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भाग तीसरा — पहली मुलाक़ात

KaliRaatKiKalam · Haunted Places · 9 मिनट

Writer
KaliRaatKiKalam
Story
मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
Chapter
3 of 3
Category
Haunted Places
Reading time
9 min
Words
1684
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगली शाम तारा ने जाने का फ़ैसला किया — और बाद में, जब वह इस कहानी को लिख चुकी थी, तो उसने उस फ़ैसले के बारे में बहुत सोचा, क्योंकि उसे कभी यक़ीन नहीं हुआ कि वह फ़ैसला उसका खुद का था। उसने पूछा खुद से — क्या मैं गई थी कहानी लेने, या कहानी ने बुला लिया था? और उसका जवाब हमेशा वही रहा — मैं गई थी साढ़े छह बजे, कैमरा लटकाए, नोटबुक थामे, और गफ़ूर चाचा के तीनों नियम कानों में गूँजते हुए — पर जब मैं गली में मुड़ी, तो मुझे लगा कि मैं घर नहीं जा रही, मैं वापस जा रही हूँ।
शाम के साढ़े छह बजे थे। मुंबई की भीड़ अपनी आवाज़ पर थी — गाड़ियों के हॉर्न, स्टॉलों पर तेल में कड़छी की आवाज़, किसी के ऊपर किसी का हाथ, किसी के नीचे किसी की आवाज़ — और तारा उस सबके बीच से निकलती गई, मलबार हिल की चढ़ाई पर, जहाँ पुरानी इमारतों की दीवारों पर अभी भी बॉम्बे के ज़माने की बलुआ पत्थर की खुशबू थी। उसने खुद को दिलासा दी उसी पुराने तर्क से — यह सिर्फ़ एक इमारत है, तारा, और तू एक पत्रकार है, और पत्रकारों का काम इमारतों से कहानियाँ पूछना है — पर उसके हाथ की उंगलियाँ नोटबुक के पन्नों पर बार-बार वही तीन लाइनें दोहरा रही थीं, जैसे कोई उससे हिफ़ाज़त करवा रहा हो।
और फिर वह गली आई।
तंग गली — जिसके मुँह पर कोई नाम नहीं था, कोई बोर्ड नहीं, कोई मुहर्रिर का निशान नहीं — जैसे शहर ने उस गली को अपने नक्शे से नहीं गिराया, बस किसी पुराने हिसाब की कतरन उतारकर अलग रख दी हो। तारा ने पहला क़दम गली में रखा, और वह हुआ जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी — भीड़ की आवाज़ रुक गई। नहीं धीमी हुई, नहीं दूर गई — रुक गई। जैसे किसी ने शहर की आवाज़ को इस गली के बाहर ही रोक दिया हो, एक अदृश्य रस्सी खींचकर, और गली के अंदर एक ऐसी खामोशी छोड़ दी हो जो मुंबई में कहीं नहीं मिलती — वो खामोशी जो सिर्फ़ पुराने स्कूलों के बंद कमरों में, सुबह-सुबह के गिरजाघरों में, और उन घरों में मिलती है जहाँ कोई किसी का इंतज़ार करते-करते सो गया है।
पीपल के पेड़ गिने-मुने पत्थरों की तरह दोनों ओर खड़े थे, और चौकीदार ने सही कहा था — पक्षी उन पर नहीं बैठे थे। हवा चल रही थी, पत्ते हिल रहे थे, पर उन पत्तों में वह आवाज़ नहीं थी जो पत्तों में होती है — वह रुई-सी फुसफुसाहट नहीं, वह हल्की-सी खड़खड़ाहट नहीं। पत्ते हिल रहे थे जैसे हवा नहीं, उन्हें कोई अंदर से आदेश दे रहा हो — हिलो, क्योंकि देखने वाला आ गया है।
और सामने, गली के अंत में — जयविलास।
तारा ने पहली बार उसे दिन की रोशनी में देखा, और उसे समझ आया कि अखबारों की तस्वीरें झूठ क्यों होती हैं — क्योंकि तस्वीरें इमारत का चेहरा लेती हैं, और जयविलास का चेहरा नहीं था, उसकी आदतें थीं। तीन मंज़िला, टूटा प्लास्टर, जिसके टुकड़े ज़मीन पर गिरे थे और ऐसे पड़े थे जैसे किसी ने उन्हें गिरने नहीं दिया, उतारा हो — धीरे से, नीचे उतारते हुए, जैसे कपड़े उतारे जाते हैं। जिन खिड़कियों के काँच बचे थे वो धूल से ऐसे ढके थे जैसे किसी ने अंदर से उन पर मलमल चढ़ा दिया हो — और तारा ने उसी पल अपनी नज़रें नीचे कर लीं, क्योंकि पहला नियम उसकी रीढ़ में उतर चुका था। ऊपर मत देखो। पर उसकी आँखें — आँखें हमेशा धोखेबाज़ होती हैं — कोने-कोने से ऊपर की ओर भागती रहीं, और उसने बिना देखे "देख लिया" कि तीसरी मंज़िल की बीच वाली खिड़की सबसे अलग है — उसका काँच साफ़ है। एक खिड़की, पूरी धूल-ढकी हवेली में, जिसका काँच साफ़ है — और वह बात इतनी छोटी थी, और इतनी बड़ी, कि तारा ने उसे तुरंत नोटबुक में नहीं लिखा। कुछ चीज़ें लिखने से पहले इंसान उन्हें दिल में उतार लेता है, क्योंकि दिल में उतरी चीज़ें भागती नहीं।
आंगन का फव्वारा सूखा पड़ा था — मार्बल का कटोरा, जिसके किनारे हansों की टूटी गर्दनें ऐसे पड़ी थीं जैसे किसी ने उन्हें देखते हुए मारा हो — और तारा ने सोचा कि यही वह फव्वारा है जिसकी पानी की आवाज़ पर राहगीर रुकते थे, और आज उसकी खामोशी पर कोई नहीं रुकता। बरामदों की बेलें सूख चुकी थीं, पर सूखी होकर भी वे दीवारों को ऐसे पकड़े हुए थीं जैसे कोई बूढ़ी औरत अपने घर की चौखट पकड़े खड़ी हो — छोड़ूँगी नहीं, कितने भी कह लो।
तारा ने कैमरा उठाया और फोटो लेनी शुरू कीं — दरवाज़े की, बरामदे की, फव्वारे की। वह हर शटर के साथ खुद से कहती — खिड़कियों में नहीं देखना है, खिड़कियों में नहीं देखना है — और वह कहती भी रही, और फोटो लेती भी रही। और फिर उसे वह बात महसूस हुई जो हर रिपोर्टर के साथ होती है — कि कैमरा एक ऐसी चीज़ है जो आँखों से ईमानदार होती है। आँख डर से फेर लेती हैं, आँख अपने आप झुक जाती हैं, आँख वह नहीं देखती जो नहीं देखना — पर लेंस को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेंस के सामने जो है, वह लेंस के अंदर आ जाता है। चाहे देखने वाला तैयार हो या न हो।
जब उसने तीसरी मंज़िल की तस्वीर लेने के लिए कैमरा ऊपर उठाया, तो लेंस के अंदर, तीसरी मंज़िल की बीच वाली खिड़की में — उसी खिड़की में, जिसका काँच साफ़ था — उसे एक पर्दा हिलता हुआ दिखा।
तारा ने कैमरा नीचे किया। खिड़की खाली थी। पर्दा-सा कुछ था — धूल से पीला, एक ऐसी चीज़ जिसे आदमी पर्दा कह देता है क्योंकि उसके पास दूसरा नाम नहीं होता — पर हिलता हुआ कुछ नहीं था। गली में हवा नहीं थी। पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे — उस झूठी, आदेश-वाली हवा में — पर खिड़की के अंदर कोई हवा नहीं थी, और पर्दा फिर भी हिला था।
उसके दिल ने एक ज़ोर का धक्का खाया, और उसी धक्के ने उसे वह किया जो हर पत्रकार करता है — उसने फिर कैमरा उठाया।
इस बार लेंस में पर्दा नहीं था।
पर्दे के पीछे एक चेहरा था — बहुत दूर, बहुत धुंधला, सौ साल की धूल और सौ गज़ की दूरी के पार — पर इतना साफ़ कि तारा बता सके कि वह चेहरा मुस्कुरा रहा था। और वह मुस्कान कोई मामूली मुस्कान नहीं थी — वह मुस्कान थी जो किसी के बहुत दिनों बाद घर आने पर मिलती है, जब कोई दरवाज़े पर खड़ा होता है और अंदर वाला कहता है — अरे, तुम आ ही गए — और उस एक मुस्कान में इतने सालों का बोझ उतर जाता है। तारा ने कैमरा नीचे किया। उसके हाथ ठंडे थे। उसने खुद को कहा — पहला नियम, तारा, पहला नियम — और उसने कैमरा बंद किया और गली से बाहर निकलने लगी, क़दम तेज़, साँस तेज़, और अपने पीछे वह खामोशी, जो अब उसके साथ-साथ चलने लगी थी जैसे किसी ने गली की हद बढ़ा दी हो।
पर बाहर निकलते-निकलते उसने एक काम कर डाला, जो उसे नहीं करना चाहिए था।
उसने कैमरे की आखिरी ली हुई तस्वीर वहीं खड़े-खड़े खोल ली।
पहले उसने सोचा कि वह स्क्रीन पर कुछ नहीं देखेगी — कि धुंधलाहट, धूल, रोशनी का धोखा — और कुछ देर तक ऐसा ही लगा। तस्वीर में खिड़की थी, पर्दा था, और पर्दे के पीछे अंधेरा था। और फिर तारा ने स्क्रीन को ज़ूम किया — और उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं, क्योंकि अंधेरे में से एक चेहरा उभर आया था, और अब वह धुंधला नहीं था। तस्वीर में — साफ़-साफ़ — एक औरत खड़ी थी। उम्र करीब बीस साल। बाल खुले हुए, जैसे अभी-अभी किसी ने उन्हें खोला हो। सादा परिधान, जैसा उस कटिंग की तस्वीर में था — और उसके हाथ में कुछ था जो चमक रहा था।
एक कागज़ का पन्ना।
जैसे संगीत की नोट-बुक का कोई पन्ना — और वह औरत उसे खिड़की से बाहर दिखा रही थी, गली की तरफ़, उस जगह की तरफ़ जहाँ तारा खड़ी थी — और जैसे उसे तारा ने देख लिया, वैसे तारा ने देख लिया कि वह औरत उसे दिखा नहीं रही थी। वह पूछ रही थी। पन्ना हाथ में पकड़े, खिड़की में खड़े, सौ साल की धूल के पार — कोई किसी से कुछ पूछ रही था, और उसका पूरा शरीर, उसकी पूरी खड़ी हुई मुद्रा, उसकी वह मुस्कान — सब एक ही सवाल था।
तारा ने और ज़ूम किया। ज़ूम करते-करते उसकी साँस रुकती गई, और ज़ूम की आखिरी सीमा पर, उसकी आँखें पन्ने पर लिखी पंक्ति पर टिक गईं — पुरानी अंग्रेज़ी लिखावट में, उसी लिखावट में जो मीरा के गुरु के पत्र में थी —
"क्या तुम संगीत जानती हो?"
तारा ने कैमरा वहीं बंद किया, गली से बाहर निकली, और शहर की आवाज़ उस पर ऐसे लौटी जैसे किसी ने बहुत दबाकर रखा रेडियो अचानक खोल दिया हो। हॉर्न। चीख़। तेल। हँसी। वह सब वापस था — पर तारा के कानों में वह सब बहुत दूर था, और बहुत पास थी एक खामोशी, जो अब उसके भीतर बैठ चुकी थी।
घर पहुँचकर उसने ताला खोला, दरवाज़ा खोला, अंदर आई — और तीसरे नियम को याद करके उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसे गफ़ूर चाचा की वह बात याद थी — जो पीछे आया है, उसे पहचान लेना उसे अपना लेने के बराबर है — और उसने दरवाज़ा बंद किया, बिना झाँके, बिना देखे, और दरवाज़े के पीछे, जहाँ गली की रोशनी थी, उसे ऐसा लगा कि वहाँ कुछ एक पल और खड़ा रहा — और फिर उस पल ने खुद को वापस खींच लिया।
उस रात तारा ने अपनी नोटबुक खोली और अंतिम पन्ने पर लिखा — और उसके हाथ काँप नहीं रहे थे, जो उसे सबसे ज़्यादा डराने वाली बात थी:
"मैंने उसे देखा। या उसने मुझे — यह अभी तय नहीं हुआ। पर सवाल तय हो चुका है, और सवाल यह है — 'क्या तुम संगीत जानती हो?'
और तारा — तुम्हें इसका जवाब देना ही होगा, क्योंकि अब तुम्हें अपने ही सीने में उस धुन का पहला सुर महसूस हो रहा है — वह सुर जो तुमने कभी सुना नहीं था, और जो तुम्हारी उंगलियों के नीचे, नोटबुक के इस पन्ने पर, अभी भी बज रहा है।"

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