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भाग चौथा — गफ़ूर चाचा का राज़

KaliRaatKiKalam · Haunted Places · 11 मिनट

Writer
KaliRaatKiKalam
Story
मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
Chapter
4 of 5
Category
Haunted Places
Reading time
11 min
Words
2199
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तारा अगली सुबह दफ़्तर नहीं गई — वह सीधी उस लिफ्ट के पास पहुँची जो बीस साल पहले बंद हो जानी चाहिए थी।
दफ़्तर की भवन की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त तारा ने तय कर लिया था कि वह गफ़ूर चाचा से सब कुछ कहेगी — तस्वीर, खिड़की, पर्दा, और वह पन्ना — क्योंकि उसे समझ आ चुका था कि यह कहानी सिर्फ़ अखबारों की नहीं है। जो आदमी तीन नियम इस तरह सुनाए जैसे वे दुआ हों, उसके पास सुनाने के लिए तीन नियम से कहीं ज़्यादा होता है।
लिफ्ट खुलने पर गफ़ूर चाचा ने उसे देखा — और बूढ़े आदमी का चेहरा पहले ही पल बदल गया। उन्होंने कुछ नहीं पूछा; बूढ़े लोग वह देख लेते हैं जो ताज़े चेहरों पर छाया नहीं होती। उन्होंने बस अपनी लिफ्ट की कुर्सी से उठकर कहा — "आज मैं तुम्हें ऊपर नहीं ले जाऊँगा, बिटिया। आज तुम मुझे नीचे ले चलना। बेसमेंट में चाय मिलती है, और नीचे की दीवारें कम कहती हैं।"
बेसमेंट की चाय की दुकान ऐसी जगह थी जहाँ शहर की धड़कन ऊपर से गुज़रती थी और नीचे बैठे लोग उसे बस एक धीमी आवाज़ सुनते थे — जैसे कोई बहुत बड़ा जानवर कहीं ऊपर सो रहा हो। दो कटोरी चाय आईं, और तारा ने अपना कैमरा निकाला, और बिना एक शब्द कहे, उसने वह तस्वीर उनके सामने रख दी।
गफ़ूर चाचा ने तस्वीर को बहुत देर तक देखा।
वह देर ऐसी थी जिसमें दो पीढ़ियाँ बीत जाती हैं। बूढ़े लिफ्टमैन ने तस्वीर को उठाया, उसे खिड़की की रोशनी में किया, फिर अपने चश्मे को साफ़ किया — और उस चश्मे को साफ़ करने की क्रिया तारा ने कभी नहीं भूली, क्योंकि वह किसी लेंस को साफ़ करने जैसी थी, जैसे उन्हें उस तस्वीर को ठीक से देखना था, अपने सारे बत्तीस साल की ताक़त से — और फिर उन्होंने ऐसे शब्द कहे, धीरे से, जैसे कोई गुनगुनी हुई चीज़ को छूता हो, जिनसे तारा समझ गई कि यह कहानी सिर्फ़ अखबारों की नहीं है।
"बिटिया, यह वही खिड़की है। और यह वही पन्ना है।"
उन्होंने चश्मा हटाया। उनकी आँखें बिना चश्मे की ढाल के बहुत पुरानी लग रही थीं, और उनमें वह चीज़ थी जो बूढ़े लोगों की आँखों में तब आती है जब वे किसी ऐसी बात को बाहर निकालने वाले हों जिसे उन्होंने अपनी उम्र की एक अलमारी में, ताला लगाकर, और फिर कुंजी खोकर, रखा हुआ था।
"बत्तीस साल पहले," गफ़ूर चाचा ने कहा, "जब मैं जवान था और इसी गली में रहता था — हाँ, उसी गली में, सामने ही मेरा एक कमरा था, पाँच रुपये किराया — तब मैंने भी यह पन्ना देखा था। और मैंने भी वही ग़लती की थी जो तुम करने जा रही हो। मैंने सोचा कि यह कोई खेल है, कोई पहेली है — और मैं उस पहेली को सुलझा लूँगा।" उन्होंने चाय की कटोरी घुमाई, पर पी नहीं। "मैं तुम्हें पहले वह बताता हूँ जो मैंने कभी किसी को नहीं बताया — और फिर वह बताता हूँ जो मुझे उस्ताद ने बताया था। और दोनों बातों के बीच, बिटिया, तुम्हें एक रात पार करनी पड़ेगी — मेरी रात।"
"साल 1993 की बात है। मुंबई उस साल जल रही थी — दंगों की आग थी, शहर की सड़कों पर जो कुछ था, उसे मैं शब्दों में नहीं बिठाऊँगा, क्योंकि कुछ चीज़ें बताई नहीं जातीं, बस पीढ़ियों में उतारी जाती हैं। उन दिनों मैं इसी इलाक़े में टैक्सी चलाता था — पीली-काली, नंबर MH 01, जो आज भी मेरी नज़रों के सामने खड़ी है। उस साल शामें जल्दी ढलने लगी थीं — शहर डरा हुआ था, लोग घरों में बंद थे, और मेरी टैक्सी खाली घूमती थी, क्योंकि कौन सवारी को अपनी जान की क़सम देकर साथ बिठाता? मैं रात की गलियों में अकेला घूमता, और रात मुझसे भी अधिक अकेली थी।
"एक रात — अब तारीख़ याद नहीं, मगर महीना याद है कि शामें अभी हल्की ठंडी होने लगी थीं — मैं उस गली से गुज़रा। मलबार हिल की तंग गली। मेरे सामने खाली सड़क थी, और उस खाली सड़क पर, कहीं से, पियानो की धुन आई।"
गफ़ूर चाचा की आवाज़ उसी पल बदल गई — वह आवाज़ अब चाय की दुकान की नहीं थी, वह 1993 की टैक्सी की सीट पर बैठ चुकी थी।
"बिटिया, धुन कैसी थी, यह बताने की मेरे पास कोई ताक़त नहीं है। मैंने सौ गाने सुने हैं, मैंने मस्जिद में आज़ान सुनी है, मैंने अपनी माँ की लोरी सुनी है — पर वह धुन कुछ और ही थी। वह बहुत सुंदर थी, पर अधूरी थी — ऐसी अधूरी जैसे कोई बोलते-बोलते रुक जाए, और रुकते हुए तुम्हारी तरफ़ देखे। तुम समझ रही हो ना? जैसे वह रुकी नहीं थी — वह रुक गई थी, मेरे लिए। और मैं — मैंने दूसरा नियम तोड़ दिया। मैं रुक गया।"
उन्होंने ठंडी हो चुकी चाय की ओर देखा।
"जैसे ही मैं रुका, धुन भी रुक गई। और फिर जो हुआ, वो मैं आज तक किसी को नहीं बताता था — उस रात मेरी टैक्सी अपने आप उस हवेली के सामने खड़ी हो गई। मैंने गाड़ी नहीं रोकी थी — ब्रेक मेरे पैर के नीचे था, इंजन चालू था, चाबी मेरे हाथ में थी — पर गाड़ी रुक गई, उसके सामने, जैसे किसी ने पहिए ज़मीन से उखाड़कर वहीं गाड़ दिए हों। और फिर — रेडियो खुद चालू हुआ। बटन मैंने नहीं दबाया। आवाज़ एकदम से ऐसी आई जैसे कोई बहुत पुरानी आवाज़ को अंदर से झकझोरकर जगाया गया हो — और उस रेडियो पर वही धुन बज रही थी, पर अब थोड़ी आगे बढ़ी हुई। वही अधूरी जगह, अब एक सुर और — जैसे कोई मुझे अगला सुर सिखा रहा हो। जैसे कोई कह रहा हो — देखो, मैं रुकी नहीं हूँ, मैं तुम्हारे साथ चल रही हूँ।"
तारा ने बिना साँस लिए सुना। बेसमेंट में ऊपर से किसी बस की आवाज़ गुज़री, और दोनों ने ऊपर की ओर देखा — एक ही पल में, एक ही डर से — और फिर गफ़ूर चाचा ने अपनी कहानी वहीं से फिर जोड़ी जहाँ वह काँपी थी।
"मैं डर गया था, बिटिया। मैं भागा — इंजन चालू था, मैंने उस गली से जान लगाकर निकाली, और मैंने ठान लिया कि अब उस गली में पैर नहीं रखूँगा। पर धुन मेरे पीछे आई। हर रात। जहाँ भी मैं टैक्सी खड़ी करता — डाबेवाला के पास, अस्पताल के सामने, अपने ही घर के नीचे — रेडियो अपने आप चालू हो जाता और वही धुन बजती। पहली रात वहीं थी जहाँ मैंने उसे छोड़ा था। दूसरी रात एक सुर आगे। तीसरी रात दो सुर आगे। हर रात एक सुर आगे — जैसे कोई मुझसे चल रहा हो और हर रात एक क़दम पास आ रहा हो।"
"पंद्रह दिनों तक यह चला। पंद्रहवें दिन मैं टूट गया — मैंने उस रात टैक्सी ही नहीं छुई। मैं दौड़कर गया एक उस्ताद के पास — अमीर उद्दीन उस्ताद, जो उस ज़माने में भिंडी बाज़ार में रहते थे, और जो संगीत के साथ-साथ उन चीज़ों को भी जानते थे जो किताबों में नहीं लिखी जातीं। मैंने सब कुछ बताया — धुन, रेडियो, हर रात एक सुर — और उस्ताद ने मेरी कलाई पकड़ी, अपनी उंगली मेरी नब्ज़ पर रखी, और बहुत देर चुप रहे। फिर उन्होंने जो कहा, वो मैं तुम्हें उन्हीं शब्दों में दे रहा हूँ, क्योंकि शायद यही इस पूरी कहानी की कुंजी है —
'बेटा, जिस कहानी ने तुम्हें चुन लिया, उससे भागना बंद करो। भागोगे तो वह तुम्हारे साथ चलेगी, क्योंकि कहानियाँ रास्तों से नहीं, इंसानों से बंधी होती हैं। उस कहानी को पूरा करने का रास्ता ढूँढो — वरना कहानी तुम्हें अपने अंदर पूरा कर लेगी।'
"और मैंने क्या किया, बिटिया?" गफ़ूर चाचा ने तारा की ओर देखा, और उनकी आँखों में वह पछतावा था जो चेहरों पर नहीं, चेहरों के पीछे बैठा होता है। "मैंने उस्ताद की नहीं मानी। मैं भागता रहा — शहर बदल दिया, गाड़ी बदल दी, नाम तक बदल लिया कुछ दिनों के लिए। और धुन मुझसे दूर होती गई — शायद उसने मुझे नामुनासिब समझ लिया, शायद मेरे भागने ने उसे बता दिया कि यह वो आदमी नहीं जो मेरी धुन को अपने सीने से लगाकर चलता है। पर एक चीज़ उसने मुझे दी, भागते हुए भी — अगली सुबह मेरी टैक्सी के शीशे पर, अंदर की तरफ़, एक कागज़ का पन्ना रखा मिला। कोई नहीं था आसपास — मैंने देखा था। पर पन्ना था, और पन्ने पर — तुम्हारी तस्वीर में वही लिखावट, वही पुरानी अंग्रेज़ी की झालर, वही सवाल —"
"क्या तुम संगीत जानती हो?"
गफ़ूर चाचा ने तस्वीर तारा की ओर धकेल दी — धीरे से, जैसे कोई इज़्ज़त से किसी चीज़ को वापस करता हो।
"अब तुम समझो, बिटिया, तुम्हारे हाथ में क्या है। वो पन्ना सौ साल से दरवाज़े-दरवाज़े घूम रहा है — जयविलास की खिड़की से लेकर मेरी टैक्सी के शीशे तक — और हर बार यही सवाल पूछ रहा है। उसने मुझे नहीं चुना — या चुना और मैं काबिल नहीं निकला। और अब तुम आई हो।" उन्होंने अपना चश्मा पहना, और उनकी आवाज़ में एक दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ थी। "इसीलिए मैंने तुम्हें तीन नियम दिए थे — क्योंकि मैं जानता हूँ कि पन्ना तुम्हें बुला रहा है, और मैं बूढ़ा आदमी तुम्हें नहीं रोक सकता। मैं बस इतना कह सकता हूँ — जिस रात तुम वहाँ जाओ, मेरी तीनों सलाहें अपनी जेब में रखना, और मेरी एक चौथी सलाह दिल पर — अगर रुको, तो पूरा रुकना। आधे रुकने वालों की हवेली खुद तय करती है कि उनका ठिकाना कहाँ होगा।"
तारा चाय की दुकान से बाहर निकली, और ऊपर, शहर की धड़कन में वापस आकर, उसे लगा जैसे वह दो दुनिया के बीच की सीढ़ियों पर खड़ी है — एक में हॉर्न बज रहे हैं, और दूसरी में कोई इंतज़ार कर रहा है जिसका इंतज़ार किसी और ने पूरा नहीं किया।
घर पहुँचकर उसने अपनी अलमारी के सबसे नीचे वाले दराज़ से एक चीज़ निकाली — एक नीला कपड़े का बैग, जिसके ऊपर उसके नाना के हाथ की सिलाई थी, और उस बैग के अंदर एक ऐसी नोट-बुक थी जिसे देखते ही कमरे का पंखा भी धीमा हो गया जैसे किसी ने उससे कहा हो — धीरे। यह पल तेज़ नहीं होता।
तारा ने गफ़ूर चाचा से एक बात छिपाई थी। और अब, उस नोट-बुक को अपनी हथेलियों पर रखकर, उसे लगा कि वह बात उसे नहीं छिपानी चाहिए थी — क्योंकि वह बात कहानी का वह दरवाज़ा थी जिसे खोले बिना आगे कोई रास्ता नहीं था।
तारा संगीत जानती थी।
बचपन में, दस साल तक, उसने पियानो की तालीम ली थी। उसके नाना — जो गोवा के एक पुर्तगाली खानदान से जुड़े संगीतकार थे, जिन्होंने गोवा की गलियों में विदेशी धुनों को देसी तानों से शादी कराई थी — उन्होंने उसे सिखाया था, और उनका तरीका कोई स्कूल नहीं था। वह उसे आंगन में बिठाते, अपनी हारमोनिका बजाते, और कहते — बेटी, पहले सुनो। उंगलियाँ बाद में आती हैं। कान पहले आते हैं। और उनकी एक बात तारा के दिल में इतनी गहरी बैठी हुई थी कि वह बात अब उसकी साँसों में थी —
"बेटी, संगीत सिर्फ़ बजाने की कला नहीं है, संगीत सुनने की कला है — और दुनिया में कुछ धुनें ऐसी हैं जो बजाने वालों की नहीं होतीं, वो उन लोगों की होती हैं जो उन्हें पूरा करने के लिए पैदा हुए होते हैं।"
तारा ने नोट-बुक खोली। उसकी स्याही पीली पड़ चुकी थी, पर अक्षर वही थे जो उन्होंने बचपन में देखे थे — कहीं तानें, कहीं नोट्स, कहीं बस एक शब्द — 'सुनो'। और फिर उसने वह पन्ना खोला जिसे उसने अपनी उम्र में सौ बार खोला था, और सौ बार नहीं समझा था। अंतिम पन्ना। नाना की ज़िंदगी का आखिरी कागज़।
उस पर लिखा था —
"अधूरी धुन — मुंबई, 1962 — मलबार हिल की एक हवेली से सुनी — आखिरी सात सुर ग़ायब — जो मिले, उसे पूरा करना।"
और उस पंक्ति के नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, वाक्य जिसे पढ़कर तारा की आँखें भर आईं, क्योंकि उसमें एक बूढ़े आदमी की पूरी ज़िंदगी की हार नहीं, उसकी आखिरी उम्मीद दर्ज़ थी —
"मेरी उंगलियाँ अब नहीं चलतीं। पर किसी और की चलेंगीं। मेरे ख़ून में से कोई।"
तारा उस रात बहुत देर तक बैठी रही — कैमरे की स्क्रीन पर खिड़की, खिड़की में पर्दा, पर्दे में पन्ना, और पन्ने पर वह सवाल जो अब उसके लिए कोई सवाल नहीं रहा था, बल्कि एक दावत थी — और नोट-बुक के पन्ने पर नाना की स्याही, जो उसे अपने पास बुला रही थी जैसे कोई दूर बैठा रिश्तेदार।
और बीच में, अपने ही सीने के भीतर, वह सुर — जो अब वह पहचानने लगी थी — जो हर बार उसी जगह रुक रहा था, जहाँ सात सुरों की जगह खाली थी।
उसने डायरी खोली और लिखा —
"गफ़ूर चाचा पंद्रह रातें सुनते रहे, और फिर भाग गए। नाना एक रात सुनकर गए, और बीस साल तक लिखते रहे। दोनों ने सुना — पर दोनों ने धुन को पूरा नहीं किया। क्योंकि सुनना आधी बात है, और आधी बात किसी कहानी को पूरी नहीं करती।
मैं सुन चुकी हूँ। मेरा नंबर अब बजाने का है।"
✦ ✦ ✦
(अगले भाग में — नाना की नोट-बुक: 1962 की वह डायरी, आधी रात की वह गली, और उस्ताद की वह बात जिसने पूरे खानदान की क़िस्मत एक धुन से बाँध दी। फिर तारा का फ़ैसला — छुट्टी, कीबोर्ड, और गफ़ूर चाचा से वह आखिरी बातचीत। बताइए, जारी रखूँ?)

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