Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”
एपिसोड 29: माँ की आखिरी गवाही
firoj saifi · Ghost Stories · 20 मिनट
अर्जुन ने मृत बच्चे को अपनी बाँहों में पकड़ा हुआ था।
उसके शरीर की गर्मी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
लेकिन बच्चे की आँखें खुली थीं।
उनमें अर्जुन का चेहरा दिखाई दे रहा था।
“अब मेरी बारी है।”
बच्चे के मुँह से निकले इन शब्दों के बाद कमरे की दीवारों पर दरारें फैलने लगीं।
अस्पताल का कमरा धीरे-धीरे शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल में बदल रहा था।
लोहे का बिस्तर लकड़ी का हो गया।
सफेद दीवारें पुराने चूने से ढक गईं।
और छत से लटकता पीला बल्ब उसी जगह आ गया, जहाँ शारदा देवी ने पंद्रह साल पहले तीसरी मंज़िल का ताला लगाया था।
अर्जुन ने बच्चे को नीचे रखने की कोशिश की।
लेकिन उसकी बाँहें नहीं खुलीं।
उसकी उँगलियाँ बच्चे की पीठ से चिपक गई थीं।
“मीरा!”
मीरा उसके पास दौड़ी।
“भैया, उसकी आँखों में मत देखो!”
अर्जुन ने नज़र हटाने की कोशिश की।
लेकिन बच्चे की आँखों में अब केवल उसका चेहरा नहीं था।
वहाँ उसकी पूरी ज़िंदगी दिखाई दे रही थी।
उसका बचपन।
उसके पिता की मौत।
देवगढ़ छोड़ने का दिन।
शारदा देवी का अंतिम संस्कार।
और वह रात, जब उसने पहली बार तीसरी मंज़िल पर अपने पिता की आवाज़ सुनी थी।
फिर एक और दृश्य उभरा।
वह दृश्य, जो उसने कभी याद नहीं किया था।
एक छोटा बच्चा अस्पताल के फर्श पर पड़ा था।
उसके पास एक स्त्री घुटनों के बल बैठी थी।
वह रो नहीं रही थी।
वह बच्चे के चेहरे पर उँगली फेरते हुए बार-बार कह रही थी—
“यह मेरा बच्चा नहीं है।”
अर्जुन ने सिर झटका।
“नहीं…”
बच्चे की आवाज़ आई—
“तुम्हें याद है?”
“चुप रहो!”
“तुमने मुझे देखा था।”
“नहीं!”
“तुमने मुझे उठाया था।”
अर्जुन की आँखों के सामने दृश्य बदल गया।
अब वह खुद उस अस्पताल में खड़ा था।
उसकी उम्र लगभग पाँच साल थी।
उसके सामने एक बिस्तर पर राधा लेटी थी।
उसकी गोद में एक बच्चा था।
और कमरे के कोने में एक दूसरी स्त्री खड़ी थी, जिसका चेहरा राधा जैसा था।
दोनों स्त्रियाँ एक-दूसरे को देख रही थीं।
राधा ने कहा—
“इसे मुझे दे दो।”
दूसरी स्त्री ने बच्चे को अपने सीने से लगा लिया।
“यह तुम्हारा नहीं है।”
“मैंने इसे जन्म दिया है।”
“तुमने इसके शरीर को जन्म दिया है।”
“यह मेरा बेटा है!”
दूसरी स्त्री ने सिर हिलाया।
“तुम्हारा बेटा तो पहले ही मर चुका है।”
अर्जुन ने आँखें खोल दीं।
बच्चा अब उसकी बाँहों में नहीं था।
वह बिस्तर पर लेटा हुआ था।
मीरा उसके सामने खड़ी थी।
और कमरे के बीचोंबीच राधा खड़ी थी।
उसके बाल खुले थे।
चेहरा थका हुआ था।
कपड़े पुराने थे।
लेकिन उसकी आँखों में वही ममता थी, जिसे अर्जुन ने अपने बचपन की सबसे सुरक्षित यादों में महसूस किया था।
“माँ?”
राधा ने उसकी ओर देखा।
“हाँ, बेटा।”
अर्जुन उसकी ओर बढ़ा।
मीरा ने उसे पकड़ लिया।
“भैया, रुको!”
“यह मेरी माँ है!”
“तुम्हें कैसे पता?”
अर्जुन ने राधा की ओर देखा।
“क्योंकि…”
वह रुक गया।
उसे कोई याद नहीं आया।
राधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“तुम्हें याद नहीं कि तुम बचपन में मेरे आँचल में छिप जाते थे?”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
“याद है।”
“जब तुम्हें डर लगता था, तो तुम मेरा हाथ पकड़कर सोते थे।”
“हाँ।”
“तुम्हें बुखार आता था, तो मैं पूरी रात तुम्हारे सिर पर पानी की पट्टियाँ रखती थी।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“हाँ, माँ।”
राधा ने हाथ बढ़ाया।
“तो फिर आओ।”
मीरा ने अर्जुन को और कसकर पकड़ लिया।
“भैया, इन बातों को याद मत करो!”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“क्यों?”
मीरा रोने लगी।
“क्योंकि मुझे भी यही सब याद है।”
राधा का हाथ हवा में ठहर गया।
मीरा ने आगे कहा—
“मुझे याद है कि राधा माँ मेरे लिए लोरी गाती थीं। मुझे याद है कि मैं उनके आँचल में छिप जाती थी। मुझे याद है कि वह मेरे बालों में तेल लगाती थीं। मुझे याद है कि जब मुझे डर लगता था, तो वह कहती थीं—मैं यहीं हूँ।”
उसने राधा की ओर देखा।
“लेकिन अगर ये यादें अर्जुन की हैं, तो मेरी यादें किसकी हैं?”
राधा का चेहरा बदल गया।
उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“मीरा…”
मीरा पीछे हट गई।
“मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए।”
राधा ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम्हें सच सुनना है?”
“हाँ।”
“पूरा सच?”
“हाँ।”
राधा ने अर्जुन की ओर देखा।
“तो फिर तुम्हें पहले यह जानना होगा कि 17 जुलाई 2008 की रात वास्तव में क्या हुआ था।”
कमरे की दीवार पर लगी घड़ी चलने लगी।
उसकी सुइयाँ पीछे घूमने लगीं।
तीन बजकर तेरह मिनट।
तीन बजकर बारह मिनट।
तीन बजकर ग्यारह मिनट।
फिर समय अचानक रुक गया।
राधा ने कहा—
“यह कहानी 1947 में शुरू हुई थी।”
17 जुलाई 2008।
शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल।
बाहर तेज़ बारिश हो रही थी।
आँगन में लगे नीम के पेड़ की शाखाएँ खिड़की से टकरा रही थीं।
शारदा देवी गलियारे में खड़ी थीं। उनके हाथ में चाँदी की घंटी थी। उनके पीछे विक्रम खड़ा था। उसके चेहरे पर खून के निशान थे।
दरवाज़े के दूसरी ओर से एक बच्चा रो रहा था।
“माँ!”
वह अर्जुन की आवाज़ थी।
लेकिन उस रात अर्जुन की उम्र तेरह साल थी।
वह घर में मौजूद था।
नीचे अपने कमरे में सो रहा था।
कम-से-कम शारदा देवी यही समझती थीं।
राधा गलियारे में पहुँची।
उसके कपड़े भीगे हुए थे।
“दरवाज़ा खोलो।”
शारदा देवी ने उसे रोक लिया।
“नहीं।”
“मेरी बेटी अंदर है।”
“तुम्हारी बेटी अंदर नहीं है।”
राधा ने उनकी ओर देखा।
“मैंने उसे अपनी आँखों से अंदर जाते देखा था।”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“राधा, तुम्हें जो दिखाई दिया, वह मीरा नहीं थी।”
राधा ने उसकी ओर देखा।
“तुमने उसे भी नहीं पहचाना?”
विक्रम चुप हो गया।
राधा की आँखों में गुस्सा भर आया।
“तुम दोनों ने मेरे साथ यही किया था। पहले मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया। फिर मेरी बेटी को।”
शारदा देवी ने कहा—
“हमने तुम्हारे बच्चों को बचाने की कोशिश की थी।”
“बचाने की?”
राधा हँस पड़ी।
“एक बच्चा मर गया। दूसरा आईने के भीतर कैद है। और तीसरे को तुम लोग अभी तक पैदा होने नहीं दे रहे!”
विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“धीरे बोलो।”
राधा ने हाथ छुड़ा लिया।
“क्यों? डरते हो कि वह सुन लेगा?”
दरवाज़े के पीछे रोने की आवाज़ बंद हो गई।
फिर एक बच्ची ने कहा—
“माँ?”
राधा का चेहरा बदल गया।
वह दरवाज़े की ओर दौड़ी।
शारदा देवी ने उसे पकड़ लिया।
“यह तुम्हारी बेटी नहीं है!”
राधा ने पूरी ताकत से उन्हें धक्का दिया।
“मुझे जाने दो!”
दरवाज़े के पीछे से बच्ची की आवाज़ फिर आई—
“माँ, मुझे ठंड लग रही है।”
राधा रो पड़ी।
“मीरा!”
उसने दरवाज़े पर हाथ मारा।
“माँ आ रही है, बेटा!”
अंदर से एक और आवाज़ आई।
इस बार वह किसी छोटे लड़के की थी।
“माँ, उसे मत बुलाओ।”
राधा ठिठक गई।
“कौन?”
“वह तुम्हारी बेटी नहीं है।”
राधा ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”
विक्रम ने दीवार पकड़ ली।
शारदा देवी के हाथ से घंटी छूटकर फर्श पर गिर गई।
और उसी क्षण तीसरी मंज़िल की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।
राधा ने दरवाज़े पर माथा टिकाया।
“मैं तुम्हें पहचानती हूँ।”
अंदर से आवाज़ आई—
“नहीं, माँ। तुमने मुझे कभी देखा ही नहीं।”
फिर दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।
पहली दस्तक पर शारदा देवी ने आँखें बंद कर लीं।
दूसरी दस्तक पर विक्रम घुटनों के बल बैठ गया।
तीसरी दस्तक पर राधा ने दरवाज़ा खोल दिया।
अंदर कोई कमरा नहीं था।
वहाँ एक अस्पताल था।
एक बिस्तर पर एक बच्चा लेटा था।
उसके पास एक स्त्री बैठी थी।
स्त्री का चेहरा राधा जैसा था।
उसकी गोद में एक नवजात था।
और बिस्तर के सामने एक छोटा लड़का खड़ा था।
उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
लड़के ने राधा को देखकर कहा—
“माँ, आपने बहुत देर कर दी।”
राधा ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“अर्णव?”
लड़के ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“अभय?”
“नहीं।”
राधा की आँखों में आँसू आ गए।
“तो फिर तुम कौन हो?”
लड़के ने उत्तर दिया—
“वह, जिसे आपने पहली बार जन्म दिया था।”
राधा ने उसे गले लगाने की कोशिश की।
लेकिन लड़का पीछे हट गया।
“आपने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था।”
“नहीं!”
“आपने दूसरे बच्चे को चुना था।”
“मैंने किसी को नहीं चुना!”
“आपने उसे अपना नाम दिया।”
राधा की साँस अटक गई।
“किसे?”
लड़के ने बिस्तर पर लेटे बच्चे की ओर इशारा किया।
“उसे।”
राधा ने बच्चे को देखा।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
लेकिन उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।
राधा ने फुसफुसाकर कहा—
“यह कौन है?”
लड़के ने उत्तर दिया—
“आपका बेटा।”
“लेकिन मेरा बेटा तो…”
“मर चुका था।”
राधा पीछे हट गई।
लड़के ने आगे कहा—
“इसलिए आपने मुझे जन्म दिया।”
राधा ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
“लेकिन आपने मुझे अपने पास नहीं रखा।”
“नहीं!”
“आपने मुझे आईने के पीछे छोड़ दिया।”
राधा ने चीखकर कहा—
“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा!”
लड़का चुप हो गया।
फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—
“तो फिर मुझे किसने छोड़ा?”
राधा के पास कोई उत्तर नहीं था।
“उस रात,” वर्तमान में खड़ी राधा ने कहा, “मैंने पहली बार समझा कि इस घर में केवल एक बच्चा नहीं खोया था।”
अर्जुन उसकी ओर देख रहा था।
“कितने बच्चे थे?”
राधा ने उत्तर दिया—
“यह सवाल गलत है।”
“तो सही सवाल क्या है?”
“कितने बच्चों को हमने एक ही नाम दिया?”
मीरा ने धीरे से पूछा, “और मेरा नाम?”
राधा ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारा नाम उस रात रखा गया था, जब तुम पैदा हुई थीं।”
“मैं कब पैदा हुई?”
राधा ने कहा—
“1998 में।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“यह मुझे पता है।”
“लेकिन तुम्हारा पहला जन्म 1947 में हुआ था।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“यह कैसे हो सकता है?”
राधा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“क्योंकि तुम पहली बार एक बच्ची के रूप में पैदा नहीं हुई थीं।”
अर्जुन ने पूछा, “तो किस रूप में?”
राधा ने कहा—
“तुम एक याद के रूप में पैदा हुई थीं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राधा ने आगे कहा—
“1947 में अस्पताल में एक बच्चा मर गया था। उसका कोई नाम नहीं था। उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था, लेकिन वह उसे अपने हाथों में नहीं ले सकी। उसके पिता ने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि बच्चा मरा नहीं है। वह कहीं और चला गया है।”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“और वह बच्चा?”
राधा ने उसकी ओर देखा।
“उस बच्चे की याद से एक दूसरा बच्चा बना।”
अर्जुन ने पूछा, “मीरा?”
राधा ने सिर हिलाया।
“उसका पहला रूप।”
मीरा पीछे हट गई।
“तो मैं असली नहीं हूँ?”
राधा की आँखों में दर्द उभरा।
“तुम्हारा शरीर असली है। तुम्हारी साँस असली है। तुम्हारे आँसू असली हैं। तुम्हारा प्यार असली है। लेकिन तुम्हारी यादों में कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जो तुम्हारी नहीं हैं।”
“किसकी हैं?”
राधा ने अर्जुन की ओर देखा।
“अर्जुन की।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“तो मैं उसके बचपन की यादें लेकर पैदा हुई?”
“हाँ।”
“क्या मैं उसकी बहन हूँ?”
राधा ने बहुत देर तक उसे देखा।
“तुम उसकी बहन बनीं।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“यह जवाब नहीं है।”
“यह सबसे सच्चा जवाब है, जो मैं तुम्हें दे सकती हूँ।”
मीरा रो पड़ी।
“मैं अपनी पूरी ज़िंदगी यही समझती रही कि मैं उसकी बहन हूँ। मैंने उसके साथ बचपन बिताया। मैंने उसे खोया। मैंने उसे वापस पाया। मैंने उसे आईने से बचाया। और अब तुम कह रही हो कि मैं उसकी यादों से बनी हूँ?”
राधा ने उसके पास आने की कोशिश की।
मीरा पीछे हट गई।
“मुझे मत छूना।”
राधा रुक गई।
मीरा ने कहा—
“अगर मेरी यादें अर्जुन की हैं, तो मेरे अपने बचपन का क्या हुआ?”
राधा ने धीरे से उत्तर दिया—
“तुम्हारा बचपन भी तुम्हारा ही है।”
“कैसे?”
“क्योंकि यादें जहाँ से शुरू होती हैं, वहाँ से आगे की ज़िंदगी तुम्हारी अपनी हो जाती है।”
मीरा ने आँसू पोंछे।
“तो फिर मुझे अपनी पहली याद बताओ।”
राधा ने कहा—
“तुम्हें एक लाल गेंद याद है?”
मीरा चुप हो गई।
“पुराने कुएँ के पास एक बच्चा खड़ा था। उसके हाथ में लाल गेंद थी। तुमने उससे पूछा था कि वह कौन है। उसने कहा था कि वह तुम्हारा भाई है। फिर तुमने उससे कहा था कि तुम्हारा कोई भाई नहीं है।”
मीरा की आँखों में अचानक एक दृश्य चमका।
पुराना कुआँ।
लाल गेंद।
एक बच्चा।
और उसके पीछे खड़ी एक स्त्री, जिसकी कोई परछाईं नहीं थी।
बच्चे ने कहा था—
“अगर तुम मुझे भाई नहीं कहोगी, तो मैं तुम्हें बहन नहीं कह पाऊँगा।”
मीरा ने अपना मुँह ढक लिया।
“मुझे याद है…”
राधा ने सिर हिलाया।
“वह तुम्हारी पहली याद थी।”
“लेकिन वह बच्चा कौन था?”
राधा ने अर्जुन की ओर देखा।
“वह बच्चा, जिसे अर्जुन ने अपना नाम दिया था।”
अर्जुन की कलाई में फिर जलन उठी।
उसने पूछा, “क्या वह बच्चा मेरा बेटा था?”
राधा ने उत्तर दिया—
“नहीं।”
“तो कौन था?”
“तुम्हारा पहला रूप।”
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“मैं कितनी बार पैदा हुआ?”
राधा ने कहा—
“तीन बार।”
“और मरा?”
“तीन बार।”
“तो फिर मैं अभी जीवित कैसे हूँ?”
राधा की आँखें भर आईं।
“क्योंकि हर बार तुम्हारी मौत के बाद किसी ने तुम्हारा नाम उठा लिया।”
अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।
तीन काली रेखाएँ अब धीरे-धीरे धड़क रही थीं।
“और मेरा असली नाम?”
राधा ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारा असली नाम वह नहीं है, जो तुम्हें दिया गया था।”
“तो क्या है?”
राधा ने कहा—
“तुम्हारा असली नाम वह है, जिसे तुमने खुद चुना था।”
अर्जुन ने बहुत देर तक उसे देखा।
“मैंने कौन-सा नाम चुना था?”
राधा ने उत्तर देने से पहले अपनी जेब से एक पुराना कागज़ निकाला।
वह कागज़ पीला पड़ चुका था।
उस पर एक बच्चे की लिखावट थी।
मेरा नाम अर्जुन है।
नीचे एक और पंक्ति थी।
अगर मैं मर जाऊँ, तो मेरी बहन को मेरा नाम दे देना।
अर्जुन ने कागज़ पकड़ लिया।
“यह मैंने लिखा था?”
राधा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“कब?”
“17 जुलाई 1995 को।”
अर्जुन ने कागज़ को घूरा।
“लेकिन मैं तो उस समय पैदा हुआ था।”
राधा ने कहा—
“तुम्हारा शरीर पैदा हुआ था। तुम्हारी यादें उससे पहले की थीं।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
“तो फिर मैं कौन हूँ?”
राधा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम वह बच्चा हो, जिसने अपने मरने से पहले अपनी बहन को बचाने के लिए अपना नाम उसे दे दिया था।”
मीरा ने काँपते हुए पूछा—
“और फिर?”
राधा ने कहा—
“फिर उस नाम ने दोनों को जीवित रखा।”
“कैसे?”
“एक शरीर में अर्जुन का नाम रहा। दूसरे शरीर में अर्जुन की यादें।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“तो मैं…”
राधा ने सिर हिलाया।
“तुम उस नाम का दूसरा हिस्सा हो।”
अर्जुन ने पूछा, “और वह बच्चा जो अभी पैदा नहीं हुआ?”
राधा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“वह नाम का तीसरा हिस्सा है।”
“ईशान?”
“शायद।”
“अभय?”
“शायद।”
“अर्णव?”
राधा ने कोई उत्तर नहीं दिया।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“माँ, मुझे पूरा सच बताओ।”
राधा ने धीरे से कहा—
“पूरा सच जानने के लिए तुम्हें यह समझना होगा कि विक्रम कौन था।”
विक्रम कमरे के कोने में खड़ा था।
उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।
लेकिन उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
राधा ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें याद है?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“अब याद है।”
अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”
विक्रम ने कहा—
“मैं वह आदमी हूँ, जिसे एक बच्चे ने पिता कहा था।”
“कौन-सा बच्चा?”
“तुम।”
“तो तुम मेरे पिता हो?”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
“मैंने तुम्हें पाला। तुम्हें नाम दिया। तुम्हें अपने बेटे की तरह प्यार किया। लेकिन मैं तुम्हें जन्म देने वाला आदमी नहीं था।”
अर्जुन ने कहा, “तुमने मुझे बचाया था।”
“हाँ।”
“तुमने मुझे मरने के लिए भी छोड़ा था।”
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
“और तुमने मुझे मेरे असली नाम से नहीं पुकारा।”
“हाँ।”
अर्जुन की आँखों में गुस्सा भर आया।
“तो फिर तुम मेरे पिता कैसे हुए?”
विक्रम ने धीरे से उत्तर दिया—
“क्योंकि जब तुमने पहली बार मुझे पिता कहा था, उस समय मैं खुद नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ।”
उसने अपनी कलाई दिखाई।
तीन काली रेखाएँ।
“मुझे भी एक नाम दिया गया था। मैं भी किसी और की यादों के साथ पैदा हुआ था। मुझे भी एक बच्चा कहा गया, फिर पिता, फिर मृतक। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी यही कोशिश की कि तुम्हें वह सब न झेलना पड़े, जो मैंने झेला।”
“लेकिन तुमने मुझे सच नहीं बताया।”
“क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुमने सच जान लिया, तो तुम मुझे पिता कहना बंद कर दोगे।”
अर्जुन चुप हो गया।
विक्रम ने आगे कहा—
“मैंने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला। फिर उस झूठ को बचाने के लिए एक और झूठ बोला। और जब मुझे समझ आया कि मैं क्या कर रहा हूँ, तब तक घर में इतने झूठ हो चुके थे कि कोई भी सच अकेला खड़ा नहीं रह सकता था।”
राधा ने कहा—
“इसीलिए 2013 में तुमने अपनी मौत को तीन बार स्वीकार किया।”
अर्जुन ने विक्रम की ओर देखा।
“तुम्हारी मौत 2013 में हुई थी?”
विक्रम ने कहा—
“एक बार।”
“बाकी दो बार?”
“एक बार उस आदमी की मौत हुई, जिसे मैं अपना पिता समझता था। दूसरी बार उस बच्चे की, जिसे मैंने अपना बेटा समझा था।”
अर्जुन ने पूछा, “और तीसरी बार?”
विक्रम ने उसकी ओर देखा।
“तीसरी बार मैं सच में मर गया था।”
“फिर तुम यहाँ कैसे खड़े हो?”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“क्योंकि तुमने मुझे याद रखा।”
अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।
वह विक्रम के पास गया।
कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर अर्जुन ने उसे गले लगा लिया।
विक्रम ने भी उसे कसकर पकड़ लिया।
“तुम मेरे पिता हो,” अर्जुन ने कहा।
विक्रम की साँस काँप गई।
“क्या?”
“मैं नहीं जानता कि तुमने मुझे जन्म दिया या नहीं। मैं नहीं जानता कि तुम कितनी बार मरे। मैं नहीं जानता कि मेरा असली नाम क्या है।”
अर्जुन ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
“लेकिन तुम मेरे पिता हो।”
विक्रम रो पड़ा।
“बेटा…”
उसी क्षण कमरे की घड़ी फिर चलने लगी।
तीन बजकर तेरह मिनट से आगे।
तीन बजकर चौदह मिनट।
तीन बजकर पंद्रह मिनट।
और दीवार पर उभरते हुए शब्द मिटने लगे।
पहले अभय।
फिर अर्णव।
फिर ईशान।
अंत में केवल एक नाम बचा।
विक्रम।
विक्रम ने पीछे हटकर दीवार को देखा।
“नहीं…”
राधा का चेहरा बदल गया।
“क्या हुआ?”
विक्रम ने कहा—
“मैंने अपना नाम याद कर लिया।”
“तो?”
विक्रम ने काँपते हुए कहा—
“अब मुझे मरना होगा।”
उसकी कलाई पर बनी तीन काली रेखाएँ चमकने लगीं।
पहली रेखा मिट गई।
फिर दूसरी।
तीसरी रेखा मिटते ही विक्रम का शरीर पारदर्शी होने लगा।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं!”
विक्रम मुस्कुराया।
“तुमने मुझे पिता कहा। अब मुझे किसी और नाम की ज़रूरत नहीं।”
“मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा!”
“बेटा, तुम मुझे पहले ही बचा चुके हो।”
विक्रम का शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगा।
“और इस बार…”
उसकी आवाज़ दूर होती गई।
“इस बार मुझे मरने देना।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ रखा था।
लेकिन हाथ उसकी उँगलियों के बीच से निकल गया।
विक्रम गायब हो गया।
फर्श पर केवल उसकी पुरानी घड़ी पड़ी थी।
घड़ी के भीतर एक छोटी तस्वीर थी।
विक्रम, राधा, शारदा और दो बच्चे।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
परिवार।
और उसके नीचे, किसी दूसरी लिखावट में—
यह तस्वीर कभी खींची ही नहीं गई थी।
राधा ने अर्जुन को तस्वीर उठाते देखा।
“अब हमें आखिरी कमरे में जाना होगा।”
अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा कमरा?”
राधा ने तीसरी मंज़िल के सबसे अंत में बने दरवाज़े की ओर इशारा किया।
वहाँ अब कोई ताला नहीं था।
दरवाज़े पर केवल एक नाम लिखा था।
माँ।
मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
“भैया, अगर अंदर वही सब हुआ जो अभी हुआ, तो?”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“तो हम बाहर आ जाएँगे।”
“और अगर बाहर आने का रास्ता नहीं हुआ?”
अर्जुन ने उसका हाथ दबाया।
“तो इस बार हम दोनों साथ रहेंगे।”
मीरा ने सिर हिलाया।
तीनों दरवाज़े तक पहुँचे।
राधा ने हाथ बढ़ाया।
लेकिन दरवाज़ा खोलने से पहले वह रुक गई।
“अर्जुन, अंदर जो भी देखो, याद रखना—तुम्हें हर चेहरे को पहचानने की ज़रूरत नहीं है।”
“क्यों?”
“क्योंकि कभी-कभी किसी को पहचानना उसे फिर से जन्म देने जैसा होता है।”
अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।
अंदर एक छोटा-सा कमरा था।
कमरे में कोई आईना नहीं था।
कोई बिस्तर नहीं।
कोई तस्वीर नहीं।
केवल एक लकड़ी की कुर्सी।
उस पर शारदा देवी बैठी थीं।
उनका चेहरा वैसा ही था, जैसा अर्जुन ने उन्हें आखिरी बार देखा था।
शांत।
थका हुआ।
और आँखों में ऐसा दुख, जो किसी एक ज़िंदगी का नहीं हो सकता था।
“दादी?”
शारदा देवी ने सिर उठाया।
“आ गए, अर्जुन?”
अर्जुन उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
“आपने मुझे सब कुछ क्यों नहीं बताया?”
शारदा देवी ने उसके बालों पर हाथ फेरा।
“क्योंकि मुझे डर था कि तुम सच जानकर मुझे माँ कहना बंद कर दोगे।”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
“आपने मुझे पाला।”
“हाँ।”
“आपने मेरी रक्षा की।”
“कोशिश की।”
“आपने मुझसे झूठ बोला।”
शारदा देवी ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“तो फिर मैं आपको क्या कहूँ?”
शारदा देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
“जो तुम्हारा मन करे।”
अर्जुन ने उनका हाथ अपने माथे से लगा लिया।
“दादी।”
शारदा देवी ने आँखें बंद कर लीं।
कमरे में पहली बार एक शांत हवा चली।
न कोई दस्तक।
न कोई आवाज़।
न कोई परछाईं।
केवल एक बूढ़ी औरत की साँस, जो धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही थी।
शारदा देवी ने अर्जुन की ओर देखा।
“अब तुम्हें आखिरी सच जानना है।”
“क्या?”
उन्होंने मीरा की ओर देखा।
“तुम दोनों में से कोई भी इस घर में पैदा नहीं हुआ था।”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
मीरा ने उनका हाथ छोड़ दिया।
“क्या?”
शारदा देवी ने कहा—
“तुम दोनों को इस घर ने चुना था।”
“क्यों?”
“क्योंकि इस घर को किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत थी, जो इसे याद रख सके।”
अर्जुन ने पूछा, “और अगर हम याद रखना बंद कर दें?”
शारदा देवी ने पहली बार मुस्कुराकर कहा—
“तो यह घर तुम्हें याद रखने लगेगा।”
कमरे की दीवारें धीरे-धीरे धुंधली होने लगीं।
शारदा देवी का चेहरा भी।
अर्जुन ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“दादी!”
शारदा देवी ने कहा—
“अब जाओ।”
“आप फिर गायब हो जाएँगी?”
“मैं कभी गई ही नहीं थी।”
उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“मैं तो हमेशा तुम्हारी यादों में रही।”
शारदा देवी की कुर्सी खाली हो गई।
कमरे में कोई नहीं था।
फर्श पर एक पुरानी डायरी पड़ी थी।
अर्जुन ने उसे उठाया।
पहले पन्ने पर लिखा था—
17 जुलाई 1947।
आज मैंने एक बच्चे को जन्म दिया।
लेकिन वह बच्चा मेरा नहीं था।
अगले पन्ने पर लिखा था—
आज मैंने उस बच्चे को अपना बेटा कहा।
और उसी क्षण मैं उसकी माँ बन गई।
फिर तीसरे पन्ने पर—
आज मैंने एक बच्ची को अपना नाम दिया।
अब वह मेरी बेटी है।
आखिरी पन्ने पर शारदा देवी की लिखावट थी—
अगर अर्जुन और मीरा यह डायरी पढ़ रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि वे आखिरकार एक-दूसरे को पहचान चुके हैं।
अब उन्हें केवल एक बात समझनी है।
जिस घर में वे पैदा हुए, वह घर उनका नहीं था।
जिस घर को वे अपना समझते रहे, वह घर किसी और की याद है।
और जिस घर से वे बाहर निकलना चाहते हैं…
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
आगे का हिस्सा फटा हुआ था।
उसके नीचे केवल एक वाक्य बचा था।
…वह घर कभी बाहर था ही नहीं।
उसी क्षण अर्जुन ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
और उसे पहली बार याद आया कि उसने देवगढ़ आने से पहले अपना घर कहाँ छोड़ा था।
एक छोटा-सा कमरा।
एक अस्पताल का बिस्तर।
एक खिड़की।
और बाहर खड़ा एक आदमी, जो उसके चेहरे जैसा था।
उस आदमी ने उससे कहा था—
“बेटा, घर चलो।”
अर्जुन ने उस दिन उसका हाथ पकड़ लिया था।
और उसके बाद वह कभी उस कमरे में वापस नहीं गया।
एपिसोड 29 समाप्त।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 29 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3893
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
“अंधेरे में कोई है” · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- दरवाज़े के उस पार , Season 1 · firoj saifi
- दरवाज़े के उस पार — Season 2 · firoj saifi
- “आखिरी दरवाज़ा” — Season 3 · firoj saifi
- मुझे आवाज़ किसने दी? · firoj saifi