स्वागत है।”
लेकिन एलियास हंस नहीं रहा था।
वह सड़क के उस पार जंगल की तरफ देख रहा था।
“हमें जल्दी करना होगा।”
---
शाम होने से पहले वे हवेली तक पहुंच गए।
ब्लैकवेल मैनर विशाल था।
काले पत्थरों से बनी दीवारें।
टूटी हुई मूर्तियां।
जंग लगा लोहे का गेट।
और उसके पीछे एक लंबा रास्ता, जो पेड़ों के बीच गायब हो रहा था।
हवा बिल्कुल बंद थी।
फिर भी गेट अपने आप हिलने लगा।
क्रीईईक।
माया ने धीरे से पूछा,
“इसे किसी ने खोला?”
डेनियल ने गेट देखा।
“नहीं।”
गेट पूरी तरह खुल गया।
तीनों अंदर चले गए।
जैसे ही माया ने पहला कदम हवेली के रास्ते पर रखा, उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“तुम आ गई।”
माया तुरंत पीछे मुड़ी।
कोई नहीं था।
“क्या हुआ?” डेनियल ने पूछा।
“कुछ नहीं।”
लेकिन वह झूठ बोल रही थी।
उसने साफ आवाज सुनी थी।
रास्ते के दोनों ओर लाल गुलाब खिले थे। उनकी पंखुड़ियों पर बारिश की बूंदें थीं, लेकिन कुछ फूलों से लाल तरल टपक रहा था।
माया ने एक फूल के पास जाकर देखा।
वह खून था।
उसने हाथ पीछे खींच लिया।
एलियास ने कहा,
“इन फूलों को मत छूना।”
“क्यों?”
“क्योंकि यहां जो चीजें जीवित दिखाई देती हैं, वे जरूरी नहीं कि जीवित हों।”
हवेली के मुख्य दरवाजे पर एक अजीब निशान बना था।
वही निशान जो डायरी में था।
एलियास ने उसे देखते ही कहा,
“इसे मत छूना।”
“क्यों?”
“यह ताला नहीं है।”
माया ने पूछा,
“तो क्या है?”
एलियास ने धीमे स्वर में कहा,
“सीमा।”
“किसके बीच?”
“हमारी दुनिया और उस दुनिया के बीच, जहां से वह आई है।”
डेनियल ने उसकी तरफ देखा।
“आपने पहले कभी यह बात नहीं बताई।”
“क्योंकि मुझे उम्मीद थी कि हमें यहां लौटना नहीं पड़ेगा।”
दरवाजा अचानक खुल गया।
तीनों जम गए।
अंदर अंधेरा था।
माया ने टॉर्च जलाई।
विशाल हॉल दिखाई दिया।
पुराना झूमर।
दीवारों पर परिवार के चित्र।
एक लंबी सीढ़ी।
और सबसे आखिर में—
एक बंद दरवाजा।
माया की नजर उसी पर टिक गई।
उसने महसूस किया कि वह दरवाजा उसे देख रहा है।
अचानक एक तस्वीर दीवार से गिर गई।
धड़ाम।
माया ने उसे उठाया।
तस्वीर में एक छोटी लड़की थी।
लगभग दस साल की।
पीछे वही हवेली।
और नीचे लिखा था—
एवलीन ब्लैकवेल — 1899।
माया की सांस अटक गई।
लड़की की आंखें तस्वीर में सीधे कैमरे की तरफ थीं।
लेकिन अगले ही पल माया को कुछ अजीब दिखाई दिया।
तस्वीर में लड़की मुस्कुरा रही थी।
माया ने पलक झपकाई।
अब लड़की मुस्कुरा नहीं रही थी।
उसका चेहरा डर से भरा था।
और उसके पीछे किसी काले साए की आकृति खड़ी थी।
माया ने तस्वीर छोड़ दी।
एलियास ने उसे उठाया।
उसने तस्वीर देखते ही कहा,
“यह असंभव है।”
“क्या?”
“यह तस्वीर उस समय की तकनीक से नहीं ली जा सकती।”
डेनियल ने पूछा,
“क्यों?”
एलियास ने तस्वीर के पीछे देखा।
वहां तारीख थी।
17 अक्टूबर 2026।
माया का दिल रुक गया।
“लेकिन आज की तारीख भी यही है।”
उसी क्षण हवेली के अंदर लगी सारी घड़ियां एक साथ चलने लगीं।
टिक।
टिक।
टिक।
फिर सभी घड़ियां एक ही समय पर रुक गईं।
3:17।
और बंद दरवाजे के पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—
“माया...”
माया जम गई।
आवाज फिर आई।
इस बार ज्यादा साफ।
“माया... मुझे बाहर निकालो।”
डेनियल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम यहां से जा रहे हैं।”
लेकिन जैसे ही वे मुख्य दरवाजे की ओर मुड़े—
वह दरवाजा गायब था।
जहां दरवाजा होना चाहिए था, वहां सिर्फ पत्थर की दीवार थी।
डेनियल ने दीवार पर हाथ मारा।
“यह क्या मजाक है?”
एलियास पीछे हट गया।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
माया ने पूछा,
“आपको क्या हुआ?”
एलियास ने बंद दरवाजे की ओर देखा।
फिर कहा—
“अब इसे पता चल गया है कि तुम कौन हो।”
“किसे?”
एलियास ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि बंद दरवाजे के नीचे से धीरे-धीरे काला पानी बाहर आने लगा था।
और उस पानी पर एक शब्द लिखा था—
स्वागत है|
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