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भाग 2: प्रथम चक्र की आग और छायाओं का साम्राज्य

Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 6 मिनट

हेल गेट के पार की रहस्यमयी दुनिया
हेल गेट के भारी और विशाल पत्थरों के दरवाजे जब पीछे बंद हुए, तो एक गहरा, गूँजता हुआ सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा साधारण नहीं था; उसमें हज़ारों आत्माओं की घुटन, सिसकियाँ और अनकहे डर का भारीपन था। विक्रमादित्य ने अपनी आँखें बंद कीं और नर्क की हवा में सांस ली। यहाँ की आबोहवा में ऑक्सीजन की जगह सल्फर और जलते हुए कोयले की गंध घुली हुई थी।
सामने का दृश्य किसी खौफनाक सपने जैसा था। अनन्त दूरी तक फैली हुई काली और पथरीली भूमि, जिस पर कहीं-कहीं हरे-नीले रंग की जहरीली रोशनी देने वाले पौधे उग रहे थे। यह नरक का प्रथम चक्र था—जिसे प्राचीन ग्रंथों में 'अंधकार का प्रान्तर' या 'लिम्बो' का विकृत रूप कहा गया है। यहाँ वे आत्माएं भटकती थीं जिन्होंने अपने जीवन में न तो बहुत बड़े पाप किए थे और न ही पुण्य, लेकिन उनके मन का छल और अहंकार उन्हें इस लोक में खींच लाया था।
विक्रमादित्य ने अपने बूटों को संभाला और आगे कदम बढ़ाया। उसके हर कदम के साथ जमीन के अंदर से नीले रंग की चिंगारियां फूट रही थीं, मानो यह धरती भी उसके आने से कांप रही हो।
2. छायाओं का विलाप और भ्रम का जाल
जैसे ही वह आगे बढ़ा, हवा में एक अजीब सा संगीत तैरने लगा—यह संगीत किसी रोती हुई स्त्री के विलाप जैसा था। अचानक, उसके चारों ओर धुंध घनी होने लगी। उस धुंध में से अनगिनत धुंधली आकृतियाँ उभरने लगीं। ये इंसानी चेहरों वाली छायाएं थीं, जिनके शरीर धुएं और राख से बने थे।
एक छाया विक्रमादित्य के बिल्कुल करीब आ गई। उसकी आँखें नहीं थीं, बस दो काले गड्ढे थे जिनसे खून की बूंदें टपक रही थीं। उस छाया ने कांपती हुई आवाज़ में कहा, "विक्रमादित्य... तुम यहाँ क्यों आए? यह जीवनपंथ नहीं, यह मृत्यु की अंतिम घाटी है। लौट जाओ, वरना तुम्हारा यह शरीर भी इसी राख में मिल जाएगा।"
विक्रमादित्य के चेहरे पर एक कठोर मुस्कान आई। उसने बिना डरे उस छाया की आँखों में देखा और कहा, "तुम्हें मेरा नाम कैसे पता? और रही बात लौटने की... तो मैं अपनी मंजिल तय करके आया हूँ। भ्रम के ये जाल किसी और पर आजमाना, मुझ पर इनका कोई असर नहीं होता।"
उसने अपनी तलवार का हत्था थोड़ा सा बाहर निकाला। तलवार की नीली चमक से वे सारी छायाएं एक झटके में चीखते हुए पीछे हट गईं, जैसे किसी जलती हुई आग पर पानी डाल दिया गया हो। भ्रम का वह कोहरा छंट गया और सामने एक चौड़ा, खूनी पत्थरों से बना मार्ग दिखाई दिया।
3. नरक का पहला सेनापति: क्रॉसन
मार्ग के अंत में एक विशाल किला खड़ा था, जिसकी दीवारें इंसानी खोपड़ियों और कंकालों से गढ़ी गई थीं। किले के मुख्य द्वार पर नरक का पहला प्रमुख सेनापति पहरा दे रहा था—उसका नाम क्रॉसन था।
क्रॉसन कोई साधारण दैत्य नहीं था। उसके शरीर पर काले लोहे का भारी बख्तर (Armor) था, जिसके हर जोड़ से नीली लपटें निकल रही थीं। उसके हाथ में एक विशाल दोधारी कुल्हाड़ी थी, जिसका वजन इतना था कि वह किसी भी पहाड़ को एक झटके में चकनाचूर कर सकती थी।
क्रॉसन ने अपनी भारी और गूंजती हुई आवाज में दहाड़ा, "रुको, नश्वर! तुमने हेल गेट तो पार कर लिया, यह तुम्हारी किस्मत थी। लेकिन मेरे इस किले की सीमा लांघने का अर्थ है—तुम्हारी आत्मा का हमेशा के लिए अनंत अंधकार में विलीन हो जाना। तुम कौन हो जो इस अद्यलोक में सम्राट बनने का सपना देख रहे हो?"
विक्रमादित्य ने बिना किसी डर के अपनी तलवार पूरी तरह म्यान से बाहर खींच ली। तलवार के बाहर आते ही एक तेज़ गूंज पूरे वातावरण में फैल गई।
"मेरा नाम विक्रमादित्य है," उसकी आवाज में एक अजीब सी दहाड़ थी, "और इस नर्क का सिंहासन अब खाली नहीं रहेगा, क्योंकि उसका असली मालिक आ चुका है!"
4. लोहे और खून की खौफनाक टक्कर
क्रॉसन अपनी जगह पर जोर से हँसा। उसकी हंसी से किले की दीवारें हिल गईं। "अहंकार! इंसानों का यह अहंकार ही उन्हें नर्क में लाता है। आज मैं तुम्हारे इस घमंड को तुम्हारी ही लाश के साथ दफना दूंगा!"
कहते ही क्रॉसन ने अपनी विशाल कुल्हाड़ी हवा में उठाई और विक्रमादित्य की तरफ झपटा। उसकी गति एक भयानक तूफान जैसी थी। उसने पूरी ताकत से कुल्हाड़ी नीचे की ओर पटकी।
धड़ाम!
जहाँ विक्रमादित्य खड़ा था, वहाँ की जमीन फट गई और पत्थरों के टुकड़े हवा में उड़ने लगे। लेकिन विक्रमादित्य उस वार से बाल-बाल बच चुका था। वह बिजली की गति से हवा में उछला और सीधे क्रॉसन के कंधे पर जा उतरा।
उसने अपनी तलवार से क्रॉसन के लोहे के बख्तर पर वार किया।
छनकाहट!
चिंगारियों का एक फव्वारा फूट पड़ा। क्रॉसन का बख्तर बहुत मजबूत था, इसलिए तलवार सीधे उसके शरीर को नहीं भेद पाई, लेकिन उस जोरदार प्रहार से क्रॉसन का संतुलन बिगड़ गया। वह लड़खड़ा कर दो कदम पीछे हट गया।
"असंभव! कोई जीवित मनुष्य इतना शक्तिशाली कैसे हो सकता है?" क्रॉसन गुस्से से पागल हो उठा। उसने अपने शरीर की सारी ऊर्जा का इस्तेमाल किया और एक चक्रवात जैसी अग्नि-लहर पैदा की, जो चारों तरफ फैलने लगी।
5. विजय की ओर अगला कदम
विक्रमादित्य ने हवा में ही अपने शरीर को घुमाया और अपनी तलवार की नोक पर अपनी सारी आंतरिक ऊर्जा केंद्रित कर ली। उसने मन ही मन अपने अतीत के उन संघर्षों को याद किया, जिन्होंने उसे इस मुकाम तक पहुँचाया था—वह दर्द, वह धोखा, और वह प्रतिशोध जिसकी आग उसके भीतर जल रही थी।
"यह नर्क मेरा है, और इसका हर एक कोना अब मेरे आदेश पर चलेगा!" विक्रमादित्य ने चिल्लाते हुए जमीन की ओर छलांग लगाई और अपनी तलवार सीधे क्रॉसन के सीने के उस हिस्से पर दे मारी जहाँ बख्तर का जोड़ कमजोर था।
आर-पार!
तलवार क्रॉसन के सीने को चीरती हुई पार निकल गई। क्रॉसन की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुँह से काले खून की धारा बह निकली। उसने अपने हथियार गिरा दिए और घुटनों के बल नीचे बैठ गया।
"सम्राट... क्षमा करें..." क्रॉसन के मुँह से आखिरी शब्द निकले और उसका विशाल शरीर जमीन पर ढेर हो गया।
विक्रमादित्य ने अपनी तलवार को खून से साफ किया और उसे वापस म्यान में रख लिया। उसने सामने देखा—प्रथम चक्र की सीमा समाप्त हो रही थी और आगे द्वितीय चक्र (दूसरा चक्र) का खौफनाक द्वार उसका इंतजार कर रहा था।
वह बिना रुके, अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ चला।
[जारी...]

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
द किंग ऑफ़ हेल (The King Of Hell)
Chapter
2 of 3
Category
Haunted Places
Reading time
6 min
Words
1047
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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