Pretika › Haunted Places › मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
भाग दूसरा — पियानो बजाने वाली
KaliRaatKiKalam · Haunted Places · 11 मिनट
- Writer
- KaliRaatKiKalam
- Story
- मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
- Chapter
- 2 of 3
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2193
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तारा को नींद उस रात देर से आई, और जब आई, तो सपने में एक ऐसी खिड़की थी जिस पर मलमल का पर्दा था और पर्दे के पीछे कोई धीरे-धीरे गिन रहा था — एक, दो, तीन... और सात पर रुक गया, और फिर वहीं से दोबारा शुरू — एक, दो, तीन... तारा ने सपने में गिनती गिनने की कोशिश की, पर उसकी गिनती हर बार आठ पर पहुँचकर टूट जाती थी, जैसे कोई उसकी ज़ुबान पर हाथ रख देता हो। वह सुबह अपने बिस्तर पर बैठी हुई उठी, मुंबई की धूप पर्दे से छनकर उसके कमरे में आ चुकी थी, और उसके सीने में एक ऐसी बेचैनी थी जो किसी कहानी का इंतज़ार नहीं करती — कहानी उसे ढूँढ लेती है, और इंसान बस उसके रास्ते से हट जाता है।
उसने उसी सुबह फ़ैसला कर लिया — कहानी शुरू की जाएगी कागज़ों से। क्योंकि तारा का नियम था, और वह नियम उसके नाना ने उसे दिया था — "बेटी, हर डरावनी चीज़ के दो चेहरे होते हैं — एक जो रात में दिखता है, और एक जो अखबारों की पीली कटिंग्स में छिपा होता है; पहले वाले से बचना, पर दूसरे वाले को ढूँढना, क्योंकि सच हमेशा पहले वाले में नहीं, दूसरे वाले में बैठा होता है।"
मुंबई के पुराने अखबारों का अभिलेखागार शहर के एक ऐसे कोने में था जहाँ पहुँचने के लिए तीन गलियाँ और एक ऐसी सीढ़ी पार करनी पड़ती थी जिसकी हर सीढ़ी पर कोई न कोई नाम उकेरा हुआ था — किसी का प्यार, किसी का इंतज़ाम, किसी का बदला। अभिलेखागार के अंदर समय ठहरा हुआ था — पंखे धीरे घूमते थे, लकड़ी की अलमारियों से सौ साल की धूल की खुशबू आती थी, और अखबारों के बंडलों को ऐसे बाँधा गया था जैसे उन्हें नहीं, उनके अंदर की साँस को बचाकर रखना हो। वहाँ का अभिलेख-पाल एक ऐसे आदमी थे जिनकी उम्र किसी ने कभी पूछी नहीं थी — सब उन्हें बस "मास्टर" कहते थे। मास्टर ने तारा को देखा, उसका परिचय पत्र देखा, और उसका नाम सुनकर अपने चश्मे के ऊपर से देखा।
"मेहरोत्रा," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे नाम को हाथ में तौल रहे हों। "तुम्हारे नाना आते थे यहाँ। गोवा के पुर्तगाली खानदान से थे, मूल तो यहीं का — और यहीं की कहानियों के भूखे। वो भी ऐसे ही बैठते थे इसी मेज़ पर, और कहते थे — 'मास्टर, आज किसी इमारत की साँस सुननी है।'" मास्टर ने अपनी कुर्सी घुमाई। "पूछो। किसकी साँस सुननी है आज?"
"जयविलास," तारा ने कहा। "मलबार हिल। सन् 1905।"
मास्टर की कुर्सी की चरमराहट रुक गई। उन्होंने कुछ देर तारा को देखा, फिर उठे, और गए — और तारा ने देखा कि बूढ़ा आदमी सीढ़ी नहीं चढ़ता, वह सीढ़ी से ऊपर तक ऐसे पहुँचता है जैसे सीढ़ी उसे पहचानती हो। वे लौटे तो उनके हाथ में एक गत्ते का डिब्बा था, जिसके ऊपर लाल स्याही से लिखा था — "1905–1923 — जयविलास, मलबार हिल — खोलने से पहले हाथ धोएँ।"
"यह डिब्बा," मास्टर ने कहा, "तीस साल पहले एक इतिहास-प्रेमी ने दान में दिया था। उसने कहा था कि इसमें वो कागज़ है जिसे कोई माँगने वाला आएगा। मैंने पूछा था — कैसे पहचानेंगे कि वही है? तो उसने कहा था — 'वो पूछेगी हवेली के बारे में, पर सुनने के बाद मौन हो जाएगी।'"
तारा ने डिब्बा खोला — और उस शाम से लेकर अगली तीन रातों तक, अभिलेखागार की उसी मेज़ पर, तारा ने एक ऐसी कहानी पढ़ी जो किसी पुरानी फिल्म जैसी थी, जिसमें खुशी और मातम दोनों एक ही परदे पर चलते हैं।
पहली कटिंग सन् 1905 की थी — "मलबार हिल पर नया आलीशान निवास: श्रीधर जयवंत का जयविलास — नगर की ज्योति।" तारा ने पढ़ा कि हवेली एक गुजराती व्यापारी, श्रीधर जयवंत, ने बनवाई थी — कपास और मसाले के कारोबार से जो धन आया, वह इस शहर में ईंट का रूप लेकर जम गया। पर कटिंग का आखिरी पैरा तारा को रोक गया — "कहा जाता है कि श्रीधर जयवंत ने यह भव्य निवास अपनी बेटी के लिए बनवाया है, जो वर्तमान में लंदन में तालीम ग्रहण कर रही हैं, और जिनका पियानो-वादन जल्द ही इस शहर के श्रोताओं को मोहित करेगा।" बेटी का नाम था — मीरा।
अगली कटिंग 1908 की थी — तस्वीर वाली। तारा ने उस तस्वीर को लंबे समय तक देखा — एक युवती, सादे सफ़ेद परिधान में, खुले बाल, और उसके पीछे एक खिड़की जिससे समंदर की एक धारी दिख रही थी। तस्वीर के नीचे कैप्शन था — "सुश्री मीरा जयवंत, जिन्होंने लंदन से पियानो की विद्या संपन्न की; स्वदेश लौटकर प्रथम प्रस्तुति जयविलास के आंगन में।" और उसी कटिंग के बगल में, किसी ने क़लम से एक और तारीफ़ की पंक्ति कतरकर चिपकाई थी — "मलबार हिल की वो शामें, जब जयविलास की खिड़कियों से पियानो की धुन समंदर की लहरों तक पहुँचती थी और राहगीर रुककर सुनते रह जाते थे। रुकते थे, और फिर चल देते थे — पर कुछ रुकने वाले कहते थे कि धुन ने उन्हें उनका नाम लेकर पुकारा।"
तारा ने वह पंक्ति दो बार पढ़ी। उसके कानों में गफ़ूर चाचा की आवाज़ गूँजी — कभी पियानो सुनकर मत रुकना — और उसे अजीब लगा कि सौ साल पहले की एक कटिंग, एक चिपकाई हुई तारीफ़, उसी नियम की तरफ़ इशारा कर रही है।
फिर आईं वो कटिंग्स जिन्हें पढ़ना तारा के लिए मुश्किल था — क्योंकि वे बहुत खुश थीं। 1909 — "जयविलास में संगीत संध्या: सुश्री मीरा ने शास्त्रीय संगीत की नई ज्योति प्रज्वलित की।" 1911 — "शहर की संगीत-प्रेमी जनता का जयविलास की ओर रुझान; राहगीरों की भीड़ गली में जमा होती है।" 1914 — "युद्ध के बादलों के बीच जयविलास का पियानो: सुश्री मीरा का वादन दुखी दिलों को सांत्वना देता है।" एक कटिंग में तो लिखा था कि एक अंग्रेज़ अफ़सर, जो फ़्रांस से लौटा था और रात को सो नहीं पाता था, हर शाम हवेली के नीचे खड़ा होता था, और जब उससे पूछा गया कि वह वहाँ क्या करता है, तो उसने कहा था — "मैं नहीं जानता यह कौन बजाता है, पर इस धुन को सुनकर मैं जंग में गए अपने भाई को माफ़ कर पाता हूँ।"
तारा उन कटिंग्स को पढ़ती गई और उसे लगा जैसे वह किसी के जीवन की सबसे अच्छी दोपहरों से गुज़र रही है — वह युवती जो आंगन में बैठती थी, जिसकी उंगलियाँ चाबियों पर उतरती थीं, जिसके पियानो पर समंदर की लहरें रुककर सुनती थीं, जिसके नाम पर राहगीर भीड़ लगाते थे — मीरा। नाम पढ़ते-पढ़ते तारा को अपने नाना की वह पंक्ति याद आई — दुनिया में कुछ धुनें ऐसी हैं जो बजाने वालों की नहीं होतीं — और उसने अपनी नोटबुक में लिखा: "यह कहानी एक हवेली की नहीं है। यह कहानी एक कलाकार की है, और हर कलाकार की कहानी में एक ऐसा पन्ना होता है जिसे कोई पढ़ना नहीं चाहता।"
वह पन्ना 1923 में था।
अभिलेखागार में उस दिन बिजली कट गई थी — मॉनसून की एक बूँद किसी तार में घुस गई थी, पंखे रुक गए, और मास्टर मोमबत्ती लेकर आए, जिसकी लौ काँप रही थी। तारा ने मोमबत्ती की रोशनी में वह कटिंग खोली, और उसकी साँस रुक गई — क्योंकि कुछ कागज़ ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ने से पहले इंसान समझ जाता है कि अब साँस अपने आप रुकेगी।
"मलबार हिल के जयविलास में शोक की घड़ी — श्रीधर जयवंत की इकलौती संतान, सुश्री मीरा, की मृत्यु नौकरानी की लापरवाही से लगी आग में; पिता ने हवेली को हमेशा के लिए बंद कर दिया। कहा जाता है कि मृत्यु से पहले की रात सुश्री मीरा ने अपना आखिरी वादन किया था, एक ऐसी धुन जो उन्होंने स्वयं रची थी और जिसका नाम उन्होंने अपने संगीत-गुरु के पत्र में लिखा था — 'घर वापसी की धुन।'"
मोमबत्ती की लौ काँपती रही। तारा ने कटिंग को दोबारा पढ़ा — नौकरानी की लापरवाही — और फिर उसके बाद की एक छोटी-सी, लगभग अनदेखी-सी कतरन, जो किसी ने तार से जोड़कर उसी बंडल में रखी थी — कोई अखबार की टिप्पणी, बिना सिर, बिना नाम — "जयविलास की घटना पर पड़ोसियों का कहना है कि उस रात आग लगने से पहले हवेली में पियानो बज रहा था, और बजता रहा — लोगों ने दावा किया कि आग की लपटों के बीच भी धुन नहीं रुकी, यहाँ तक कि जब दरवाज़े की लकड़ी जल उठी थी। अग्निशमक दल के एक अधिकारी ने, नाम जाहिर न करने की शर्त पर, कहा कि उन्होंने अंदर से कोई आवाज़ नहीं सुनी — सिर्फ़ संगीत, और संगीत, उनके शब्दों में, 'एक ऐसा गीत जो किसी के आने का इंतज़ार कर रहा हो।'"
तारा की उंगलियाँ कटिंग के किनारों पर जम गईं। मास्टर ने मोमबत्ती नीचे रखी और धीरे से बोले — "यहीं रुक जाती हैं ज़्यादातर लड़कियाँ। तुम रुकी नहीं। इसलिए डिब्बे की बात याद रखना — यह जो अब तुम पढ़ने जा रही हो, यह अखबार में नहीं है। यह पत्र है। और पत्र वो चीज़ है जिसे इंसान लिखता है जब उसे किसी एक इंसान तक पहुँचना होता है — चाहे वह इंसान सौ साल बाद आए।"
डिब्बे की सबसे नीचे की परत में, रेशम के कपड़े में लिपटा, एक पत्र था — पीला, नाज़ुक, जिसके किनारे आग से झुलसे जैसे थे। वह पत्र मीरा के संगीत-गुरु का था, लंदन से लिखा गया, और वह पत्र किसी इतिहास-प्रेमी ने अभिलेखागार को दान किया था — शायद इसलिए कि उसने उसमें वो चीज़ देख ली थी जो दूसरों को दिखाई नहीं देती — कि यह पत्र कोई दस्तावेज़ नहीं, एक तार है, जो सौ साल से बिजली का इंतज़ार कर रही है।
पत्र में लिखा था — और तारा ने उसे मोमबत्ती के पास लाकर, काँपती लौ के पास, पढ़ा — पुरानी अंग्रेज़ी लिखावट में, जिसे मास्टर ने उसके लिए धीरे-धीरे हिंदी में उतारा, और उसकी एक-एक पंक्ति तारा के सीने में ऐसे उतरी जैसे ठंडा पानी —
"मीरा ने मुझे अपने आखिरी पत्र में लिखा था — 'गुरुजी, मैंने एक ऐसी धुन रची है जो अधूरी है; आखिरी सात सुर मुझे नहीं मिल रहे। मैं रात में उठती हूँ और बजाती हूँ, और रोशनी की बत्ती तक मुझसे नहीं जलती — बत्ती जलती है, पर मेरी आँखें उसे भर नहीं पातीं, क्योंकि सारी रोशनी उस सात सुर में चली गई है जो नहीं मिल रहे। डर लगता है कि कहीं मैं उन्हें ढूँढ न पाऊँ तो क्या होगा — क्योंकि मुझे लगता है कि जिस दिन मैं यह धुन पूरी कर लूँगी, उस दिन मैं घर से बाहर निकल पाऊँगी, उस घर से जो मुझे अपने भीतर क़ैद किए हुए है। मैंने पिता से कहा कि यह धुन मेरी शादी की तरह है — उन्होंने हँसकर कहा कि शादी तो मैं तुम्हारी कर दूँगा, तुम धुन क्यों नहीं पूरी कर लेतीं। पिता नहीं जानते कि कुछ धुनें दहेज में नहीं मिलतीं, गुरुजी — कुछ धुनें क़िस्मत में लिखी जाती हैं, और क़िस्मत ने मेरी धुन को अधूरा इसलिए रखा है कि शायद इसे पूरा करने वाला कोई और है, जिसे मैं अभी नहीं जानती।'"
पत्र की तारीख़ थी — 14 फ़रवरी 1923।
और मीरा की मौत हुई थी — 15 फ़रवरी 1923 की रात को, उसी आग में, जो उसी कमरे में लगी थी जहाँ पियानो रखा था।
अभिलेखागार में उस रात बिजली नहीं आई, और मास्टर ने तारा को जाने नहीं दिया — "अब बाहर मत जाओ बिटिया, रात ऐसी चीज़ है जो दरवाज़े पर आकर इंतज़ार करती है, अंदर मत बुलाओ उसे।" तारा उसी मेज़ पर बैठी रही, डिब्बे के सामने, और उसने मीरा की कटिंग्स को एक क्रम में सजाया — 1905 की ईंटों से 1923 की राख तक — और उसे वह दिखा जो शायद किसी ने पहले नहीं देखा था: हर खुशी की कटिंग में धुन आगे बढ़ती दिखती थी, हर तारीफ़ में "अधूरी" शब्द किसी कोने में छिपा था — एक साक्षात्कार में मीरा ने खुद कहा था, "मेरी धुन अभी पूरी नहीं हुई है; लोग सुनते हैं और सोचते हैं कि मैं रुक गई हूँ — मैं रुकी नहीं हूँ, मैं इंतज़ार कर रही हूँ।" और सन् 1922 की आखिरी कटिंग में — जो उसके जीवन की आखिरी मुद्रित बात थी — मीरा का एक वाक्य था, जिसे पढ़कर तारा अपनी कुर्सी से उठ नहीं पाई:
"संगीत में एक बात बताइए, क्या कभी कोई धुन किसी इंसान की हो जाती है — ऐसे जैसे कोई घर, कोई माँ, कोई नाम?"
तारा ने अपनी नोटबुक खोली और उस पन्ने पर, जिस पर तीन नियम और वह चौथी लाइन लिखी थी, अब पाँचवीं लाइन लिखी — और इस बार उसे यकीन था कि उसका हाथ नहीं, कहानी लिखवा रही है:
"आखिरी सात सुर — मिलेंगे कहाँ? और अगर मिल गए — तो क्या वह हवेली उन्हें मुझसे लेने देगी?"
और अभिलेखागार की बंद खिड़की के बाहर, मॉनसून की उस रात, मलबार हिल की दिशा में, बादलों के पीछे से एक बिजली चमकी — दूर, बिना गड़गड़ाहट के — और तारा को ऐसा लगा जैसे किसी ने किसी तीसरी मंज़िल की खिड़की में, पर्दे के पीछे से, एक बार रोशनी जला दी हो — और बुझा दी हो — और जला दी हो।
मास्टर ने मोमबत्ती बुझाई और अंधेरे में कहा — "सो जाओ बिटिया। कल से तुम्हें कागज़ों में नहीं जाना होगा। कल से जो कहानी है, वो तुम्हें ढूँढने आएगी — क्योंकि अब तुम्हारे पास वह नाम है जिसे उसने सौ साल से अपने पते पर लिखा है।"
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