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भाग पाँच — पुड़िया

Pretika · Village Horror · 4 मिनट

हमने उसी रात, वहीं, फ़्रेम उखाड़ा। पप्पू ने उसे अपने गमछे में लपेटा... ख़ून से भीगे गमछे में। और पुल के किनारे से नीचे, जहाँ जानवरों का रास्ता है, नाले में फेंक दिया। अँधेरे में। बिना पीछे देखे।
नागपुर पहुँचकर पप्पू के हाथ में चौदह टाँके आए। मैंने गाड़ी सेठ के हवाले की... और घर चला गया।
एक महीना बुख़ार में पड़ा रहा। रात को सो नहीं पाता था। रेखा पूछती थी, क्या हुआ... मैं कहता, कुछ नहीं, थकान है। पर वो सब समझती थी। पूरी-पूरी रात मेरे सिरहाने बैठी रहती। और अनुराग भाई... इतने सालों में पहली बार... मैंने उसे देखा। ठीक से देखा। जैसे पहली बार देख रहा हूँ।
उस एक महीने मेरे घर में एक भी शीशा खुला नहीं था। रेखा ने ड्रेसिंग टेबल का शीशा भी कपड़े से ढक दिया था, मेरे कहने पर। उसने कुछ पूछा नहीं। बस ढक दिया।
फिर धीरे-धीरे ठीक हुआ। पैसे की ज़रूरत थी, तो गाड़ी पर लौट आया। सेठ से नया रूट माँग लिया। अब मैं राजस्थान की तरफ़ चलाता हूँ। सिवनी की तरफ़ मुँह भी नहीं करता।
पप्पू... पप्पू ने मेरा साथ छोड़ दिया था। मैंने बुरा नहीं माना। उस रात के बाद कोई भी छोड़ देता। फिर पता चला कि उसने लाइसेंस बनवा लिया है। ख़ुद ड्राइवर बन गया है। एक दिन उसका फ़ोन आया, बहुत ख़ुश था। बोला, 'उस्ताद, आपसे ही सीखा है सब।'
मैंने पूछा, 'कौन सा रूट मिला?'
थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, 'नागपुर साइड, उस्ताद।'
मैंने कहा, 'पप्पू, उधर मत चला।'
वो हँसा। 'अरे उस्ताद, अब काहे का डर। वो तो टूट गई।'
फिर उसने एक बात कही... हल्के में, जैसे यूँ ही... पर मेरा ख़ून जम गया।
'उस्ताद... आजकल रात को गाड़ी चलाते वक़्त एक गाना सा दिमाग़ में बजता रहता है। पता नहीं कहाँ सुना। बोल याद नहीं... बस धुन।'
और उसने फ़ोन पर गुनगुनाया।
वही धुन थी भाई।
ये पिछले महीने की बात है।
दस दिन पहले मेरे पास सिवनी पुलिस का फ़ोन आया। बोले, पप्पू के फ़ोन में आपका नंबर 'उस्ताद' नाम से सेव है... आप आ जाइए।
पप्पू की गाड़ी... पेंच वाली सड़क पर खड़ी मिली थी। उसी जगह, उसी रेलिंग के पास, जहाँ हमारी गाड़ी रुकी थी। इंजन चालू। डीज़ल ख़त्म होने तक चलता रहा। केबिन अंदर से बंद।
पप्पू कहीं नहीं था।
उसकी गाड़ी का बायाँ शीशा... नया था। कंपनी वाला। एकदम ठीक-ठाक।
पर एक पुलिस वाला, जवान सा लड़का, मुझे एक तरफ़ ले जाकर धीरे से बोला... 'भैया, एक बात बोलूँ? हमने केबिन की फ़ोटो खींची थीं। बाएँ शीशे वाली फ़ोटो में बगल की सीट पर कोई बैठा दिख रहा है। दुबला सा लड़का। मुस्कुराता हुआ। पर सीट तो ख़ाली थी। हमने सोचा कैमरे की गड़बड़ है।'
उसने फ़ोटो नहीं दिखाई। मैंने माँगी भी नहीं।
पप्पू के घर में ढंग का कोई है नहीं। तो उसका सामान पुलिस ने मुझे दे दिया। एक बैग। कुछ कपड़े। एक फ़ोन, जो अब चालू नहीं होता। और उसका बटुआ।
बटुए में उसका लाइसेंस था। उसकी माँ की एक पुरानी फ़ोटो। और एक पुड़िया। अख़बार में लिपटी हुई।
मैंने खोली।
उसमें काँच का एक छोटा सा टुकड़ा था। अँगूठे के नाख़ून जितना। किनारों पर सूखा हुआ भूरा ख़ून।
पप्पू ने उस रात... जब फ़्रेम फेंका था... एक टुकड़ा अपने पास रख लिया था। पता नहीं क्यों। शायद निशानी समझकर। या शायद... किसी ने उससे कहा हो रखने को।
अनुराग भाई, मैंने आपको ये सब इसलिए लिखा है... क्योंकि मुझे नहीं पता अब मैं क्या करूँ।
वो टुकड़ा इस वक़्त मेरे सामने रखा है। मेरे ट्रक के डैशबोर्ड पर। मैं उसे फेंक नहीं पा रहा। तीन बार खिड़की से बाहर फेंकने के लिए हाथ उठाया... तीनों बार हाथ हवा में ही रुक गया।
और कल रात... जयपुर वाले हाईवे पर... मैंने ग़लती से उस टुकड़े में झाँक लिया।
इतने छोटे टुकड़े में बहुत कुछ नहीं दिखता। बस थोड़ा सा। एक कोना।
मेरी बगल वाली सीट का एक कोना।
और उस पर रखी एक कलाई।
लाल चूड़ियों वाली।
और उसके बगल में... एक दूसरी कलाई। पतली सी। चौदह टाँकों के निशान वाली।
दोनों धीरे-धीरे... मेरी तरफ़ बढ़ रही थीं।
केबिन में मोगरे की ख़ुशबू है, अनुराग भाई।
अभी। इसी वक़्त। जब मैं ये लिख रहा हूँ।
मेरे दोनों हाथ फ़ोन पर हैं...
और गाड़ी... साठ पर चल रही है।

Writer
Pretika
Story
एक ट्रक ड्राइवर की आपबीती
Chapter
5 of 5
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
698
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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