Pretika › Jinn & Spirits › क़ुबूल है

भाग 2

Pretika · Jinn & Spirits · 6 मिनट

निकाह वाले दिन हमारे आँगन में क़ाज़ी साहब बैठे थे, मेरे अब्बा थे, दो गवाह थे, इमरान के अब्बा और उनके बड़े भाई थे, और सबके बीच में एक स्टूल पर मेरे भैया का फ़ोन रखा था जिस पर वीडियो कॉल चल रही थी। मैं अंदर वाले कमरे में औरतों के बीच बैठी थी, लेकिन दरवाज़े की झिरी से मुझे वो स्क्रीन साफ़ दिख रही थी।
स्क्रीन पर इमरान टिन की दीवार वाले एक कमरे में बैठे थे। रोशनी उनके पीछे थी, तो चेहरा बस एक काला ख़ाका था, और उन्होंने बताया कि जनरेटर ख़राब है, पूरे कैंप में एक ही बल्ब जल रहा है। क़ाज़ी साहब ने कहा कि बेटा थोड़ा रोशनी की तरफ़ घूमो, तो वो ज़रा सा घूमे, और जितना चेहरा दिखा वो इमरान का ही था, वही माथा, वही नाक, वही ठोड़ी, बस आँखें नहीं दिखीं, क्योंकि आँखों की जगह पर दो गहरे साये पड़े हुए थे। उनकी तरफ़ से कोई गवाह नहीं था, उन्होंने कहा कि सब लोग ड्यूटी पर हैं, और क़ाज़ी साहब ने कहा कि कोई बात नहीं, गवाह इधर के काफ़ी हैं।
क़ाज़ी साहब ने उनसे तीन बार पूछा, और तीनों बार उन्होंने “क़ुबूल है” कहा, लेकिन मैं आज भी क़सम खाकर कह सकती हूँ कि तीसरी बार जब यह लफ़्ज़ आया तब स्क्रीन पर तस्वीर अटक चुकी थी, होंठ हिल नहीं रहे थे, और आवाज़ फ़ोन के स्पीकर में से नहीं आई थी। वो आवाज़ आँगन की हवा में से आई थी, इतनी साफ़ और इतनी पास से कि नीम के पेड़ पर बैठे सारे कौवे एक साथ उड़ गए थे। उस वक़्त सबने इसे नेटवर्क की ख़राबी समझा, और निकाह के बीच में कौन टोकता है, तो किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर क़ाज़ी साहब अंदर आए और उन्होंने मुझसे पूछा, पूरा नाम लेकर, मेरे वालिद के नाम के साथ, जैसे निकाह में लिया जाता है, कि निकहत परवीन, बिन्त मोहम्मद इदरीस, क्या तुम्हें यह निकाह क़ुबूल है।
मैंने पहली बार कहा, “क़ुबूल है,” और मुझे अपनी ज़ुबान पर कुछ किरकिरा सा महसूस हुआ, जैसे दाँतों के बीच रेत का एक दाना आ गया हो।
मैंने दूसरी बार कहा, “क़ुबूल है,” और वो किरकिराहट मेरे पूरे मुँह में फैल गई।
मैंने तीसरी बार कहा, “क़ुबूल है,” और मेरा पूरा मुँह उस स्वाद से भर गया जो जून की दोपहर में उड़ती हुई गरम धूल का होता है। मैंने पानी माँगा, और भाभी ने हँसकर कहा कि देखो, दुल्हन घबरा गई है।
मैं घबराई नहीं थी, मैं ख़ुश थी। मैं इतनी ख़ुश थी कि मैंने उस रात के लिए अपनी सबसे अच्छी लाल क़मीज़ निकालकर पहनी थी और आँखों में काजल लगाया था, यह जानते हुए भी कि मेरा शौहर चार हज़ार किलोमीटर दूर है और मुझे उस रात सिर्फ़ उसकी आवाज़ मिलेगी।
उस रात बारिश हो रही थी, पूरे गाँव में कीचड़ था, और हवा इतनी गीली थी कि मेरे कमरे की दीवारें तक पसीज रही थीं। मेरे कमरे की एक ही खिड़की है जो खेतों की तरफ़ खुलती है, और उसके पार दूर-दूर तक सिर्फ़ पानी से भरे हुए धान के खेत दिख रहे थे।
फ़ोन ठीक बारह बजे आया। उन्होंने कहा, “आज फ़ोन कान पर मत लगाना। स्पीकर खोलकर तकिये के पास रख दो और लेट जाओ।” मैंने वैसा ही किया। फिर उन्होंने कहा, “अब आँखें बंद कर लो, और जब तक मैं न कहूँ तब तक मत खोलना, क्योंकि आज मैं आ रहा हूँ।”
मैं हँस पड़ी और मैंने पूछा कि सऊदी से आ रहे हैं, वीज़ा मिल गया क्या?
और उन्होंने बहुत धीरे से कहा, “रेत को वीज़ा नहीं लगता, निकहत।”
सबसे पहले बारिश की आवाज़ बंद हुई। बारिश रुकी नहीं थी, मुझे बंद पलकों के पार बिजली की चमक महसूस हो रही थी, लेकिन मेरे कमरे के अंदर उसकी आवाज़ आनी बंद हो गई, जैसे किसी ने मेरे कमरे को उठाकर चुपचाप किसी और जगह पर रख दिया हो। फिर हवा बदली। वो गीली, चिपचिपी हवा अचानक इतनी सूखी हो गई कि मेरे होंठ एक पल में पपड़ा गए, और कमरे में वो गरमी भर गई जो मई की दोपहर में तपे हुए पत्थर से उठती है। और फिर तकिये के पास रखा फ़ोन चुप हो गया, क्योंकि अब उसकी ज़रूरत नहीं थी। वही हवा की आवाज़, जो बीस रातों से फ़ोन के अंदर से आ रही थी, अब मेरे कमरे के अंदर थी।
मेरे पलंग की निवाड़ मेरे बग़ल में धीरे-धीरे दबी, इतने धीरे कि मुझे लगा कोई आकर बैठा नहीं है, बल्कि कोई चीज़ वहाँ आकर जमा हो रही है।
और फिर उसने मुझे छुआ।
मैं नहीं जानती कि उस छुअन को किन लफ़्ज़ों में बताऊँ, क्योंकि वो किसी हाथ जैसी नहीं थी। आपने कभी धूप में तपी हुई बारीक रेत में अपना पाँव धँसाया है, जब रेत हर तरफ़ से आपकी खाल से लिपट जाती है और उसकी गरमी सीधे हड्डी तक उतर जाती है? वो छुअन वैसी ही थी, बस वो सिर्फ़ मेरे पाँव पर नहीं थी। वो मेरे टखनों से शुरू हुई और बहती हुई ऊपर चढ़ी, घुटनों के पीछे, कमर के उस मोड़ पर जहाँ क़मीज़ ख़त्म होती है, पीठ की पूरी लंबाई पर, और वो एक साथ इतनी जगहों पर थी जितनी जगहों पर किसी आदमी के दो हाथ एक साथ हो ही नहीं सकते। मेरी गर्दन पर एक साँस थी जो लू जितनी गरम थी, और उसी साँस ने मेरे कान में, बिना किसी फ़ोन के, मेरा नाम लिया।
मैं झूठ नहीं बोलूँगी, मुझे उस वक़्त डरना चाहिए था और मैं नहीं डरी। मैंने अपनी मुट्ठियों में चादर भींच ली, मेरी पीठ अपने आप पलंग से ऊपर उठ गई, और जब वो गरमी मेरे होंठों तक पहुँची तो मैंने ख़ुद अपने होंठ खोल दिए, और उस बोसे का स्वाद ठीक वही था जो तीसरी बार “क़ुबूल है” कहते वक़्त मेरे मुँह में आया था। उस रात उसने मेरे बदन का कोई हिस्सा ऐसा नहीं छोड़ा जहाँ से वो गुज़रा न हो, और वो हर जगह इतने इत्मीनान से ठहरा जैसे उसके पास हज़ार साल का वक़्त हो और उसे कहीं जाने की जल्दी न हो, और मैं उस रात इतनी बार टूटी और इतनी बार जुड़ी कि आख़िर में मुझे अपना नाम तक याद नहीं रहा था।
मुझे बस इतना याद है कि एक बार मैंने आँखें खोलनी चाही थीं, तो मेरी पलकों पर एक गरम वज़न आकर टिक गया था और उसने कहा था, “अभी नहीं। जिस दिन तुम मुझे देख लोगी, उस दिन के बाद मैं सुबह को लौट नहीं पाऊँगा।”
फ़ज्र की अज़ान के साथ वो वज़न मेरे ऊपर से ऐसे उतर गया जैसे बंद मुट्ठी में से रेत फिसल जाती है।
सुबह जब मैंने आँखें खोलीं तो बारिश अब भी हो रही थी और दीवारें अब भी गीली थीं, लेकिन मेरी चादर पर, मेरे तकिये पर, मेरे बालों में, मेरी नाभि में, मेरी उँगलियों के बीच और मेरे कान के पीछे बारीक, सूखी, गेरुए-लाल रंग की रेत थी। भरी बरसात में, बिहार के उस गाँव में, जहाँ की मिट्टी काली और चिकनी है और जहाँ उस सुबह घुटनों तक कीचड़ था।
मैंने वो रेत चादर से झाड़कर काजल की एक ख़ाली डिबिया में भर ली थी। उस दिन तक मुझे यह सब एक राज़ जैसा लग रहा था, मेरा और मेरे शौहर का राज़, और सच कहूँ तो मुझे उस राज़ पर नाज़ था।

Writer
Pretika
Story
क़ुबूल है
Chapter
2 of 3
Category
Jinn & Spirits
Reading time
6 min
Words
1191
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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