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एपिसोड 30: अंधेरे में कोई है

firoj saifi · Ghost Stories · 29 मिनट

सुबह के पाँच बज रहे थे।
शर्मा निवास की खिड़कियों से धुँधली रोशनी भीतर आ रही थी।
अर्जुन बैठक में बैठा था।
उसके सामने शारदा देवी की डायरी खुली थी। पास में विक्रम की घड़ी, 1947 की तस्वीर और अस्पताल का फटा हुआ जन्म प्रमाणपत्र रखा था।
मीरा खिड़की के पास खड़ी थी।
राधा कुर्सी पर बैठी थीं।
तीनों चुप थे।
पहली बार घर में कोई आवाज़ नहीं थी।
न तीसरी मंज़िल से कदमों की आहट।
न दीवारों के पीछे से फुसफुसाहट।
न आईने के भीतर किसी की साँस।

अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।

तीन काली रेखाएँ गायब थीं।

उसने उँगली से त्वचा छुई।

वहाँ कोई निशान नहीं था।

“क्या सब खत्म हो गया?” उसने पूछा।

राधा ने उत्तर नहीं दिया।

मीरा ने धीरे से कहा—

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हें अब भी कुछ याद नहीं?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मुझे बहुत कुछ याद है।”

“क्या?”

“मुझे याद है कि मैं तुम्हारे साथ बड़ी हुई। मुझे याद है कि हम पुराने कुएँ के पास जाते थे। मुझे याद है कि तुम मुझे डराते थे और फिर खुद डर जाते थे। मुझे याद है कि तुमने मुझे एक बार बारिश में घर तक पहुँचाया था, क्योंकि मैं रास्ता भूल गई थी।”

वह मुस्कुराई।

“मुझे यह भी याद है कि तुमने मेरा जन्मदिन भूलकर अगले दिन केक खरीदा था।”

अर्जुन हल्का-सा हँसा।

“तुमने मुझे तीन दिन तक बात नहीं की थी।”

“क्योंकि तुमने केक पर गलत नाम लिखवाया था।”

दोनों कुछ क्षण हँसते रहे।

फिर मीरा का चेहरा गंभीर हो गया।

“लेकिन मुझे यह भी याद है कि उन यादों में कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जो मैंने कभी की ही नहीं।”

अर्जुन ने पूछा, “जैसे?”

“मुझे एक ऐसा कमरा याद है, जिसमें मैं कभी नहीं गई। मुझे एक ऐसी माँ याद है, जिसे मैंने कभी देखा नहीं। मुझे एक ऐसा भाई याद है, जिसका चेहरा तुम्हारे जैसा था, लेकिन वह तुम नहीं था।”

उसने अपनी कलाई देखी।

“और मुझे एक नाम याद है, जिसे मैं अब भी बोल नहीं सकती।”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“तो फिर हम उसे ढूँढ़ेंगे।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“अगर उसे ढूँढ़ने से यह सब फिर शुरू हो गया तो?”

अर्जुन ने कुछ क्षण सोचा।

“तो इस बार हम भागेंगे नहीं।”

राधा ने सिर झुका लिया।

“तुम दोनों को अभी भी लगता है कि इस घर में जो कुछ हुआ, वह सब तुम्हारे लिए हुआ था।”

अर्जुन ने उनकी ओर देखा।

“क्या ऐसा नहीं था?”

राधा ने धीरे से कहा—

“नहीं।”

“तो किसके लिए था?”

राधा ने कमरे के अंत में बने दरवाज़े की ओर देखा।

वह दरवाज़ा, जो कल तक वहाँ नहीं था।

उस पर कोई नाम नहीं लिखा था।

लेकिन उसके नीचे से सफेद रोशनी निकल रही थी।

“उसके लिए,” राधा ने कहा, “जो अब तक पैदा नहीं हुआ।”

अर्जुन उस दरवाज़े तक पहुँचा।

उसने हैंडल पकड़ा।

दरवाज़ा खुल गया।

अंदर एक लंबा गलियारा था।

गलियारे की दीवारों पर तस्वीरें टँगी थीं।

पहली तस्वीर में शारदा देवी थीं।

दूसरी में विक्रम।

तीसरी में राधा।

चौथी में मीरा।

पाँचवीं में अर्जुन।

हर तस्वीर के नीचे एक तारीख़ लिखी थी।

शारदा देवी—1947।

विक्रम—1953।

राधा—1995।

मीरा—1998।

अर्जुन—2013।

अर्जुन तस्वीरों के सामने रुक गया।

“यह गलत है।”

राधा ने उसके पीछे आकर कहा—

“हो सकता है।”

अर्जुन ने उनकी ओर देखा।

“आपको भी अब हर बात में शायद कहना पड़ता है?”

राधा ने उदास मुस्कान के साथ कहा—

“क्योंकि मैं भी नहीं जानती कि मेरी कौन-सी याद मेरी अपनी है।”

अर्जुन ने अपनी तस्वीर उतारी।

उसमें वह अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था।

उसकी आँखें बंद थीं।

उसके पास विक्रम खड़ा था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

17 जुलाई 2013।

मृतक: अर्जुन शर्मा।

पहचान की पुष्टि: नहीं हुई।

अर्जुन ने तस्वीर मीरा को दिखाई।

“तो क्या मैं 2013 में मर गया था?”

मीरा ने तस्वीर को देखा।

“शायद।”

“और अब?”

“अब तुम मेरे सामने खड़े हो।”

अर्जुन ने कहा, “क्या इतना काफी है?”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अभी के लिए।”

अर्जुन ने तस्वीर वापस दीवार पर लगा दी।

फिर उसने आगे की ओर देखा।

गलियारे के अंत में एक बड़ा कमरा था।

दरवाज़े पर लिखा था—

जन्म कक्ष।

अर्जुन अंदर गया।

कमरे के बीचोंबीच तीन पालने रखे थे।

पहले पालने में एक नवजात बच्चा सो रहा था।

दूसरा पालना खाली था।

तीसरे पालने के भीतर केवल एक परछाईं थी।

अर्जुन पहले पालने के पास गया।

बच्चे का चेहरा उसका अपना था।

लेकिन उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।

उसने दूसरे पालने में देखा।

वहाँ एक छोटी-सी पर्ची रखी थी।

उस पर लिखा था—

जिसे जन्म दिया गया, वह मर गया।

अर्जुन तीसरे पालने के पास गया।

उसकी परछाईं फर्श पर लंबी हो गई।

पालने में पड़ी परछाईं ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

और अर्जुन की आवाज़ में कहा—

“तुम आखिरकार आ गए।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

परछाईं ने कहा—

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने हमेशा खोजा।”

“तुम अभय हो?”

“नहीं।”

“अर्णव?”

“नहीं।”

“ईशान?”

“नहीं।”

“तो फिर तुम्हारा नाम क्या है?”

परछाईं ने उत्तर देने से पहले कुछ क्षण तक उसे देखा।

फिर कहा—

“तुम्हारा।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मेरा नाम अर्जुन है।”

“वह नाम तुम्हारा है?”

“हाँ।”

“तुम्हें किसने दिया?”

“मेरी माँ ने।”

“कौन-सी माँ?”

अर्जुन चुप हो गया।

परछाईं ने कहा—

“जिसने तुम्हें जन्म दिया?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

“जिसने तुम्हें पाला?”

वह फिर चुप रहा।

“या जिसने तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारा?”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“इनमें फर्क क्या है?”

परछाईं हँसी।

“यही तो इस घर का रहस्य था।”

उसने पालने की ओर इशारा किया।

“जन्म देने वाली माँ ने तुम्हें शरीर दिया। पालने वाली माँ ने तुम्हें जीवन दिया। लेकिन नाम देने वाली माँ ने तुम्हें वह बना दिया, जो तुम हो।”

अर्जुन ने पूछा, “और तुम?”

परछाईं ने उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जिसे किसी ने नाम नहीं दिया।”

अर्जुन के सीने में दर्द उठा।

“तुम्हारा कोई नाम नहीं है?”

“था।”

“क्या?”

परछाईं ने सिर झुका लिया।

“तुमने उसे भूलने का फैसला किया था।”

अर्जुन की आँखों के सामने अचानक एक दृश्य उभरा।

वह एक छोटे कमरे में बैठा था।

उसके सामने एक बच्चा था।

बच्चे की कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

दोनों के बीच एक कागज़ रखा था।

बच्चे ने कहा था—

“अगर तुम मुझे अपना नाम दे दोगे, तो मैं जीवित रहूँगा।”

अर्जुन ने पूछा था—

“और अगर मैं अपना नाम नहीं दूँ?”

बच्चे ने कहा था—

“तो तुम मर जाओगे।”

अर्जुन ने बहुत देर तक सोचा था।

फिर उसने कागज़ पर लिखा था—

अर्जुन।

बच्चे ने उस नाम को छुआ।

और उसी क्षण उसका शरीर गायब हो गया था।

अर्जुन ने आँखें खोल दीं।

“मैंने तुम्हें अपना नाम दिया था।”

परछाईं ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“और फिर?”

“तुमने मुझे भूलने का फैसला किया।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर तुम मुझे याद रखते, तो तुम्हें मेरे साथ मरना पड़ता।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“तो क्या मैं तुम्हारी वजह से जीवित हूँ?”

“नहीं।”

परछाईं ने धीरे से कहा—

“तुम मेरी जगह जीवित हो।”

कमरे की दीवारों पर दरारें उभरने लगीं।

पहले पालने के भीतर सो रहा बच्चा जाग गया।

दूसरे पालने में एक दूसरा बच्चा दिखाई देने लगा।

तीसरे पालने की परछाईं उठकर खड़ी हो गई।

तीनों बच्चे अर्जुन को देख रहे थे।

पहले बच्चे ने कहा—

“मैं तुम्हारा शरीर हूँ।”

दूसरे ने कहा—

“मैं तुम्हारी याद हूँ।”

तीसरे ने कहा—

“और मैं तुम्हारा नाम हूँ।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“तो मैं कौन हूँ?”

तीनों बच्चों ने एक साथ उत्तर दिया—

“तुम वह हो, जिसे हमने चुना।”

अचानक कमरे की दीवार पर एक बड़ी घड़ी दिखाई दी।

सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर थीं।

फिर वे चलने लगीं।

तीन बजकर चौदह मिनट।

तीन बजकर पंद्रह मिनट।

तीन बजकर सोलह मिनट।

और समय आगे बढ़ता गया।

पहली बार।

इस घर में पहली बार।

समय तीन बजकर तेरह मिनट से आगे निकल गया था।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

“सब खत्म हो गया।”

लेकिन परछाईं ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अब तुमने अपना नाम याद कर लिया है।”

“तो?”

“अब तुम्हें उसे वापस देना होगा।”

अर्जुन ने पूछा, “किसे?”

परछाईं ने तीसरे पालने की ओर देखा।

“मुझे।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैं तुम्हें अपना नाम वापस नहीं दूँगा।”

परछाईं चुप हो गई।

फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—

“तो क्या तुम मुझे मरने दोगे?”

अर्जुन ने उत्तर देने के लिए मुँह खोला।

लेकिन शब्द नहीं निकले।

क्योंकि उसे अब याद आ रहा था कि इस बच्चे ने मरने से पहले क्या कहा था।

“मुझे अपने नाम से मत बुलाना।”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“मैं तुम्हें कोई नाम नहीं दूँगा।”

परछाईं की आँखों में पहली बार आँसू उभरे।

“तो मैं कभी पैदा नहीं हो पाऊँगा।”

“मुझे अफ़सोस है।”

परछाईं ने सिर झुका लिया।

“तुम्हें हमेशा अफ़सोस होता है।”

उसका शरीर धीरे-धीरे धुँधला होने लगा।

अर्जुन ने हाथ बढ़ाया।

“रुको!”

परछाईं ने उसकी ओर देखा।

“क्या तुम मुझे याद रखोगे?”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“हाँ।”

“किस नाम से?”

अर्जुन चुप रहा।

परछाईं ने मुस्कुराकर कहा—

“बस। इतना काफी है।”

और वह गायब हो गई।

तीनों पालने खाली हो गए।

घड़ी की सुइयाँ चलती रहीं।

तीन बजकर सत्रह मिनट।

तीन बजकर अठारह मिनट।

तीन बजकर उन्नीस मिनट।

अर्जुन ने कमरे से बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाया।

लेकिन दरवाज़े पर पहुँचते ही उसे एहसास हुआ कि वह अकेला नहीं था।

उसके पीछे किसी की साँस चल रही थी।

वह धीरे-धीरे पलटा।

कमरे में एक बच्ची खड़ी थी।

उसकी उम्र आठ साल थी।

दो चोटियाँ।

सफेद फ्रॉक।

तीन काली रेखाएँ।

और चेहरे पर मीरा की मुस्कान।

“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।

बच्ची ने कहा—

“मैं तुम्हारी पहली बहन हूँ।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तुम जा चुकी हो।”

“नहीं।”

“मैंने तुम्हें याद रखा है।”

बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

“इसीलिए तो मैं वापस आई हूँ।”

उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“अब तुम्हें मुझे मेरा नाम देना होगा।”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“मैंने कहा था कि मैं तुम्हें नाम नहीं दूँगा।”

“तुमने उस बच्चे से कहा था।”

“तुम उससे अलग नहीं हो।”

बच्ची की मुस्कान गायब हो गई।

“तुम्हें सच में ऐसा लगता है?”

उसने अपनी कलाई आगे की।

तीन काली रेखाएँ।

फिर उसने अपनी दूसरी कलाई दिखाई।

वहाँ भी तीन काली रेखाएँ थीं।

अर्जुन पीछे हट गया।

“तुम्हारे पास छह रेखाएँ क्यों हैं?”

बच्ची ने कहा—

“क्योंकि मैं दो बार पैदा हुई थी।”

“किस रूप में?”

“एक बार तुम्हारी बहन बनकर।”

“और दूसरी बार?”

बच्ची ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हारी माँ बनकर।”

अर्जुन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

बच्ची ने कहा—

“अब तुम्हें समझ आया, पापा?”

अर्जुन ने चीखकर आँखें बंद कर लीं।

जब उसने आँखें खोलीं, वह शर्मा निवास की बैठक में था।

सूरज निकल चुका था।

खिड़की से आती रोशनी फर्श पर फैली हुई थी।

मीरा उसके सामने बैठी थी।

राधा खिड़की के पास खड़ी थीं।

अर्जुन ने उठने की कोशिश की।

उसका सिर भारी था।

“मैं कितनी देर बेहोश था?”

मीरा ने कहा, “कुछ मिनट।”

“मैं जन्म कक्ष में था।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“कौन-सा जन्म कक्ष?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“मीरा, तुम मेरे साथ नहीं थीं?”

“मैं यहीं थी।”

“राधा माँ?”

राधा ने उसकी ओर देखा।

“मैं भी यहीं थी।”

अर्जुन ने अपने हाथों को देखा।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ वापस आ गई थीं।

वह खड़ा हो गया।

“नहीं…”

उसने अपनी कलाई रगड़ी।

रेखाएँ नहीं मिटीं।

मीरा उसके पास आई।

“भैया, क्या हुआ?”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

उसके चेहरे पर वही मासूमियत थी।

वही चिंता।

वही अपनापन।

“तुम्हारा नाम क्या है?” अर्जुन ने पूछा।

मीरा चौंक गई।

“मीरा।”

“तुम्हारा पहला नाम?”

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

“भैया…”

“बताओ।”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हें याद है कि तुमने मुझे पहली बार क्या कहा था?”

मीरा ने बहुत देर तक सोचा।

फिर बोली—

“भैया।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“और मैंने तुम्हें क्या कहा था?”

मीरा मुस्कुराई।

“मीरा।”

“उससे पहले?”

मीरा चुप हो गई।

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम्हारा नाम मीरा था, या मैंने तुम्हें मीरा कहा था?”

मीरा की आँखें भर आईं।

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने उसे गले लगा लिया।

“कोई बात नहीं।”

मीरा रो पड़ी।

“भैया, अगर मैं सच में तुम्हारी यादों से बनी हूँ, तो क्या मेरा प्यार भी तुम्हारी याद है?”

अर्जुन ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा।

“नहीं।”

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि अगर यह मेरी याद होती, तो मुझे याद होता कि मैं तुम्हें इतना प्यार क्यों करता हूँ।”

मीरा उसके सीने से लगकर रोती रही।

कुछ देर बाद वह अलग हुई।

उसने अर्जुन की कलाई देखी।

“ये निशान फिर आ गए।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“क्या तुमने अपना नाम वापस दे दिया?”

अर्जुन ने कहा—

“नहीं।”

“तो फिर?”

अर्जुन ने खिड़की के बाहर देखा।

आँगन में नीम का पेड़ खड़ा था।

उसकी शाखाओं पर सुबह की रोशनी पड़ रही थी।

लेकिन पेड़ के नीचे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

वही सफेद फ्रॉक।

वही दो चोटियाँ।

वही तीन काली रेखाएँ।

वह अर्जुन को देखकर मुस्कुराई।

फिर उसने अपनी उँगली होंठों पर रखी।

चुप रहने का इशारा किया।

और गायब हो गई।

अर्जुन ने खिड़की बंद कर दी।

“कुछ नहीं,” उसने कहा।

मीरा ने उसे देखा।

“तुम झूठ बोल रहे हो।”

अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“शायद।”

दोपहर तक घर सामान्य दिखाई देने लगा।

तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा बंद था।

अस्पताल के कागज़ गायब हो चुके थे।

शारदा देवी की डायरी के आखिरी पन्ने खाली थे।

विक्रम की घड़ी चल रही थी।

और राधा ने पहली बार रसोई में खाना बनाया।

मीरा ने अर्जुन के लिए चाय बनाई।

दोनों बरामदे में बैठे थे।

“भैया,” मीरा ने कहा, “क्या तुम देवगढ़ छोड़कर जाओगे?”

अर्जुन ने चाय का प्याला नीचे रखा।

“तुम चाहती हो कि मैं जाऊँ?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो फिर?”

“मैं चाहती हूँ कि तुम यहाँ रहो। लेकिन इस घर के लिए नहीं।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“फिर किसलिए?”

मीरा ने मुस्कुराकर कहा—

“मेरे लिए।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैं यहीं रहूँगा।”

“हमेशा?”

“जब तक तुम मुझे भैया कहती रहोगी।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“और अगर एक दिन मैं तुम्हें किसी और नाम से बुलाऊँ?”

अर्जुन ने कहा—

“तो मैं पूछूँगा कि तुमने वह नाम कहाँ से सीखा।”

मीरा हँस पड़ी।

कुछ देर दोनों चुपचाप बैठे रहे।

फिर मीरा ने कहा—

“मुझे एक बात पूछनी है।”

“पूछो।”

“अगर तुम्हें कभी पता चला कि मैं सच में तुम्हारी बहन नहीं हूँ, तो?”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“तब भी तुम मेरी बहन रहोगी।”

“अगर तुम्हें पता चला कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ?”

अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।

मीरा ने तुरंत कहा—

“मैं केवल पूछ रही हूँ।”

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

“तब मैं सच जानने की कोशिश करूँगा।”

“और अगर सच तुम्हें मुझसे दूर ले गया?”

अर्जुन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तो मैं सच से लड़ूँगा।”

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।

“मुझे यही जवाब चाहिए था।”

उसने चाय का प्याला उठाया।

लेकिन प्याले के भीतर चाय नहीं थी।

उसमें काला पानी था।

और पानी की सतह पर एक चेहरा दिखाई दे रहा था।

विक्रम का।

उसने पानी के भीतर से अर्जुन की ओर देखा।

फिर अपने होंठ हिलाए।

दरवाज़ा मत खोलना।

अर्जुन ने प्याला नीचे रख दिया।

मीरा ने पूछा, “क्या हुआ?”

अर्जुन ने पानी में देखा।

चेहरा गायब हो चुका था।

“कुछ नहीं।”

लेकिन तभी मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

अर्जुन और मीरा ने एक-दूसरे को देखा।

इस बार किसी घड़ी की सुई नहीं रुकी।

किसी दीवार पर कोई शब्द नहीं उभरा।

कोई आवाज़ बदलकर नहीं आई।

बस दरवाज़े पर दस्तक हुई।

राधा रसोई से बाहर आईं।

“कौन है?”

बाहर से एक पुरुष की आवाज़ आई—

“मैं हूँ।”

अर्जुन के हाथ से प्याला छूट गया।

वह आवाज़ विक्रम की थी।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया, मत खोलना।”

बाहर से आवाज़ फिर आई—

“अर्जुन, बेटा।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“पापा?”

राधा ने चीखकर कहा—

“नहीं!”

लेकिन अर्जुन दरवाज़े तक पहुँच चुका था।

उसने कुंडी पर हाथ रखा।

फिर रुक गया।

उसे विक्रम की आखिरी बात याद आई—

इस बार मुझे मरने देना।

अर्जुन ने कुंडी से हाथ हटा लिया।

“तुम कौन हो?”

बाहर से उत्तर आया—

“तुम्हारा पिता।”

“कौन-सा?”

कुछ क्षण तक खामोशी रही।

फिर आवाज़ आई—

“वह, जिसे तुमने अपना नाम दिया था।”

अर्जुन पीछे हट गया।

मीरा ने दरवाज़े के नीचे देखा।

वहाँ से एक कागज़ भीतर सरकाया गया।

अर्जुन ने उसे उठाया।

उस पर एक तस्वीर थी।

तस्वीर में वह खुद था।

उसके बगल में विक्रम खड़ा था।

उनके पीछे राधा थीं।

और सामने एक छोटी बच्ची बैठी थी।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

शर्मा परिवार।

तारीख़: 19 अक्टूबर 2026।

अर्जुन ने तारीख़ दोबारा पढ़ी।

आज की तारीख़।

लेकिन तस्वीर में सभी के चेहरे बूढ़े थे।

विक्रम के बाल सफेद थे।

राधा की आँखों के नीचे गहरी झुर्रियाँ थीं।

मीरा लगभग पचास साल की दिखाई दे रही थी।

और अर्जुन…

अर्जुन तस्वीर में भी उतना ही जवान था।

उसके चेहरे पर उम्र का कोई निशान नहीं था।

तस्वीर के नीचे एक और पंक्ति लिखी थी—

परिवार में कुल पाँच सदस्य।

अर्जुन ने गिनती की।

वह।

विक्रम।

राधा।

मीरा।

और बच्ची।

पाँच।

लेकिन तस्वीर के सबसे पीछे, दरवाज़े के पास, एक छठी परछाईं खड़ी थी।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।

अर्जुन ने तस्वीर को रोशनी के सामने किया।

छठी परछाईं के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था।

फोटोग्राफ़र: अर्जुन शर्मा।

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

उसने दरवाज़े के बाहर खड़े आदमी से पूछा—

“तुम्हारा नाम क्या है?”

बाहर से उत्तर आया—

“अर्जुन शर्मा।”

“तुम्हारी उम्र?”

“अट्ठाईस साल।”

“तुम यहाँ क्यों आए हो?”

बाहर से बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया।

फिर आवाज़ आई—

“क्योंकि मैं घर लौट आया हूँ।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

यह वही आवाज़ थी, जिसे उसने 2023 में पहली बार सुना था।

वही आवाज़, जिसने उसे देवगढ़ लौटने के लिए बुलाया था।

वही आवाज़, जो उसके अपने गले से निकलती थी।

लेकिन इस बार वह दरवाज़े के बाहर थी।

और अर्जुन भीतर।

“तुम कौन हो?” उसने फिर पूछा।

बाहर से जवाब आया—

“मैं वह हूँ, जो तुम बनोगे।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं तुम्हें अंदर नहीं आने दूँगा।”

बाहर से एक हल्की हँसी सुनाई दी।

“तुमने यही बात पहले भी कही थी।”

“कब?”

“जब तुमने पहली बार दरवाज़ा बंद किया था।”

अर्जुन की आँखों के सामने एक दृश्य चमका।

वह बच्चा था।

उसके सामने एक आईना था।

आईने के भीतर एक दूसरा बच्चा खड़ा था।

दोनों के चेहरे एक जैसे थे।

एक ने अपना हाथ काँच पर रखा।

दूसरे ने भी।

फिर अर्जुन ने अपना हाथ हटा लिया।

आईने के भीतर खड़ा बच्चा रो पड़ा।

“मुझे बाहर निकालो!”

बच्चे अर्जुन ने कहा—

“तुम कौन हो?”

आईने के भीतर के बच्चे ने उत्तर दिया—

“मैं तुम हूँ।”

“नहीं।”

“मैं तुम्हारा भाई हूँ।”

“मेरा कोई भाई नहीं।”

“तो मुझे क्या कहोगे?”

बच्चे अर्जुन ने बहुत देर तक सोचा।

फिर कहा—

“मैं तुम्हें अपना नाम नहीं दूँगा।”

आईने के भीतर का बच्चा चुप हो गया।

उसने अपना माथा काँच से लगा दिया।

और बहुत धीरे से कहा—

“तो फिर मैं तुम्हारे नाम से बाहर आऊँगा।”

अर्जुन ने आँखें खोल दीं।

दरवाज़े के बाहर दस्तक फिर हुई।

इस बार केवल एक बार।

फिर आवाज़ आई—

“अर्जुन, तुम्हें याद है कि तुमने मुझे क्या कहा था?”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

“क्या?”

“तुमने कहा था कि अगर मैं तुम्हारा नाम लेकर बाहर आऊँ, तो तुम मुझे पहचान लोगे।”

अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।

“मैंने झूठ बोला था।”

बाहर से उत्तर आया—

“मुझे पता है।”

“मैंने तुम्हें छोड़ दिया था।”

“हाँ।”

“मैंने तुम्हें मरने दिया था।”

“हाँ।”

“मुझे माफ़ कर दो।”

कुछ क्षण तक खामोशी रही।

फिर बाहर से बहुत धीरे से कहा गया—

“मैंने तुम्हें पहले ही माफ़ कर दिया था।”

अर्जुन ने दरवाज़े पर माथा टिका दिया।

“तो फिर तुम अंदर क्यों आना चाहते हो?”

बाहर से उत्तर आया—

“क्योंकि अब तुम्हारी बारी है।”

अर्जुन ने कुंडी से हाथ हटा लिया।

“मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगा।”

बाहर से आवाज़ आई—

“ठीक है।”

फिर कदमों की आवाज़ दूर जाने लगी।

एक कदम।

दूसरा।

तीसरा।

फिर खामोशी।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

मीरा ने उसे गले लगा लिया।

“तुमने सही किया, भैया।”

राधा की आँखों में आँसू थे।

“अब सब खत्म हो गया।”

अर्जुन ने सिर उठाया।

“सच?”

राधा ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

अर्जुन ने दरवाज़े की ओर देखा।

“तो फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि कोई अभी भी घर के अंदर है?”

किसी ने उत्तर नहीं दिया।

अचानक बैठक की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में मीरा का हाथ अर्जुन के हाथ से छूट गया।

राधा की आवाज़ दूर होती चली गई।

और फिर किसी ने अर्जुन के कान के पास फुसफुसाकर कहा—

“भैया?”

अर्जुन ने तुरंत हाथ बढ़ाया।

“मीरा?”

कोई जवाब नहीं आया।

फिर वही आवाज़ आई—

“पापा?”

अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।

“कौन है?”

अँधेरे में किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उस हाथ में गर्मी थी।

उसकी उँगलियाँ छोटी थीं।

और उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

“मैं हूँ,” बच्चे ने कहा।

“कौन?”

“जिसे तुमने बाहर छोड़ दिया था।”

अर्जुन ने चाँदी की घंटी खोजने की कोशिश की।

लेकिन उसकी जेब खाली थी।

बच्चे ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“इस बार मुझे मत भूलना।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं तुम्हें नहीं भूलूँगा।”

“तो मेरा नाम बोलो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसे एक नाम याद आया।

लेकिन इस बार उसने उसे ज़ोर से नहीं कहा।

उसने केवल अपने मन में दोहराया।

बच्चे का हाथ धीरे-धीरे गर्म होने लगा।

फिर वह छोटा हाथ अर्जुन की उँगलियों से छूट गया।

अँधेरे में एक हल्की हँसी गूँजी।

और जब बत्तियाँ दोबारा जलीं, अर्जुन बैठक में अकेला खड़ा था।

मीरा गायब थी।

राधा गायब थीं।

विक्रम की घड़ी गायब थी।

शारदा देवी की डायरी गायब थी।

दीवारों पर लगी तस्वीरें गायब थीं।

शर्मा निवास खाली था।

अर्जुन ने मुख्य दरवाज़े की ओर देखा।

वह खुला हुआ था।

बाहर सुबह की रोशनी थी।

वह दहलीज़ पार करके बाहर आया।

आँगन में नीम का पेड़ नहीं था।

पुराना कुआँ नहीं था।

वह सड़क भी नहीं थी, जिस पर उसने पंद्रह साल बाद लौटते समय कदम रखा था।

उसके सामने एक अस्पताल था।

पुराना मातृत्व केंद्र।

मुख्य फाटक पर एक बोर्ड लगा था।

मातृत्व केंद्र, देवगढ़।

स्थापना: 12 मार्च 1947।

अर्जुन पीछे हट गया।

उसके सामने एक आदमी खड़ा था।

चेहरा बिल्कुल उसका अपना।

कलाई पर कोई निशान नहीं।

आदमी ने मुस्कुराकर कहा—

“आखिरकार तुम बाहर आ गए।”

अर्जुन ने पूछा—

“यह कौन-सी तारीख़ है?”

आदमी ने उत्तर दिया—

“17 जुलाई 1947।”

“नहीं।”

“हाँ।”

“मैं 2026 में हूँ।”

आदमी ने सिर हिलाया।

“तुम्हारा शरीर 2026 में था।”

“और अब?”

आदमी ने अस्पताल के भीतर इशारा किया।

“अब तुम्हें अपने जन्म का गवाह बनना है।”

अर्जुन ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

आदमी ने कहा—

“मैं तुम्हारा पहला पिता हूँ।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तुम पहले भी यह कह चुके हो।”

आदमी मुस्कुराया।

“और तुम पहले भी मुझे भूल चुके हो।”

उसने अस्पताल का दरवाज़ा खोला।

अंदर से एक नवजात बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

अर्जुन ने दरवाज़े के भीतर देखा।

एक बिस्तर पर राधा लेटी थीं।

उनके पास शारदा देवी खड़ी थीं।

विक्रम खिड़की के पास था।

और मीरा एक पालने के पास बैठी थी।

सबके चेहरे जवान थे।

जैसे किसी ने समय को पीछे घुमा दिया हो।

राधा ने अर्जुन को देखकर कहा—

“आ गए, बेटा?”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

“यह कौन-सा बच्चा है?”

शारदा देवी ने पालने की ओर देखा।

“तुम्हारा।”

“मेरा?”

“हाँ।”

“लेकिन मैं तो…”

विक्रम ने उसकी बात काट दी।

“तुम्हें अभी पैदा होना है।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“यह असंभव है।”

मीरा ने पालने से सिर उठाया।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“भैया…”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

मीरा ने कहा—

“इस बार तुम मुझे छोड़कर मत जाना।”

अर्जुन ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

मीरा मुस्कुराई।

“मैं तुम्हारी बहन हूँ।”

“तुम्हारा पहला नाम क्या है?”

मीरा ने उत्तर दिया—

“अर्जुन।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

मीरा ने आगे कहा—

“और तुम्हारा पहला नाम…”

वह पालने की ओर झुकी।

बच्चे के माथे को चूमा।

“मीरा है।”

अस्पताल की सारी घड़ियाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गईं।

राधा ने बच्चे को उठाया।

शारदा देवी ने दूसरे पालने पर कपड़ा डाल दिया।

विक्रम ने खिड़की बंद कर दी।

और कमरे के कोने में खड़ा पहला पिता मुस्कुराया।

“अब सब कुछ अपनी जगह आ गया।”

अर्जुन ने चीखकर कहा—

“नहीं!”

लेकिन किसी ने उसकी आवाज़ नहीं सुनी।

राधा ने बच्चे को अपनी गोद में लिया।

उसके माथे पर चूमा।

और कहा—

“मेरा बेटा।”

बच्चे ने आँखें खोल दीं।

उसकी आँखें अर्जुन जैसी थीं।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

और उसने पहली बार बोलना शुरू किया।

“माँ…”

राधा रो पड़ी।

“हाँ, बेटा।”

बच्चे ने फिर कहा—

“पापा…”

पहला पिता आगे बढ़ा।

“हाँ।”

बच्चे ने उसकी ओर देखा।

फिर मुस्कुराकर कहा—

“मैं घर लौट आया हूँ।”

अर्जुन ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

जब उसने उन्हें खोला, वह फिर शर्मा निवास की बैठक में था।

सुबह हो चुकी थी।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

मीरा सामने बैठी थी।

राधा रसोई में थीं।

और दरवाज़ा बंद था।

सब कुछ सामान्य था।

अर्जुन ने घड़ी देखी।

सुबह के आठ बज रहे थे।

उसने गहरी साँस ली।

“मैंने सपना देखा था।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“क्या?”

अर्जुन ने कहा—

“कि मैं 1947 में चला गया था।”

मीरा ने कुछ क्षण उसे देखा।

फिर मुस्कुराकर कहा—

“तुम्हें अजीब सपने आते हैं, भैया।”

अर्जुन भी मुस्कुराया।

“हाँ।”

वह उठा और दरवाज़े की ओर गया।

उसने कुंडी खोली।

बाहर धूप थी।

आँगन में नीम का पेड़ था।

दूर पुराने कुएँ के पास एक बच्चा लाल गेंद से खेल रहा था।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

फिर उसे याद आया कि विक्रम की घड़ी कहाँ रखी है।

वह बैठक में लौटा।

मेज़ पर घड़ी रखी थी।

उसने उसे उठाया।

घड़ी चल रही थी।

आठ बजकर पाँच मिनट।

उसने घड़ी का पिछला ढक्कन खोला।

अंदर एक छोटी तस्वीर थी।

अर्जुन ने तस्वीर बाहर निकाली।

तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।

विक्रम।

राधा।

शारदा देवी।

मीरा।

और अर्जुन।

सब मुस्कुरा रहे थे।

लेकिन तस्वीर में एक छठा व्यक्ति भी था।

वह सबसे पीछे खड़ा था।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

कलाई पर कोई निशान नहीं था।

तस्वीर के पीछे एक वाक्य लिखा था—

जब तक तुम कहानी पढ़ रहे हो, वह तुम्हारे घर के बाहर खड़ा है।

अर्जुन ने तस्वीर छोड़ दी।

उसी क्षण मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

मीरा ने रसोई से आवाज़ लगाई—

“भैया, देखो कौन आया है!”

अर्जुन दरवाज़े के सामने खड़ा हो गया।

उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी।

बाहर से उसकी अपनी आवाज़ आई—

“अर्जुन, दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसने घंटी नहीं बजाई।

उसने जवाब भी नहीं दिया।

बाहर से आवाज़ फिर आई—

“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

अर्जुन चुप रहा।

“मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”

अर्जुन ने कुंडी से हाथ हटा लिया।

“मैं तुम्हारा भाई हूँ।”

उसने पीछे मुड़कर मीरा को देखा।

मीरा बैठक में खड़ी थी।

उसके चेहरे पर डर था।

बाहर से आवाज़ फिर आई—

“मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

राधा रसोई से बाहर आईं।

उन्होंने अर्जुन को देखा।

फिर दरवाज़े को।

और बहुत धीरे से कहा—

“इस बार मत खोलना।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

बाहर से आखिरी बार आवाज़ आई—

“तो फिर मैं किसे बुलाऊँ?”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ क्षण तक खामोशी रही।

फिर बाहर खड़े व्यक्ति ने बहुत धीरे से कहा—

“ठीक है।”

कदमों की आवाज़ दूर जाने लगी।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

लेकिन फिर उसे महसूस हुआ कि बैठक में कुछ बदल गया है।

दीवार पर लगी तस्वीर में अब पाँच लोग नहीं थे।

वहाँ केवल चार लोग थे।

विक्रम।

राधा।

शारदा देवी।

और मीरा।

अर्जुन तस्वीर में नहीं था।

उसकी जगह एक खाली कुर्सी थी।

कुर्सी पर एक चाँदी की घंटी रखी थी।

अर्जुन ने तस्वीर के पास जाकर उसे छुआ।

शीशे के भीतर मीरा ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसने सीधे अर्जुन की ओर देखा।

और तस्वीर के भीतर से कहा—

“भैया, अब तुम्हारी बारी है।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं…”

तस्वीर में मीरा ने मुस्कुराकर कहा—

“तुमने मुझे मेरा नाम दे दिया था।”

“मैंने तुम्हें कुछ नहीं दिया!”

“तुमने मुझे अपना नाम दिया था।”

“चुप रहो!”

“और अब…”

मीरा की आँखें काली हो गईं।

“अब मुझे तुम्हारा घर चाहिए।”

तस्वीर के शीशे पर दरार पड़ गई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

और हर दरार के भीतर अर्जुन का एक अलग चेहरा दिखाई देने लगा।

बच्चा।

जवान आदमी।

बूढ़ा आदमी।

मृत आदमी।

और सबसे अंत में—

एक चेहरा, जिसकी आँखें नहीं थीं।

उसने अपना हाथ शीशे पर रखा।

“अर्जुन…”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा—

“तुम कौन हो?”

चेहरे ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जो तुम्हें देख रहा है।”

फिर तस्वीर का शीशा टूट गया।

सारे टुकड़े फर्श पर बिखर गए।

और हर टुकड़े में एक ही वाक्य लिखा था—

अंधेरे में कोई है।

उस रात अर्जुन ने शर्मा निवास छोड़ने का फैसला किया।

उसने एक बैग में कपड़े रखे।

शारदा देवी की डायरी उठाई।

विक्रम की घड़ी जेब में रखी।

और मीरा को आवाज़ दी।

“चलो।”

मीरा उसके कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी।

“कहाँ?”

“यहाँ से दूर।”

“कितनी दूर?”

“जहाँ कोई आईना न हो।”

मीरा ने कुछ क्षण सोचा।

फिर कहा—

“अगर आईना न हुआ, तो हम अपना चेहरा कैसे देखेंगे?”

अर्जुन ने उत्तर दिया—

“हमें अपना चेहरा देखने की ज़रूरत नहीं।”

मीरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

“ठीक है, भैया।”

दोनों नीचे आए।

राधा दरवाज़े के पास खड़ी थीं।

उन्होंने अर्जुन को गले लगाया।

“अपना ध्यान रखना।”

अर्जुन ने पूछा—

“आप हमारे साथ नहीं चलेंगी?”

राधा ने सिर हिलाया।

“मुझे यहीं रहना होगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि किसी को इस घर की याद रखनी होगी।”

अर्जुन ने उनकी आँखों में देखा।

“और अगर घर ने आपको ही भूलना शुरू कर दिया?”

राधा ने उदास मुस्कान के साथ कहा—

“तो शायद मैं आखिरकार आज़ाद हो जाऊँगी।”

अर्जुन ने उनका हाथ चूमा।

फिर वह मीरा के साथ बाहर निकल आया।

रात शांत थी।

सड़क पर कोई नहीं था।

दोनों गाँव की सीमा की ओर चलने लगे।

कुछ दूर जाने के बाद मीरा ने पूछा—

“भैया, क्या तुम्हें लगता है कि हम सच में बाहर निकल आए हैं?”

अर्जुन ने कहा—

“हाँ।”

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि इस बार समय चल रहा है।”

मीरा ने घड़ी देखी।

रात के दस बजकर बारह मिनट।

“और अगर समय भी एक याद हो तो?”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“तो हम कोई नई याद बनाएँगे।”

मीरा मुस्कुराई।

दोनों आगे बढ़ते गए।

कुछ देर बाद उन्हें सड़क के किनारे एक पुराना बस स्टॉप दिखाई दिया।

उस पर एक आदमी बैठा था।

उसकी उम्र लगभग अट्ठाईस साल थी।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।

वह आदमी उठ खड़ा हुआ।

“अर्जुन?”

अर्जुन रुक गया।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

आदमी ने कहा—

“मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।”

अर्जुन ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

आदमी ने उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जो शर्मा निवास से बाहर नहीं निकल पाया।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैं अब वापस नहीं जाऊँगा।”

आदमी मुस्कुराया।

“तुम्हें वापस जाने की ज़रूरत नहीं।”

“तो फिर तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

आदमी ने मीरा की ओर देखा।

“मैं इसे लेने आया हूँ।”

मीरा पीछे हट गई।

अर्जुन उसके आगे खड़ा हो गया।

“तुम इसे कहीं नहीं ले जाओगे।”

आदमी ने कहा—

“तुम इसे बचा नहीं सकते।”

“क्यों?”

“क्योंकि यह पहले से ही मेरे साथ है।”

मीरा ने अर्जुन की बाँह पकड़ ली।

“भैया, मुझे यहाँ से ले चलो।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ा।

दोनों सड़क के दूसरी ओर भागे।

लेकिन जब वे रुके, तो उनके सामने शर्मा निवास खड़ा था।

वही पुराना घर।

वही नीम का पेड़।

वही तीसरी मंज़िल।

वही बंद दरवाज़ा।

अर्जुन पीछे मुड़ा।

बस स्टॉप गायब था।

सड़क गायब थी।

गाँव गायब था।

चारों ओर केवल शर्मा निवास था।

मीरा रो पड़ी।

“हम वापस आ गए।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“नहीं।”

उसने घर की ओर देखा।

“हम कभी बाहर गए ही नहीं थे।”

अगली सुबह देवगढ़ के कुछ लोगों ने शर्मा निवास के मुख्य दरवाज़े को खुला पाया।

घर के भीतर कोई नहीं था।

रसोई में बर्तन रखे थे।

बैठक में कुर्सियाँ थीं।

दीवार पर तस्वीरें थीं।

लेकिन अर्जुन, मीरा और राधा गायब थे।

शारदा देवी की डायरी मेज़ पर खुली पड़ी थी।

उसके आखिरी पन्ने पर किसी ने लिखा था—

17 जुलाई 2008 की रात, तीसरी मंज़िल पर केवल दो लोग गए थे।

राधा और शारदा।

विक्रम नीचे था।

अर्जुन अपने कमरे में सो रहा था।

मीरा उस रात घर में मौजूद नहीं थी।

इसके नीचे एक और पंक्ति थी—

तो फिर तीसरी मंज़िल से किसने आवाज़ लगाई थी?

और उसके नीचे, बिल्कुल नई लिखावट में—

मैंने।

लोगों ने पुलिस को बुलाया।

पुलिस ने घर की तलाशी ली।

तीसरी मंज़िल पर एक बड़ा आईना मिला।

आईना बिल्कुल साफ़ था।

उसके सामने फर्श पर चाँदी की घंटी पड़ी थी।

दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी।

तस्वीर में अर्जुन अकेला खड़ा था।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

अर्जुन शर्मा।

जन्म: 17 जुलाई 1995।

मृत्यु: अज्ञात।

स्थिति: घर के भीतर।

एक पुलिसकर्मी ने तस्वीर उतारी।

तभी आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

कमरे में कोई नहीं था।

फिर उसने दोबारा आईने में देखा।

उसके पीछे एक आदमी खड़ा था।

चेहरा अर्जुन जैसा।

कलाई पर तीन काली रेखाएँ।

पुलिसकर्मी ने तुरंत पलटकर देखा।

कमरा खाली था।

वह घबराकर नीचे भागा।

लेकिन आईने में खड़ा आदमी वहीं रहा।

उसने धीरे से हाथ उठाया।

और काँच के भीतर से कहा—

“दरवाज़ा बंद कर दो।”

आईने के बाहर कोई नहीं था।

फिर भी कमरे का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद हो गया।

अंदर अँधेरा छा गया।

और आईने के भीतर से एक आवाज़ आई—

“अब अगली कहानी शुरू होगी।”

कहानी समापन — “अंधेरे में कोई है”
अर्जुन, मीरा, राधा और विक्रम की कहानी का मुख्य रहस्य अब सामने है: इस घर में पहचानें केवल जन्म से तय नहीं होती थीं; नाम, यादें और रिश्ते भी किसी को नया जीवन दे सकते थे। अर्जुन और मीरा की साझा यादों ने उन्हें एक-दूसरे से बाँधा, जबकि विक्रम ने पिता बनने का अर्थ अपने चुनावों से पाया। मगर आखिरी मोड़ यह बताता है कि अर्जुन शायद कभी शर्मा निवास से बाहर निकला ही नहीं।
और अब सबसे बड़ा सवाल बचा है—
अगर अर्जुन आईने के भीतर है, तो इन एपिसोडों में कहानी किसने सुनाई?
क्योंकि आखिरी पन्ने के पीछे एक और वाक्य लिखा मिला था—
“जिस दिन पाठक यह सवाल पूछेगा, उस दिन आईने के बाहर खड़ा आदमी उसे देख लेगा।”

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
30 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
29 min
Words
5634
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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