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भाग तीन — नाम
Pretika · Village Horror · 6 मिनट
हैदराबाद में माल उतरा। वापसी का लोड मिला... चावल। हैदराबाद से कानपुर। मतलब फिर वही रास्ता। फिर वही जंगल।
और अनुराग भाई... अब मैं आपको वो बताने वाला हूँ जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। रेखा को भी नहीं।
मैं उस रात का इंतज़ार करने लगा।
दिन में गाड़ी चलाने में मन नहीं लगता था। दोपहर को ढाबों पर रुक-रुककर सो लेता। और शाम ढलते ही... एक बेचैनी शुरू हो जाती। जैसे कोई नशा हो। जैसे... घर लौट रहा हूँ।
दूसरी रात वो फिर आई। साठ के पार। उसी सीट पर।
इस बार वो सामने नहीं देख रही थी। वो शुरू से मुझे देख रही थी। और थोड़ी पास बैठी थी... सीट के बीच की तरफ़ खिसकी हुई। उसकी साड़ी का पल्लू... शीशे में... गियर लीवर पर गिरा हुआ था।
मैंने गियर बदला। मेरा हाथ उस पल्लू के बीच से होकर गया। वहाँ कुछ नहीं था। हवा थी बस। पर उँगलियों पर... रेशम जैसी एक छुअन रह गई। देर तक।
तीसरी रात उसने मेरे कंधे पर सिर रखा।
शीशे में। सिर्फ़ शीशे में।
पर कंधे पर वज़न था भाई। हल्का सा। गर्म। और गर्दन पर... साँस। मोगरे वाली साँस। धीमी, लंबी... जैसे कोई नींद में करवट ले रहा हो। मेरे कान के पास उसके होंठ थे... मैं महसूस कर रहा था... और वो कुछ गुनगुना रही थी। कोई पुराना सा गीत। बोल समझ नहीं आते थे... बस धुन। एक ऐसी धुन जो कानों से नहीं, सीधे नसों में उतरती थी।
मैं बता नहीं सकता उस वक़्त मेरा क्या हाल था। बारह साल की तन्हाई... महीनों की दूरी... और एक औरत जो सिर्फ़ मेरे लिए आती थी। अँधेरे में। जंगल के बीच। जो कुछ माँगती नहीं थी, कोई शिकायत नहीं करती थी... किसी किस्त, किसी उधार, किसी डॉक्टर की बात नहीं करती थी। बस... चाहती थी। मुझे।
चौथी रात उसका हाथ मेरी जाँघ पर था।
शीशे में देखा... उसकी उँगलियाँ। लंबी, पतली। कलाई में काँच की लाल चूड़ियाँ। धीरे-धीरे ऊपर सरकती हुईं। और मेरी जाँघ पर... वो छुअन। असली। इतनी असली कि एक्सीलरेटर पर मेरा पैर काँप गया, और गाड़ी एक बार लहरा गई।
उसने शीशे में मुझे टेढ़ी नज़र से देखा... और अपने होंठों पर उँगली रख दी। जैसे कह रही हो... धीमे मत होना। रुकना मत।
तब तक मैं समझ गया था... ये उसका नियम था। जब तक पहिया घूम रहा है... वो मेरी है। जिस पल गाड़ी रुकी... वो ग़ायब।
तो मैंने रुकना छोड़ दिया।
रात भर चलाता था। चाय के लिए नहीं रुकता, पेशाब के लिए नहीं रुकता। पप्पू बार-बार कहता, 'उस्ताद, आँखें लाल हो रही हैं। सो जाओ। मैं गाड़ी किनारे लगा दूँ?' मैं उस पर चिल्ला देता।
और फ़ोन... रेखा का फ़ोन रोज़ रात ग्यारह बजे के आसपास आता था। शादी को आठ साल हुए, आठ साल से रोज़। मैंने उठाना बंद कर दिया। रिंग बजती रहती... बजती रहती... और शीशे में वो मुस्कुराती रहती। जैसे कोई बाज़ी जीत गई हो।
एक रात पप्पू पीछे से उठकर आया, पानी पीने। और मुझे देखकर वहीं रुक गया।
बाद में उसने बताया... 'उस्ताद, तुम बगल वाली ख़ाली सीट से बात कर रहे थे। धीरे-धीरे। और मुस्कुरा रहे थे। तुम्हारा बायाँ हाथ हवा में ऐसे चल रहा था... जैसे किसी के बाल सहला रहे हो।'
मैंने कहा, 'सपना देखा होगा तूने।'
पर पप्पू डर गया था। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था।
अगले चक्कर में... खवासा के पास एक पंजाबी ढाबा है। वहाँ एक पुराने ड्राइवर रहते हैं... बिट्टू पाजी। सत्तर के होंगे। चालीस साल गाड़ी चलाई, अब उसी ढाबे पर चारपाई डालकर पड़े रहते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हैं, और नए लड़कों को रास्ते की कहानियाँ सुनाते हैं।
पप्पू मुझसे छिपकर उनके पास गया। सब बता दिया। फिर बिट्टू पाजी ने मुझे बुलवाया।
मैं गया। चारपाई के किनारे बैठा। पाजी ने बहुत देर तक मुझे देखा। मेरी आँखें, मेरे काँपते हाथ। फिर बिना कुछ पूछे बोले...
'शीशा कहाँ से लगवाया?'
मेरा गला सूख गया। 'लखनादौन। सलीम चाचा से।'
पाजी ने लंबी साँस ली। हुक्के की गुड़गुड़ाहट रुक गई।
'सलीम ने बताया नहीं तुझे? ...नहीं बताएगा। वो उस शीशे को अपने पास छुपाकर रखता है, ताकि किसी के हाथ न लगे। पर हर दो-तीन साल में कोई मजबूर ड्राइवर आधी रात को आ ही जाता है... और उस रात सलीम के पास कोई दूसरा शीशा होता ही नहीं। या शायद... शीशा ख़ुद चाहता है कि उसे लगाया जाए।'
मैंने पूछा, 'कौन है वो पाजी?'
पाजी ने कंधे उचकाए। 'किसी को नहीं पता पुत्तर। कोई कहता है कोई सवारी थी, जिसे कभी किसी ड्राइवर ने रास्ते में... ख़ैर। कोई कहता है वो कभी औरत थी ही नहीं। हम पुराने ड्राइवर उसे बस... बाएँ शीशे वाली कहते हैं। पिछले तीस साल में मैंने चार गाड़ियाँ देखी हैं, जो उस जंगल वाली सड़क पर खड़ी मिलीं। इंजन चालू। डीज़ल ख़त्म होने तक चलता रहा। केबिन अंदर से बंद। और ड्राइवर... ग़ायब।'
'और बाएँ शीशे में?' मैंने पूछा। पता नहीं क्यों पूछा।
पाजी ने सीधे मेरी आँखों में देखा। 'पुलिस वाले कहते थे... शीशे में बगल वाली सीट पर कोई बैठा दिखता है। एक मर्द। मुस्कुराता हुआ। पर सीट ख़ाली होती है।'
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। ठीक वैसे ही जैसे सलीम चाचा ने पकड़ा था।
'सुन। तीन बातें याद रख। एक... वो कुछ भी पूछे, उसे अपना नाम मत बताना। दो... जिस दिन वो ख़ुद तुझसे गाड़ी रोकने को कहे... समझ ले वो तेरी सीट लेने आई है। उस दिन मरते दम तक मत रोकना। और तीन... अगर उतार नहीं पा रहा, तो तोड़ दे। पर अपने हाथ से नहीं। किसी और के हाथ से। जिसका उससे कोई लेना-देना न हो।'
उस रात मैंने तय कर लिया था कि शीशा उतार दूँगा।
अनुराग भाई... मैंने नहीं उतारा।
रात के दो बजे थे। जंगल के बीच। वो शीशे में मेरी गोद की तरफ़ झुकी हुई थी। उसके खुले बाल मेरी बाँह पर फिसल रहे थे। साड़ी कंधे से सरकी हुई थी... और उसकी साँसें तेज़ थीं। मेरी साँसों के साथ-साथ। और पहली बार... उसने कुछ बोला। गुनगुनाहट नहीं... शब्द। मेरे कान में। एकदम पास से।
'तेरा नाम क्या है?'
उसकी आवाज़... भीगी हुई थी। जैसे किसी गहरे कुएँ के अंदर से कोई बोल रहा हो।
मुझे पाजी की बात याद थी। पूरी की पूरी याद थी।
और मैंने कहा...
'दिलीप।'
उसी पल... शीशे में... उसकी मुस्कान पूरी खुल गई। इतनी कि उसके दाँत दिखे। और उसने मेरा नाम दोहराया। धीरे से। रुक-रुककर। जैसे कोई मिठाई चख रही हो।
'दि... लीप।'
अगली सुबह रेखा का फ़ोन आया। मैंने उठाया। इस बार उठा लिया। वो रो रही थी।
बोली, 'तुमने रात को ढाई बजे फ़ोन किया था। मैंने उठाया तो तुम्हारी ही आवाज़ थी... पर तुम कोई अजीब सा गाना गा रहे थे। और फिर बोले... रेखा, अब मैं घर आऊँगा तो अकेला नहीं आऊँगा। हम दोनों आएँगे। ...दिलीप, किसके साथ आ रहे हो तुम?'
मैंने कॉल लॉग खोला।
रात दो बजकर इकतीस मिनट। रेखा को आउटगोइंग कॉल। चार मिनट।
उस वक़्त मेरे दोनों हाथ स्टेयरिंग पर थे भाई। मुझे पक्का पता है।
फ़ोन तो... डैशबोर्ड पर पड़ा था। बाईं तरफ़।
- Writer
- Pretika
- Story
- एक ट्रक ड्राइवर की आपबीती
- Chapter
- 3 of 5
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1149
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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