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भाग पाँचवाँ — नाना की नोट-बुक

KaliRaatKiKalam · Haunted Places · 11 मिनट

Writer
KaliRaatKiKalam
Story
मुंबई की सुनसान हवेली — मलबार हिल का आखिरी खंडहर
Chapter
5 of 5
Category
Haunted Places
Reading time
11 min
Words
2097
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तारा की दुनिया उस रात पलट गई — पर पलटने जैसी कोई एक शानदार घटना नहीं हुई थी, जैसे फिल्मों में होता है। कोई बिजली नहीं कड़की, कोई खिड़की नहीं खुली, कोई आवाज़ नहीं आई। बस उसने उस रात जो समझा, वह यह था — कि इस कहानी में अब तक वह समझ रही थी कि वह कहानी उसके पास आई है, पर असल में कहानी एक तरफ़ा रास्ता बनाती हुई उसके नाना से होकर उस तक पहुँची है। 1962 से 2026 तक — चौरासी साल — और उस रास्ते की हर ईंट पर एक ही धुन की स्याही थी।
वह अगली सुबह जल्दी उठी, और अपने कमरे की उस अलमारी के सामने बैठी जिसे उसने सालों से "समेटे हुए पुराने घर" की तरह रखा था — ऊपर से कपड़े, बीच में किताबें, और सबसे नीचे, एक लोहे का संदूक़, जिसमें नाना की ज़िंदगी बंद थी। ताला उसने पहले ही खोल लिया था — वह ताला बरसों से खुला था, क्योंकि परिवारों के ताले खोलने के लिए कुंजियाँ नहीं, वक़्त चाहिए होता है। अंदर थे — नाना के पत्र, उनकी तस्वीरें, उनकी हारमोनिका (जिसके पांच छेद अब भी हवा को याद करते थे), उनकी पुरानी घड़ी, और एक डायरी — नीली मखमली जिल्द वाली, जिसके कोनों का कपड़ा अपने ज़माने की चाय और अपने मालिक के पसीने से रंगा हुआ था।
डायरी के ऊपर सोने के अक्षरों में लिखा था — "1962"।
तारा ने उसे ऐसे खोला जैसे कोई पुराना घर का दरवाज़ा खोलता है — धीरे से, एक आहट भी नहीं, क्योंकि डर होता है कि कहीं अंदर बैठी हुई चीज़ भाग न जाए। और फिर उसने पढ़ना शुरू किया — और पढ़ते-पढ़ते उसे लगा जैसे वह किसी और के द्वारा अपने ही नाना से मिल रही है।
1962 की डायरी के पन्ने धूप में पीले पड़ चुके थे, पर अक्षर ऐसे थे जैसे कल ही लिखे गए हों — क्योंकि कुछ हाथ ऐसे होते हैं जो अपनी इमानदारी की वजह से समय से बच निकलते हैं।
पहला पन्ना — जनवरी 1962:
"आज नया साल शुरू हुआ। मुंबई में ठंड है, और मुझे ठंड इस शहर में सबसे अच्छी चीज़ लगती है, क्योंकि ठंड में इंसान अपनी आवाज़ में सुनता है। गोवा से यहाँ आए हुए तीन साल हो गए, और मैं अब भी इस शहर को सुन रहा हूँ। लोग कहते हैं मुंबई सुनाई नहीं देती, मुंबई दिखाई देती है — मैं कहता हूँ, तुमने ठीक से सुना ही नहीं।"
तारा हल्की-सी मुस्कुराई — यह उनकी आवाज़ थी। आगे बढ़ी।
मार्च 1962 — एक लंबी एंट्री, जिसमें नाना ने उस रात की शुरुआत लिखी थी, जो उनकी और उस कहानी की पहली मुलाक़ात थी:
"आज मलबार हिल की उस हवेली के सामने से गुज़रा, जिसके बारे में लोग कहते हैं कि वहाँ एक पियानो-वादक की आत्मा रहती है। मैं इन बातों पर यक़ीन नहीं करता — आत्माएँ, प्रेत, यह सब उन लोगों की भाषा है जिन्होंने संगीत कभी सुना नहीं। पर हाँ, मैं मानता हूँ कि कुछ जगहें होती हैं जहाँ ध्वनि ठहर जाती है — जैसे कोई पुरानी घंटी जिसका शरीर चला गया, पर आवाज़ दीवारों में रह गई। मैंने आज सुना था कि वह हवेली चालीस साल से बंद है। कोई चालीस साल तक इंतज़ार नहीं करता, दोस्तों। इंतज़ार चालीस साल तक करवाता है। फ़र्क़ समझो।"
तारा का हाथ रुक गया। वह पंक्ति फिर से पढ़ी — इंतज़ार चालीस साल तक करवाता है — और उसे अचानक गफ़ूर चाचा याद आए, जिनकी रात सौ साल की कहानी में सिर्फ़ पंद्रह दिन थी। उसने आगे पलटा।
और फिर — जून 1962 की रात, जिसके लिए वह साल भर से तैयार हो रही थी:
"आज रात की बात लिख रहा हूँ, क्योंकि कल सुबह होते ही मुझे लगेगा कि यह सपना था — और मुझे अपने सपनों पर भरोसा नहीं, मुझे अपनी याददाश्त पर भरोसा है।
आज मैं उसी गली से लौट रहा था — मलबार हिल की तंग गली — रात का वक़्त था, शहर दूर था, और जैसे ही मैंने पहला क़दम रखा, मुझे धुन सुनाई दी। पियानो की धुन। ऊपर, तीसरी मंज़िल से, एक बंद हवेली से, जिसमें चालीस साल से कोई नहीं रहता।
बिटिया, तुम्हें यह डायरी मिल रही है मतलब मैं नहीं रहा — तो सुनो ध्यान से, क्योंकि मैं वहीं रुक गया था जहाँ गफ़ूर — नहीं, वह तो तुम्हारे ज़माने का है — मैं वहीं रुक गया जहाँ हर आदमी रुकता है, क्योंकि वह धुन थी, और धुन जब सच्ची होती है, तो पैर खुद रुक जाते हैं, पूछकर नहीं।
मैंने धुन को सुना — ईमानदारी से सुना। यह वही बात है जो मैं तुम्हें सिखाना चाहता हूँ, तारा — ईमानदारी से सुना। क्योंकि धुन अधूरी थी, और अधूरी ऐसे नहीं जैसे कोई भूल गया हो — अधूरी ऐसे थी जैसे कोई किसी के जवाब का इंतज़ार कर रहा हो। मैंने अपने कान उसमें डाले, और मैंने वह सुना जो शायद चालीस साल में किसी ने नहीं सुना — कि वह अधूरी धुन कोई रोना नहीं थी, कोई चीत्कार नहीं थी — वह एक निमंत्रण था। जैसे कोई शादी का कार्ड बाँट रहा हो, और हर आने वाला दरवाज़े पर पहुँचकर लौट जाता हो, क्योंकि कार्ड पर लिखा है — 'केवल संगीतज्ञों के लिए'।"
तारा की आँखों में आँसू थे, और वह समझ नहीं पा रही थी कि वे किसके हैं — नाना के लिए, मीरा के लिए, या उस अकेले बूढ़े आदमी के लिए जो अपनी डायरी में अपनी नातिन से बात कर रहा था जो अभी पैदा भी नहीं हुई थी।
"मैंने उसके सुरों को अपनी नोट-बुक में उतार लिया है — इस डायरी के आखिरी पन्ने पर, जहाँ से तुम्हें यह पढ़ना है। और मैंने वह भी सुना जो मैं लिख नहीं सकता, क्योंकि कुछ चीज़ें कागज़ पर नहीं, कानों की याददाश्त में रहती हैं — कि आखिरी सात सुर वह नहीं बजाएगी। नहीं बजाएगी, क्योंकि वह नहीं जानती। वह चाहती है कि कोई उसके साथ बजाए। संगीत में इसे 'युगल' कहते हैं — और युगल के लिए दो लोग चाहिए, एक जीवित, और एक जो जीवित था।
*मैंने उस रात गली से निकलकर देखा — नीचे, उस पुराने गैस लैम्प के पास — अपना साया। और हमेशा की तरह मैंने साये में दूसरा साया देखने की ज़िद नहीं की। मैं बूढ़ा नहीं था उस रात, पर मैंने अपने नाना की एक बात याद रखी थी — जो चीज़ तुम्हें बुलाए, उससे पूछो पहले कि वह किसे ढूँढ रही है। अगर वह तुम्हें ढूँढ रही हो, तो ईमानदारी से जवाब देना, क्योंकि झूठ बोलने वालों को कहानियाँ अपने अंदर रख लेती हैं।"
डायरी का वह पन्ना ख़त्म होता था, और तारा ने अगला पन्ना पलटा — और वहाँ थे वे सात सुर। स्टाफ़ पर लिखे हुए, पेंसिल से, उन हाथों से जो उसे खिलाने वाले हाथ थे। उन सात सुरों के नीचे एक पंक्ति थी — और उसे पढ़कर तारा की साँस ठहर गई, क्योंकि उसमें एक बूढ़े आदमी का पूरा जीवन, उसकी पूरी शरणागति, और उसकी पूरी आशा एक साथ दर्ज़ थी:
"ये सात सुर मैंने अपने कानों से उतारे हैं — वे आखिरी सुर हैं जो मैंने उस रात सुने थे, जो शायद उसने उसी रात हवा में भेजे थे, इस उम्मीद में कि कोई सुनने वाला मिलेगा। तारा — अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो समझो कि मैंने तुम्हारे लिए यह ज़मीन तैयार की है। मैं बूढ़ा हो गया हूँ और मेरी उंगलियाँ अब पियानो के लिए नहीं बचीं — वे अब सिर्फ़ तुम्हारे सिर पर हाथ रखने के लिए हैं, और यह भी बहुत है। पर मैं यह सुर अपनी नोट-बुक में छोड़कर जा रहा हूँ, और मैं जानता हूँ कि तुम इन्हें एक दिन ढूँढोगी, क्योंकि मेरी तारा वो लड़की है जो कहानियों को अधूरा नहीं छोड़ती।
अगर मेरे ख़ून में से कोई कभी इस हवेली तक पहुँचे और उसे संगीत आता हो, तो वह इस धुन को पूरा करे — क्योंकि मुझे यक़ीन है कि जिसने यह धुन रची थी, उसका इरादा किसी को डराने का नहीं था। डराने वाले धुनें रचते नहीं, वे शोर करते हैं। उसका इरादा बस इतना था कि उसकी आखिरी रचना अधूरी न रहे — क्योंकि किसी भी कलाकार के लिए अधूरी कला से बड़ा कोई नर्क नहीं होता। और एक बात और, तारा — इस बात को तुम्हारी दादी मत बताना, वह कहेंगी मैं भूतों के चक्कर में पड़ा हूँ — मुझे उस रात ऐसा लगा जैसे वह धुन मुझे पहचानती थी। जैसे उसने इंतज़ार इसी खानदान का किया हो। यह बात मैं कागज़ पर लिख रहा हूँ, क्योंकि अगर यह सच है, तो यह सच तुम्हारे हिस्से का है।"
तारा ने डायरी बंद नहीं की। वह उसी पन्ने पर बैठी रही, और उसके हाथ नाना की स्याही को छू रहे थे — और उसे उन सात सुरों को देखते हुए अपनी उंगलियों के पोरों में एक जुबान सी महसूस हुई, जैसे उंगलियाँ कह रही हों — हमें दिखाओ। हम तैयार हैं।
उसने उस रात बहुत देर तक अपने दादा-दादी की तस्वीरों के सामने बैठकर सोचा — तस्वीर में नाना मुस्कुरा रहे थे, दादी शर्मा रही थीं, और पीछे गोवा का समंदर था जो शायद अब भी वैसा ही है। और सुबह होते-होते उसने फ़ैसला कर लिया।
वह इस कहानी को पूरा करेगी। पर अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर, और गफ़ूर चाचा के तीनों नियमों को अपनी जेब में रखते हुए — क्योंकि उसने समझ लिया था कि नियम किसी कहानी से बाहर रहने के नहीं हैं; नियम किसी कहानी के अंदर ज़िंदा बाहर आने के हैं।
अगली सुबह उसने अपने दफ़्तर से एक हफ़्ते की छुट्टी ली। एडिटर ने पूछा — "कहानी कहाँ तक पहुँची?" तारा ने कहा — "अंत तक। बस अंत लिखना बाक़ी है।" एडिटर ने उसे देखा, कुछ पूछना चाहा, फिर नहीं पूछा — एडिटरों को वह चेहरा पहचान होता है जिस पर कहानी पहुँ चुकी होती है, और वे जानते हैं कि उस दौरान पूछना बंद करना होता है।
फिर उसने एक छोटा-सा कीबोर्ड उधार लिया — उसके एक पुराने साथी से, जो जनता था कि वह बचपन में बजाती थी — और उसने कीबोर्ड को उसी नीले बैग में रखा जिसमें नाना की नोट-बुक थी। दो चीज़ें, एक बैग में — एक मरा हुआ हुनर और एक ज़िंदा; दोनों एक ही धुन के इंतज़ार में।
और फिर वह गफ़ूर चाचा के पास गई — आखिरी बार, उस लिफ्ट में, जहाँ पीतल के बटन घिस चुके थे और पंखा आधा घूमता था। गफ़ूर चाचा ने उसे देखा, उसका बैग देखा, और उन्हें सब कुछ समझ आ गया — बूढ़े लोगों को समझने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते।
"चाचा," तारा ने कहा, "आपने कहा था कि कहानी को पूरा करने का रास्ता ढूँढना चाहिए। तो सुनिए — मैं रास्ता ढूँढ चुकी हूँ। मेरे नाना ने 1962 में उस रात के सात सुर उतारे थे, और उन्होंने मेरे लिए छोड़े थे। मैं उस धुन के आखिरी सात सुर बजाऊँगी — और मैं उसे उसकी 'घर वापसी की धुन' दूँगी, क्योंकि शायद सौ साल से वह बस यही माँग रही है — कि कोई उसकी धुन को इतना प्यार करे कि उसे पूरा करने की ज़हमत उठाए।"
गफ़ूर चाचा बहुत देर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी लिफ्ट का वह घिसा हुआ बटन दबाया — जिसके अक्षर मिट चुके थे — और लिफ्ट उस मंज़िल पर चढ़ी जहाँ कोई नहीं जाता था। दरवाज़ा खुला, और उन्होंने उस मंज़िल की तरफ़ देखा — खाली गलियारा, बंद दरवाज़े, और एक खिड़की जिससे मलबार हिल की दिशा में धूप आ रही थी।
"बत्तीस साल पहले," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं उस मंज़िल से भागा था। आज मैं तुम्हें यहीं से आशीर्वाद दे रहा हूँ — क्योंकि भागने वाला आदमी भी जानता है कि कौन भाग सकता है और कौन रुक सकता है। तुम रुक सकती हो, बिटिया।" उन्होंने अपना चश्मा उतारा, और उनकी आँखों में तारा ने पहली बार डर नहीं देखा — दुआ देखी। "जाओ। और सुनो — अगर उस रात तुम्हें कोई धुन सुनाई दे, तो याद रखना — वह तुम्हें रोकने के लिए नहीं बजेगी। वह तुम्हें गिनने के लिए बजेगी। एक, दो, तीन... और जब सात पर रुके, तो अपनी उंगलियाँ आगे बढ़ाना। क्योंकि सात के बाद वाले सुर — वह तुम्हारे हैं।"
लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हुआ, और तारा नीचे उतर आई — उसके बैग में नाना की नोट-बुक, उसके सीने में सात सुर, और उसके कदमों में पहली बार कोई डर नहीं था — सिर्फ़ एक सवाल था, जो अब उसका अपना हो चुका था:
क्या तुम संगीत जानती हो?
जानती हूँ। और अब मैं आ रही हूँ।
✦ ✦ ✦
(अगले भाग में — हवेली के अंदर: वह शाम जब ताला खुद खुला, सीढ़ियों पर दो क़दमों की आहटें, और फव्वारे की सूखी बूँद जो कोई नहीं समझा। फिर वह कमरा, वह पियानो, और वह पल जब कमरे का तापमान बदल गया। बताइए, जारी रखूँ?)

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