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भाग पहला — शहर के बीच का शांत खंडहर

KaliRaatKiKalam · Haunted Places · 11 मिनट

Writer
KaliRaatKiKalam
Story
मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
Chapter
1 of 3
Category
Haunted Places
Reading time
11 min
Words
2083
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

मुंबई — शहर जो कभी सोता नहीं।
रात के तीन बजे भी जब पूरा शहर अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेता है, तो लोकल ट्रेनों की धड़धड़ाहट उसकी नसों में दौड़ती रहती है, जैसे किसी दीवाने की धड़कन जो रुकने से कतराती हो। मरीन ड्राइव की लाइटें समंदर को हमेशा जगाए रखती हैं — पीली, नारंगी, हरी — और समंदर, बूढ़ा जादूगर, उन रोशनियों को अपनी लहरों पर उलटा कर लोगों को वापस फेंक देता है, जैसे कह रहा हो कि मैंने तुम्हारी सारी रोशनी देख ली है, अब सो जाओ। पर शहर नहीं सोता। शहर की गलियों में भटूरे तलने की आवाज़ रात के दो बजे तक चलती है, किसी फुटपाथ पर कोई गिटार बजाता हुआ अजनबी गाता है, किसी अस्पताल की खिड़की से कोई रोता है, और किसी टैक्सी के रेडियो पर कोई पुराना गाना ऐसे बजता है जैसे उसे गाने वाला अभी-अभी मरा हो।
इसी शहर के सबसे अमीर इलाक़े — मलबार हिल — जहाँ ज़मीन सोने के भाव बिकती है, जहाँ हर कोने पर एक इमारत ऐसी खड़ी है जिसे देखकर आम आदमी अपनी जेब का हिसाब भूल जाता है — वहाँ, एक तंग-सी पुरानी गली में, पेड़ों की घनी छाँव के नीचे, एक हवेली खड़ी है जिसे शहर ने भुला दिया है। या शायद — और यह "शायद" ज़रूरी है, क्योंकि इस शहर में हर बात के दो हिस्से होते हैं, एक जो दिखता है और एक जो दिखता नहीं — शायद शहर ने जानबूझकर उसे अपनी यादों से बाहर कर दिया है।
गली इतनी तंग है कि दोपहर की धूप भी उसमें पूरा शरीर नहीं ला पाती — आधी रोशनी दीवारों पर आकर ठिठक जाती है, जैसे कोई मेहमान दरवाज़े पर रुककर अंदर की तरफ़ झाँकता हो और फिर सोचे कि अभी नहीं। गली के दोनों ओर पीपल के पेड़ हैं, पुराने, मोटे, जिनकी जड़ें सड़क की नींव को चूमती हुई अंदर तक गई हैं। पेड़ों पर कभी पक्षी नहीं बैठते — या ऐसा गली के बूढ़े चौकीदार का दावा है — "पक्षी पीपल पर बैठते हैं बाबा, पर उस हवेली वाली तरफ़ के पेड़ों पर क्यों नहीं बैठते, यह मैं तीस साल से देख रहा हूँ, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।"
हवेली का नाम पुराने कागज़ों में "जयविलास" मिलता है। मुंबई नगर निगम की पुरानी नक़लों में, जिनके किनारे कीड़े लग चुके हैं, सन् 1905 का एक एंट्री है — "बंदोबस्त संख्या 214 — जयविलास — श्रीधर जयवंत, व्यापारी — तीन मंज़िला निवास, बरामदे सहित।" तीन मंज़िला, ईंट-चूने की, जिनके बरामदों में गुलाब की बेलें चढ़ती थीं, जिसके आंगन में कभी फव्वारा चलता था — हansों वाला, मार्बल का, जिसका पानी ऐसे उछलता था जैसे कोई बच्चा ठहाका लगा रहा हो — और जिसकी खिड़कियों से कभी समंदर दिखता था। उस वक़्त जब मुंबई बॉम्बे था, जब इस शहर में घोड़ा-गाड़ियाँ चलती थीं, जब मलबार हिल पर नंगे पाँव चलने वाले पारसी बच्चे स्कूल से लौटते थे और हवाओं में अंग्रेज़ी कॉलर की खुशबू और इत्र की मलक्का खुशबू एक-दूसरे में घुलती थीं।
आज हवेली के चारों ओर ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें खड़ी हैं — काँच की, चमकती हुईं, जिनके फ्लैट करोड़ों में बिकते हैं और जिनके लिफ्टों में अंग्रेज़ी में बोली जाने वाली आवाज़ें कहती हैं "गोइंग अप"। वहाँ रहने वाले लोग सुबह-सुबह अपनी बालकनियों में खड़े होकर समुद्र देखते हैं, और कॉफ़ी पीते हुए दुनिया की हर ख़बर पर टिप्पणी करते हैं — पर नीचे, उस तंग गली की तरफ़, कोई नहीं देखता। उनकी बालकनियों से जयविलास की खिड़कियाँ ठीक सामने आती हैं, पर किसी ने कभी वहाँ देखने की ज़हमत नहीं उठाई। जैसे वह इमारत नहीं, गली में एक ठहरी हुई साँस है, जिसे देख लेने से साँस अपना धीरज खो देगी।
और जयविलास के आसपास की ज़मीन किसी बिल्डर ने नहीं छुई।
यह बात इस शहर की सबसे बड़ी गुत्थी है, क्योंकि मुंबई में अगर किसी ज़मीन पर कोई इमारत नहीं उठ रही, तो उसका मतलब यह नहीं कि वहाँ ज़मीन नहीं है — उसका मतलब यह है कि वहाँ क़ानून, या क़िस्मत, या कुछ और, रास्ता रोक रहा है। न इसलिए कि क़ानून ने रोका था — क़ानून तो बिक जाता है, यह शहर जानता है — बल्कि इसलिए कि जिस भी बिल्डर ने इस ज़मीन को खरीदने की कोशिश की, वो या तो सौदे से पीछे हट गया, या उसके साथ कुछ ऐसा हुआ कि उसने शहर ही छोड़ दिया।
इसकी कहानियाँ गली के चायखानों में मिलती हैं, बिना नाम के, बिना तारीख़ के, जैसे शहर अपनी फुसफुसाहट में उन्हें बचाकर रखता हो। नब्बे के दशक की बात है — एक बिल्डर, जिसका नाम आज कोई याद नहीं रखता, पर जिसके साथ वह क़िस्सा ज़रूर जुड़ा है — उसने जयविलास खरीदने का ठेका लिया। कागज़ बन गए, पैसा हाथ बदला, और एक सुबह मज़दूर भेजे गए — हथौड़े लेकर, शटर लेकर, उस पुराने प्लास्टर को तोड़ने के लिए जो सौ साल की धूल अपने सीने पर ढो रहा था।
तीन मज़दूर अंदर घुसे।
तीनों एक घंटे बाद बाहर निकले — बिना हथौड़ों के।
हथौड़े कहाँ गए, यह किसी ने नहीं पूछा, क्योंकि जो लोग उन्हें देखकर आए थे, उनकी नज़रें हथौड़ों पर नहीं, उन तीन चेहरों पर थीं — तीनों के चेहरे ऐसे थे जैसे तीनों ने कोई ऐसी बात सुन ली हो जिसे सुनकर इंसान अपनी उम्र काट दे। तीनों ने एक ही बात कही, एक ही लहज़े में, एक ही साँस के साथ, जैसे तीनों के गले में एक ही आवाज़ बँट गई हो —
"अंदर कोई बैठा है। बहुत धीरे-धीरे गा रहा है। और उसने हमें कहा कि यह घर अभी किराए पर नहीं — अपने लोगों के इंतज़ार में है।"
बिल्डर ने मज़दूरों से पूछा — किसने कहा? कहाँ बैठा था? आवाज़ किसकी थी? तीनों में से कोई जवाब नहीं दे पाया। एक ने कहा कि आवाज़ दीवार से आई, दूसरे ने कहा फ़र्श से, और तीसरे ने बस अपने कान पकड़ लिए और बार-बार कहने लगा कि अब वह आवाज़ कभी रुकेगी नहीं। बिल्डर ने वह शाम एक होटल के कमरे में बंद रहा, और अगली सुबह उसने अपने वकील को फोन किया और एक ही वाक्य कहा — "सौदा ख़त्म। पैसा डूबने दो। और अगर तुमने किसी से मेरा नाम इस ज़मीन के साथ जोड़ा, तो मैं तुम्हें शहर से निकलवा दूँगा।" वह बिल्डर छह महीने बाद दुबई चला गया। कहते हैं, वह कभी लौटकर नहीं आया — और मरते-मरते उसने अपने बेटे से कहा कि मुंबई में एक हवेली मेरे नाम की मत लिखना, कहीं वह मुझे ढूँढ न ले।
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इसी हवेली की कहानी लेकर एक शाम एक युवा पत्रकार पहुँची — तारा मेहरोत्रा, उम्र सत्ताईस साल।
तारा का नाम उसके काम से भी पहले बन चुका था, पर वह नाम ऐसा नहीं था जिसे लोग अखबार की सुर्ख़ियों में पढ़ते — वह नाम था उन चीज़ों का, जो लोग उसे भेजते थे। एक टूटी डाकिया से लिफाफ़ा, एक फोटोकॉपी की हुई कटिंग जिस पर पीली स्याही में किसी की दादी की तस्वीर टेप से चिपकी थी, एक किराये की दुकान का बिल जिसके पीछे किसी ने पेंसिल से लिखा था — "यह इमारत कल ढह जाएगी, कोई लिख ले इसे"। तारा मुंबई के एक छोटे से वेब पोर्टल के लिए "शहर की भूली हुई कहानियाँ" नाम की सीरीज़ लिखती थी — वह सीरीज़ जिसे शुरुआत में उसके एडिटर ने "पेज-भरने का सामान" कहा था, पर जो धीरे-धीरे शहर की उन लोगों की रोज़ की सुबह बन गई थी जिनके अपने घर कहीं ढह चुके थे और जो अब किसी और के घरों की कहानियाँ पढ़कर अपने घर याद करते थे।
तारा ने गिरजाघरों की इंचीटेप से नापी हुई दीवारों की कहानियाँ लिखी थीं, बंद पड़े सिनेमा घरों की कहानियाँ, उस आखिरी पुस्तक की दुकान की कहानी जो आगे पढ़ने की जगह आँखों से पढ़ती थी, उस वॉशिंग कॉलोनी की कहानी जहाँ हर सिलाई मशीन पर एक ही सवालिया गीत गुनगुनाया जाता था। उसका नियम था — वह कभी किसी इमारत को "डरावनी" नहीं लिखती थी। वह लिखती थी — "उदास", "अधूरी", "इंतज़ार में"। क्योंकि उसका मानना था कि डर वह चीज़ है जो इंसान दूसरों पर थोपता है, और उदासी वह चीज़ है जो इमारतें खुद पर ले लेती हैं।
और उसे इस हवेली के बारे में बताया उसके दफ़्तर के बूढ़े लिफ्टमैन, गफ़ूर चाचा, ने।
गफ़ूर चाचा की लिफ्ट एक ऐसी लिफ्ट थी जिसे शहर ने बीस साल पहले बंद कर देना चाहिए था — पीतल के बटन, जिनके अक्षर घिस चुके थे, एक पंखा जो आधा घूमता था और आधा सोचता, और एक चरमराहट जो हर मंज़िल पर ऐसे आती थी जैसे कोई बूढ़ा इंसान सीढ़ियाँ चढ़ते हुए रुक-रुक कर अपनी उम्र माँग रहा हो। गफ़ूर चाचा उस लिफ्ट में बैठते थे चौबीस साल से, और उनकी लिफ्ट की कुर्सी इतनी घिस चुकी थी कि उस पर किसी पुराने लोग की गोद जैसी कटी हुई थी। तारा दफ़्तर आती थी तो वे उसके लिए लिफ्ट का दरवाज़ा ऐसे खोलते थे जैसे कोई दादा अपनी नातिन का दरवाज़ा खोलता हो — और हर बार वही एक सवाल — "बिटिया, आज किसकी कहानी लिख रही हो?"
उस शाम — जब मॉनसून अपनी पहली बारिश की खुशबू शहर में बिखेर रहा था और तारा अपनी सीरीज़ के लिए नई कहानी ढूँढ रही थी — गफ़ूर चाचा ने अपनी चाय का कप नीचे रखा, अपने चश्मे को ठीक किया, और उस तरह देखा जिस तरह बूढ़े लोग देखते हैं जब वे किसी को किसी चीज़ की तरफ़ धकेलने वाले हों, खींचने वाले नहीं।
"बिटिया," उन्होंने कहा, "तुम शहर की कहानियाँ लिखती हो ना, तो एक हवेली है मलबार हिल में — उसकी कहानी लिख लो।"
तारा ने नोटबुक निकाली। "नाम?"
"जयविलास। पर नाम लिखने से पहले एक बार गफ़ूर चाचा की बात सुन लेना।" बूढ़े आदमी की आवाज़ में एक ऐसी गहराई आई जो लिफ्ट की चरमराहट में भी नहीं थी। "उस हवेली के सामने से गुज़रना — यह तुम्हारा काम है, मैं नहीं रोकूँगा — पर तीन बातें याद रखना, और इन्हें नोटबुक में नहीं, कानों में लिखना। कभी खिड़की में मत देखना। कभी पियानो सुनकर मत रुकना। और कभी — कभी लैम्प के नीचे अपना साया मत तौलना।"
तारा हँसी। वह ऐसी हँसी थी जो सत्ताईस साल की उम्र की होती है — पूरे आत्मविश्वास के साथ, पूरी दुनिया को गिनने की हिम्मत के साथ।
"चाचा, आप भी," उसने कहा, "मुंबई में भूत-प्रेत? यहाँ तो ट्रेन में साँस लेने की जगह नहीं मिलती, भूत कहाँ बैठेंगे? भूत भी तो रेंट देंगे, और इस शहर में रेंट कौन दे पा रहा है?"
गफ़ूर चाचा हँसे नहीं। उन्होंने अपनी चाय का कप नीचे रखा — धीरे से, बिना आवाज़ किए, जैसे कप नहीं, कोई अहम सबूत रख रहे हों — और बहुत गंभीरता से बोले:
"बिटिया, भूत खाली जगहों पर नहीं रहते। खाली जगहों पर तो बिल्डर रहते हैं, और वो तुम्हारी तरह रोशनी ढूँढते हैं।" उन्होंने लिफ्ट का पंखा देखा, जो आधा घूमा और रुक गया। "भूत अधूरी कहानियों में रहते हैं — और मुंबई जैसे शहर में अधूरी कहानियों की कोई कमी नहीं है। यहाँ हर फुटपाथ पर कोई न कोई अपनी कहानी अधूरी छोड़कर गया है — कोई ट्रेन पकड़ने से पहले, कोई आखिरी बार माँ को फोन करने से पहले, कोई अपना नाम किसी को बताए बिना। जयविलास में भी एक कहानी अधूरी है — सौ साल से — और जो लोग उसे सुनने जाते हैं, उनमें से कुछ तो वापस आते हैं..."
वे रुके। लिफ्ट उसी मंज़िल पर खड़ी रही, और शहर की धड़कन काँच के बाहर चलती रही — हॉर्न, भीड़, किसी की हँसी, किसी की गाली।
"पर कुछ," गफ़ूर चाचा ने अपनी आँखें तारा की आँखों में उतारते हुए कहा, "कुछ उस कहानी का हिस्सा बन जाते हैं।"
लिफ्ट का दरवाज़ा उस शाम तारा के लिए खुला, पर तारा को बाद में याद आया कि उस शाम लिफ्ट उसके मंज़िल से एक मंज़िल ऊपर गई थी — पहली बार बत्तीस सालों में — और जब उसने गफ़ूर चाचा से पूछा था कि ऊपर क्याँ है, तो बूढ़े आदमी ने बस इतना कहा था — "ऊपर कुछ नहीं है बिटिया, ऊपर बस वो मंज़िल है जहाँ लिफ्ट अपने आप रुक जाती है। मैं भी उसे रोकना नहीं चाहता।"
तारा बाहर निकली, मॉनसून की हवा उसके चेहरे पर लगी, और उसने अपनी नोटबुक बंद की — पर उस रात, अपने कमरे में, उसने नोटबुक दोबारा खोली और एक पन्ने पर सिर्फ़ तीन लाइनें लिखीं, बिना समझाए, बिना कारण — जैसे कोई लिखवा रहा हो:
खिड़की में मत देखना।
पियानो पर मत रुकना।
साया मत तौलना।
और उसी पन्ने के नीचे, बिल्कुल हाशिए पर, उसके हाथ ने अपने आप — या शायद उसके हाथ ने जानबूझकर, यह तारा आज तक तय नहीं कर पाई — एक चौथी लाइन खींची थी:
और अगर हवेली खुद दरवाज़ा खोल दे, तो?

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