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एपिसोड 26: पहला पिता
firoj saifi · Ghost Stories · 28 मिनट
दरवाज़ा खुल चुका था।
और शर्मा निवास के भीतर वह आदमी खड़ा था, जिसका चेहरा अर्जुन के चेहरे से इतना मिलता था कि पहली नज़र में दोनों में अंतर करना असंभव था।
अंतर केवल इतना था कि अर्जुन की दाईं कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
उस आदमी की कलाई बिल्कुल साफ़ थी।
न कोई निशान।
न कोई पुराना घाव।
न कोई ऐसी पहचान, जिसे देखकर अर्जुन उसे इस घर के किसी पुराने रहस्य से जोड़ सकता।
वह आदमी कुछ क्षण तक अर्जुन को देखता रहा।
फिर उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी।
“अब तुम्हारी बारी है, बेटा।”
अर्जुन ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।
उसने उसे भीतर आने का रास्ता भी नहीं दिया।
“तुम कौन हो?”
आदमी ने घर के अंदर झाँका। उसकी नज़र सीढ़ियों पर गई, फिर दीवार पर टँगी शारदा देवी की तस्वीर पर, और अंत में तीसरी मंज़िल की ओर जाती अँधेरी सीढ़ियों पर ठहर गई।
“तुम्हारे पिता।”
अर्जुन के पीछे खड़ा विक्रम अचानक हँस पड़ा।
वह हँसी इतनी कड़वी थी कि कमरे की हवा में किसी पुराने घाव की गंध फैल गई।
“कितनी बार?” विक्रम ने पूछा।
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“क्या?”
“कितनी बार तुमने इस लड़के के सामने यह दावा किया है कि तुम उसके पिता हो?”
आदमी की मुस्कान गायब हो गई।
उसने विक्रम को ऐसे देखा, जैसे किसी सड़क पर खड़े अजनबी को देख रहा हो।
“तुम्हें मैं जानता हूँ?”
विक्रम चुप हो गया।
अर्जुन ने पहली बार उसके चेहरे पर डर देखा।
यह वह डर नहीं था जो किसी शक्तिशाली प्राणी को देखकर पैदा होता है।
यह उस आदमी का डर था, जिसने अचानक किसी ऐसी चीज़ को देख लिया हो, जिसके अस्तित्व से वह बरसों से इनकार करता आया था।
“तुम इसे नहीं पहचानते?” अर्जुन ने पूछा।
दरवाज़े पर खड़े आदमी ने सिर हिलाया।
“मैंने इससे पहले कभी इस आदमी को नहीं देखा।”
विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
“हो सकता है।”
“तुम मुझे जानते हो।”
“अगर जानता होता, तो याद होता।”
“तुमने मुझे नाम दिया था!”
आदमी की आँखों में एक क्षण के लिए उलझन उभरी।
“किस नाम से?”
विक्रम के होंठ खुल गए।
लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
अर्जुन ने देखा कि विक्रम की उँगलियाँ काँप रही थीं।
तभी पीछे से मीरा की आवाज़ आई।
“भैया…”
अर्जुन ने मुड़कर देखा।
मीरा सीढ़ियों के पास खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही घबराहट थी, जो उसने 2008 की उस रात के बाद कई बार देखी थी—जब कोई पुरानी याद अचानक वर्तमान में लौट आती थी और उसे समझ नहीं आता था कि वह सच में क्या देख रही है।
“उसे अंदर मत आने देना,” मीरा ने कहा।
दरवाज़े पर खड़ा आदमी उसकी आवाज़ सुनकर पलटा।
उसने मीरा को देखा।
कुछ क्षण तक देखता रहा।
फिर उसने बहुत सामान्य स्वर में पूछा—
“यह लड़की कौन है?”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“मीरा?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र उस आदमी के चेहरे पर जमी हुई थी।
“तुमने मुझे नहीं पहचाना?” उसने पूछा।
आदमी ने ध्यान से उसका चेहरा देखा।
“क्या मुझे पहचानना चाहिए?”
मीरा एक कदम पीछे हट गई।
उसकी उँगलियाँ सीढ़ियों की रेलिंग पर कस गईं।
“तुमने मुझे गोद में उठाया था।”
आदमी चुप रहा।
“तुमने मेरे बाल काटे थे। मैं रो रही थी, तो तुमने कहा था कि अगर मैं चुप हो जाऊँगी, तो तुम मुझे चाँद दिखाने ले जाओगे।”
आदमी की आँखों में कोई पहचान नहीं आई।
मीरा की आवाज़ काँपने लगी।
“तुमने मेरे लिए लकड़ी का एक घोड़ा बनाया था। उसका एक पैर छोटा था। मैं उसे लेकर पूरे घर में घूमती थी। तुमने कहा था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तो तुम उसके चारों पैर बराबर कर दोगे।”
उस आदमी ने धीरे से सिर हिलाया।
“मुझे अफ़सोस है। मुझे ऐसी कोई बात याद नहीं।”
मीरा की आँखों में आँसू भर आए।
“तुमने ही तो कहा था कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ।”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
इस बार उसकी आँखों में पहली बार कोई भाव उभरा।
दया।
“बेटी,” उसने धीरे से दोहराया, “मेरी कोई बेटी नहीं थी।”
उसी क्षण घर के भीतर लगी सभी घड़ियाँ बंद हो गईं।
एक साथ।
दीवार की घड़ी।
बैठक में रखा पुराना घड़ीघर।
रसोई की छोटी घड़ी।
अर्जुन की कलाई की घड़ी।
सबकी सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गईं।
लेकिन इस बार किसी घड़ी ने आवाज़ नहीं की।
कोई टिक-टिक नहीं।
कोई घंटी नहीं।
केवल एक ऐसी खामोशी, जिसमें अर्जुन को अपनी धड़कन भी किसी दूसरे आदमी की छाती से आती हुई महसूस होने लगी।
विक्रम ने फुसफुसाकर कहा—
“तुम्हें मीरा याद नहीं है…”
दरवाज़े पर खड़े आदमी ने उसकी ओर देखा।
“नहीं।”
“लेकिन तुम उसे जानते थे।”
“मैंने इसे कभी नहीं देखा।”
“तुमने इसे पैदा होते देखा था।”
आदमी की मुस्कान लौट आई।
इस बार वह मुस्कान बिल्कुल अलग थी।
“तुम्हें अपनी यादों पर इतना भरोसा क्यों है, विक्रम?”
विक्रम पीछे हट गया।
अर्जुन ने तुरंत उसकी बाँह पकड़ ली।
“तुम इसे जानते हो?”
विक्रम ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“विक्रम!”
“मैंने इसका चेहरा देखा है,” विक्रम ने अंततः कहा, “लेकिन जिस आदमी को मैं जानता था, उसके चेहरे पर यह निशान था।”
उसने अर्जुन की कलाई की ओर इशारा किया।
फिर दरवाज़े पर खड़े आदमी की कलाई की ओर।
“तीन काली रेखाएँ।”
अजनबी ने अपनी साफ़ कलाई को देखा।
“तो शायद तुम किसी और को जानते थे।”
विक्रम की आवाज़ भर्रा गई।
“नहीं। मैं तुम्हें जानता था।”
“फिर भी मेरा नाम नहीं बता सकते।”
विक्रम चुप हो गया।
आदमी ने अर्जुन की ओर हाथ बढ़ाया।
“आओ, बेटा। यहाँ से चलना होगा।”
अर्जुन ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।
“कहाँ?”
“उस जगह, जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ था।”
“मेरा जन्म देवगढ़ में हुआ था।”
“तुम्हें ऐसा बताया गया था।”
“मेरे पास जन्म प्रमाणपत्र है।”
“तुम्हारे पास कागज़ है।”
आदमी ने धीरे से सिर झुकाया।
“जन्म नहीं।”
अर्जुन के गले में कुछ अटक गया।
“और तुम मुझे वहाँ ले जा सकते हो?”
“मैं तुम्हें वहाँ वापस ले जा सकता हूँ।”
“वापस?”
“क्योंकि तुम वहाँ से आए थे।”
अर्जुन ने उसके चेहरे को गौर से देखा।
उसका चेहरा बिल्कुल अपना था।
आँखें भी।
भौंहों के ऊपर का छोटा निशान भी।
यहाँ तक कि नाक के पास वह हल्की-सी लकीर भी, जो अर्जुन को बचपन में गिरने से लगी थी।
लेकिन उस आदमी के चेहरे पर थकान नहीं थी।
उसकी आँखों के नीचे काले घेरे नहीं थे।
और उसकी त्वचा पर उम्र का कोई निशान नहीं था।
वह अर्जुन जैसा दिखता था, लेकिन अर्जुन की तरह जीया हुआ नहीं लगता था।
“तुम्हारी उम्र कितनी है?” अर्जुन ने पूछा।
आदमी ने कहा—
“जिस दिन तुम पैदा हुए, उस दिन मैं मर गया था।”
विक्रम के मुँह से निकला—
“नहीं!”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें यह बात याद है?”
विक्रम की आँखें फैल गईं।
“तुम मर गए थे।”
“हाँ।”
“17 जुलाई 1947 को।”
“शायद।”
“तुम्हें एक अस्पताल में मृत घोषित किया गया था।”
“शायद।”
“और फिर तुम्हें उसी रात दफना दिया गया था।”
आदमी कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“तो फिर मैं यहाँ कैसे खड़ा हूँ?”
किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
अर्जुन ने आखिरकार दरवाज़े से हटकर उसे अंदर आने दिया।
यह निर्णय उसने भरोसे से नहीं लिया था।
वह केवल यह देखना चाहता था कि शर्मा निवास उसके भीतर आने पर क्या करता है।
अजनबी ने दहलीज़ पार की।
पहले उसका दायाँ पैर भीतर आया।
फिर बायाँ।
और जैसे ही उसका दूसरा पैर घर के अंदर पड़ा, तीसरी मंज़िल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से आती हुई।
लेकिन उसमें एक ऐसी बेचैनी थी, जैसे कोई बच्चा कई वर्षों से रो रहा हो और अब उसकी आवाज़ में आँसू भी बाकी न बचे हों।
अजनबी रुक गया।
उसने सिर उठाकर ऊपर देखा।
“वह अभी भी यहाँ है?”
अर्जुन का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
“कौन?”
आदमी ने जवाब नहीं दिया।
वह सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा।
मीरा उसके रास्ते में आ खड़ी हुई।
“तुम ऊपर नहीं जा सकते।”
आदमी ने उसे देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि वहाँ जो है, वह तुम्हारा इंतज़ार नहीं कर रहा।”
“मुझे मालूम है।”
“तुम्हें कुछ नहीं मालूम।”
मीरा की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई।
“तुम मुझे पहचानते तक नहीं हो। तुम मेरे पिता होने का दावा करते हो, लेकिन तुम्हें मेरी एक भी याद नहीं। फिर तुम्हें इस घर के बारे में कैसे पता है?”
आदमी ने कुछ क्षण उसे देखा।
फिर बहुत धीरे से कहा—
“क्योंकि यह घर मेरी बेटी ने नहीं बनाया था।”
मीरा की साँस अटक गई।
“क्या?”
“यह घर उस आदमी ने बनाया था, जिसे तुमने अपना पिता समझा।”
उसने विक्रम की ओर देखा।
“और वह आदमी भी नहीं जानता था कि वह किसके लिए घर बना रहा है।”
विक्रम ने उसकी बाँह पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन उसका हाथ अजनबी की बाँह के आर-पार निकल गया।
ऐसा नहीं कि अजनबी गायब हो गया था।
वह वहीं खड़ा था।
विक्रम का हाथ बस उसे छू नहीं पाया।
अगले ही पल विक्रम की उँगलियाँ पत्थर की सीढ़ी से टकराईं।
वह लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़ा।
अर्जुन ने उसे संभाल लिया।
“यह क्या था?”
विक्रम अपनी हथेली को देख रहा था।
उसकी उँगलियों पर खून था।
“मैंने इसे छुआ था,” वह बुदबुदाया।
अजनबी ने सिर हिलाया।
“नहीं। तुमने उस जगह को छुआ, जहाँ मैं खड़ा था।”
“तुम इंसान नहीं हो।”
“यह बात तुम पहले भी कह चुके हो।”
“मैंने तुम्हें पहले कब देखा?”
अजनबी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने सीढ़ियों पर पहला कदम रखा।
फिर दूसरा।
तीसरे कदम पर पहुँचते ही ऊपर से एक आवाज़ आई—
“पापा?”
अजनबी ठिठक गया।
यह आवाज़ अर्जुन की थी।
लेकिन अर्जुन ने कुछ नहीं कहा था।
आवाज़ फिर आई।
“पापा, आप आ गए?”
इस बार उसमें एक छोटे बच्चे की खुशी थी।
अजनबी के चेहरे पर ऐसी कोमलता उभरी, जिसे देखकर अर्जुन का सीना कस गया।
वह कोमलता अर्जुन ने अपने पिता विक्रम के चेहरे पर कभी नहीं देखी थी।
“हाँ,” अजनबी ने ऊपर देखते हुए कहा, “मैं आ गया।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
इस बार वह उसे छू सकी।
“झूठ मत बोलो।”
अजनबी ने उसकी ओर देखा।
“क्या?”
“वह आवाज़ अर्जुन की नहीं है।”
“मुझे पता है।”
“तो फिर तुमने जवाब क्यों दिया?”
अजनबी के चेहरे से कोमलता गायब हो गई।
“क्योंकि वह मेरा बेटा है।”
मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।
अर्जुन को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर की सारी हवा खींच ली हो।
“कौन-सा बेटा?”
आदमी ने अर्जुन को देखा।
“तुम।”
“मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा।”
“तुमने मुझे याद नहीं रखा।”
“तुम मेरे पिता होने का दावा करते हो, लेकिन तुम्हें मेरी उम्र तक नहीं पता।”
“मुझे तुम्हारी उम्र पता है।”
“तो बताओ।”
“तुम अट्ठाईस साल के हो।”
अर्जुन ने दाँत भींचे।
“और तुमने मुझे आखिरी बार कब देखा था?”
आदमी ने उत्तर दिया—
“1947 में।”
कुछ क्षण तक कोई नहीं बोला।
फिर अर्जुन हँस पड़ा।
वह हँसी नहीं थी।
एक टूटी हुई आवाज़ थी, जिसमें गुस्सा, डर और अविश्वास एक साथ फूट पड़े थे।
“तुम कहना चाहते हो कि तुमने मुझे 1947 में देखा था, जबकि मेरा जन्म 1995 में हुआ?”
आदमी ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो फिर?”
“मैंने तुम्हें मरते हुए देखा था।”
अर्जुन का चेहरा जम गया।
आदमी ने आगे कहा—
“तुम्हारा जन्म बाद में हुआ। लेकिन तुम्हारी पहली मौत उससे पहले हो चुकी थी।”
बैठक की दीवार पर लगी शारदा देवी की तस्वीर अचानक टेढ़ी हो गई।
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
तस्वीर के शीशे में शारदा देवी का चेहरा दिखाई दे रहा था।
लेकिन तस्वीर में उनका सिर दूसरी ओर मुड़ा हुआ था।
शीशे में वह सीधे अर्जुन को देख रही थीं।
उनके होंठ हिले।
आवाज़ नहीं आई।
फिर शीशे पर भीतर से धुंध जमने लगी।
उस धुंध में चार शब्द उभरे—
उसे नाम मत देना।
अर्जुन ने तस्वीर की ओर बढ़ना चाहा, लेकिन अजनबी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
इस बार उसका स्पर्श बिल्कुल वास्तविक था।
उसकी उँगलियाँ गर्म थीं।
उसकी हथेली में नब्ज़ धड़क रही थी।
“उसकी तरफ मत देखो।”
अर्जुन ने हाथ छुड़ाया।
“तुम कौन हो?”
“मैंने बताया।”
“नहीं। तुमने केवल एक दावा किया है।”
आदमी ने गहरी साँस ली।
“तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”
“मुझे कहानियाँ नहीं चाहिए।”
“तुम्हें हमेशा यही कहा गया कि 17 जुलाई 1995 को तुम पैदा हुए। तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म दिया। तुम्हारे पिता ने तुम्हें गोद में उठाया। तुम्हारी दादी ने तुम्हारा नाम रखा।”
वह कुछ क्षण रुका।
“लेकिन अगर मैं कहूँ कि उस रात तुम्हारी माँ ने एक बच्चे को जन्म दिया था, और तुम्हारे पिता ने दूसरे बच्चे को घर लाया था, तो?”
अर्जुन को जन्म-कक्ष की वे तस्वीरें याद आ गईं।
तीन पालने।
दो बच्चे।
एक खाली पालना, जिसके नीचे किसी तीसरे का साया था।
“यह सब मुझे पहले बताया जा चुका है।”
“तुम्हें यह भी बताया गया कि उनमें से एक बच्चा मर गया था।”
“हाँ।”
“लेकिन तुम्हें कभी यह नहीं बताया गया कि कौन-सा बच्चा।”
अर्जुन चुप हो गया।
अजनबी ने अपनी कलाई आगे की।
“देखो।”
वहाँ कोई काली रेखा नहीं थी।
“जिस बच्चे को तुम्हारी दादी ने विक्रम नाम दिया, उसकी कलाई पर तीन रेखाएँ थीं।”
विक्रम ने सिर उठाया।
“यह झूठ है।”
“तुम्हारी कलाई पर भी तीन रेखाएँ हैं।”
“क्योंकि तुमने—”
“मैंने कुछ नहीं किया।”
अजनबी ने अर्जुन की ओर देखा।
“तीन रेखाएँ उस बच्चे पर थीं, जिसे घर के भीतर रखा गया। लेकिन जिस बच्चे को बाहर भेजा गया, उसके शरीर पर कोई निशान नहीं था।”
“बाहर कहाँ?” अर्जुन ने पूछा।
“उस जगह, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।”
“आईने के भीतर?”
आदमी ने सिर झुका लिया।
“तुम उसे आईना कहते हो।”
“तो तुम क्या कहते हो?”
“पहला कमरा।”
अर्जुन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“किसका पहला कमरा?”
“मौत का।”
कमरे में हवा अचानक ठंडी हो गई।
अजनबी ने आगे कहा—
“1947 में उस कमरे में एक आदमी मरा था। उसकी उम्र तुम्हारी जितनी थी। उसके चेहरे पर तुम्हारा चेहरा था। और उसके पास एक बच्चा खड़ा था।”
“वह बच्चा कौन था?”
“मैं।”
विक्रम अचानक उठ खड़ा हुआ।
“नहीं! वह बच्चा तुम नहीं थे!”
अजनबी ने उसे देखा।
“तुम वहाँ थे?”
विक्रम चुप हो गया।
“तुमने उस आदमी को मरते देखा?”
“मैं…”
“तुमने उसका चेहरा देखा?”
विक्रम की आँखें झुक गईं।
अजनबी ने कहा—
“नहीं। तुम वहाँ नहीं थे। तुम्हें वह कहानी किसी और ने सुनाई थी।”
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“उस आदमी का नाम क्या था?”
अजनबी के चेहरे पर उदासी उतर आई।
“उसका कोई नाम नहीं था।”
“हर आदमी का कोई नाम होता है।”
“हर आदमी का नहीं।”
उसने अर्जुन के चेहरे को देखा।
“कुछ लोगों को नाम दिया जाता है। कुछ लोगों से नाम छीन लिया जाता है। और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका नाम कोई और पहन लेता है।”
अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।
तीन काली रेखाएँ।
उसने उँगली से उन्हें रगड़ा।
वे त्वचा के भीतर थीं।
जैसे स्याही नहीं, नसों में बहता हुआ कोई काला पदार्थ हो।
“और मेरा नाम?”
आदमी ने उत्तर देने से पहले मीरा की ओर देखा।
“तुम्हारा नाम तुम्हारी माँ ने रखा था।”
“राधा?”
“तुम्हें ऐसा लगता है।”
अर्जुन के भीतर कुछ टूट गया।
“तुम मेरी माँ को भी नहीं मानते?”
“मैं यह नहीं कह रहा कि वह तुम्हारी माँ नहीं थी।”
“तो क्या कह रहे हो?”
“मैं कह रहा हूँ कि उसने तुम्हें जो नाम दिया, वह तुम्हारा पहला नाम नहीं था।”
“मेरा पहला नाम क्या था?”
अजनबी ने मुँह खोला।
लेकिन उससे पहले तीसरी मंज़िल से एक तेज़ आवाज़ आई।
जैसे किसी ने लोहे की भारी चीज़ फर्श पर गिरा दी हो।
फिर बच्चे की आवाज़ गूँजी—
“अर्णव!”
अर्जुन का पूरा शरीर अकड़ गया।
आवाज़ दोबारा आई।
“अर्णव, दरवाज़ा खोलो!”
अजनबी ने आँखें बंद कर लीं।
उसके होंठ हिले।
बहुत धीमे।
“नहीं…”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुमने यह नाम पहले सुना है?”
आदमी ने आँखें खोल दीं।
इस बार उनमें ऐसा भय था, जिसे वह छिपा नहीं पा रहा था।
“मैंने तुम्हें यह नाम नहीं दिया।”
“मैंने तुमसे यह नहीं पूछा।”
“और मैं तुम्हें इसका उत्तर नहीं दूँगा।”
वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा।
मीरा ने उसका रास्ता रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं।
वह उसके पास से गुज़र गया।
मीरा पीछे हट गई, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो।
अर्जुन उसके पीछे दौड़ा।
“रुको!”
अजनबी सीढ़ियों के बीचोंबीच खड़ा था।
ऊपर तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा बंद था।
उस पर वही पुराना ताला लगा था, जिसे शारदा देवी ने वर्षों पहले बंद किया था।
लेकिन अब ताले के नीचे से सफेद रोशनी निकल रही थी।
अजनबी ने दरवाज़े पर हाथ रखा।
अर्जुन ने उसे रोक लिया।
“तुम ऊपर नहीं जाओगे।”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“तुम मुझे रोक सकते हो?”
“कोशिश कर सकता हूँ।”
“तुम्हारे पिता ने भी यही कोशिश की थी।”
“किस पिता ने?”
आदमी ने उत्तर नहीं दिया।
उसने दरवाज़े पर कान लगाया।
अंदर से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“पापा?”
अजनबी का चेहरा बदल गया।
वह अब अर्जुन जैसा नहीं दिख रहा था।
उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।
उसकी ठुड्डी छोटी।
उसके चेहरे पर उम्र का कोई निशान नहीं था।
वह एक बच्चे की तरह लगने लगा था, जिसने बहुत लंबे समय बाद अपने पिता की आवाज़ सुनी हो।
“पापा, आप मुझे लेने आए हैं?”
अजनबी ने दरवाज़े पर माथा टिका दिया।
“हाँ।”
अर्जुन ने उसका कंधा पकड़कर खींचा।
“यह तुम्हें बुला रहा है!”
“मुझे पता है।”
“यह कोई बच्चा नहीं है!”
“तुम्हें कैसे पता?”
अर्जुन जवाब नहीं दे पाया।
क्योंकि दरवाज़े के पीछे से अब वही आवाज़ आ रही थी, जो उसने बचपन में अपनी यादों के सबसे अँधेरे हिस्से में सुनी थी।
उसकी अपनी आवाज़।
एक ऐसा बच्चा, जिसे उसने कभी देखा नहीं था।
एक ऐसा बच्चा, जिसके बारे में हर रिकॉर्ड कुछ और कहता था।
एक ऐसा बच्चा, जिसे शायद उसने अपनी जगह मरने के लिए छोड़ दिया था।
“पापा…”
इस बार आवाज़ रो रही थी।
“आपने कहा था कि आप मुझे लेने आएँगे।”
अजनबी ने आँखें बंद कर लीं।
“मैं आ गया हूँ।”
ताला अपने आप खुल गया।
उसकी आवाज़ इतनी हल्की थी कि अर्जुन को पहले लगा कि शायद उसने कल्पना की है।
फिर ताले की कुंडी नीचे गिरी।
दरवाज़ा एक इंच खुला।
अंदर अँधेरा था।
लेकिन उस अँधेरे में दो छोटी आँखें चमक रही थीं।
अर्जुन ने तुरंत चाँदी की घंटी निकाली।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
विक्रम नीचे से चिल्लाया—
“घंटी मत बजाना!”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि इस बार वह दरवाज़े के पीछे नहीं है!”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“तो कहाँ है?”
विक्रम ने उसकी ओर इशारा किया।
अर्जुन ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।
अजनबी उसके ठीक सामने खड़ा था।
उसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं था।
उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें पुतलियाँ नहीं थीं।
केवल गहरा, सपाट अँधेरा।
और उसके पीछे दीवार पर उसकी परछाईं दिखाई दे रही थी।
लेकिन वह परछाईं आदमी की नहीं थी।
वह एक छोटे बच्चे की थी।
बच्चे की परछाईं ने अपना सिर उठाया।
और अर्जुन को देखकर मुस्कुराई।
“तुमने कहा था कि तुम्हारी कलाई पर कोई निशान नहीं है,” अर्जुन ने धीरे से कहा।
अजनबी ने अपनी कलाई देखी।
“नहीं है।”
“लेकिन तुम्हारी परछाईं…”
“परछाईं को शरीर की ज़रूरत नहीं होती।”
उसने हाथ उठाया।
दीवार पर बच्चे की परछाईं ने भी हाथ उठाया।
लेकिन उसकी उँगलियाँ तीन नहीं थीं।
चार थीं।
अर्जुन ने एक कदम पीछे हटाया।
“तुम कौन हो?”
“मैं तुम्हारा पहला पिता हूँ।”
“और वह बच्चा?”
“तुम।”
“मैं यहाँ खड़ा हूँ।”
“तुम्हारा शरीर यहाँ खड़ा है।”
आदमी ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“लेकिन तुम्हारा पहला रूप मेरे भीतर है।”
अर्जुन ने चाँदी की घंटी कसकर पकड़ ली।
“तुम मुझे पागल करने की कोशिश कर रहे हो।”
“नहीं, बेटा। मैं तुम्हें वह याद दिलाने आया हूँ, जिसे तुमने मुझसे छिपाया था।”
“मैंने तुमसे कुछ नहीं छिपाया।”
“तुमने मुझे मरने दिया था।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
अर्जुन को लगा जैसे उसकी छाती के भीतर कोई भारी दरवाज़ा बंद हो गया हो।
“मैं 1947 में पैदा भी नहीं हुआ था।”
“तुम्हारा शरीर नहीं हुआ था।”
“तो फिर मैं तुम्हें कैसे मार सकता था?”
अजनबी ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हें याद नहीं कि उस रात तुमने क्या कहा था?”
“नहीं।”
“तुमने कहा था—अगर मैं मर गया, तो तुम मेरे बेटे बन जाओगे।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“यह असंभव है।”
“मौत के कमरे में असंभव कुछ नहीं होता।”
अजनबी ने धीरे-धीरे अपना हाथ बढ़ाया।
“तुम्हें केवल एक बात याद करनी है।”
“कौन-सी?”
“तुमने मुझे क्या नाम दिया था।”
अर्जुन ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।
“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया।”
“तुमने दिया था।”
“नहीं।”
“तुमने मुझे देखकर कहा था कि अगर मेरा कोई पिता नहीं है, तो तुम मेरे पिता बन जाओगे।”
अर्जुन की साँसें तेज़ हो गईं।
“यह झूठ है।”
“तुमने मेरा हाथ पकड़ा था।”
“चुप रहो।”
“तुमने मुझे अपने साथ चलने को कहा था।”
“चुप रहो!”
“और जब मैं गिर पड़ा, तो तुमने मुझे उठाने के बजाय—”
“बस!”
अर्जुन की चीख पूरे घर में गूँज गई।
उसके हाथ में पकड़ी चाँदी की घंटी अपने आप बज उठी।
एक बार।
फिर दूसरी बार।
फिर तीसरी बार।
हर बार आवाज़ पहले से गहरी होती गई।
पहली घंटी पर अजनबी की आँखें सामान्य हो गईं।
दूसरी घंटी पर उसकी परछाईं दीवार से अलग हो गई।
तीसरी घंटी पर सीढ़ियों के ऊपर का दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।
और अजनबी घुटनों के बल गिर पड़ा।
अर्जुन ने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया।
“तुम ठीक हो?”
आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।
उसने अर्जुन को अपनी ओर खींचा।
“ध्यान से सुनो।”
अर्जुन झुक गया।
“क्या?”
आदमी के होंठ काँप रहे थे।
“मैं तुम्हारा पहला पिता नहीं हूँ।”
अर्जुन का दिल एक पल के लिए रुक गया।
“क्या कहा?”
“मैं…”
उसने गहरी साँस ली।
“मैं तुम्हारे पहले पिता की परछाईं हूँ।”
अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।
आदमी फर्श पर गिर गया।
उसकी आँखें बंद थीं।
उसकी छाती नहीं उठ रही थी।
वह मर चुका था।
कम-से-कम देखने में।
विक्रम सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया।
उसने आदमी के शरीर को देखा और पीछे हट गया।
“तुमने उसे मार दिया।”
“मैंने कुछ नहीं किया!”
“तुमने घंटी बजाई।”
“उसने खुद कहा कि वह मेरा पिता नहीं है!”
विक्रम ने झुककर उस आदमी की नब्ज़ टटोली।
फिर उसकी कलाई देखी।
तीन काली रेखाएँ धीरे-धीरे उभर रही थीं।
पहली रेखा।
दूसरी।
तीसरी।
विक्रम का चेहरा बदल गया।
“नहीं…”
उसने अर्जुन की ओर देखा।
“यह नहीं हो सकता।”
“क्या?”
“यह शरीर…”
वह आदमी के चेहरे के करीब झुका।
“यह शरीर तो पहले से मरा हुआ था।”
अर्जुन ने उसकी बाँह पकड़ ली।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
विक्रम ने काँपती आवाज़ में कहा—
“यह आदमी अभी मरा नहीं है।”
“तो?”
“यह पहले ही मर चुका था।”
जब वे नीचे पहुँचे, तो बैठक की दीवार पर लगी शारदा देवी की तस्वीर फिर सीधी हो चुकी थी।
लेकिन शीशे पर लिखा संदेश बदल गया था।
अब वहाँ केवल तीन शब्द थे—
पहले पिता को पहचानो।
मीरा बैठक के बीचोंबीच खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर के किनारे जले हुए थे।
बीच में एक अस्पताल का कमरा दिखाई दे रहा था।
एक बिस्तर पर एक आदमी लेटा था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
बिस्तर के पास एक छोटा बच्चा खड़ा था।
उस बच्चे की कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
और उसके पीछे एक दूसरा बच्चा था, जिसकी कोई परछाईं नहीं थी।
तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।
मीरा ने उसे अर्जुन की ओर बढ़ाया।
“यह तस्वीर तीसरी मंज़िल के दरवाज़े के नीचे से निकली।”
अर्जुन ने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था—
12 मार्च 1947।
मृतक: अज्ञात।
गवाह: विक्रम शर्मा।
बच्चे की पहचान: अर्जुन।
अर्जुन ने तारीख़ को दोबारा पढ़ा।
“यह वही तारीख़ है, जिस दिन…”
“जिस दिन पहला विक्रम अस्पताल में मिला था,” मीरा ने कहा।
विक्रम ने तस्वीर छीनने की कोशिश की।
अर्जुन ने उसे पीछे कर दिया।
“तुम्हें इसके बारे में पता था?”
“नहीं।”
“तुमने कहा था कि वह आदमी 1947 में मरा था।”
“मैंने कहा था कि एक आदमी मरा था।”
“और तस्वीर में तुम गवाह हो।”
विक्रम की आँखें तस्वीर पर जमी थीं।
“यह मेरी लिखावट नहीं है।”
मीरा ने तस्वीर के निचले कोने की ओर इशारा किया।
“यह देखो।”
वहाँ बहुत छोटे अक्षरों में एक और पंक्ति लिखी थी।
गवाह की उम्र: 5 वर्ष।
अर्जुन ने विक्रम की ओर देखा।
“तुम्हारी उम्र पाँच साल थी?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“मैं 1948 में पैदा हुआ था।”
“तो फिर 1947 में तुम गवाह कैसे हो सकते हो?”
विक्रम ने उत्तर नहीं दिया।
अर्जुन ने तस्वीर के पीछे उँगली फेरी।
कागज़ के भीतर कुछ कठोर-सा महसूस हुआ।
उसने तस्वीर का जला हुआ किनारा खींचा।
कागज़ की दो परतें अलग हो गईं।
उनके बीच एक पतली पर्ची छिपी थी।
उस पर एक ही वाक्य लिखा था—
जिस बच्चे को गवाही देनी थी, उसे जन्म से पहले मार दिया गया।
अर्जुन की आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
वह पास की कुर्सी पर बैठ गया।
“यह सब किसने लिखा?”
मीरा ने कहा—
“शायद शारदा देवी ने।”
“शायद?”
“मैंने उन्हें लिखते नहीं देखा।”
“तुमने यह तस्वीर कहाँ पाई?”
मीरा ने तीसरी मंज़िल की ओर देखा।
“दरवाज़े के नीचे।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
“दरवाज़ा तो बंद था।”
“हाँ।”
“और तुम ऊपर नहीं गई थीं?”
“नहीं।”
“तो तस्वीर नीचे कैसे आई?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“क्योंकि किसी ने इसे अंदर से बाहर भेजा।”
उसी क्षण बैठक में रखे टेलीफ़ोन की घंटी बज उठी।
यह वही पुराना टेलीफ़ोन था, जिसकी लाइन पंद्रह साल पहले काट दी गई थी।
पहली घंटी।
दूसरी घंटी।
तीसरी घंटी।
अर्जुन ने रिसीवर उठाया।
दूसरी ओर से कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर एक बच्चे ने फुसफुसाकर कहा—
“भैया?”
अर्जुन की उँगलियाँ जम गईं।
“कौन?”
“मैं हूँ।”
“कौन मैं?”
“जिसे तुमने बाहर छोड़ दिया था।”
अर्जुन ने रिसीवर कसकर पकड़ लिया।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने बहुत धीरे से कहा—
“तुम्हारा पहला पिता सो गया है।”
अर्जुन ने पीछे देखा।
सीढ़ियों के पास वह आदमी अब खड़ा था।
उसकी आँखें खुली थीं।
उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
लेकिन उसकी परछाईं गायब थी।
अर्जुन के हाथ से रिसीवर छूट गया।
वह आदमी मुस्कुराया।
“अब मुझे पहचान लिया?”
अर्जुन ने चाँदी की घंटी उठाई।
“तुम मर चुके थे।”
“हाँ।”
“तुम्हारी कलाई पर तीन रेखाएँ नहीं थीं।”
“अब हैं।”
“तुम्हारी परछाईं थी।”
“अब नहीं है।”
आदमी ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा।
उसकी त्वचा के नीचे कुछ हिल रहा था।
जैसे चेहरे के भीतर कोई दूसरा चेहरा अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा हो।
“तुम्हें पता है, अर्जुन,” उसने कहा, “किसी आदमी को मारना बहुत आसान है।”
उसकी आवाज़ धीरे-धीरे बदलने लगी।
अब उसमें विक्रम की आवाज़ भी थी।
“लेकिन किसी आदमी को उसका नाम वापस देना…”
फिर शारदा देवी की आवाज़।
“वह सबसे कठिन काम है।”
फिर राधा की आवाज़।
“क्योंकि नाम लौटाने के लिए…”
और अंत में अर्जुन की अपनी आवाज़—
“पहले यह जानना पड़ता है कि वह नाम किसका था।”
आदमी का चेहरा फिर सामान्य हो गया।
उसने मीरा की ओर देखा।
इस बार उसके चेहरे पर पहचान की हल्की-सी झलक उभरी।
मीरा आगे बढ़ी।
“पापा?”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“मीरा…”
मीरा की साँस रुक गई।
“आपको याद आ गया?”
आदमी ने सिर हिलाया।
“हाँ, बेटी।”
मीरा उसकी ओर दौड़ी।
लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको!”
मीरा ने उसकी ओर देखा।
“भैया, वह मुझे पहचानते हैं!”
“अभी कुछ देर पहले उन्होंने कहा था कि उनकी कोई बेटी नहीं थी।”
“लेकिन अब उन्हें याद आ गया!”
अर्जुन ने आदमी की आँखों में देखा।
“तुम्हें मीरा कैसे याद आई?”
आदमी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“तुमने अभी उसका नाम लिया। इससे पहले तुम उसे पहचानते नहीं थे। अब तुम उसे बेटी कह रहे हो। क्या बदला?”
आदमी की आँखों में आँसू चमक रहे थे।
“मुझे सब याद आ गया।”
“क्या?”
“उसकी माँ।”
मीरा के चेहरे से रंग उड़ गया।
“मेरी माँ?”
आदमी ने सिर हिलाया।
“राधा।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आप मेरी माँ को जानते थे?”
“मैंने उसे देखा था।”
“कहाँ?”
“उस कमरे में।”
“कौन-सा कमरा?”
आदमी ने तीसरी मंज़िल की ओर देखा।
“जहाँ तुम पैदा हुई थीं।”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“मैं तो 1998 में पैदा हुई थी।”
आदमी ने धीरे से सिर हिलाया।
“तुम्हारा शरीर 1998 में पैदा हुआ था।”
वही वाक्य।
वही लहजा।
वही भय।
अर्जुन ने मीरा को अपने पीछे कर लिया।
“तुम फिर वही बात कह रहे हो।”
आदमी ने अर्जुन को देखा।
“क्योंकि तुम दोनों एक ही गलती कर रहे हो।”
“कौन-सी गलती?”
“तुम समझते हो कि जन्म का मतलब है किसी शरीर का दुनिया में आना।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“लेकिन इस घर में कुछ बच्चे शरीर से पहले पैदा हुए थे।”
फिर उसने मीरा की ओर इशारा किया।
“और कुछ बच्चों को शरीर मिलने से पहले ही उनका नाम दे दिया गया।”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
“तो मैं कौन हूँ?”
आदमी ने उसके चेहरे को देखा।
“तुम…”
वह रुक गया।
उसके होंठ काँपने लगे।
“तुम वह बच्ची हो, जिसे राधा ने अपने हाथों से उठाया था।”
मीरा ने राहत की साँस ली।
लेकिन अगले ही पल आदमी ने कहा—
“और वह बच्ची, जिसे उसने उठाया था, उसका नाम मीरा नहीं था।”
कमरे में फिर वही खामोशी छा गई।
मीरा पीछे हट गई।
“मेरा नाम मीरा है।”
आदमी ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“मेरी माँ मुझे मीरा कहती थी।”
“हाँ।”
“तो फिर मेरा दूसरा नाम क्या था?”
आदमी ने आँखें बंद कर लीं।
“वह नाम मुझे नहीं लेना चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन तुम्हें तुम्हारा पहला नाम याद आ जाएगा…”
उसने अर्जुन की ओर देखा।
“उस दिन तुम्हारे भैया को अपना पहला चेहरा याद आ जाएगा।”
अर्जुन के हाथ में पकड़ी घंटी अचानक ठंडी पड़ गई।
मीरा ने फुसफुसाकर पूछा—
“मेरा पहला नाम क्या था?”
आदमी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसके पीछे दीवार पर एक नई परछाईं उभर आई।
इस बार वह किसी बच्चे की नहीं थी।
वह एक स्त्री की परछाईं थी।
लंबे बाल।
झुका हुआ सिर।
और दोनों हाथों में किसी नवजात को उठाए हुए आकृति।
अर्जुन ने उस परछाईं को देखते ही अपनी माँ की आवाज़ सुनी—
“अर्जुन, मेरे बच्चे…”
वह आवाज़ दीवार के भीतर से आ रही थी।
“तुम्हें याद है न, मैंने तुम्हें क्या नाम दिया था?”
अर्जुन की आँखों के सामने अचानक अस्पताल का कमरा उभर आया।
एक बिस्तर।
सफेद चादर।
रक्त से सने हाथ।
और बिस्तर पर लेटी एक स्त्री, जिसका चेहरा उसे दिखाई नहीं दे रहा था।
उसके पास एक आदमी खड़ा था।
उस आदमी का चेहरा अर्जुन जैसा था।
लेकिन उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।
स्त्री ने काँपते हुए अपना हाथ उठाया।
“मेरे बच्चे को उसका नाम दे दो।”
आदमी ने कहा—
“उसका नाम तो पहले ही दिया जा चुका है।”
स्त्री ने सिर हिलाया।
“नहीं। वह नाम उसका नहीं है।”
“तो उसका नाम क्या है?”
स्त्री ने आँखें बंद कर लीं।
और अर्जुन ने पहली बार वह शब्द सुना, जिसे सुनने से पहले ही उसका मन उसे भूलने लगा।
एक नाम।
सिर्फ़ एक नाम।
लेकिन उसी क्षण अस्पताल की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।
सभी घड़ियाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गईं।
और बिस्तर पर लेटी स्त्री की छाती ने आखिरी बार साँस ली।
अर्जुन ने चीखकर आँखें खोल दीं।
वह वापस बैठक में था।
मीरा उसके सामने खड़ी थी।
विक्रम दीवार से लगा हुआ था।
और वह आदमी…
वह आदमी गायब था।
फर्श पर केवल उसकी परछाईं पड़ी थी।
एक परछाईं, जिसके चेहरे पर अर्जुन की आँखें थीं।
उसके नीचे एक वाक्य लिखा था—
तुम्हारा पहला पिता मरने के लिए नहीं आया था। वह यह देखने आया था कि तुमने उसकी मौत को कितनी अच्छी तरह याद रखा है।
अर्जुन ने काँपते हाथों से चाँदी की घंटी उठाई।
तभी बैठक के पुराने टेलीफ़ोन से फिर आवाज़ आई।
इस बार किसी बच्चे की नहीं।
एक स्त्री की।
“अर्जुन?”
वह आवाज़ राधा की थी।
“बेटा, मुझे पहचानते हो?”
अर्जुन ने रिसीवर नहीं उठाया।
आवाज़ फिर आई।
“मैं तुम्हारी माँ हूँ।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“भैया, मत उठाना।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“क्यों?”
मीरा की आँखों में आँसू थे।
“क्योंकि…”
वह कुछ पल चुप रही।
फिर उसने ऐसा वाक्य कहा, जिसने अर्जुन के भीतर की सारी हिम्मत छीन ली।
“क्योंकि राधा माँ ने मुझे कभी जन्म नहीं दिया था।”
टेलीफ़ोन की आवाज़ बंद हो गई।
दीवार पर पड़ी परछाईं धीरे-धीरे उठी।
वह खड़ी हुई।
उसने अपना सिर घुमाया।
और पहली बार अर्जुन ने उसकी आँखें देखीं।
वे काली नहीं थीं।
वे सफेद भी नहीं थीं।
वे बिल्कुल अर्जुन की आँखों जैसी थीं।
परछाईं ने मुस्कुराकर कहा—
“अब तुम्हें याद आया, बेटा?”
अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा—
“क्या?”
परछाईं ने उत्तर दिया—
“तुमने मुझे पहली बार कब मारा था।”
फिर पूरे शर्मा निवास में किसी बच्चे की हँसी गूँज उठी।
और तीसरी मंज़िल से एक दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
इस बार दरवाज़े के पीछे कोई बच्चा नहीं था।
वहाँ एक अस्पताल का बिस्तर था।
उस पर एक आदमी लेटा था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
और बिस्तर के पास खड़ी एक स्त्री ने धीरे से कहा—
“डॉक्टर साहब, बच्चा पैदा हो गया है।”
अँधेरे में किसी पुरुष की आवाज़ आई—
“कौन-सा बच्चा?”
स्त्री ने उत्तर दिया—
“वही, जो मर चुका था।”
फिर एक दूसरी आवाज़ आई।
“और जो जीवित है?”
स्त्री चुप हो गई।
कुछ क्षण बाद उसने कहा—
“वह अभी पैदा नहीं हुआ।”
कमरे की घड़ी तीन बजकर तेरह मिनट पर रुक गई।
और बिस्तर पर लेटे आदमी ने आँखें खोल दीं।
उसने सीधे अर्जुन की ओर देखा।
“बेटा,” उसने कहा, “इस बार मुझे मरने मत देना।”
एपिसोड 26 समाप्त।
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- firoj saifi
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