Pretika › Jinn & Spirits › क़ुबूल है
भाग 1
Pretika · Jinn & Spirits · 8 मिनट
मेरा नाम निकहत परवीन है, उम्र चौबीस साल है, और मैं सिवान के उस इलाक़े से हूँ जहाँ हर दूसरे घर का एक लड़का सऊदी, दुबई या क़तर में है और हर दूसरे घर की एक लड़की फ़ोन की स्क्रीन पर किसी का इंतज़ार कर रही है। हमारे यहाँ रिश्ते ऐसे ही होते हैं कि लड़का दो साल में एक बार तीस दिन की छुट्टी पर आता है, उन्हीं तीस दिनों में देखना-दिखाना, मँगनी और कभी-कभी निकाह तक निपटा दिया जाता है, और उसके बाद की पूरी मोहब्बत व्हाट्सऐप के भरोसे चलती है। मैंने बी.ए. किया है, घर पर सिलाई का काम करती हूँ, और छत पर बने एक अकेले कमरे में रहती हूँ।
मेरी मँगनी इमरान से हुई थी, जो हमारे गाँव से ग्यारह किलोमीटर दूर के रहने वाले थे और सऊदी अरब की एक कंपनी में पाइपलाइन बिछाने वाली मशीन चलाते थे। उनका कैंप शरूरा नाम के क़स्बे से भी क़रीब सवा सौ किलोमीटर आगे था, बिल्कुल उस रेगिस्तान के किनारे पर जिसे अरबी में रुब-अल-ख़ाली कहते हैं, यानी “ख़ाली चौथाई”, दुनिया का सबसे बड़ा रेत का समंदर, जहाँ सैकड़ों किलोमीटर तक न कोई पेड़ है, न कोई बस्ती, सिर्फ़ लाल रेत के टीले हैं जो छोटे पहाड़ों जितने ऊँचे हैं।
उसके बाद नौ दिन तक कोई फ़ोन नहीं आया, कोई मैसेज नहीं आया, और मेरे भेजे हुए हर वॉइस नोट पर सिर्फ़ एक टिक लगा रहा। मैंने ख़ुद को समझाया कि रेगिस्तान है, आँधी आई होगी, टावर गिर गया होगा, क्योंकि ऐसा पहले भी दो-तीन बार हो चुका था।
दसवीं रात को, ठीक एक बजकर दस मिनट पर, मेरा फ़ोन बजा।
स्क्रीन पर इमरान का ही नाम था, वही फ़ोटो थी, और जब मैंने फ़ोन उठाया तो आवाज़ भी उन्हीं की थी, लेकिन उस आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं था। वो आवाज़ पहले से धीमी थी, पहले से भारी थी, और हर लफ़्ज़ के बीच इतना ठहराव था जैसे बोलने वाला हर लफ़्ज़ को पहले अपने मुँह में रखकर चख रहा हो और फिर मुझे दे रहा हो।
उन्होंने सलाम नहीं किया, खाना नहीं पूछा, अब्बा की तबीयत नहीं पूछी। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “निकहत… तुम्हारी हँसी में एक जगह साँस टूटती है, सातवें सेकंड पर, और मैं नौ दिन से उसी जगह पर रुका हुआ हूँ।”
मैं सच बताऊँ तो उस एक लाइन ने मेरे साथ वो कर दिया जो पौने दो साल की मँगनी नहीं कर पाई थी। मुझे लगा कि इतने दिन की दूरी और उस सन्नाटे ने मेरे चुप रहने वाले मँगेतर के अंदर से कोई और ही आदमी बाहर निकाल दिया है, और मुझे वो आदमी अच्छा लगा, ज़रूरत से बहुत ज़्यादा अच्छा लगा।
उस रात के बाद फ़ोन हर रात आने लगा और जुम्मे का इंतज़ार ख़त्म हो गया। वो हमेशा आधी रात के बाद फ़ोन करते थे, और फ़ोन तब तक नहीं कटता था जब तक हमारी मस्जिद से फ़ज्र की, यानी सुबह की पहली, अज़ान शुरू नहीं हो जाती थी, और अज़ान का पहला लफ़्ज़ हवा में आते ही लाइन ऐसे कट जाती थी जैसे किसी ने बीच से तार खींच लिया हो। उन्होंने कभी ख़ुद से नहीं कहा कि अच्छा रखता हूँ। उन्हें कभी नींद नहीं आई, कभी जम्हाई नहीं आई, कभी खाँसी तक नहीं आई, और पीछे से हमेशा, हर रात, एक ही आवाज़ आती रहती थी, तेज़ चलती हुई सूखी हवा की आवाज़।
और उनकी बातें ऐसी थीं कि मैं दिन में उन्हें याद करके रसोई में खड़ी-खड़ी लाल हो जाती थी और भाभी पूछती थीं कि चूल्हे की आँच तेज़ है क्या। वो पूछते थे कि मैंने बाल खोले हैं या बाँधे हैं, और अगर बाँधे होते तो कहते कि खोल दो, मुझे उनके तकिये पर गिरने की आवाज़ सुननी है। वो कहते थे कि फ़ोन को कान से हटाकर अपनी गर्दन के उस गड्ढे पर रखो जहाँ दोनों हँसलियाँ आकर मिलती हैं, और जब मैं रखती थी तो वो बहुत देर तक चुप रहते थे और फिर कहते थे कि हाँ, अब सुनाई दे रही है, अब तेज़ हो गई है, इसे और तेज़ होने दो।
वो मेरे बदन के हर उस हिस्से के बारे में पूछते थे जिसका नाम मैंने कभी अपनी ज़ुबान से नहीं लिया था, और इतने सब्र से, इतने धीरे-धीरे पूछते थे कि जवाब देते-देते मेरी आवाज़ काँपने लगती थी और मेरी चादर पसीने से भीग जाती थी, जबकि बोलने वाला मुझसे चार हज़ार किलोमीटर दूर था। कई रातें ऐसी गुज़रीं जब उन्होंने मुझे हाथ तक नहीं लगाया था, लग भी नहीं सकते थे, और फिर भी सुबह उठकर मुझसे आईने में अपनी ही आँखों से आँखें नहीं मिलाई जाती थीं।
उन रातों में फ़ोन इतना गरम हो जाता था कि सुबह मेरे दाहिने कान की लौ पर लाल निशान पड़ा होता था, जैसे किसी ने गरम चिमटा छुआ दिया हो। और एक बात जो मुझे तब अजीब नहीं लगी थी, अब लगती है, कि पाँच-पाँच घंटे की बात के बाद भी मेरे फ़ोन की बैटरी एक परसेंट भी कम नहीं होती थी।
क़रीब बीस दिन बाद उन्होंने कहा कि निकहत, मुझसे अब और इंतज़ार नहीं होता, लेकिन कफ़ील पासपोर्ट नहीं दे रहा और छुट्टी अगले साल से पहले नहीं मिलेगी। कफ़ील, यानी वो सऊदी मालिक जिसके नाम पर मज़दूर का वीज़ा होता है और जिसकी मर्ज़ी के बिना मज़दूर मुल्क नहीं छोड़ सकता। उन्होंने कहा कि वीडियो कॉल पर निकाह कर लेते हैं, उसके बाद तुम मेरी हो, और फिर मैं तुमसे वो सब कह सकूँगा और तुम्हारे साथ वो सब कर सकूँगा जो एक ग़ैर मर्द नहीं कर सकता।
हमारे इलाक़े में फ़ोन पर निकाह कोई अनोखी बात नहीं है, हर साल ऐसे दस-बीस निकाह होते हैं। इमरान ने अपने अब्बा को फ़ोन किया, उनके अब्बा मिठाई लेकर हमारे घर आए, और तारीख़ तय हो गई, जुलाई का पहला जुम्मा।
इमरान बहुत सीधे आदमी थे, और मैं यह बात इसलिए बता रही हूँ क्योंकि आगे जो कुछ हुआ उसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है। मँगनी के बाद पूरे पौने दो साल में उन्होंने मुझसे कभी कोई ऐसी बात नहीं कही जिसे सुनकर किसी लड़की के कान गरम हो जाएँ। वो हर जुम्मे को, यानी शुक्रवार को, ठीक दस मिनट के लिए फ़ोन करते थे, पूछते थे कि खाना खा लिया, अब्बा की तबीयत कैसी है, बारिश हुई कि नहीं, और फिर कहते थे कि अच्छा रखता हूँ, ड्यूटी है। मेरी रज़िया भाभी मज़ाक़ में कहती थीं कि निकहत, तेरा दूल्हा नहीं है, मौसम विभाग का आदमी है।
लेकिन एक चीज़ थी जो वो मुझसे बार-बार माँगते थे, और वो थी मेरी आवाज़। कैंप के अंदर नेटवर्क नहीं आता था, तो वो रात को कैंप के पीछे वाले सबसे ऊँचे टीले पर चढ़ जाते थे, क्योंकि सिर्फ़ उसकी चोटी पर फ़ोन में दो डंडी आती थी, और वहीं बैठकर मेरे भेजे हुए वॉइस नोट सुनते थे। एक बार उन्होंने बहुत झिझकते हुए कहा था कि निकहत, कुछ भी बोलकर भेज दिया करो, यहाँ रात को इतना सन्नाटा होता है कि आदमी को अपनी ही धड़कन से डर लगने लगता है।
तो मैं भेजने लगी, कभी दिन भर का हाल, कभी कोई पुराना गाना, और एक रात, जब घर में सब सो चुके थे, मैंने पहली बार थोड़ी हिम्मत करके एक ऐसा वॉइस नोट भेजा जिसमें मैंने बस इतना कहा था कि “अब आ भी जाइए, और कितना इंतज़ार करवाएँगे”, और यह कहते-कहते मुझे ख़ुद पर इतनी शर्म आई कि मैं बीच में ही हँस पड़ी, और हँसते-हँसते मेरी साँस एक जगह पर अटक गई थी। कुल ग्यारह सेकंड का वॉइस नोट था। इमरान ने अगले जुम्मे बताया कि वो उसे चालीस बार सुन चुके हैं, और यह भी बताया कि उनका ईयरफ़ोन ख़राब हो गया है, इसलिए अब वो टीले पर बैठकर फ़ोन के स्पीकर पर ही सुनते हैं।
उसी दिन उन्होंने हँसते हुए एक और बात बताई थी। कैंप में एक बुज़ुर्ग ड्राइवर थे, हैदराबाद के, जिन्हें सब लोग चचा कहते थे और जो तीस साल से उसी रेगिस्तान में गाड़ी चला रहे थे। चचा ने इमरान को टीले पर स्पीकर बजाते देखा तो बहुत नाराज़ हुए और बोले कि बेटा, इस रेत में रात को किसी औरत की आवाज़ खुले में मत बजाया कर, यह रेत सुनती है, और इसे जो चीज़ पसंद आ जाए उसे यह लौटाती नहीं।
इमरान ने यह भी बताया था कि वहाँ के टीले रात को सचमुच आवाज़ करते हैं, एक भारी, गहरी, लंबी गूँज, जैसे कोई बहुत बड़ा आदमी सीने के अंदर ही अंदर कुछ गुनगुना रहा हो, और कंपनी के इंजीनियर कहते हैं कि यह रेत के खिसकने की आवाज़ है। मैंने पूछा था कि आपको वहाँ अकेले बैठकर डर नहीं लगता, तो वो हँसकर बोले थे कि डर कैसा, वो तो बस साथ में सुनता है।
मैंने उस वक़्त उस “वो” पर ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि मुझे लगा था कि वो टीले की बात कर रहे हैं।
वो जून का पहला जुम्मा था, और वो इमरान का आख़िरी फ़ोन था।
- Writer
- Pretika
- Story
- क़ुबूल है
- Chapter
- 1 of 3
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1458
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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