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भाग एक — लाल कपड़े में लिपटा शीशा

Pretika · Village Horror · 4 मिनट

राम राम अनुराग भाई... और राम राम उन सब भाइयों को जो ये सुन रहे हैं।
मेरा नाम दिलीप है। उम्र चौंतीस साल। झाँसी के पास बबीना से आगे एक छोटा सा गाँव है... वहीं का हूँ। बाईस साल की उम्र में स्टेयरिंग पकड़ा था, आज बारह साल हो गए। घर में बीवी है, रेखा... और बूढ़ी माँ। बच्चा अभी तक नहीं हुआ... ख़ैर, वो अलग बात है।
हम ट्रक वालों की ज़िंदगी आप लोग बाहर से देखते हो तो लगता है... आज़ादी है। खुली सड़क है, ढाबे हैं, गाने बज रहे हैं। अंदर से देखो तो... अकेलापन है भाई। महीने में पच्चीस रातें केबिन में कटती हैं। पीछे वाली बर्थ पर, पसीने और डीज़ल की गंध में। बीवी की आवाज़ फ़ोन पर सुनते हो... और फिर फ़ोन रखकर अँधेरे में लेटे रहते हो। छत को घूरते हुए।
ये बात पिछले साल अगस्त की है। बरसात चल रही थी।
मेरी गाड़ी... चौदह चक्के वाली टाटा। सेठ की गाड़ी है, पर चलाता मैं ही हूँ, तो अपनी ही लगती है। मेरे साथ खलासी था... पप्पू। उन्नीस-बीस साल का लड़का, छतरपुर का। दुबला-पतला, हर वक़्त फ़ोन में घुसा रहता, रील देखता रहता... और गाड़ी रुकते ही पीछे बर्थ पर ऐसे सो जाता जैसे बेहोश हो गया हो। पर लड़का दिल का साफ़ था। मुझे उस्ताद बोलता था।
उस बार लोड था आगरा से हैदराबाद। टाइल्स। भारी माल। रास्ता वही पुराना... ग्वालियर, झाँसी, सागर... फिर लखनादौन, सिवनी, नागपुर... और आगे।
सागर से निकले तो रात हो गई थी। लखनादौन से पहले एक जगह है जहाँ सड़क किनारे पेड़ों की डालियाँ बहुत नीचे झुकी रहती हैं। बरसात में और झुक जाती हैं, पानी के वज़न से। सामने से एक बस आई, आँखें चौंधियाती हुई लाइट मारती हुई... मैंने गाड़ी थोड़ी बाईं तरफ़ दबाई...
और... चटाक।
एक मोटी डाली सीधी बाएँ शीशे पर लगी।
बायाँ शीशा... यानी कंडक्टर साइड वाला। जो आप लोग ट्रक के बाहर लटका देखते हो, लंबा सा, लोहे के डंडे पर टँगा हुआ।
शीशा बीच से चटक गया। मकड़ी के जाले जैसा।
अब ट्रक में बायाँ शीशा न हो तो समझो आधी आँख फूट गई। ख़ासकर रात में... ओवरटेक करते वक़्त, मोड़ पर... पीछे से बाइक वाले घुस आते हैं। बिना उस शीशे के गाड़ी चलाना, मौत से खेलना है।
तो लखनादौन पहुँचकर... हाईवे के किनारे एक पुराना मिस्त्री है। उसकी दुकान क्या, एक टीन का छप्पर है। चारों तरफ़ पुराने टायर, कबाड़, टूटे बंपर, जंग खाई चेसिस। नाम था... सलीम चाचा। सफ़ेद दाढ़ी, गले में काला धागा, आँखों में सुरमा।
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। दुकान बंद थी। मैंने दो-तीन बार हॉर्न दिया, आवाज़ लगाई। सलीम चाचा लालटेन लेकर निकले, आँखें मलते हुए।
मैंने कहा, 'चाचा, बायाँ शीशा बदलना है। नया हो तो लगा दो।'
चाचा ने चटका हुआ शीशा देखा, फिर बोले, 'नया तो सुबह आएगा बेटा, नागपुर से मँगवाना पड़ेगा। अभी तो... एक पुराना पड़ा है। कबाड़ में। एकदम साफ़ है। बस... थोड़ा पुराना है।'
मैंने कहा, 'लगा दो चाचा, सुबह तक रुक नहीं सकता। सेठ जान खा जाएगा।'
चाचा अंदर गए। काफ़ी देर बाद लौटे। हाथ में एक शीशा था... कपड़े में लपेटा हुआ। और वो कपड़ा... लाल रंग का था। गहरा लाल। जैसे किसी औरत की ओढ़नी हो।
उन्होंने कपड़ा हटाया। शीशा सचमुच साफ़ था। इतना साफ़ कि लालटेन की लौ उसमें... कैसे बताऊँ भाई... ज़्यादा गहरी दिखती थी। जैसे शीशे के अंदर कोई दूसरी लालटेन जल रही हो। थोड़ी दूर। किसी और कमरे में।
मैंने पूछा, 'किस गाड़ी का है चाचा?'
चाचा थोड़ी देर चुप रहे। फिर बोले, 'छोड़ो बेटा... गाड़ी तो कबकी कट गई। शीशा बच गया था। तीन सौ दे देना।'
तीन सौ। नया शीशा बारह सौ से कम का नहीं आता। मैंने ख़ुशी-ख़ुशी लगवा लिया।
जब चाचा पेंच कस रहे थे... मैंने देखा, उनके होंठ हिल रहे थे। कुछ पढ़ रहे थे धीमे-धीमे। मुझे लगा, बूढ़े आदमी की आदत होगी।
पैसे देकर जब मैं केबिन में चढ़ने लगा... चाचा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनका हाथ बर्फ़ जैसा ठंडा था। बोले...
'बेटा... रात को गाड़ी चलाते वक़्त... बाएँ शीशे में ज़्यादा मत देखना। बस काम भर का।'
मैं हँस पड़ा। 'चाचा, शीशा देखने के लिए ही तो लगवाया है।'
वो हँसे नहीं। बस लालटेन उठाई... और अंदर चले गए। छप्पर का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। फिर कुंडी लगने की।
और उसी रात... पहली बार... मुझे वो दिखी।

Writer
Pretika
Story
एक ट्रक ड्राइवर की आपबीती
Chapter
1 of 5
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
709
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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