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एपिसोड 27: जिसका जन्म अभी बाकी है

firoj saifi · Ghost Stories · 30 मिनट

“बेटा, इस बार मुझे मरने मत देना।”
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे आदमी की आवाज़ शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल से आ रही थी।
अर्जुन सीढ़ियों के नीचे खड़ा था।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी। घंटी की ठंडी सतह उसकी हथेली में धँस रही थी, लेकिन उसने उसे छोड़ा नहीं।
अभी कुछ क्षण पहले उसने उस कमरे को देखा था—सफेद दीवारें, लोहे का बिस्तर, पीली रोशनी और एक आदमी, जिसका चेहरा बिल्कुल अर्जुन जैसा था। उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं। उसके पास खड़ी स्त्री ने कहा था कि बच्चा पैदा हो गया है। फिर किसी डॉक्टर ने पूछा था कि कौन-सा बच्चा।
और जवाब आया था—
“वही, जो मर चुका था।”
अर्जुन ने आँखें खोल दीं।
तीसरी मंज़िल की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर कोई नहीं था।

लेकिन ऊपर से बिस्तर के पहियों की आवाज़ आ रही थी।

खर्र…

खर्र…

खर्र…

जैसे कोई भारी बिस्तर धीरे-धीरे गलियारे में घसीटा जा रहा हो।

मीरा उसके पीछे खड़ी थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।

“भैया, हमें यहाँ से निकलना चाहिए।”

“कहाँ जाएँगे?”

“बाहर।”

“बाहर कौन है, मीरा?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“तुमने कहा था कि राधा माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था। तुम्हें यह बात कब पता चली?”

“मुझे नहीं पता।”

“तुम्हें याद नहीं?”

“मुझे याद है कि मैंने यह बात कही थी। लेकिन यह याद नहीं कि मुझे यह बात मालूम कैसे हुई।”

अर्जुन कुछ क्षण उसे देखता रहा।

“क्या तुम्हारे साथ हमेशा ऐसा होता है?”

मीरा ने अपनी उँगलियाँ आपस में कस लीं।

“जब भी मैं इस घर के बारे में कुछ ऐसा जानती हूँ, जो मुझे नहीं जानना चाहिए, उसके बाद मुझे याद नहीं रहता कि मैंने वह बात कहाँ से सीखी थी।”

“तो तुम अपनी यादों पर भरोसा नहीं करती?”

“मैं तुम्हारी यादों पर भी भरोसा नहीं करती, भैया।”

यह सुनकर अर्जुन चुप हो गया।

मीरा की आँखें भर आईं।

“लेकिन मैं तुम पर भरोसा करती हूँ।”

“दोनों में क्या फर्क है?”

“यादें बदल सकती हैं। तुम भी बदल सकते हो। लेकिन जब तुम मेरे सामने खड़े होते हो, तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा हिस्सा है जो अभी तक नहीं बदला।”

अर्जुन ने पहली बार उसकी आवाज़ में वह थकान सुनी, जो पंद्रह वर्षों से किसी के भीतर जमा होती रही हो।

“और अगर वह हिस्सा भी बदल गया तो?”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“तो मैं तुम्हें फिर से पहचानना सीखूँगी।”

ऊपर से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

दोनों ने एक साथ सिर उठाया।

फिर वही आवाज़ आई—

“भैया?”

इस बार आवाज़ तीसरी मंज़िल से नहीं आई थी।

वह उनके पीछे, घर के मुख्य दरवाज़े के पास से आई थी।

अर्जुन ने पलटकर देखा।

दरवाज़ा खुला हुआ था।

बाहर अँधेरा था।

और दहलीज़ पर एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसकी उम्र लगभग पाँच साल थी। उसने अस्पताल में पहने जाने वाले पुराने कपड़े पहन रखे थे। कपड़ों पर भूरे रंग के दाग थे। उसके नंगे पैर मिट्टी से सने थे।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

अर्जुन का गला सूख गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने सिर टेढ़ा किया।

“तुम मुझे नहीं पहचानते?”

“नहीं।”

“लेकिन तुमने मेरा नाम रखा था।”

अर्जुन ने चाँदी की घंटी कसकर पकड़ ली।

“मैंने तुम्हारा कोई नाम नहीं रखा।”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“फिर तुमने मुझे किस नाम से बुलाया था?”

अर्जुन जवाब नहीं दे पाया।

बच्चे ने अपनी कलाई उठाई।

“यह देखो।”

तीन काली रेखाएँ।

“तुम्हारे पास भी हैं।”

अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।

फिर बच्चे की।

“तुम कौन हो?”

बच्चा धीरे-धीरे अंदर आया।

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने अपने नाम के नीचे छिपा दिया था।”

अर्जुन ने घंटी बजा दी।

एक तेज़, साफ़ आवाज़ पूरे घर में फैल गई।

बच्चा वहीं रुक गया।

उसका चेहरा काँपने लगा, जैसे किसी तस्वीर को पानी में डाल दिया गया हो।

एक पल के लिए उसका चेहरा अर्जुन का हो गया।

फिर विक्रम का।

फिर शारदा देवी का।

फिर एक ऐसी स्त्री का, जिसे अर्जुन पहचान नहीं पाया।

अंत में बच्चा फिर अपने पुराने चेहरे पर लौट आया।

उसने अर्जुन को देखा और उदास स्वर में कहा—

“तुम हमेशा यही करते हो।”

फिर वह पीछे मुड़ा और बाहर के अँधेरे में चला गया।

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

मीरा ने अर्जुन की बाँह पकड़ ली।

“तुमने उसे देखा?”

“हाँ।”

“वह कौन था?”

अर्जुन ने उत्तर देने से पहले बहुत देर तक बंद दरवाज़े को देखा।

“मुझे नहीं पता।”

ऊपर से बिस्तर के पहियों की आवाज़ फिर सुनाई दी।

लेकिन अब उसके साथ कदमों की आवाज़ भी थी।

कोई नीचे उतर रहा था।

धीरे-धीरे।

एक-एक सीढ़ी।

अर्जुन ने घंटी उठाई।

मीरा उसके आगे आ खड़ी हुई।

“अगर वह आदमी नीचे आए, तो उससे कुछ मत पूछना।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे लगता है कि वह हमारे सवालों का जवाब देने नहीं आया।”

“तो किसलिए आया है?”

मीरा ने सीढ़ियों की ओर देखा।

“वह यह देखने आया है कि हम कौन-से सवाल पूछते हैं।”

***

सीढ़ियों के मोड़ पर विक्रम दिखाई दिया।

उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। माथे पर पसीना था और उसकी दाईं हथेली पर खून लगा हुआ था।

वह नीचे आते ही दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

“वह आदमी कहाँ है?”

अर्जुन ने कहा, “गायब हो गया।”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“नहीं।”

“तुम्हें क्या पता था?”

“मैंने उसे पहले देखा है।”

“कहाँ?”

“अस्पताल में।”

“किस अस्पताल में?”

विक्रम ने सिर उठाया।

“उस अस्पताल में, जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ था।”

अर्जुन के भीतर कुछ सख्त हो गया।

“तुमने कहा था कि तुम्हें 1947 की कोई याद नहीं है।”

“मुझे याद नहीं थी।”

“अब याद आ गई?”

“कुछ हिस्से।”

“कौन-से हिस्से?”

विक्रम ने काँपते हाथ से अपनी जेब टटोली। वहाँ से उसने एक पुरानी चाबी निकाली।

चाबी काले लोहे की थी। उस पर तीन छोटे गोल निशान बने थे।

“यह चाबी शारदा ने मुझे दी थी।”

अर्जुन ने चाबी लेने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन विक्रम ने उसे पीछे कर लिया।

“इससे कोई दरवाज़ा नहीं खुलता।”

“तो फिर यह किस काम की है?”

“यह तय करती है कि कौन-सा दरवाज़ा खुल सकता है।”

मीरा ने चाबी को ध्यान से देखा।

“इस पर तीन निशान क्यों हैं?”

विक्रम ने कहा, “तीन जन्म।”

अर्जुन ने पूछा, “और चौथा?”

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

“चौथा जन्म नहीं होता।”

“तो क्या होता है?”

विक्रम ने जवाब दिया—

“गवाही।”

यह शब्द सुनते ही अर्जुन को तस्वीर याद आई।

1947 की तस्वीर।

मृतक का नाम अज्ञात।

गवाह—विक्रम शर्मा।

बच्चे की पहचान—अर्जुन।

और गवाह की उम्र—पाँच वर्ष।

“तुम उस तस्वीर में पाँच साल के थे,” अर्जुन ने कहा। “लेकिन तुम कहते हो कि तुम्हारा जन्म 1948 में हुआ।”

विक्रम ने धीरे से सिर हिलाया।

“क्योंकि उस तस्वीर में जो बच्चा खड़ा है, वह मैं नहीं हूँ।”

“फिर कौन है?”

“वह बच्चा, जिसे मेरे नाम से पुकारा गया था।”

अर्जुन ने चाबी की ओर देखा।

“तुम्हें याद है कि उसका नाम क्या था?”

विक्रम ने बहुत देर तक उत्तर नहीं दिया।

फिर बोला—

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि जब मैंने उसे नाम से पुकारा, उसी क्षण वह मर गया।”

मीरा की आँखें फैल गईं।

“तुमने उसे मारा?”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

“लेकिन वह मर गया?”

“हाँ।”

“तो फिर तुम्हें कैसे पता कि तुमने उसे बचाने की कोशिश की थी? अगर तुम्हें उसका नाम तक याद नहीं?”

विक्रम के चेहरे पर दर्द उभरा।

“क्योंकि मुझे उसकी आखिरी बात याद है।”

“क्या कहा था उसने?”

विक्रम ने अर्जुन की ओर देखा।

“उसने कहा था—मुझे अपने नाम से मत बुलाना।”

अर्जुन के हाथ से चाबी लगभग छूट गई।

“क्यों?”

“क्योंकि जिस नाम से उसे पुकारा जाता, उसी नाम का आदमी उसकी जगह मर जाता।”

कुछ क्षण तक बैठक में कोई आवाज़ नहीं हुई।

फिर मीरा ने धीमे स्वर में कहा—

“तो क्या किसी ने अर्जुन नाम से उस बच्चे को पुकारा था?”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“मुझे नहीं पता।”

“लेकिन तुमने अभी कहा कि तुमने उसे नाम से पुकारा था।”

“मैंने उसका नाम नहीं लिया था।”

“तो क्या लिया था?”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

उसके होंठ हिले।

आवाज़ बहुत धीमी थी।

“बेटा।”

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

उस एक शब्द ने उसके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा खोल दिया था।

उसे याद आया कि बचपन में विक्रम उसे कभी-कभी इसी तरह पुकारते थे।

लेकिन उसे यह भी याद आया कि एक रात, जब वह लगभग सात साल का था, उसने अपने पिता से पूछा था कि क्या उनके कोई और बच्चे भी हैं।

विक्रम ने तब जवाब दिया था—

“अगर तुम्हारा कोई भाई होता, तो मैं तुम्हें बता देता।”

उस रात अर्जुन को लगा था कि उसके पिता मज़ाक कर रहे हैं।

अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह जवाब झूठ था, सच था या किसी ऐसी बात को छिपाने का तरीका, जिसे विक्रम खुद भी नहीं समझते थे।

“मुझे अस्पताल जाना है,” अर्जुन ने कहा।

विक्रम ने तुरंत सिर उठाया।

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि वहाँ तुम्हारा इंतज़ार कोई डॉक्टर नहीं कर रहा।”

“तो कौन कर रहा है?”

विक्रम ने बहुत धीरे से कहा—

“तुम्हारी पहली मौत।”

***

देवगढ़ का पुराना मातृत्व केंद्र गाँव के उत्तर में था।

अब वहाँ कोई अस्पताल नहीं चलता था। इमारत की छत कई जगह से टूट चुकी थी। मुख्य फाटक पर जंग लगा ताला लटकता था, और उसके पीछे उगी झाड़ियों ने रास्ते का आधा हिस्सा ढक लिया था।

कभी वहाँ गाँव की औरतें बच्चों को जन्म देने आती थीं।

अब लोग उस रास्ते से दिन में भी नहीं गुजरते थे।

कहा जाता था कि रात में अस्पताल की खिड़कियों के पीछे रोशनी दिखाई देती है।

कभी किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

कभी नर्स की घंटी बजती है।

और कभी कोई आदमी अस्पताल के बाहर खड़ा होकर अपने ही नाम की पुकार लगाता है।

अर्जुन, मीरा और विक्रम जब वहाँ पहुँचे, तब शाम ढल चुकी थी।

आसमान पर बादल जमा थे।

हवा में मिट्टी और पुराने लोहे की गंध थी।

अर्जुन ने जंग लगे फाटक को धक्का दिया।

वह बिना आवाज़ किए खुल गया।

“यह ताला लगा हुआ था,” मीरा ने कहा।

“तुमने देखा था?”

“हाँ।”

“कब?”

मीरा ने कुछ क्षण सोचा।

“मुझे याद नहीं।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

मीरा ने तुरंत कहा, “लेकिन मैं जानती हूँ कि मैंने इसे बंद देखा था।”

विक्रम आगे बढ़ा।

“तुम दोनों मेरे पीछे रहना।”

“क्यों?” अर्जुन ने पूछा।

“क्योंकि इस अस्पताल में हर कमरे के बाहर एक नाम लिखा है।”

“और?”

“और हर नाम के पीछे एक कमरा है, जो उस आदमी के लिए नहीं बना, जिसका नाम बाहर लिखा है।”

अर्जुन ने पूछा, “तो हम किस कमरे में जाएँगे?”

विक्रम ने चाबी उसकी ओर बढ़ाई।

“जिस पर तुम्हारा नाम लिखा है।”

अस्पताल के भीतर कदम रखते ही अर्जुन को लगा कि हवा अचानक भारी हो गई है।

मुख्य गलियारे की दीवारों पर पुराने बोर्ड लगे थे।

प्रसूति कक्ष।

दवा कक्ष।

रिकॉर्ड रूम।

डॉक्टर का कार्यालय।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हर बोर्ड पर नामों के नीचे तारीख़ें लिखी थीं।

कहीं 1947।

कहीं 1995।

कहीं 2008।

और कहीं 2013।

कुछ कमरों के बाहर एक ही नाम कई बार लिखा था।

**विक्रम शर्मा — 12 मार्च 1947।**

**विक्रम शर्मा — 17 जुलाई 1995।**

**विक्रम शर्मा — 17 जुलाई 2013।**

तीनों के नीचे अलग-अलग समय।

3:13 AM।

अर्जुन ने दीवार को छुआ।

पेंट के नीचे कुछ उभरा हुआ था।

उसने नाखून से थोड़ा रंग खुरचा।

नीचे एक और नाम निकला।

**अर्जुन शर्मा।**

तारीख़—17 जुलाई 1947।

समय—3:13 AM।

अर्जुन पीछे हट गया।

“यह गलत है।”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“यह अस्पताल तारीख़ें गलत नहीं लिखता।”

“तो फिर यह कैसे हो सकता है?”

“तुम्हें लगता है कि तारीख़ें केवल कैलेंडर पर लिखी जाती हैं।”

विक्रम ने गलियारे के अंत की ओर इशारा किया।

“कुछ तारीख़ें लोगों के भीतर लिखी होती हैं।”

वे आगे बढ़े।

रिकॉर्ड रूम का दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर लकड़ी की पुरानी अलमारियाँ थीं। कागज़ों पर धूल जमी थी। एक मेज़ पर लाल कपड़े में लिपटी रजिस्टर की किताब रखी थी।

अर्जुन ने उसे खोला।

पहले पन्ने पर लिखा था—

**मातृत्व केंद्र, देवगढ़।**

**विशेष अभिलेख: वे बच्चे जिन्हें जन्म दिया गया, लेकिन जन्म प्रमाणपत्र नहीं दिया गया।**

अर्जुन ने पन्ना पलटा।

पहली प्रविष्टि—

**नाम: विक्रम।**

**जन्म: 12 मार्च 1947।**

**माता-पिता: अज्ञात।**

**स्थिति: जीवित।**

नीचे लाल स्याही से लिखा था—

**मृत्यु दर्ज नहीं की जा सकती।**

दूसरी प्रविष्टि—

**नाम: अर्जुन।**

**जन्म: 17 जुलाई 1947।**

**माता: अज्ञात।**

**पिता: वही बच्चा।**

**स्थिति: जन्म शेष।**

अर्जुन की उँगलियाँ पन्ने पर जम गईं।

“जन्म शेष?”

मीरा उसके पास आ गई।

“इसका क्या मतलब है?”

विक्रम ने रजिस्टर बंद करने की कोशिश की।

अर्जुन ने उसे रोक दिया।

“मुझे देखने दो!”

उसने अगला पन्ना पलटा।

तीसरी प्रविष्टि—

**नाम: मीरा।**

**जन्म: दर्ज नहीं।**

**माता: राधा शर्मा।**

**पिता: दर्ज नहीं।**

**स्थिति: साक्षी।**

अर्जुन ने मीरा की ओर देखा।

मीरा की आँखें उस पन्ने पर जमी थीं।

“यह मेरा नाम है।”

अर्जुन ने धीरे से कहा, “हाँ।”

“लेकिन मेरी जन्मतिथि नहीं है।”

“हाँ।”

“मेरी माँ का नाम है।”

“हाँ।”

मीरा ने उसके हाथ से रजिस्टर लिया।

“और मेरी स्थिति साक्षी लिखी है।”

उसने अगली पंक्ति पढ़ी।

**साक्षी को तब तक जीवित माना जाएगा, जब तक वह उस घटना को याद रखे, जिसे किसी और ने भुला दिया।**

मीरा के हाथ काँपने लगे।

“कौन-सी घटना?”

रजिस्टर के नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था—

**17 जुलाई 2008।**

मीरा ने पन्ना पलटने की कोशिश की।

लेकिन अगला पन्ना चिपका हुआ था।

उसने उसे धीरे से अलग किया।

कागज़ के भीतर से एक छोटी तस्वीर नीचे गिर गई।

तस्वीर में राधा खड़ी थी।

उसकी गोद में एक बच्ची थी।

पीछे विक्रम खड़ा था।

और उनके बीच एक आदमी था, जिसका चेहरा किसी ने काली स्याही से मिटा दिया था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**जिसे मीरा ने पिता कहा, वह उसका पिता नहीं था।**

मीरा ने तस्वीर सीने से लगा ली।

“नहीं।”

अर्जुन ने उसकी बाँह पकड़ी।

“मीरा…”

“नहीं, भैया। मेरी माँ ने मुझे बताया था कि मेरे पिता की मौत हो गई थी।”

विक्रम ने कहा, “हो सकता है उसने सच कहा हो।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“तो यह तस्वीर किसकी है?”

विक्रम चुप रहा।

“कौन था वह आदमी?”

विक्रम ने बहुत धीरे से कहा—

“वह आदमी, जिसकी पहचान तुमने अपनी यादों से बनाई थी।”

मीरा की आँखों में गुस्सा भर आया।

“तुम सब यही कहते हो! कोई मुझे पहचानता नहीं, कोई मेरी यादों पर भरोसा नहीं करता, और जब मैं सवाल पूछती हूँ तो कहते हो कि मैं शायद पैदा ही नहीं हुई!”

उसकी आवाज़ रिकॉर्ड रूम में गूँज उठी।

“मैं यहाँ हूँ! मैं साँस ले रही हूँ! मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूँ! मुझे किसी रजिस्टर की ज़रूरत नहीं कि मैं साबित कर सकूँ कि मैं जीवित हूँ!”

उसने तस्वीर मेज़ पर फेंक दी।

तस्वीर उलटकर फर्श पर गिरी।

और उसके नीचे से एक और पर्ची निकली।

इस बार पर्ची पर केवल एक नाम लिखा था।

**राधा।**

उसके नीचे—

**मृत्यु: 17 जुलाई 1947।**

मीरा की चीख निकल गई।

अर्जुन ने पर्ची उठा ली।

“यह गलत है।”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

“शायद।”

“तुम फिर शायद कह रहे हो!”

“क्योंकि मुझे नहीं पता कि कौन-सी तारीख़ सच है!”

विक्रम की आवाज़ पहली बार टूट गई।

“मैंने राधा को 2008 में देखा था। मैंने उसे 2013 में सुना था। मैंने उसे 1995 की तस्वीरों में देखा है। और अब यह रजिस्टर कहता है कि वह 1947 में मर गई थी। तुम मुझसे कौन-सा सच माँग रहे हो, अर्जुन?”

अर्जुन चुप हो गया।

विक्रम ने आगे कहा—

“मैंने इस घर में इतने लोगों को मरते देखा है कि अब मुझे समझ नहीं आता कि मौत किसे कहते हैं। जो मर गया, वह वापस आ जाता है। जो जीवित है, उसकी जन्मतिथि नहीं मिलती। और जो पैदा नहीं हुआ, वह दरवाज़े पर खड़ा होकर अपने पिता को पुकारता है।”

उसने अपनी आँखें पोंछीं।

“मुझे भी नहीं पता कि मैं कौन हूँ।”

पहली बार अर्जुन ने विक्रम को एक रहस्य के रखवाले की तरह नहीं, बल्कि किसी ऐसे आदमी की तरह देखा जो खुद उसी रहस्य में फँसा हुआ था।

तभी रिकॉर्ड रूम के बाहर घंटी बजी।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“यह अस्पताल की घंटी है।”

अर्जुन ने पूछा, “यहाँ तो कोई अस्पताल नहीं चलता।”

“मैंने कहा था न, कुछ आवाज़ें तब भी चलती रहती हैं, जब जगहें बंद हो जाती हैं।”

गलियारे से किसी नर्स के चलने की आवाज़ आई।

धीमे कदम।

फिर कपड़े की सरसराहट।

फिर एक स्त्री की आवाज़—

“डॉक्टर साहब, तीसरा बच्चा रो रहा है।”

विक्रम का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसने अर्जुन की ओर देखा।

“हमें यहाँ से निकलना होगा।”

अर्जुन ने रजिस्टर बंद किया।

“नहीं।”

“अर्जुन!”

“हम यहाँ इसीलिए आए हैं।”

वह दरवाज़े की ओर बढ़ा।

गलियारे में कोई नहीं था।

लेकिन दूर प्रसूति कक्ष के बाहर एक सफेद कपड़ों वाली नर्स खड़ी थी।

उसका चेहरा दीवार की ओर था।

उसके हाथ में एक छोटा-सा बच्चा था।

बच्चा रो नहीं रहा था।

वह हँस रहा था।

नर्स ने बिना मुड़े कहा—

“डॉक्टर साहब आ गए।”

अर्जुन ने कदम रोक लिया।

“तुम कौन हो?”

नर्स ने बच्चे को थोड़ा ऊपर उठाया।

“मैं वह हूँ, जिसे इस अस्पताल ने कभी नौकरी पर रखा ही नहीं।”

“और बच्चा?”

नर्स ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।

उसका चेहरा नहीं था।

केवल चिकनी त्वचा।

जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ दो पतली दरारें थीं।

“यह बच्चा नहीं है।”

उसने बच्चे को अर्जुन की ओर बढ़ाया।

“यह गवाह है।”

अर्जुन पीछे हट गया।

नर्स ने कहा—

“इसे पकड़ लो। इसे तुम्हारा चेहरा याद है।”

मीरा ने अर्जुन को पीछे खींचा।

लेकिन बच्चा अचानक रोने लगा।

उसके रोने की आवाज़ इतनी तीखी थी कि अस्पताल की सारी खिड़कियाँ काँप उठीं।

गलियारे की दीवारों पर लगे बोर्ड बदलने लगे।

प्रसूति कक्ष के नीचे अब लिखा था—

**जन्म: 17 जुलाई 1947।**

दवा कक्ष के नीचे—

**मृत्यु: 17 जुलाई 1995।**

रिकॉर्ड रूम के नीचे—

**गवाह: 17 जुलाई 2008।**

और मुख्य दरवाज़े के ऊपर—

**वापसी: 17 जुलाई 2013।**

अर्जुन ने देखा कि हर तारीख़ के नीचे एक ही समय लिखा था।

3:13 AM।

नर्स ने बच्चे को अपनी छाती से लगा लिया।

“इनमें से किसी एक दिन तुम पैदा हुए थे।”

उसने अर्जुन की ओर अपना चेहराविहीन सिर घुमाया।

“और किसी एक दिन तुम मर गए थे।”

अर्जुन ने कहा, “मुझे यह सब पहले भी बताया गया है।”

“किसने?”

“मेरे पिता ने।”

नर्स की दरारों जैसी आँखें चौड़ी हो गईं।

“तुम्हारे कितने पिता हैं?”

अर्जुन चुप हो गया।

नर्स ने गिनना शुरू किया।

“एक जिसने तुम्हें जन्म दिया।”

“एक जिसने तुम्हें नाम दिया।”

“एक जिसने तुम्हें बचाया।”

“एक जिसने तुम्हें मरने के लिए छोड़ दिया।”

“और एक…”

वह रुक गई।

अर्जुन ने पूछा, “एक क्या?”

नर्स ने बच्चे को नीचे देखा।

“एक जिसे तुमने कभी पिता नहीं कहा।”

बच्चा अचानक चुप हो गया।

उसने अपना सिर उठाया।

उसकी आँखें खुलीं।

और अर्जुन ने उनमें अपना ही चेहरा देखा।

लेकिन वह चेहरा बूढ़ा था।

बहुत बूढ़ा।

उसकी आँखों के नीचे गहरी झुर्रियाँ थीं। बाल सफेद थे। होंठ सूखे हुए थे।

फिर भी उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

बच्चे ने कहा—

“अर्जुन।”

आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

“तुम बहुत देर से आए।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

बच्चे ने उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जो तुम्हारे बाद पैदा होगा।”

अस्पताल की सारी रोशनियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में किसी ने अर्जुन की कलाई पकड़ ली।

वह हाथ मीरा का नहीं था।

वह हाथ बहुत छोटा था।

और उसकी उँगलियों में तीन काली रेखाएँ थीं।

“भैया,” बच्चे ने फुसफुसाया, “इस बार मुझे अपने साथ ले चलो।”

अर्जुन ने घंटी बजाने के लिए हाथ उठाया।

लेकिन घंटी उसके हाथ में नहीं थी।

उसकी जगह एक छोटी-सी चाबी थी।

वही काले लोहे की चाबी, जो विक्रम ने उसे दी थी।

अँधेरे में नर्स की आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोलो, डॉक्टर साहब।”

अर्जुन ने सामने देखा।

प्रसूति कक्ष का दरवाज़ा खुला हुआ था।

अंदर एक बिस्तर पर राधा लेटी थी।

उसके चेहरे पर पसीना था।

उसके दोनों हाथों में खून लगा था।

वह दर्द से कराह रही थी।

बिस्तर के पास एक आदमी खड़ा था।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।

उस आदमी ने अर्जुन की ओर देखा।

“तुम आ गए।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

आदमी ने कहा—

“तुम्हारा पहला पिता।”

“तुम्हारी मौत हो चुकी है।”

“हाँ।”

“फिर तुम यहाँ कैसे हो?”

आदमी ने बिस्तर पर लेटी राधा की ओर देखा।

“क्योंकि तुम्हारा जन्म अभी बाकी है।”

राधा ने अचानक अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

उसकी पकड़ में असाधारण ताकत थी।

“बेटा,” उसने कहा, “जब डॉक्टर तुमसे तुम्हारा नाम पूछे, तो अपना नाम मत बताना।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“क्यों?”

राधा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“क्योंकि तुम्हारा नाम सुनते ही वह बच्चे को मार देगा।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा बच्चा?”

राधा ने अपने पेट पर हाथ रखा।

“जो अभी पैदा नहीं हुआ।”

उसी क्षण कमरे के कोने में रखा तीसरा पालना अपने आप हिलने लगा।

उसमें कोई बच्चा नहीं था।

लेकिन पालने के नीचे एक परछाईं थी।

परछाईं ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

राधा ने चीखकर कहा—

“उसे मत देखना!”

लेकिन अर्जुन देख चुका था।

परछाईं के हाथ में एक नाम लिखा था।

वह नाम जिसे अर्जुन ने अपने सपनों में कई बार सुना था, लेकिन हर बार जागते ही भूल गया था।

उसने नाम पढ़ने की कोशिश की।

पहला अक्षर दिखाई दिया।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

लेकिन जैसे ही उसने पूरा नाम पढ़ना चाहा, कमरे की घड़ी तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गई।

बिस्तर पर लेटी राधा की साँस थम गई।

डॉक्टर ने बच्चे को उठाया।

वह रो नहीं रहा था।

डॉक्टर ने उसकी कलाई देखी।

तीन काली रेखाएँ।

फिर उसने अर्जुन की कलाई देखी।

वहाँ भी तीन काली रेखाएँ थीं।

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

“दोनों जीवित हैं।”

अर्जुन ने पूछा, “तो तीसरा कौन है?”

डॉक्टर ने उसकी ओर देखा।

“तीसरा?”

उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

“तीसरा तो अभी पैदा ही नहीं हुआ।”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

कमरे का दरवाज़ा बंद था।

लेकिन उसके बाहर मीरा खड़ी थी।

उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी।

वह अर्जुन को देखकर रो रही थी।

“भैया, जल्दी बाहर आओ!”

अर्जुन ने उसकी ओर बढ़ने की कोशिश की।

लेकिन राधा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“उसे मत पहचानना।”

“वह मीरा है!”

“नहीं।”

राधा की आँखें अचानक काली पड़ गईं।

“वह तुम्हारी बेटी है।”

अर्जुन का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।

बाहर खड़ी मीरा ने दरवाज़े पर हाथ मारा।

“भैया!”

राधा ने फुसफुसाकर कहा—

“अगर तुमने उसे बेटी माना, तो वह तुम्हारी बहन कभी नहीं रही होगी।”

दरवाज़े के बाहर मीरा की आवाज़ बदल गई।

अब वह किसी बच्ची की आवाज़ थी।

“पापा?”

अर्जुन ने राधा का हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

लेकिन उसकी उँगलियाँ लोहे की तरह कठोर हो चुकी थीं।

“तुम झूठ बोल रही हो!”

राधा ने आँसू भरी आँखों से कहा—

“मैंने भी यही कहा था।”

“किससे?”

“तुम्हारे पहले पिता से।”

उसने अर्जुन के कान के पास मुँह लाकर फुसफुसाया—

“और उसने मुझे मार दिया था।”

अर्जुन ने चीखकर आँखें बंद कर लीं।

***

जब उसने आँखें खोलीं, तो वह अस्पताल के रिकॉर्ड रूम में था।

मीरा उसके सामने घुटनों के बल बैठी थी।

विक्रम दरवाज़े के पास खड़ा था।

अर्जुन की साँसें तेज़ चल रही थीं।

“मैं कहाँ था?”

मीरा ने उसका चेहरा पकड़ लिया।

“यहीं।”

“मैं प्रसूति कक्ष में था।”

“नहीं, भैया।”

“राधा वहाँ थी।”

“नहीं।”

“उसने कहा कि तुम मेरी बेटी हो!”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में भय था।

“तुम्हें क्या याद है?”

अर्जुन ने जवाब देने की कोशिश की।

लेकिन उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।

उसे राधा का चेहरा याद था।

बिस्तर।

तीन पालने।

बच्चे की कलाई पर तीन काली रेखाएँ।

और एक नाम, जिसे उसने पढ़ने की कोशिश की थी।

लेकिन वह नाम गायब था।

“मैंने एक नाम देखा था,” उसने कहा।

मीरा ने पूछा, “कौन-सा नाम?”

“मुझे याद नहीं।”

विक्रम धीरे-धीरे उनके पास आया।

उसके हाथ में एक नया कागज़ था।

“मुझे यह प्रसूति कक्ष के बाहर मिला।”

अर्जुन ने कागज़ लिया।

उस पर अस्पताल की मुहर थी।

ऊपर लिखा था—

**जन्म प्रमाणपत्र।**

नाम: मीरा।

जन्मतिथि: 17 जुलाई 1947।

माता: राधा शर्मा।

पिता: अर्जुन शर्मा।

स्थिति: जन्म अपूर्ण।

अर्जुन ने कागज़ को घूरा।

“यह कैसे हो सकता है?”

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।

मीरा धीरे-धीरे खड़ी हुई।

उसने कागज़ अर्जुन के हाथ से लिया।

फिर उसे बीच से फाड़ दिया।

“यह झूठ है।”

कागज़ के दो टुकड़े फर्श पर गिर गए।

मीरा ने उन्हें पैरों से दबा दिया।

“मेरा नाम मीरा है। मैं तुम्हारी बहन हूँ। और मैं तुम्हें यह साबित करने के लिए किसी कागज़ की ज़रूरत नहीं पड़ने दूँगी।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“लेकिन अगर…”

“नहीं।”

मीरा की आवाज़ दृढ़ थी।

“अगर इस घर ने मेरे बारे में कोई झूठ लिखा है, तो मैं उसे झूठ ही मानूँगी। अगर इसने मेरे बारे में कोई सच छिपाया है, तो मैं उसे खोजूँगी। लेकिन मैं अपनी पूरी ज़िंदगी किसी ऐसे नाम के पीछे नहीं बिताऊँगी, जिसे कोई आईना मेरे सामने रख दे।”

वह अर्जुन के पास आई।

“तुम मेरे भैया हो। अभी के लिए मेरे लिए इतना सच काफी है।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“और अगर एक दिन मैं तुम्हें पहचानना भूल गया?”

मीरा ने उसकी हथेली दबाई।

“तो मैं तुम्हें याद दिलाऊँगी।”

“और अगर मैं तुम्हें पहचानने से इनकार कर दूँ?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“तो मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

कुछ क्षण तक दोनों चुप रहे।

फिर मीरा ने धीरे से कहा—

“लेकिन भैया, एक बात मुझे अब समझ आ गई है।”

“क्या?”

“इस अस्पताल में जो कुछ भी है, वह हमारे जन्म की कहानी नहीं बता रहा।”

अर्जुन ने पूछा, “तो क्या बता रहा है?”

मीरा ने फर्श पर पड़े फटे प्रमाणपत्र को देखा।

“यह बता रहा है कि किसे किसका नाम दिया गया।”

विक्रम ने सिर उठाया।

“और किसका नाम किससे छीन लिया गया।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हें यह पहले से पता था?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“मुझे शक था।”

“किस बात का?”

विक्रम ने गहरी साँस ली।

“कि 1947 में जिस आदमी की मौत हुई थी, वह तुम्हारा पिता नहीं था।”

“तो कौन था?”

विक्रम ने कहा—

“वह तुम्हारा बेटा था।”

कमरे में अचानक ठंडी हवा चलने लगी।

मीरा ने धीरे से पूछा—

“और अगर वह अर्जुन का बेटा था, तो उसका जन्म कैसे हो सकता है, जब अर्जुन खुद उससे पहले पैदा ही नहीं हुआ था?”

विक्रम ने उत्तर नहीं दिया।

उसने केवल दीवार की ओर देखा।

वहाँ अब एक नया दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

लकड़ी का पुराना दरवाज़ा।

उस पर पीतल की पट्टी लगी थी।

**कमरा 313।**

दरवाज़े के नीचे से रोशनी निकल रही थी।

और उसके पीछे किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।

अर्जुन ने काले लोहे की चाबी उठाई।

वह दरवाज़े के पास गया।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया, अगर इसके पीछे वह बच्चा हुआ तो?”

अर्जुन ने कहा, “तो मैं उससे पूछूँगा कि वह कौन है।”

“और अगर उसने तुम्हें तुम्हारा नाम बता दिया?”

अर्जुन ने कुछ क्षण सोचा।

फिर बोला—

“तो इस बार मैं उससे अपना नाम नहीं छीनूँगा।”

उसने चाबी ताले में डाली।

ताला खुल गया।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

अंदर एक छोटा कमरा था।

कमरे के बीचोंबीच एक पालना रखा था।

पालने में कोई बच्चा नहीं था।

दीवार पर एक बड़ा आईना लगा था।

आईने में अर्जुन, मीरा और विक्रम दिखाई दे रहे थे।

लेकिन उनके पीछे एक चौथा आदमी भी खड़ा था।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।

वह मुस्कुराया।

फिर उसने आईने के भीतर से अपना हाथ उठाया और पालने की ओर इशारा किया।

पालना अपने आप हिलने लगा।

उसके भीतर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

“माँ?”

मीरा की आँखें फैल गईं।

आईने में खड़ी आकृति ने सिर झुकाया।

“हाँ, बेटा।”

बच्चे ने पूछा—

“क्या इस बार मेरा जन्म पूरा होगा?”

आदमी ने जवाब दिया—

“अगर तुम्हारा पिता तुम्हें पहचान ले।”

अर्जुन ने आईने की ओर देखा।

“तुम कौन हो?”

आदमी ने मुस्कुराकर कहा—

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने 1947 में मरने के लिए छोड़ दिया था।”

अर्जुन ने चाँदी की घंटी उठाई।

“तुम मेरे बेटे हो?”

आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

उसने बहुत धीरे से सिर हिलाया।

“नहीं।”

अर्जुन का दिल बैठ गया।

“तो फिर?”

आईने के भीतर खड़ा आदमी एक कदम आगे आया।

उसका चेहरा अब बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा था।

वह अर्जुन था।

लेकिन उसकी आँखों में कोई भय नहीं था।

“मैं वह हूँ,” उसने कहा, “जिसे तुमने अपना पिता बनने से पहले ही मार दिया था।”

आईने के भीतर पालने में रोशनी भर गई।

एक नवजात बच्चे का हाथ बाहर निकला।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

और उसकी मुट्ठी में एक छोटी-सी पर्ची थी।

अर्जुन ने पर्ची पढ़ने की कोशिश की।

उस पर लिखा था—

**जन्म लेने वाला: अर्जुन शर्मा।**

**जन्म देने वाला: अर्जुन शर्मा।**

**मृत्यु का कारण: पिता की पहचान।**

अर्जुन पीछे हट गया।

आईने में खड़े उसके दूसरे रूप ने आखिरी बार कहा—

“अब तुम्हें चुनना होगा, अर्जुन।”

“क्या?”

“तुम अपने बेटे को जन्म दोगे…”

वह रुक गया।

“या अपने पिता को मरने दोगे?”

आईने में अचानक दरार पड़ गई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

और हर दरार में अर्जुन का एक अलग चेहरा दिखाई देने लगा।

एक बच्चा।

एक जवान आदमी।

एक बूढ़ा आदमी।

एक मृत आदमी।

और सबसे अंत में—

एक चेहरा, जिसकी आँखें थीं ही नहीं।

उस चेहरे ने होंठ खोले।

“अर्जुन…”

कमरे की सारी रोशनियाँ बुझ गईं।

“अब अपनी माँ से पूछो कि उसने तुम्हें पहली बार किस नाम से पुकारा था।”

अँधेरे में मीरा का हाथ अर्जुन के हाथ से छूट गया।

अर्जुन ने उसे पुकारा—

“मीरा?”

कोई जवाब नहीं आया।

उसने फिर पुकारा—

“मीरा!”

इस बार अँधेरे में एक स्त्री की आवाज़ आई।

“मीरा कौन?”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“तुम कौन हो?”

स्त्री ने कहा—

“मैं वह हूँ, जिसने उसे जन्म दिया था।”

“राधा?”

“नहीं।”

कुछ क्षण का मौन।

फिर आवाज़ आई—

“मैं उसकी पहली माँ हूँ।”

अर्जुन ने अँधेरे में हाथ बढ़ाया।

उसकी उँगलियाँ किसी के चेहरे से टकराईं।

वह चेहरा मीरा का था।

लेकिन उसकी त्वचा बर्फ जैसी ठंडी थी।

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

“भैया, मुझे मेरा असली नाम बता दो।”

अर्जुन ने काँपते हुए कहा—

“मुझे नहीं पता।”

मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

“तो फिर तुमने मुझे क्यों बचाया था?”

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

मीरा ने अपना माथा उसके माथे से लगा दिया।

“तुमने मुझे बचाया था, भैया।”

उसकी आवाज़ अचानक किसी बच्चे जैसी हो गई।

“लेकिन किससे?”

कमरे में एक तेज़ धमाका हुआ।

आईना टूटकर फर्श पर बिखर गया।

और टूटे हुए हर टुकड़े में एक ही दृश्य दिखाई दे रहा था—

17 जुलाई 1947।

एक अस्पताल।

एक बिस्तर।

एक मृत आदमी।

उसके पास खड़ा पाँच साल का बच्चा।

और उस बच्चे की पीठ के पीछे खड़ी एक छोटी लड़की।

लड़की ने बच्चे का हाथ पकड़ा।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

उसने बच्चे के कान में कुछ कहा।

बच्चा मुस्कुराया।

फिर उसने अपना सिर उठाकर सीधे अर्जुन की ओर देखा।

उसकी आँखों में अर्जुन का चेहरा था।

और उसके होंठों पर एक ही शब्द—

**“भैया।”**

***

जब अर्जुन ने अगली सुबह आँखें खोलीं, वह शर्मा निवास की बैठक में पड़ा था।

उसके पास मीरा बैठी थी।

विक्रम खिड़की के पास खड़ा था।

सूरज निकल चुका था।

घड़ियाँ चल रही थीं।

तीन बजकर तेरह मिनट की सुइयाँ अब सामान्य समय दिखा रही थीं।

अर्जुन धीरे-धीरे उठ बैठा।

“हम वापस कैसे आए?”

मीरा ने कहा, “तुम्हें अस्पताल में बेहोश पाया था। विक्रम तुम्हें उठाकर यहाँ लाए।”

“कमरा 313?”

“कौन-सा कमरा?”

अर्जुन ने उसे देखा।

“अस्पताल का कमरा।”

मीरा का चेहरा बदल गया।

“भैया, हम किसी अस्पताल में नहीं गए थे।”

“क्या?”

“हम रिकॉर्ड रूम तक गए थे। वहाँ तुम्हें चक्कर आया। फिर तुम गिर पड़े। हम तुम्हें वापस घर ले आए।”

अर्जुन ने विक्रम की ओर देखा।

“तुम्हें याद है?”

विक्रम ने धीरे से सिर हिलाया।

“हम अस्पताल गए थे।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“नहीं।”

विक्रम ने कहा, “हाँ।”

“तुमने मुझे वापस घर लाया था।”

“मैंने तुम्हें उठाया था।”

“हम अस्पताल नहीं गए थे।”

विक्रम ने बहुत धीरे से कहा—

“मीरा, तुम वहाँ थीं।”

मीरा ने अपना सिर पकड़ लिया।

“नहीं…”

उसकी साँसें तेज़ होने लगीं।

“मैं वहाँ नहीं थी।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मीरा, मेरी ओर देखो।”

उसने उसकी ओर देखा।

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हें क्या याद है?”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“मुझे याद है कि हम घर से निकले थे।”

“फिर?”

“मुझे याद है कि हम अस्पताल पहुँचे थे।”

“फिर?”

“मुझे याद है कि वहाँ एक बच्चा था।”

वह काँपने लगी।

“और मुझे याद है कि मैंने उसे अपने हाथों में उठाया था।”

अर्जुन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“उसके बाद?”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

“उसके बाद…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“उसके बाद मैंने उसे अपना नाम दे दिया था।”

बैठक की दीवार पर लगी शारदा देवी की तस्वीर के शीशे में हल्की दरार उभरी।

मीरा ने सिर उठाया।

उसकी आँखें अचानक स्थिर हो गईं।

“भैया…”

“क्या हुआ?”

“मुझे अब याद आ गया।”

“क्या?”

मीरा ने अर्जुन का हाथ छोड़ दिया।

उसने अपनी दाईं कलाई पर उँगली फेरी।

वहाँ तीन काली रेखाएँ उभर आई थीं।

पहली।

दूसरी।

तीसरी।

फिर उसके होंठ हिले।

“मेरा पहला नाम…”

वह रुक गई।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“मेरा पहला नाम अर्जुन था।”

अर्जुन के भीतर जैसे कुछ टूट गया।

“नहीं।”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“मैंने तुम्हें अपना नाम दिया था, भैया।”

“नहीं!”

“तुमने मुझे मीरा कहा।”

“चुप रहो!”

“और जब तुमने मुझे मीरा कहा, तब मैं तुम्हारी बहन बन गई।”

अर्जुन ने उसके कंधे पकड़ लिए।

“तुम मेरी बहन हो!”

मीरा रो पड़ी।

“हाँ, भैया।”

उसने अर्जुन को गले लगा लिया।

“मैं तुम्हारी बहन हूँ।”

कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को पकड़े रहे।

फिर मीरा ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

“लेकिन मैं तुम्हारी पहली बहन नहीं हूँ।”

अर्जुन ने उसे पीछे किया।

“क्या मतलब?”

मीरा की आँखें अब बिल्कुल काली थीं।

“तुम्हारी पहली बहन वह थी, जिसे तुमने जन्म लेने से पहले ही अपना नाम दे दिया था।”

अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।

मीरा की आँखें सामान्य हो गईं।

वह घबराकर इधर-उधर देखने लगी।

“भैया?”

अर्जुन पीछे हट गया।

“तुमने अभी क्या कहा?”

“क्या?”

“तुमने कहा कि तुम मेरी पहली बहन नहीं हो।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा।”

“तुमने कहा था!”

“भैया, मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो!”

अर्जुन ने विक्रम की ओर देखा।

विक्रम का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

वह दीवार पर लगी तस्वीर को घूर रहा था।

“विक्रम?”

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।

अर्जुन उसके पास गया।

“तुमने सुना?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“तो इसका मतलब…”

विक्रम ने उसकी बात काट दी।

“इसका मतलब है कि शारदा ने सबसे बड़ा झूठ हमसे छिपाया था।”

“कौन-सा झूठ?”

विक्रम ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

शारदा देवी की तस्वीर में अब उनके पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

बच्ची ने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

उसके चेहरे पर मीरा की मुस्कान थी।

लेकिन उसकी आँखें अर्जुन जैसी थीं।

तस्वीर के नीचे काले अक्षरों में एक वाक्य उभर रहा था—

**पहली संतान का जन्म कभी हुआ ही नहीं था।**

और उसके नीचे, लाल स्याही में—

**क्योंकि वह पहले से ही पिता थी।**

उसी क्षण घर के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

फिर बाहर से किसी छोटी बच्ची की आवाज़ आई—

“भैया, दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने मीरा की ओर देखा।

मीरा ने सिर हिलाया।

“मत खोलना।”

बाहर से आवाज़ फिर आई—

“भैया, मैं हूँ।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“तुम कौन हो?”

बाहर से जवाब आया—

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने अपना नाम दिया था।”

फिर दरवाज़े के नीचे से एक पुरानी तस्वीर भीतर सरकाई गई।

अर्जुन ने उसे उठाया।

तस्वीर में वह खुद था।

लेकिन उसके साथ खड़ी बच्ची मीरा नहीं थी।

वह एक दूसरी लड़की थी।

उसकी उम्र लगभग आठ साल थी।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

और तस्वीर के पीछे लिखा था—

**अर्जुन और उसकी पहली बहन।**

**जन्म: 17 जुलाई 1947।**

**मृत्यु: अभी बाकी है।**

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

बाहर से बच्ची की आवाज़ आई—

“भैया, इस बार मुझे मत भूलना।”

और शर्मा निवास के भीतर, तीसरी मंज़िल पर, किसी ने बहुत धीरे से कहा—

“अर्णव।”

अर्जुन ने अनजाने में जवाब दे दिया—

“हाँ?”

घर की सारी घड़ियाँ एक साथ रुक गईं।

तीन बजकर तेरह मिनट।

दरवाज़े के बाहर खड़ी बच्ची हँसी।

फिर उसने कहा—

“अब मुझे तुम्हारा असली नाम याद आ गया।”

दरवाज़े के भीतर से किसी ने कुंडी खोल दी।

लेकिन अर्जुन ने हाथ नहीं लगाया था।

कुंडी धीरे-धीरे नीचे गिरी।

दरवाज़ा अपने आप खुलने लगा।

और दहलीज़ पर खड़ी बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

“नमस्ते, पापा।”
एपिसोड 27 समाप्त।

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
27 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
30 min
Words
5991
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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