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भाग चार — पेंच का जंगल

Pretika · Village Horror · 6 मिनट

उसके बाद वाला चक्कर... आख़िरी था।
पप्पू ने उस बार साथ आने से मना कर दिया था। फिर पता नहीं क्या सोचकर आ गया। बोला, 'उस्ताद, तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।' वो बिट्टू पाजी से एक लोहे का पाना माँगकर लाया था। बड़ा, भारी पाना। उसे अपनी बर्थ में तकिये के नीचे रख लिया।
मुझसे कहा, 'आज रात मैं सोऊँगा नहीं।'
सिवनी पार करते-करते रात का डेढ़ बज गया। पप्पू पीछे बैठा जागने की कोशिश करता रहा... पर पता नहीं उस रात की हवा में क्या था। उसकी पलकें भारी होती गईं, और आख़िर वो एक तरफ़ लुढ़क गया। मैंने पलटकर देखा... वो सो रहा था। ऐसी गहरी नींद में... जैसे किसी ने सुला दिया हो।
साठ पार। शीशे में... लाल रंग।
पर इस बार वो सीट पर नहीं थी।
इस बार वो... मेरी गोद में थी।
शीशे में मैं साफ़ देख रहा था। वो मेरी तरफ़ मुँह करके बैठी थी। उसकी बाँहें मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द। उसका माथा मेरे माथे से लगा हुआ। और मुझे... उसका वज़न महसूस हो रहा था। उसकी कमर की गर्मी। उसकी साँसें मेरे होंठों पर। और उसकी धड़कन...
नहीं। धड़कन नहीं थी।
वही सबसे अजीब बात थी भाई। इतनी पास... इतनी गर्म... और सीने में कोई धड़कन नहीं। जैसे कोई ख़ाली कमरा हो, जिसमें आग जल रही हो।
मैंने सामने सड़क पर ध्यान लगाने की कोशिश की। हेडलाइट में गीली सड़क, दोनों तरफ़ जंगल, दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं। मेरी आँखें सड़क पर थीं... पर दिमाग़ शीशे में था। और फिर...
स्टेयरिंग भारी हो गया।
ऐसा लगा जैसे पावर स्टेयरिंग फ़ेल हो गया हो। मैंने ज़ोर लगाया... स्टेयरिंग मेरी मर्ज़ी से नहीं घूम रहा था। वो अपनी मर्ज़ी से घूम रहा था। हल्के-हल्के। हर मोड़ के साथ। एकदम सही।
मैंने शीशे में देखा।
शीशे में मेरे हाथ स्टेयरिंग पर नहीं थे।
शीशे में... मेरे हाथ उसकी पीठ पर थे। और स्टेयरिंग पर... उसके हाथ थे। लाल चूड़ियों वाले।
मैंने नीचे देखा। असली में। अपनी आँखों से। मेरे हाथ स्टेयरिंग पर ही थे। पर मैं उन्हें महसूस नहीं कर पा रहा था। जैसे वो मेरे हाथ नहीं, किसी और के हों। सुन्न। लकड़ी जैसे।
स्पीडोमीटर... अस्सी। पचासी। नब्बे।
चावल से लदी गाड़ी, नब्बे पर... और मेरा पैर? मेरा पैर एक्सीलरेटर पर दबा था, और मैं उसे उठा नहीं पा रहा था।
तब मैंने शीशे में पीछे देखा। उसके कंधे के ऊपर से। जहाँ पीछे की सड़क दिखनी चाहिए थी।
अनुराग भाई... वहाँ सड़क थी। पर वो पेंच वाली सड़क नहीं थी।
वो एक लंबी, सीधी, काली सड़क थी... जिसका कोई अंत नहीं था। और उसके दोनों तरफ़... ट्रक खड़े थे। क़तार में। पुराने ट्रक। कुछ इतने पुराने कि वैसे मॉडल अब बनते भी नहीं। गोल नाक वाले, लकड़ी की बॉडी वाले... सबके केबिन की बत्ती जल रही थी। पीली, बीमार सी रोशनी।
और हर केबिन में... कंडक्टर सीट पर... एक आदमी बैठा था।
सीधा। हाथ घुटनों पर। जैसे कोई सवारी हो।
सबके चेहरे मेरी तरफ़ थे। और सब... मुस्कुरा रहे थे। ठीक वैसी मुस्कान... जो उसने पहली रात मुझे दी थी। आँखें सफ़ेद। पुतलियाँ नहीं।
और ड्राइवर सीट... हर ट्रक की ड्राइवर सीट... ख़ाली थी।
तब मुझे समझ आया भाई। वो ड्राइवर ग़ायब नहीं हुए थे। वो सवारी बन गए थे। हमेशा के लिए। उसकी सवारी। और वो... वो उन सबकी गाड़ी चलाती थी। एक-एक करके। उस कभी न ख़त्म होने वाली सड़क पर।
उसने मेरे कान में कहा... बहुत प्यार से... जैसे कोई बीवी अपने पति को मना रही हो...
'दिलीप... बस एक बार रोक दे। यहीं। किनारे लगा दे। फिर हम हमेशा साथ चलेंगे। फिर तू कभी अकेला नहीं रहेगा। कभी नहीं।'
बिट्टू पाजी की बात कान में गूँजी... जिस दिन वो ख़ुद रुकने को कहे...
और भगवान क़सम भाई... उस पल मेरा मन किया कि रोक दूँ।
इतना मन किया, जितना ज़िंदगी में किसी चीज़ के लिए नहीं किया। वो वादा... कभी अकेला नहीं... बारह साल की उन सारी रातों के बाद... मेरा पैर अपने आप एक्सीलरेटर से उठने लगा। जो अब तक नहीं उठ रहा था... अब ख़ुद-ब-ख़ुद उठने लगा। धीरे-धीरे ब्रेक की तरफ़ सरकने लगा।
स्पीड गिरने लगी। सत्तर। साठ।
और साठ से नीचे आते ही... शीशे में मैंने देखा...
वो अब मेरी गोद में नहीं थी।
वो ड्राइवर सीट पर थी। स्टेयरिंग पकड़े।
और मैं... शीशे में... कंडक्टर सीट पर बैठा था। सीधा। हाथ घुटनों पर।
मुस्कुराता हुआ।
मेरी अपनी शक्ल। मेरी अपनी मुस्कान। और मेरी आँखें... सफ़ेद होने लगी थीं।
पचास। चालीस।
मैंने चीख़ने की कोशिश की... आवाज़ नहीं निकली। मुँह में मोगरे का स्वाद था। मीठा। सड़ा हुआ मीठा।
तीस।
और तभी... पीछे से... पप्पू की आवाज़ आई।
'उस्ताद!'
वो जाग गया था। शायद गाड़ी के झटकों से... शायद किसी और वजह से... मुझे आज तक नहीं पता। उसने आगे झाँककर देखा। पहले मुझे देखा... फिर मेरी नज़र का पीछा करते हुए बाएँ शीशे को।
उसने बाद में बताया, उसे शीशे में कुछ नहीं दिखा। बस मेरी आँखें दिखीं... जो सफ़ेद हो रही थीं। और मेरे होंठ... जो मुस्कुरा रहे थे। एक ऐसी मुस्कान में, जो मेरी नहीं थी।
मैं बस एक शब्द बोल पाया। पूरी ताक़त लगाकर। जैसे गले से ख़ून निकालकर बोल रहा हूँ।
'शीशा...'
पप्पू ने तकिये के नीचे से पाना निकाला। खिड़की नीचे की। आधा बाहर लटक गया... चलती गाड़ी से... और पूरी ताक़त से पाना घुमाया।
छन्न्न्न्न...
वो आवाज़ अनुराग भाई... मैं मरते दम तक नहीं भूलूँगा। वो काँच टूटने की आवाज़ नहीं थी। वो एक चीख़ थी। एक औरत की लंबी चीख़... और उसके पीछे... सैकड़ों आदमियों की आवाज़ें। एक साथ। जैसे किसी ने बरसों से बंद एक भरा हुआ कमरा अचानक खोल दिया हो।
स्टेयरिंग एकदम हल्का हो गया। मेरे हाथ... फिर से मेरे हो गए। मैंने पूरी ताक़त से ब्रेक दबाया। गाड़ी घिसटती हुई, चीख़ती हुई, बाईं तरफ़ लोहे की रेलिंग से रगड़ खाती हुई... चिंगारियाँ उड़ाती हुई... रुक गई।
सन्नाटा।
सिर्फ़ इंजन की धड़-धड़। और जंगल में कहीं दूर... किसी जानवर की लंबी सी आवाज़।
केबिन में मोगरे की ख़ुशबू नहीं थी अब। सिर्फ़ डीज़ल। और ख़ून की गंध।
पप्पू का दायाँ हाथ काँच से कट गया था। कलाई से लेकर कोहनी तक। ख़ून टपक रहा था। पर वो रो नहीं रहा था। वो बस टूटे शीशे के उस फ़्रेम को देख रहा था, जो अब भी बाहर लटक रहा था।
उस फ़्रेम में काँच के कुछ टुकड़े अटके रह गए थे।
और हर टुकड़े में... एक आँख थी। काली। हमें घूरती हुई।
फिर एक-एक करके... वो आँखें बंद होती गईं।

Writer
Pretika
Story
एक ट्रक ड्राइवर की आपबीती
Chapter
4 of 5
Category
Village Horror
Reading time
6 min
Words
1052
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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