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भाग दो — साठ के पार
Pretika · Village Horror · 4 मिनट
लखनादौन से सिवनी तक रास्ता क़रीब साठ-सत्तर किलोमीटर का है। रात का एक बज रहा था। पप्पू पीछे बर्थ पर सो चुका था, उसके खर्राटे इंजन की आवाज़ में घुल रहे थे। बारिश रुक गई थी, पर सड़क गीली थी... हेडलाइट की रोशनी उस पर तेल की तरह फिसल रही थी।
मैं आदत से हर दस-पंद्रह सेकंड में दोनों शीशे देखता हूँ। दायाँ... फिर बायाँ। दायाँ... फिर बायाँ।
और एक बार जब बाएँ शीशे में देखा...
उसमें पीछे की सड़क नहीं थी।
उसमें... मेरे केबिन का अंदर दिख रहा था। मेरी बगल वाली सीट। कंडक्टर सीट।
और उस सीट पर... एक औरत बैठी थी।
अनुराग भाई, झूठ नहीं बोलूँगा... मेरे हाथ स्टेयरिंग पर जम गए। मैंने झटके से गर्दन घुमाई... बगल की सीट ख़ाली। एकदम ख़ाली। बस पप्पू का गमछा पड़ा था, और पानी की एक बोतल।
फिर शीशे में देखा।
वो वहीं थी।
तीस-बत्तीस की उम्र होगी। साँवला रंग। बाल खुले, गीले... जैसे अभी-अभी नहाकर आई हो। कंधों पर चिपके हुए। लाल रंग की साड़ी... वैसा ही लाल, जैसा उस कपड़े का था जिसमें शीशा लिपटा था। और वो मुझे नहीं देख रही थी। वो सामने देख रही थी... सड़क की तरफ़। जैसे कोई सवारी बैठी हो, जिसे कहीं पहुँचना हो।
मेरा पैर अपने आप ब्रेक पर चला गया। गाड़ी धीमी हुई... चालीस... तीस... बीस...
और जैसे-जैसे गाड़ी धीमी हुई... शीशे में वो धुँधली होने लगी। जैसे ठंडे काँच पर भाप से बनी तस्वीर... जो धीरे-धीरे सूख रही हो।
गाड़ी रुकी। शीशे में अब पीछे की सड़क थी। अँधेरा। एक सूखा पीपल। बस।
मैं पाँच मिनट वैसे ही बैठा रहा। दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे इंजन निकलकर सीने में आ गया हो। मैंने ख़ुद को समझाया... दिलीप, सत्रह घंटे से गाड़ी चला रहा है तू। आँखें थकी हैं। नींद है। हो जाता है।
पप्पू को नहीं उठाया। सोचा, क्या बोलूँगा... कि शीशे में औरत दिखी? वो सुबह तक पूरे ढाबे में गा-गाकर सुना देता।
गाड़ी फिर चलाई। धीरे-धीरे स्पीड बढ़ी। चालीस... पचास...
और साठ पार होते ही...
शीशे में फिर वो लाल रंग उभरने लगा।
इस बार मैंने गाड़ी नहीं रोकी। पता नहीं क्यों। शायद डर से... शायद... किसी और चीज़ से। मैं बस चलाता रहा, और हर थोड़ी देर में बाएँ शीशे में देखता रहा। अब दाएँ शीशे में देखना जैसे भूल ही गया था।
वो वहीं बैठी रही। सिवनी तक। पूरा एक घंटा।
और एक बात... जो उस रात मैंने नोटिस की... केबिन में एक ख़ुशबू थी। मोगरे की। गजरे वाली। डीज़ल और पसीने की उस बदबू के बीच... एकदम ताज़ा मोगरा। जैसे किसी ने अभी-अभी बालों में लगाया हो।
सिवनी के बाद जंगल वाला हिस्सा शुरू होता है... पेंच का। वहाँ जानवरों के लिए सड़क के नीचे से रास्ते बनाए हैं, और ऊपर पुल जैसी लंबी सड़क चलती है। उस पर रात को कोई रुकता नहीं। रुकने का मन भी नहीं करता। सिर्फ़ सन्नाटा... और दोनों तरफ़ काला, घना जंगल।
उस हिस्से में घुसते ही... उसने पहली बार गर्दन घुमाई।
शीशे में। मेरी तरफ़।
उसकी आँखें काली थीं। बहुत काली। और उनमें एक भूख थी भाई... जो मैंने किसी औरत की आँखों में कभी नहीं देखी। रेखा की आँखों में भी नहीं। जैसे कोई बरसों से प्यासा भटक रहा हो... और अचानक सामने कुआँ दिख गया हो।
वो मुस्कुराई।
और मेरी रीढ़ में एक ठंडक ऊपर से नीचे तक उतर गई... पर उसके साथ... एक गर्मी भी। ऐसी गर्मी, जिसके बारे में बताते हुए आज भी मुझे शर्म आती है।
नागपुर पहुँचते-पहुँचते सुबह के पाँच बज गए। आसमान धूसर होने लगा। और रोशनी के साथ... वो चली गई। बस पीछे की सड़क रह गई। एक आम सा शीशा।
पप्पू उठा, अंगड़ाई लेकर बोला, 'उस्ताद, पूरी रात खींच दी? कहीं रुके नहीं?'
मैंने कहा, 'नींद नहीं आई।'
उसने नाक सिकोड़ी। 'केबिन में ये कैसी ख़ुशबू है उस्ताद? किसी लेडीज़ को बिठा लिया था क्या रात में?' और ठहाका मारकर हँसने लगा।
मैं नहीं हँसा।
- Writer
- Pretika
- Story
- एक ट्रक ड्राइवर की आपबीती
- Chapter
- 2 of 5
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 638
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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