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एपिसोड 28: पहली बहन

firoj saifi · Ghost Stories · 13 मिनट

दरवाज़ा खुल चुका था।
दहलीज़ पर खड़ी बच्ची मुस्कुरा रही थी।
उसकी उम्र आठ साल से ज़्यादा नहीं थी। उसने पुराने ज़माने की सफेद फ्रॉक पहन रखी थी, जिसके निचले हिस्से पर मिट्टी और सूखे खून जैसे भूरे धब्बे थे। उसके बाल दो चोटियों में बँधे थे। माथे पर छोटी-सी बिंदी थी और दाईं कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
उसका चेहरा मीरा से मिलता था।
आँखें अर्जुन जैसी थीं।
लेकिन उसकी मुस्कान किसी तीसरे व्यक्ति की थी।
“नमस्ते, पापा।”
अर्जुन के हाथ से तस्वीर गिर गई।
“मुझे पापा मत कहो।”
बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ।”
“आपने ही तो मुझे अपना नाम दिया था।”
“मैंने तुम्हें कभी देखा तक नहीं!”
बच्ची की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।
“आपने मुझे देखा था, पापा। बस आपको याद नहीं।”
अर्जुन ने पीछे हटते हुए चाँदी की घंटी उठाई।
“तुम जो भी हो, इस घर के अंदर नहीं आओगी।”
बच्ची ने दहलीज़ की ओर देखा।
“लेकिन मैं तो पहले से अंदर हूँ।”
उसी क्षण अर्जुन के पीछे खड़ी मीरा चीख पड़ी।
“भैया, पीछे हटो!”
अर्जुन पलटा।
बैठक की दीवार पर तीन परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।
पहली अर्जुन की।
दूसरी मीरा की।
तीसरी उस बच्ची की।
लेकिन तीसरी परछाईं दहलीज़ पर खड़ी बच्ची की नहीं थी।
वह अर्जुन के ठीक पीछे खड़ी थी।
अर्जुन ने तुरंत घंटी बजाई।
टन्न्न!
तीनों परछाइयाँ एक साथ काँप उठीं।
बच्ची ने अपने कान ढक लिए।
“आप हमेशा ऐसा क्यों करते हैं?”
अर्जुन ने दूसरी बार घंटी बजाई।
इस बार बच्ची की आँखों से काला तरल बहने लगा।
उसने अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा लिया।
“मुझे फिर मत मारिए!”
उसकी आवाज़ बदल गई।
अब वह आठ साल की बच्ची की आवाज़ नहीं थी।
वह एक वयस्क स्त्री की आवाज़ थी।
“मैंने आपका क्या बिगाड़ा था?”

अर्जुन का हाथ रुक गया।

उसने मीरा की ओर देखा।

मीरा की आँखें खुली थीं, लेकिन वह बच्ची को नहीं देख रही थी। उसकी नज़र दरवाज़े के ऊपर जमी हुई थी।

वहाँ लकड़ी पर कुछ उभर रहा था।

धीरे-धीरे।

जैसे किसी ने दरवाज़े के भीतर से नाखून चलाए हों।

अभय।

फिर उस नाम के नीचे दूसरा नाम उभरा।

अर्णव।

और तीसरा—

ईशान।

बच्ची ने अपना चेहरा उठाया।

उसकी आँखें फिर सामान्य थीं।

“इनमें से कौन आपका नाम है, पापा?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

“अगर आप अपना नाम नहीं जानते,” बच्ची ने कहा, “तो मुझे कैसे पहचानेंगे?”

वह एक कदम आगे बढ़ी।

अर्जुन ने घंटी उठाई, लेकिन इस बार उसे बजाया नहीं।

बच्ची दहलीज़ पार करके बैठक में आ गई।

कोई बिजली नहीं चमकी।

कोई घड़ी नहीं रुकी।

दीवार पर कोई नई परछाईं नहीं उभरी।

वह बस अंदर आ गई।

और यही बात सबसे डरावनी थी।

क्योंकि इस घर में अब तक जितनी भी चीज़ें आई थीं, वे किसी-न-किसी तरह अपना अस्तित्व साबित करती थीं। कोई आईने में दिखती थी, कोई आवाज़ बनकर आती थी, कोई बंद दरवाज़े के पीछे खड़ी रहती थी।

यह बच्ची सामान्य लग रही थी।

उसके पैरों में मिट्टी थी।

उसकी फ्रॉक पर धूल थी।

उसकी साँस चल रही थी।

वह बिल्कुल जीवित थी।

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्ची ने तुरंत उत्तर दिया—

“आपका नाम।”

“मेरा नाम अर्जुन है।”

“वह नाम जो आपको दिया गया था।”

“मेरा असली नाम भी अर्जुन है।”

बच्ची ने सिर हिलाया।

“अगर ऐसा है, तो फिर आप अर्णव सुनकर जवाब क्यों देते हैं?”

अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।

बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

“और अभय सुनकर आपकी कलाई में दर्द क्यों होता है?”

अर्जुन ने अनजाने में अपनी दाईं कलाई पकड़ ली।

तीन काली रेखाओं के नीचे तीखी जलन उठ रही थी।

मीरा ने आगे बढ़कर बच्ची को पकड़ना चाहा।

लेकिन बच्ची ने उसकी ओर देखा और पीछे हट गई।

“मुझे मत छूना।”

मीरा रुक गई।

“क्यों?”

बच्ची ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“तुम्हें याद नहीं कि तुमने मेरे साथ क्या किया था?”

मीरा के होंठ काँपने लगे।

“मैंने तुम्हारे साथ कुछ नहीं किया।”

“तुमने मुझे नाम दिया था।”

“नहीं।”

“तुमने मुझे अपनी बहन कहा था।”

मीरा की आँखों में अचानक आँसू भर आए।

“मैं तुम्हारी बहन हूँ।”

बच्ची ने सिर हिलाया।

“तुम मेरी बहन नहीं हो।”

उसने अर्जुन की ओर देखा।

“यह मेरी बहन है।”

कमरे की हवा जैसे जम गई।

अर्जुन ने बच्ची को देखा।

फिर मीरा को।

दोनों के चेहरे एक जैसे नहीं थे।

फिर भी उस पल अर्जुन को लगा कि वह एक ही चेहरे के दो अलग समय देख रहा है।

एक बच्ची, जो अभी पैदा हुई थी।

और एक लड़की, जो पच्चीस साल से अपने जन्म की कहानी खोज रही थी।

“तुम्हारा नाम क्या है?” अर्जुन ने फिर पूछा।

बच्ची ने इस बार उत्तर नहीं दिया।

उसने अपनी फ्रॉक की जेब से एक छोटी-सी लकड़ी की गुड़िया निकाली।

गुड़िया का एक हाथ टूटा हुआ था।

उसका चेहरा काले रंग से रंगा गया था।

और पीठ पर तीन रेखाएँ बनी थीं।

मीरा ने गुड़िया देखते ही मुँह पर हाथ रख लिया।

“यह…”

अर्जुन ने पूछा, “तुम इसे जानती हो?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“यह मेरे पास थी।”

“कब?”

“बचपन में।”

“कहाँ गई थी?”

मीरा की आँखें दूर कहीं देखने लगीं।

“मुझे याद नहीं।”

बच्ची ने गुड़िया उसकी ओर बढ़ाई।

“तुमने इसे मेरे पालने में रखा था।”

मीरा ने गुड़िया नहीं ली।

“मैंने ऐसा नहीं किया।”

“तुमने कहा था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तो तुम मुझे ढूँढ़ने आओगी।”

“मैंने तुम्हें कभी देखा नहीं!”

बच्ची ने गुड़िया वापस अपनी जेब में रख ली।

“तुम्हें भी यही लगता है।”

वह अर्जुन की ओर मुड़ी।

“आपको भी लगता है कि आपने मुझे कभी नहीं देखा।”

अर्जुन ने कहा, “क्योंकि मैंने नहीं देखा।”

बच्ची ने धीरे से पूछा—

“तो फिर 1947 में आपने मुझे क्यों बचाया था?”

मीरा पीछे हटते-हटते दीवार से लग गई।

विक्रम ने आगे बढ़कर बच्ची और अर्जुन के बीच खड़े होने की कोशिश की।

लेकिन बच्ची ने केवल उसे देखा।

विक्रम के कदम वहीं रुक गए।

“तुम यहाँ नहीं होनी चाहिए,” विक्रम ने कहा।

बच्ची ने पूछा, “क्यों?”

“क्योंकि तुम मर चुकी हो।”

बच्ची कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली—

“कौन-सी बार?”

विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।

“तुम्हें क्या याद है?”

“पहली बार जब मैं मरी, तब मैं पैदा नहीं हुई थी।”

बच्ची ने अपनी उँगलियों पर गिनना शुरू किया।

“दूसरी बार जब मैं मरी, तब मुझे मेरा नाम नहीं पता था।”

“तीसरी बार जब मैं मरी, तब मेरे पापा ने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया।”

उसने अर्जुन की ओर देखा।

“और चौथी बार जब मैं मरी…”

वह रुक गई।

उसकी मुस्कान लौट आई।

“तब मैं आपके घर में पैदा हुई थी।”

अर्जुन ने महसूस किया कि उसकी कलाई की जलन अब पूरे हाथ में फैल रही थी।

“यह बच्ची हमें उलझा रही है,” उसने कहा।

विक्रम ने धीमे स्वर में जवाब दिया, “शायद।”

“तुम्हें हर बात में शायद क्यों कहना पड़ता है?”

“क्योंकि इस घर में जब भी मैंने किसी बात को सच मान लिया, वह किसी दूसरी रात झूठ बनकर लौट आई।”

विक्रम ने बच्ची की ओर देखा।

“लेकिन एक बात मुझे मालूम है।”

“क्या?”

“यह बच्ची किसी की परछाईं नहीं है।”

बच्ची हँस पड़ी।

“बहुत अच्छा, विक्रम चाचा।”

विक्रम का चेहरा जम गया।

“तुमने मुझे चाचा कहा?”

“आपने ही तो मुझे पहली बार गोद में उठाया था।”

“कब?”

“जब मेरे पापा ने कहा था कि मैं उनकी बेटी नहीं हूँ।”

विक्रम के होंठ काँपने लगे।

“नहीं…”

“आपने मुझे उस कमरे में छिपाया था, जहाँ घड़ी उल्टी चलती है।”

विक्रम ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।

“बस करो!”

बच्ची चुप हो गई।

फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“आपको याद आ गया।”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“तुम…”

“हाँ।”

“तुम वही बच्ची हो?”

बच्ची ने सिर हिलाया।

विक्रम घुटनों के बल बैठ गया।

“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”

बच्ची ने उसकी ओर देखा।

“लेकिन आपने मुझे वापस छोड़ दिया था।”

विक्रम रो पड़ा।

“मैंने सोचा था कि अगर तुम्हें बाहर निकालूँगा, तो अर्जुन मर जाएगा।”

“तो आपने मुझे मरने दिया।”

“मैंने तुम्हें नहीं मारा!”

“आपने दरवाज़ा बंद किया था।”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

बच्ची ने अर्जुन की ओर देखा।

“और आपने दूसरी तरफ़ से दरवाज़ा बंद किया था, पापा।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

उसके दिमाग में एक दृश्य चमका।

एक लंबा गलियारा।

दोनों तरफ़ दो दरवाज़े।

एक तरफ़ मीरा रो रही थी।

दूसरी तरफ़ एक छोटी बच्ची।

वह दोनों के बीच खड़ा था।

किसी ने उससे कहा था—

“एक को बचाओ।”

उसने एक दरवाज़े की ओर हाथ बढ़ाया था।

लेकिन उसे याद नहीं था कि उसने कौन-सा दरवाज़ा खोला था।

या बंद किया था।

अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

“नहीं…”

बच्ची धीरे-धीरे उसके पास आई।

“आपको याद आने लगा है।”

“चुप रहो।”

“आपने मुझे नाम दिया था।”

“चुप!”

“आपने कहा था कि अगर मैं मर गई, तो आप मुझे अपने भीतर रखेंगे।”

अर्जुन ने उसे धक्का देने की कोशिश की।

लेकिन उसका हाथ बच्ची के शरीर से होकर निकल गया।

पहली बार उसका शरीर पारदर्शी दिखाई दिया।

उसके भीतर एक छोटा-सा कमरा था।

कमरे में एक पालना।

पालने के पास एक आईना।

और आईने में खड़ा अर्जुन।

बच्ची ने कहा—

“आपने मुझे अपने भीतर रखा था, पापा।”

अर्जुन पीछे गिर पड़ा।

घंटी उसके हाथ से छूट गई।

बच्ची ने घंटी उठाई और उसे अर्जुन की ओर बढ़ा दिया।

“अब इसे मुझे दे दीजिए।”

“क्यों?”

“क्योंकि इस बार मैं दरवाज़ा बंद नहीं होने दूँगी।”

अर्जुन ने घंटी ले ली।

बच्ची मुस्कुराई।

फिर वह मीरा की ओर मुड़ी।

“दीदी, आप चलेंगी?”

मीरा ने काँपते हुए पूछा, “कहाँ?”

बच्ची ने तीसरी मंज़िल की ओर इशारा किया।

“जहाँ आपका जन्म हुआ था।”

मीरा ने अर्जुन की ओर देखा।

अर्जुन धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

“हम सब साथ जाएँगे।”

बच्ची ने सिर हिलाया।

“नहीं, पापा।”

उसकी आवाज़ पहली बार कठोर हो गई।

“इस बार आपको अकेले जाना होगा।”

तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा खुला हुआ था।

अर्जुन को याद नहीं था कि उसने उसे खोला था या नहीं।

वह सीढ़ियाँ चढ़ता गया।

हर सीढ़ी पर उसे अपनी ज़िंदगी का कोई दृश्य दिखाई देता।

पहली सीढ़ी पर वह पाँच साल का था, विक्रम की उँगली पकड़े स्कूल जा रहा था।

दूसरी सीढ़ी पर वह दस साल का था, अपने पिता के साथ आँगन में पतंग उड़ा रहा था।

तीसरी सीढ़ी पर वह तेरह साल का था, मीरा के साथ पुराने कुएँ के पास खड़ा था।

चौथी सीढ़ी पर वह सत्रह साल का था, देवगढ़ छोड़कर जा रहा था।

हर दृश्य में कुछ ठीक था।

और हर दृश्य में कुछ गलत।

कभी विक्रम के चेहरे पर आँखें नहीं थीं।

कभी मीरा की जगह कोई छोटी बच्ची खड़ी थी।

कभी अर्जुन की पतंग की डोर किसी अदृश्य हाथ से बँधी थी।

और कभी वह खुद सीढ़ियों पर खड़ा था, जबकि नीचे उसका दूसरा रूप उसे जाते हुए देख रहा था।

सीढ़ियों के अंत में तीसरी मंज़िल का गलियारा था।

उसके अंत में तीन दरवाज़े थे।

पहले पर लिखा था—

अभय।

दूसरे पर—

अर्णव।

तीसरे पर कोई नाम नहीं था।

अर्जुन ने पहले दरवाज़े को छुआ।

अंदर से आवाज़ आई—

“मुझे बाहर निकालो।”

दूसरे दरवाज़े के पीछे से आवाज़ आई—

“मुझे याद करो।”

तीसरे दरवाज़े के पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई।

अर्जुन ने तीसरे दरवाज़े पर हाथ रखा।

दरवाज़ा तुरंत खुल गया।

अंदर अस्पताल का वही कमरा था।

सफेद दीवारें।

लोहे का बिस्तर।

पीली रोशनी।

और बिस्तर पर लेटा एक आदमी।

अर्जुन जैसा चेहरा।

तीन काली रेखाएँ।

आदमी ने आँखें खोलीं।

“तुम आ गए।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

आदमी ने कहा—

“तुम्हारा पहला नाम।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“मेरा पहला नाम अभय था?”

आदमी ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“अर्णव?”

“नहीं।”

“तो क्या था?”

आदमी ने आँखें बंद कर लीं।

“वह नाम, जिसे तुम्हारी माँ ने तुम्हें दिया था।”

“राधा?”

“वह स्त्री, जिसे तुम राधा कहते हो, तुम्हारी माँ थी। लेकिन उसने तुम्हें यह नाम नहीं दिया।”

अर्जुन का सिर घूमने लगा।

“तो किसने?”

आदमी ने बिस्तर के नीचे इशारा किया।

वहाँ एक छोटी लड़की छिपी हुई थी।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

उसने सिर उठाया।

“मैंने।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

लड़की ने कहा—

“मैंने तुम्हें तुम्हारा पहला नाम दिया था, भैया।”

“तुम कौन हो?”

लड़की ने मुस्कुराकर कहा—

“तुम्हारी पहली बहन।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

लड़की ने उत्तर देने से पहले अपना चेहरा छिपा लिया।

“अगर मैंने अपना नाम बता दिया, तो तुम मुझे फिर भूल जाओगे।”

“मैं तुम्हें नहीं भूलूँगा।”

“तुमने पहले भी यही कहा था।”

अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया।

“मुझे याद नहीं।”

लड़की ने उसकी हथेली पकड़ ली।

“मुझे पता है।”

उसने अर्जुन की हथेली पर उँगली से कुछ लिखा।

एक नाम।

अर्जुन ने पढ़ने की कोशिश की।

लेकिन अक्षर उसके हाथ पर टिक नहीं रहे थे।

वे बनते, मिटते और फिर किसी दूसरे नाम में बदल जाते।

पहले अभय।

फिर अर्णव।

फिर ईशान।

फिर मीरा।

अंत में केवल एक शब्द बचा।

माँ।

अर्जुन ने सिर उठाया।

लड़की गायब थी।

बिस्तर खाली था।

और कमरे की दीवार पर एक नया वाक्य लिखा था—

जिसे तुम अपनी बहन समझते हो, वह तुम्हारी माँ नहीं है।

नीचे दूसरी पंक्ति उभरी—

लेकिन जिसने तुम्हें जन्म दिया, वह तुम्हारी बेटी है।

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसने घंटी बजाई।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

कमरे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

फिर उसने अपनी आँखें खोलीं।

बिस्तर पर अब एक नवजात बच्चा लेटा था।

बच्चे ने आँखें खोलीं।

उसकी आँखें अर्जुन जैसी थीं।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

और उसने पहली बार रोने के बजाय कहा—

“भैया।”

अर्जुन ने बच्चे को गोद में उठा लिया।

उसके शरीर में गर्मी थी।

उसकी साँस चल रही थी।

वह जीवित था।

अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”

बच्चे ने उसकी उँगली पकड़ ली।

फिर फुसफुसाया—

“तो फिर मुझे मेरा नाम दे दो।”

अर्जुन ने उसके माथे को चूमा।

“तुम्हारा नाम…”

वह रुक गया।

उसे कोई नाम याद नहीं था।

बच्चे ने धीरे से कहा—

“मेरा नाम वही है, जो तुमने अपने लिए चुना था।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“अर्जुन।”

बच्चा रोने लगा।

कमरे की सारी दीवारें काँप उठीं।

दरवाज़े के बाहर किसी ने चीखकर कहा—

“नहीं!”

अर्जुन ने बच्चे को सीने से लगा लिया।

“मैंने तुम्हें नाम दे दिया।”

बच्चे की कलाई पर बनी तीन काली रेखाएँ धीरे-धीरे मिटने लगीं।

पहली।

दूसरी।

तीसरी।

और जैसे ही आखिरी रेखा मिट गई, बच्चे ने आँखें बंद कर लीं।

उसकी साँस रुक गई।

अर्जुन चीख पड़ा।

“नहीं!”

उसने बच्चे को झकझोरा।

“उठो!”

लेकिन बच्चा नहीं हिला।

तभी दरवाज़े पर मीरा दिखाई दी।

उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।

“भैया, तुमने क्या कर दिया?”

अर्जुन ने मृत बच्चे को अपनी छाती से लगा रखा था।

“मैंने उसे उसका नाम दिया।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“तुमने उसे उसका नाम नहीं दिया।”

“तो क्या किया?”

मीरा की आवाज़ टूट गई।

“तुमने उसे अपनी जगह दे दी।”

कमरे की घड़ी तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गई।

बिस्तर पर लेटे मृत बच्चे ने आँखें खोल दीं।

और अर्जुन की अपनी आवाज़ में कहा—

“अब मेरी बारी है।”
एपिसोड 28 समाप्त।

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
28 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
13 min
Words
2441
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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