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भाग 3

Pretika · Jinn & Spirits · 12 मिनट

उसके बाद हर रात यही हुआ, और हर रात पहले से ज़्यादा हुआ। अब फ़ोन की घंटी भी नहीं बजती थी, बस आधी रात को कमरे की हवा सूख जाती थी और मैं समझ जाती थी कि वो आ गया है। मेरी हालत यह हो गई थी कि मैं पूरा दिन सिर्फ़ रात का इंतज़ार करती थी, शाम होते ही नहा लेती थी, बाल खोल लेती थी, और खाना आधा छोड़कर ऊपर अपने कमरे में चली जाती थी, और भाभी नीचे से आवाज़ लगाती थीं कि निकहत, फ़ोन वाले दूल्हे के लिए इतना सिंगार कौन करता है।
महीने भर में मेरा बदन बदलने लगा। मेरी कमर के दोनों तरफ़, पसलियों के ठीक नीचे, खाल का रंग गहरा हो गया, बिल्कुल वैसे जैसे धूप में झुलसने से होता है, और वो दाग़ किसी हथेली और उसकी फैली हुई उँगलियों की शक्ल के थे, जबकि मैं हफ़्तों से धूप में निकली ही नहीं थी। मेरे होंठ हर वक़्त फटे रहते थे। मुझे ऐसी प्यास लगती थी कि मैं दिन में तीन-तीन घड़े पानी पी जाती थी और फिर भी मेरा गला सूखा रहता था। और सबसे अजीब बात यह थी कि मैं कमज़ोर नहीं हो रही थी, उलटा गाँव की औरतें भाभी से पूछती थीं कि निकहत के चेहरे पर यह रंग कैसे आ गया है, निकाह तो फ़ोन पर हुआ है।
पहली बार शक भाभी को हुआ, क्योंकि घर की चादरें वही धोती थीं। उन्होंने एक दिन मेरी चादर झाड़ी तो आँगन के फ़र्श पर लाल रेत की एक पतली लकीर बिछ गई, और वो बहुत देर तक खड़ी उसे देखती रहीं। फिर उन्होंने मुझसे कहा कि निकहत, मैं रात को पानी पीने उठती हूँ तो तेरे कमरे से आवाज़ें आती हैं, तेरी आवाज़ तो मुझे समझ आती है और मैं उस पर कुछ नहीं कहूँगी, लेकिन तेरे साथ जो दूसरी आवाज़ आती है वो किसी आदमी की नहीं है।
मैंने हँसकर कहा कि भाभी, फ़ोन स्पीकर पर रहता है। और यह साबित करने के लिए कि मेरा शौहर मुझसे कितनी मोहब्बत करता है, मैंने उन्हें वो वॉइस नोट सुनाया जो उसने मुझे निकाह से एक रात पहले भेजा था, जिसमें वो पूरे दो मिनट तक बताता है कि निकाह के बाद वो मुझे कहाँ से छूना शुरू करेगा और कहाँ जाकर रुकेगा। मुझे वो नोट ज़ुबानी याद था, और मैंने शरम के मारे अपना मुँह दुपट्टे में छुपा लिया था।
भाभी ने पूरा नोट सुना। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई किसी बीमार को देखता है, और बोलीं, “निकहत, इसमें तो कोई बोल ही नहीं रहा, इसमें सिर्फ़ आँधी चल रही है।”
मैंने नोट दोबारा चलाया। मुझे उसका एक-एक लफ़्ज़ साफ़ सुनाई दे रहा था, और भाभी को सिर्फ़ हवा सुनाई दे रही थी।
उस रात मैंने पहली बार अपने फ़ोन का कॉल रिकॉर्ड खोलकर देखा। इमरान के नंबर से आख़िरी फ़ोन जून के पहले जुम्मे को आया था, दस मिनट चार सेकंड का, और उसके बाद उस नंबर से कुछ भी नहीं था, न कोई कॉल, न कोई वीडियो कॉल, न पाँच-पाँच घंटे की वो रातें। मुझे याद आया कि एक रात मैंने बात के बीच में स्क्रीन की फ़ोटो ले ली थी, ताकि बाद में उसे चिढ़ा सकूँ कि देखिए आपने मुझे कितनी देर जगाया, तो मैंने गैलरी खोली, और उस फ़ोटो में कोई कॉल नहीं थी, सिर्फ़ मेरे फ़ोन का वॉलपेपर था और ऊपर रात के दो बजकर चालीस मिनट का वक़्त लिखा था।
उस रात जब कमरे की हवा सूखी, तो मैंने पहली बार उससे पूछा, “आपका नाम क्या है?”
बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया। फिर मेरे कान के बिल्कुल पास उसने कहा, “मेरा नाम तुम्हारी ज़ुबान में नहीं आता। जब हवा टीले की चोटी के ऊपर से गुज़रती है तो जो आवाज़ निकलती है, वो मेरा नाम है, और तुम्हारी भाभी ने आज मेरा नाम ही सुना था।”
मैंने पूछा, “इमरान कहाँ हैं?”
और उसने मेरे बालों में अपनी गरम साँस छोड़ते हुए कहा, “सो जाओ, निकहत। इमरान घर आ रहा है।”
तीन दिन बाद, दस अगस्त को, इमरान के अब्बा के पास रियाद से एक एजेंट का फ़ोन आया।
एजेंट ने बताया कि इमरान की लाश मिली है, कैंप से क़रीब सात किलोमीटर अंदर रेगिस्तान में, एक टीले के नीचे से, जब पिछले हफ़्ते की आँधी ने उस टीले की रेत को एक तरफ़ खिसका दिया। और फिर उसने वो बात बताई जिसे सुनकर इमरान के अब्बा के हाथ से फ़ोन छूटकर गिर गया था। इमरान छह जून की रात से कैंप से ग़ायब थे। कंपनी ने दो दिन उन्हें ढूँढा और फिर काग़ज़ों में उनके नाम के आगे “हुरूब” लिखवा दिया, यानी भगोड़ा, यानी वो मज़दूर जो कफ़ील को बताए बिना काम छोड़कर भाग गया हो, क्योंकि ऐसा लिखवा देने के बाद कंपनी अपनी ज़िम्मेदारी से छूट जाती है और घरवालों को ख़बर करने की भी कोई ज़रूरत नहीं समझी जाती। पुलिस की रिपोर्ट पर तारीख़ सात जून की थी, और डॉक्टर ने लिखा था कि मौत उसी रात के आसपास हुई है।
अब आप ज़रा मेरे साथ हिसाब लगाइए। इमरान का आख़िरी असली फ़ोन जून के पहले जुम्मे को आया था, यानी पाँच जून को, और अगली ही रात वो ग़ायब हो गए। नौ दिन की ख़ामोशी के बाद जो फ़ोन आने शुरू हुए, वो सारे के सारे उनके मरने के बाद आए थे। और जिस दिन हमारे आँगन में मेरा निकाह पढ़ा गया, उस दिन काग़ज़ों के हिसाब से मेरे शौहर को मरे हुए पूरे सत्ताईस दिन हो चुके थे।
इमरान की अम्मी यह बात मानने को तैयार ही नहीं थीं। वो चीख़-चीख़कर कह रही थीं कि मेरा बेटा दो महीने से रोज़ मुझे फ़ोन कर रहा है, कल रात भी किया था, और कल रात उसने मुझसे कहा था कि अम्मी रोना मत, मैं बहुत जल्द घर आ रहा हूँ।
क़ाज़ी साहब को बुलाया गया, गवाहों को बुलाया गया, और सबने एक ही बात कही कि हमने अपनी आँखों से स्क्रीन पर इमरान को देखा था और अपने कानों से तीन बार “क़ुबूल है” सुना था। क़ाज़ी साहब बहुत देर तक सिर झुकाए चुप बैठे रहे और फिर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि मुर्दे के साथ निकाह नहीं होता, इसलिए यह लड़की न किसी की बीवी है और न किसी की बेवा।
मेरे घरवालों ने उस एक लाइन को ऐसे पकड़ लिया जैसे डूबता हुआ आदमी रस्सी पकड़ता है।
लेकिन उस रात जब मेरे कमरे की हवा सूखी, तो उसकी आवाज़ में पहली बार हँसी थी। उसने कहा, “क़ाज़ी ने नाम इमरान का पढ़ा था, लेकिन ‘क़ुबूल है’ मैंने कहा था। और तुम, निकहत, तुम दरवाज़े की झिरी से मुझे ही देख रही थीं, मुझे ही सुन रही थीं, और बीस रातों से मुझसे ही बातें कर रही थीं। तुमसे तीन बार पूछा गया था, और तीनों बार तुमने हाँ कहा था। नाम से कुछ नहीं होता, निकाह उसी से होता है जिसे क़ुबूल किया जाता है।”
मैं रोई, मैंने उसे धक्का देना चाहा, लेकिन रेत को धक्का कैसे दिया जाता है, मेरे हाथ उसके अंदर धँस गए और वो गरमी मेरी कलाइयों से चढ़कर मेरे कंधों तक आ गई। और फिर उसने मुझे उसी तरह छुआ जैसे वो हर रात छूता था, उतने ही सब्र से, उतने ही धीरे, और मैं आपको वो बात बता रही हूँ जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई, कि जिस रात मुझे पता चला कि मेरे बिस्तर में जो आता है वो इंसान नहीं है, उस रात भी मेरा रोना बहुत देर तक रोना नहीं रह पाया था।
लाश को आने में चौबीस दिन लगे। काग़ज़, दूतावास, कफ़ील के दस्तख़त, और आख़िर में पटना एयरपोर्ट से एक एम्बुलेंस में लकड़ी का वो लंबा बक्सा हमारे इलाक़े में आया।
ताबूत के साथ एक पॉलिथीन में इमरान का सामान था, एक घड़ी, एक बटुआ, और उनका फ़ोन, जो एजेंट के मुताबिक़ उनकी बंद मुट्ठी में से निकाला गया था। इमरान के घरवालों ने वो फ़ोन मुझे दे दिया, यह कहकर कि इसमें तो तेरी ही चीज़ें होंगी, तू ही रख ले।
मैंने उसे चार्जर पर लगाया। फ़ोन खुला तो सबसे ऊपर व्हाट्सऐप खुला हुआ था, उसमें मेरी चैट खुली हुई थी, और मेरा वही ग्यारह सेकंड का वॉइस नोट आधा चला हुआ रुका था, ठीक सातवें सेकंड पर, जहाँ मेरी हँसी में साँस टूटती है।
उसी फ़ोन में “चचा कैंप” के नाम से एक नंबर था। मैंने वो नंबर मिलाया, और उस बूढ़ी आवाज़ ने जब सुना कि मैं निकहत बोल रही हूँ, तो वो बहुत देर तक कुछ बोल ही नहीं पाए।
फिर उन्होंने सब बताया। उन्होंने बताया कि इमरान हर रात टीले पर बैठकर मेरी आवाज़ खुले में बजाता था। कुछ हफ़्तों बाद उसने कहना शुरू किया कि चचा, मेरे बग़ल में रेत ऐसे दब जाती है जैसे कोई आकर बैठ गया हो, और वो मेरे साथ में सुनता है। फिर एक दिन उसने कहा कि चचा, अब वो पूछता है कि यह किसकी आवाज़ है। इमरान डर गया और उसने टीले पर जाना छोड़ दिया, लेकिन तब रात को कैंप की टिन की दीवारें गुनगुनाने लगीं, और वो गुनगुनाहट पूरे कमरे में सिर्फ़ इमरान के बिस्तर के पास वाली दीवार में होती थी।
और आख़िरी रात, चचा ने बताया, इमरान उनके पास आया था और वो बच्चों की तरह रो रहा था। दो साल से उसे छुट्टी नहीं मिली थी, पासपोर्ट कफ़ील की तिजोरी में बंद था, और वो बस किसी भी तरह घर जाना चाहता था। उसने कहा था, “चचा, वो कह रहा है कि अगर मैं उसे उस लड़की का नाम और पता बता दूँ, तो वो मुझे घर भेज देगा।” चचा ने उसे क़सम दी थी कि मत बताना।
सुबह इमरान का बिस्तर ख़ाली था और चप्पलें दरवाज़े पर पड़ी थीं। नंगे पाँव के निशान टीले की चोटी तक जाते थे, और उसके आगे रेत बिल्कुल साफ़ थी, जैसे उस पर कभी कोई चला ही न हो।
फ़ोन रखने से पहले चचा ने एक बात और कही, और वो बात मैं मरते दम तक नहीं भूलूँगी। उन्होंने कहा, “बेटी, उस रात मैंने टीले की तरफ़ से उसकी आवाज़ सुनी थी। वो तुम्हारा नाम ले रहा था, पूरा नाम, वालिद के नाम के साथ, ठीक वैसे जैसे निकाह में लिया जाता है।”
तो यह था सच। मेरे मँगेतर ने घर लौटने के बदले में मुझे दे दिया था, और जिसे दिया था उसने अपना वादा पूरा निभाया था। इमरान घर आ गया था।
दफ़नाने से पहले जब आख़िरी बार चेहरा दिखाने के लिए ताबूत खोला गया, तो मैंने भी देखा। रेगिस्तान लाश को सड़ाता नहीं है, सुखा देता है, तो वो चेहरा इमरान का ही था, बस सिकुड़ा हुआ और पुराने चमड़े जैसा। और जब इमरान के बड़े भाई ने उनका सिर सीधा किया, तो उनके होंठों के कोने से लाल रेत की एक पतली धार निकली और कफ़न पर बहती चली गई, बहती चली गई, और तब तक नहीं रुकी जब तक किसी ने घबराकर ताबूत बंद नहीं कर दिया।
उसके बाद मेरे घरवालों ने वो सब किया जो ऐसे में घरवाले करते हैं। एक बहुत पहुँचे हुए बुज़ुर्ग को बुलाया गया, जो मेरे कमरे में कुल दस मिनट रुके, फिर बाहर आए, अपनी टोपी उतारकर उसमें से रेत झाड़ी और मेरे अब्बा से बोले कि जो चीज़ ज़बरदस्ती आती है उसे निकाला जा सकता है, लेकिन जिसे आवाज़ देकर बुलाया गया हो, जिसे घर का पता दिया गया हो और जिसे तीन बार क़ुबूल किया गया हो, उसे कोई नहीं निकाल सकता। उन्होंने पैसे नहीं लिए और वो दोबारा कभी हमारे गाँव की तरफ़ नहीं आए।
जिस रात इमरान को दफ़नाया गया, उस रात वो हमेशा से ज़्यादा देर से आया। मैं जाग रही थी। जब पलंग की निवाड़ दबी और वो गरमी मेरे पाँवों से ऊपर चढ़नी शुरू हुई, तो मैंने वो किया जो मैंने पूरे दो महीने में एक बार भी नहीं किया था।
मैंने आँखें खोल दीं।
मेरे ऊपर इमरान का चेहरा था। वही माथा, वही नाक, वही ठोड़ी पर का तिल, बस आँखों की जगह दो गड्ढे थे जिनके अंदर कुछ बहुत धीरे-धीरे घूम रहा था, जैसे बहुत दूर कहीं कोई आँधी उठ रही हो। वो चेहरा मुस्कुराया, और उसने कहा, “तुम्हें यही चेहरा पसंद था न? अब उसे इसकी ज़रूरत नहीं थी, तो मैंने रख लिया।”
और उस मुस्कुराहट के कोने से रेत की एक पतली धार निकलकर मेरे गले पर गिरने लगी।
मुझे चीख़ना चाहिए था, और मैं जानती हूँ कि आप सब इस वक़्त यही सोच रहे हैं कि मुझे चीख़ना चाहिए था।
मैंने हाथ बढ़ाया, और अपने अँगूठे से उसके होंठ के कोने पर लगी वो रेत पोंछ दी।
उसने सच कहा था। उस रात के बाद वो फ़ज्र की अज़ान पर गया नहीं। वो अब दिन में भी यहीं रहता है, इसी कमरे में, और जब दोपहर को पूरा घर सो जाता है तो मेरी पीठ पर वही गरम वज़न आकर टिक जाता है, और मैं सिलाई की मशीन पर झुकी-झुकी अपना होंठ दाँतों में दबा लेती हूँ। घरवाले समझते हैं कि मैं ठीक हो गई हूँ, क्योंकि अब रात को मेरे कमरे से कोई आवाज़ नहीं आती। उन्हें नहीं पता कि आवाज़ इसलिए नहीं आती क्योंकि अब वो मेरी आवाज़ को मेरे होंठों पर ही रोक लेना सीख गया है।
काजल की वो डिबिया तीसरे ही हफ़्ते में भर गई थी। अब एक पूरा कनस्तर भर चुका है और दूसरा आधा हो गया है। मैं रोज़ सुबह ख़ुद झाड़ू लगाती हूँ और ख़ुद ही उसे भरती हूँ, क्योंकि पता नहीं क्यों, मुझसे वो रेत फेंकी नहीं जाती।
और पिछले महीने से मुझे अपने पेट के अंदर कुछ महसूस होता है। वो हिलता नहीं है, जैसे बच्चे हिलते हैं। वो सरकता है, धीरे-धीरे, एक तरफ़ से दूसरी तरफ़, ठीक वैसे जैसे हवा चलने पर टीला सरकता है।
मैंने अभी तक यह बात घर में किसी को नहीं बताई है।
सिर्फ़ उसे बताई है, और वो उस रात पहली बार मेरे पेट पर अपना सिर रखकर सुबह तक गुनगुनाता रहा था।

Writer
Pretika
Story
क़ुबूल है
Chapter
3 of 3
Category
Jinn & Spirits
Reading time
12 min
Words
2266
Language
Hindi (हिंदी)
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