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भाग 1: नर्क की देहरी और अनकहा अभिशाप

Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 6 मिनट

अधर में लटका हुआ आसमान और रक्ताक्ष horizon
हवा में एक अजीब सी भारीपन था, मानो वायुमंडल में ऑक्सीजन की जगह कोई भारी, दमघोंटू धातु घुल गई हो। आसमान का रंग नीला नहीं, बल्कि उबलते हुए लावा जैसा संतरी और गहरे काले रंग का मिश्रण था। क्षितिज (horizon) पर बादलों के बजाय विशालकाय, धुएं के काले गुबार उठ रहे थे, जो किसी महाविनाश की चेतावनी दे रहे थे।
इस बंजर और वीरान दुनिया में, जहाँ दूर-दूर तक केवल राख और सुलगते हुए पत्थर दिखाई देते थे, एक अकेली आकृति खड़ी थी। उसका नाम विक्रमादित्य था, जिसे इस लोक में लोग केवल 'द शैडो' या 'नरक का मुसाफिर' के नाम से जानते थे। उसके कंधे पर एक प्राचीन तलवार लटकी हुई थी, जिसकी म्यान पर नरक की प्राचीन लिपियों में कुछ भयानक मंत्र उकेरे गए थे।
विक्रमादित्य की आँखें शांत थीं, लेकिन उन आँखों के भीतर एक ऐसा तूफान छिपा था जो पूरी कायनात को राख कर सकता था। उसने गहरी सांस ली। नर्क की हवा उसके फेफड़ों में उतरी—यह हवा ठंडी नहीं थी, बल्कि इसमें सदियों के जले हुए पापों और रोते हुए रुहों की तड़प की महक थी।
"तो, मैं आ गया..." विक्रमादित्य की आवाज़ गूँजी, जो किसी गिटार के टूटे हुए तारों जैसी कर्कश और भारी थी।
2. काल-कोठरी से आती चीखें
वह आगे बढ़ा। उसके बूटों के पत्थरों पर पड़ने से एक अजीब सी खड़खड़ाहट पैदा हो रही थी। रास्ते के दोनों ओर बड़े-बड़े लोहे के खंभे गड़े थे, जिन पर अनंतकाल से जंजीरों में जकड़े हुए पापी झूल रहे थे। उनकी चीखें इस शांत और डरावने सन्नाटे को चीर रही थीं।
इनमें से एक पापी ने, जिसका शरीर जलते हुए अंगारों से ढका हुआ था, अपनी लाल, सूजी हुई आँखें उठाईं और विक्रमादित्य को देखा। वह चिल्लाया, "बचाओ... मुझे यहाँ से बचाओ! यह नर्क है! यहाँ कोई दया नहीं है!"
विक्रमादित्य रुका। उसने उस पापी की तरफ देखा। उसकी आँखों में कोई सहानुभूति नहीं थी, बस एक ठंडा सा यथार्थ था। उसने धीमी आवाज़ में कहा, "दया? दया शब्द इस लोक की डिक्शनरी में कभी था ही नहीं। तुमने जब अपनी धरती पर मासूमों का खून बहाया था, तब दया कहाँ थी? अब इस आग में जलना ही तुम्हारा भाग्य है।"
पापी ने कांपते हुए कहा, "तुम... तुम कौन हो? क्या तुम भगवान के दूत हो?"
विक्रमादित्य के चेहरे पर एक सूक्ष्म, व्यंग्यपूर्ण मुस्कान तैर गई। उसने अपनी तलवार के मुठ्ठे पर हाथ रखा और कहा, "भगवान? भगवान इस नर्क की सरहद पार करते ही दम तोड़ देते हैं। मैं भगवान का दूत नहीं हूँ... मैं इस नर्क का अगला सम्राट हूँ।"
3. रक्त-नदी का रहस्य
आगे बढ़ने पर उसे एक विशाल नदी मिली। यह पानी की नदी नहीं थी, बल्कि यह गाढ़े, लाल रक्त और आंसुओं की नदी थी—वैतरणी का विकृत रूप। नदी के ऊपर एक संकीर्ण पुल बना हुआ था, जिसके पार नरक का मुख्य द्वार—'हेल गेट' (The Gate of Hell) स्थित था।
उस पुल के मुहाने पर एक भयानक दैत्य खड़ा था। उसके तीन सिर थे, शरीर पर हाथियों जैसी चमड़ी थी, और उसके हाथों में एक विशाल गदा थी, जिस पर खोपड़ियां जड़ी हुई थीं। वह नरक के द्वारों का रक्षक था—'त्रिशीर्ष'।
त्रिशीर्ष ने दहाड़ते हुए कहा, "रुक जाओ, नश्वर! आगे बढ़ना मौत से भी बदतर सजा को बुलावा देना है। इस पुल को पार करने का अधिकार केवल उन्हें है जिनके शरीर में प्राण नहीं हैं। तुम अभी भी जीवित हो! वापस लौट जाओ!"
विक्रमादित्य ने अपनी जगह से एक इंच भी हिलना मुनासिब नहीं समझा। उसने अपनी तलवार को म्यान से बाहर खींचा। तलवार के बाहर आते ही एक नीली और पैनी रोशनी ने पूरे इलाके को रोशन कर दिया। उस रोशनी में नर्क की काली दीवारें भी चमक उठीं।
"वापस लौटना मेरी फितरत में नहीं है, त्रिशीर्ष," विक्रमादित्य की आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी, "और जहाँ तक बात जीवन की है, मेरा दिल बहुत पहले धड़कना बंद कर चुका है। अब केवल मेरा गुस्सा जिंदा है।"
4. पहली भीषण जंग
त्रिशीर्ष ने अपनी गदा हवा में घुमाई और विक्रमादित्य पर पूरी ताकत से हमला कर दिया। हवा में एक भारी सनसनाहट पैदा हुई। जमीन कांप उठी और ऐसा लगा मानो धरती फट जाएगी।
लेकिन विक्रमादित्य अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। जैसे ही गदा उसके सिर पर आने वाली थी, उसने बिजली की सी फूर्ती से छलांग लगाई और हवा में ही त्रिशीर्ष के एक कंधे पर पैर रखकर दूसरा वार किया।
छपाक!
तलवार की धार इतनी तेज थी कि त्रिशीर्ष के दाहिने सिर की गर्दन पर एक गहरा घाव हो गया। काला, बदबूदार खून फव्वारे की तरह बाहर निकल पड़ा। दैत्य दर्द से चीख उठा। उसकी चीखों से नर्क की चट्टानें दरकने लगीं।
"असंभव!" त्रिशीर्ष ने गुस्से से पागल होकर अपने बाकी दोनों सिरों से आग के गोले छोड़ने शुरू कर दिए।
आग के वे गोले विक्रमादित्य की तरफ बढ़े, लेकिन उसने अपनी तलवार को एक चक्रव्यूह की तरह घुमाया। तलवार से निकली ऊर्जा ने उन सभी गोलों को हवा में ही काट दिया। इसके बाद, विक्रमादित्य ने जमीन पर एक पैर पटका और सीधे त्रिशीर्ष के सीने पर प्रहार किया।
एक जोरदार धमाका हुआ। त्रिशीर्ष का विशालकाय शरीर पीछे की ओर लड़खड़ाया और वह सीधे रक्त-नदी में जा गिरा। नदी का काला-लाल खून चारों तरफ फैल गया। दैत्य कुछ सेकंड के लिए तड़पा और फिर हमेशा के लिए शांत हो गया।
5. हेल गेट का खुलना
विक्रमादित्य ने अपनी तलवार को साफ किया और उसे वापस म्यान में डाल दिया। उसका सांस थोड़ा सा तेज था, लेकिन चेहरे पर थकान का कोई नामोनिशान नहीं था।
वह रक्त-नदी के उस पार पहुंचा। उसके सामने अब वह विशाल, काले पत्थरों से बना द्वार खड़ा था, जिसके ऊपर लिखा था—"Abandon all hope, ye who enter here" (जो यहाँ प्रवेश करते हैं, वे हर उम्मीद छोड़ दें)।
द्वार के मध्य में एक गोल खांचा था, जिसमें एक प्राचीन ताले जैसी संरचना बनी हुई थी। विक्रमादित्य ने अपनी जेब से एक चमकता हुआ पन्ना निकाला—यह वही 'अमेथिस्ट स्टोन' था जिसे पाने के लिए उसने अपनी दुनिया में अनगिनत लड़ाइयाँ लड़ी थीं।
उसने धीरे से उस पत्थर को द्वार के खांचे में फिट कर दिया।
कड़कड़... घर्र्र्र...
सदियों से बंद पड़े नरक के भारी दरवाजे धीरे-धीरे खुलने लगे। दरवाजों के खुलने के साथ ही एक ठंडी और भयानक चीख हवा में गूंज उठी, मानो नर्क के अंदर बैठे करोड़ों भूत-प्रेत और आत्माएं अपने नए राजा का स्वागत करने के लिए बेताब बैठी हों।
विक्रमादित्य ने बिना किसी डर के आगे कदम बढ़ाया और उस अंधेरे में समा गया। दरवाज़े उसके पीछे अपने आप बंद हो गए।
[जारी...]

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
द किंग ऑफ़ हेल (The King Of Hell)
Chapter
1 of 3
Category
Haunted Places
Reading time
6 min
Words
1078
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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