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एपिसोड 25: पिता की पहली मौत

firoj saifi · Ghost Stories · 35 मिनट

1. वह पिता जो अर्जुन से पहले मर चुका था
“तुम्हारे पिता की मृत्यु 1947 में हुई थी।”
विक्रम के ये शब्द सुनकर अर्जुन कुछ क्षण उसे देखता रहा।
कमरे में पीली रोशनी जल रही थी। बाहर बारिश फिर शुरू हो गई थी। खिड़की के काँच पर गिरती बूँदों के बीच अर्जुन को अपना प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था, लेकिन विक्रम का प्रतिबिंब नहीं।
कुर्सी पर बैठा आदमी साफ दिखाई दे रहा था।
उसकी साँसें चल रही थीं।
उसकी उँगलियाँ मेज पर धीरे-धीरे थपथपा रही थीं।
लेकिन खिड़की के काँच में उसकी जगह खाली थी।
अर्जुन ने यह बात जानबूझकर नहीं देखी थी। उसकी निगाह बस एक पल के लिए वहाँ गई थी। फिर भी उसने जो देखा, उसे अनदेखा करना संभव नहीं था।
“तुम्हारी परछाईं कहाँ है?” उसने पूछा।
विक्रम ने अपनी उँगलियाँ रोक दीं।
“तुम्हें अभी भी परछाईं की चिंता है?”
“कम से कम वह तुम्हारे बारे में कुछ तो बताएगी।”
“किसके बारे में?”
“तुम्हारे बारे में।”
विक्रम ने खिड़की की तरफ देखा।
“अगर किसी आदमी की परछाईं न हो, तो क्या वह आदमी नहीं रहता?”
“मैंने ऐसा नहीं कहा।”
“लेकिन तुम यही मानते हो। तुम्हें लगता है कि परछाईं ही तय करती है कि कौन असली है और कौन नकली।”
“क्या ऐसा नहीं है?”
विक्रम ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
“नहीं, अर्जुन। परछाईं केवल यह बताती है कि रोशनी किस तरफ से आ रही है। वह यह नहीं बताती कि सामने खड़ा आदमी कौन है।”
अर्जुन ने कुर्सी खींचकर उसके सामने रखी, लेकिन बैठा नहीं।
“तुमने कहा कि मेरे पिता की मौत 1947 में हुई थी। उस समय मैं पैदा भी नहीं हुआ था। फिर तुम मेरे पिता को कैसे जानते हो?”
“क्योंकि मैं वहाँ था।”
“कहाँ?”
“उस कमरे में, जहाँ पहली बार किसी ने तुम्हारे पिता को मृत घोषित किया था।”
“वह कमरा कहाँ है?”
विक्रम ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“यहीं।”
अर्जुन ने उसे घूरा।
“तुम्हारा मतलब है कि तुम्हारे भीतर?”
“मेरा मतलब है कि वह कमरा किसी जगह पर नहीं था। वह एक फैसला था।”
“कौन-सा फैसला?”
“किसे जीवित माना जाएगा और किसे मृत।”
अर्जुन ने थककर आँखें बंद कर लीं।
“तुम्हारी हर बात किसी पहेली की तरह क्यों होती है?”
“क्योंकि तुम हर जवाब को एक नाम देना चाहते हो।”
“मुझे नाम चाहिए, पहेली नहीं!”
विक्रम ने अचानक मेज पर हाथ मारा।
आवाज इतनी तेज थी कि खिड़की के शीशे काँप गए।
“और अगर तुम्हें अपना नाम मिल गया तो? क्या तुम मान लोगे कि बाकी सभी नाम झूठे थे? क्या तुम यह तय कर पाओगे कि तुम्हारी माँ कौन है? तुम्हारे पिता कौन हैं? वह बच्चा कौन था, जिसे तुमने 2008 में दरवाज़े के पीछे छोड़ दिया था?”

अर्जुन चुप हो गया।

विक्रम की आवाज़ धीमी पड़ गई।

“मैं भी कभी तुम्हारी तरह जवाब चाहता था। मुझे लगता था कि अगर मैं हर चीज़ का नाम जान लूँ, तो मेरा डर खत्म हो जाएगा।”

“फिर क्या हुआ?”

“मैंने अपने बेटे का नाम जान लिया।”

“कौन-सा बेटा?”

विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तुम।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तुम मुझे उलझा रहे हो।”

“नहीं। मैं तुम्हें वह बता रहा हूँ, जिसे तुम सुनना नहीं चाहते।”

विक्रम ने अपनी जेब से एक पुरानी घड़ी निकाली।

वही घड़ी, जो अर्जुन ने वर्षों पहले अपने पिता की चीज़ों में देखी थी।

उसकी चेन टूटी हुई थी। शीशे पर एक लंबी दरार थी। सुइयाँ 3:13 पर रुकी थीं।

विक्रम ने घड़ी अर्जुन की हथेली पर रख दी।

“इसे खोलो।”

अर्जुन ने पीछे का ढक्कन खोलने की कोशिश की।

वह नहीं खुला।

“यह बंद है।”

“क्योंकि यह घड़ी समय नहीं दिखाती।”

“तो क्या दिखाती है?”

“वह क्षण, जब किसी ने तुम्हें पहली बार अपना बेटा कहा था।”

अर्जुन ने घड़ी को कान के पास किया।

अंदर से टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

उसने ढक्कन पर जोर लगाया।

अचानक घड़ी खुल गई।

भीतर कोई मशीन नहीं थी।

केवल एक छोटी-सी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक आदमी नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़ा था।

आदमी का चेहरा साफ नहीं था। उसकी आँखों और मुँह पर किसी ने काली स्याही फैला दी थी।

लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

अर्जुन ने तस्वीर को पलटा।

पीछे लिखा था—

“12 मार्च 1947। आज मैंने अपने पिता को जन्म दिया।”

उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।

“यह किसने लिखा?”

विक्रम ने उत्तर दिया, “तुमने।”

अर्जुन ने तस्वीर नीचे रख दी।

“मैं 1947 में पैदा नहीं हुआ था।”

“तुम्हारा शरीर नहीं।”

“तो कौन पैदा हुआ था?”

विक्रम कुर्सी से उठ गया।

“वह सवाल है, जिसका जवाब पाने के लिए तुम्हें उस रात जाना होगा, जब मेरे पिता पहली बार मरे थे।”

“और वह रात कब थी?”

विक्रम ने कमरे की घड़ी की तरफ देखा।

“आज।”

अर्जुन ने भी घड़ी की ओर देखा।

समय 3:13 था।

फिर घड़ी की सुई एक मिनट पीछे गई।

3:12।

फिर एक और मिनट।

3:11।

फिर 3:10।

विक्रम ने कहा, “जल्दी करो। जब घड़ी 3:13 पर वापस पहुँचेगी, तब दरवाज़ा खुलेगा।”

“कौन-सा दरवाज़ा?”

विक्रम ने कमरे के आईने की तरफ इशारा किया।

“वही, जिसके पीछे तुम्हारे पिता अब भी मर रहे हैं।”
2. आईने में पिता
अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।

उसमें उसका अपना प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

चेहरा थका हुआ था। आँखों के नीचे गहरे घेरे थे। बाल बिखरे हुए थे। कपड़ों पर बारिश के छींटे थे।

वह सामान्य दिख रहा था।

लेकिन जब अर्जुन ने अपना दायाँ हाथ उठाया, तो आईने में प्रतिबिंब ने बायाँ हाथ उठाने के बजाय दोनों हाथ नीचे ही रखे।

अर्जुन ठिठक गया।

उसने फिर हाथ उठाया।

इस बार प्रतिबिंब ने उसकी नकल की।

“तुमने देखा?” उसने विक्रम से पूछा।

“हाँ।”

“यह क्या है?”

“आईना तुम्हें पहचानने की कोशिश कर रहा है।”

“आईने को पहचानने की क्या जरूरत है?”

विक्रम ने कहा, “क्योंकि इसमें अब एक नहीं, दो लोग दिखाई दे रहे हैं।”

अर्जुन ने दोबारा देखा।

अब आईने में उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

वह अर्जुन से कुछ कदम दूर था। उसके बाल सफेद थे, चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं और गर्दन के पास एक पुराना घाव दिखाई दे रहा था।

उसके कपड़े अस्पताल के मरीजों जैसे थे।

अर्जुन धीरे-धीरे पलटा।

कमरे में कोई नहीं था।

उसने फिर आईने की तरफ देखा।

बूढ़ा आदमी अब भी खड़ा था।

वह अर्जुन को नहीं देख रहा था।

उसकी निगाहें आईने के भीतर किसी दूसरी जगह पर थीं।

अर्जुन ने धीरे से पूछा, “आप कौन हैं?”

बूढ़े ने सिर उठाया।

उसकी आँखें देखकर अर्जुन का दिल रुकने जैसा हुआ।

वह आँखें उसके पिता विक्रम की थीं।

बूढ़े ने आईने के भीतर से अपना हाथ उठाया।

उसकी हथेली पर तीन काली लकीरें थीं।

फिर उसने होंठ हिलाए।

“बेटा…”

अर्जुन आईने के पास चला गया।

“पिताजी?”

विक्रम ने पीछे से कहा, “उससे बात मत करो।”

अर्जुन ने उसकी बात नहीं सुनी।

“पिताजी, क्या आप मुझे सुन सकते हैं?”

आईने के भीतर बूढ़े आदमी ने सिर हिलाया।

उसके होंठ फिर हिले।

इस बार अर्जुन ने शब्द पढ़ लिए।

“मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन ने आईने पर हाथ रख दिया।

काँच के नीचे से हल्की गर्मी महसूस हुई।

“आप कहाँ हैं?”

बूढ़े ने अपने पीछे की तरफ इशारा किया।

वहाँ एक अस्पताल का कमरा था। बिस्तर पर कोई लेटा था। कमरे के कोने में एक डॉक्टर खड़ा था और दरवाज़े के पास एक और आदमी।

अर्जुन ने डॉक्टर का चेहरा देखा।

वह डॉ. नीलकंठ था।

दरवाज़े के पास खड़े आदमी का चेहरा विक्रम जैसा था।

लेकिन बिस्तर पर लेटा आदमी…

वह भी अर्जुन था।

अर्जुन पीछे हट गया।

“यह क्या है?”

विक्रम ने कहा, “यह वह कमरा है, जहाँ पहली मौत हुई थी।”

“किसकी मौत?”

“मेरे पिता की।”

“आईने में खड़े आदमी के पिता की?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“और बिस्तर पर कौन लेटा है?”

“तुम।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“मैं यहाँ खड़ा हूँ।”

“तुम्हारा शरीर यहाँ खड़ा है।”

“और बिस्तर पर?”

विक्रम ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा—

“तुम्हारी पहली पहचान।”

अर्जुन ने आईने में देखा।

बिस्तर पर लेटे अर्जुन की आँखें खुल गई थीं।

उसने सीधे आईने के पार अर्जुन को देखा।

फिर धीरे-धीरे अपने होंठ खोले।

“तुम वापस क्यों आए?”

अर्जुन ने उत्तर दिया, “क्योंकि मुझे सच जानना है।”

बिस्तर पर लेटे अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तुम सच नहीं चाहते।”

“तो मैं क्या चाहता हूँ?”

“तुम चाहते हो कि कोई तुम्हें बताए कि तुमने कुछ गलत नहीं किया।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“मैंने क्या किया?”

बिस्तर पर लेटे अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम्हें याद है, 2008 की रात तुमने दरवाज़ा क्यों बंद किया था?”

अर्जुन ने दाँत भींच लिए।

“मैं बच्चा था।”

“तुम्हें डर लग रहा था?”

“हाँ।”

“तुम्हें लगा था कि अगर दरवाज़ा खुला रहा, तो मीरा मर जाएगी?”

अर्जुन चुप रहा।

बिस्तर पर लेटे आदमी ने आँखें खोल दीं।

“नहीं। तुम्हें लगा था कि अगर दरवाज़ा खुला रहा, तो तुम मर जाओगे।”

आईने के भीतर का कमरा अचानक काँपने लगा।

बिस्तर पर लेटे अर्जुन ने हाथ उठाया।

“तुमने मुझे बचाने के लिए दरवाज़ा बंद नहीं किया था। तुमने अपनी जगह बचाने के लिए दरवाज़ा बंद किया था।”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “यह झूठ है।”

आईने के भीतर से आवाज़ आई—

“तो फिर याद करो।”

और उसी क्षण कमरे की दीवारें गायब हो गईं।
3. 17 जुलाई 2008
अर्जुन ने आँखें खोलीं।

वह तीसरी मंज़िल के गलियारे में खड़ा था।

उसके सामने लकड़ी का वही दरवाज़ा था, जिसे शारदा देवी ने वर्षों तक बंद रखा था। दरवाज़े के नीचे से रोशनी बाहर आ रही थी।

अंदर से मीरा के रोने की आवाज़ आ रही थी।

“भैया! दरवाज़ा खोलो!”

अर्जुन ने अपने हाथ देखे।

वे छोटे थे।

उसने नीचे देखा तो उसके पैरों में पुराने स्कूल के जूते थे।

वह फिर तेरह साल का हो चुका था।

पीछे से किसी ने उसका कंधा छुआ।

अर्जुन पलटा।

विक्रम खड़ा था।

उसका चेहरा पीला था और कपड़ों पर खून लगा था।

“पिताजी?”

विक्रम ने जल्दी से उसके मुँह पर हाथ रख दिया।

“आवाज मत करना।”

“मीरा अंदर है।”

“मुझे पता है।”

“हमें उसे निकालना होगा।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“अगर हम दरवाज़ा खोलेंगे, तो वह बाहर आ जाएगा।”

“कौन?”

विक्रम ने अर्जुन की आँखों में देखा।

“तुम।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“मैं तो यहाँ हूँ।”

“तुम्हारा शरीर यहाँ है।”

विक्रम ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“लेकिन तुम्हारी दूसरी पहचान अंदर है।”

अर्जुन ने कहा, “यह कैसे हो सकता है?”

विक्रम ने उत्तर देने के बजाय अपनी जेब से एक छोटी चाँदी की घंटी निकाली।

“इसे पकड़ो।”

अर्जुन ने घंटी ले ली।

“इससे क्या होगा?”

“अगर तुम्हें अपनी आवाज़ सुनाई दे, तो घंटी बजाना। अगर तुम्हें अपना चेहरा दिखाई दे, तो आँखें बंद कर लेना। और अगर कोई तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकारे…”

“तो?”

विक्रम ने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।

“तो जवाब मत देना।”

अर्जुन ने पूछा, “मेरा असली नाम क्या है?”

विक्रम की आँखें भर आईं।

“मुझे नहीं पता, बेटा।”

“आप मेरे पिता हैं। आपको कैसे नहीं पता?”

विक्रम ने उसे सीने से लगा लिया।

“क्योंकि जिस रात तुम पैदा हुए थे, उस रात मैंने एक बच्चे को पिता कहा था। और जिस रात तुमने पहली बार मुझे पिता कहा, उस रात मैंने अपना बेटा खो दिया।”

अर्जुन कुछ समझ नहीं पाया।

तभी दरवाज़े के भीतर से एक और आवाज़ आई।

वह अर्जुन की अपनी आवाज़ थी।

“पिताजी?”

विक्रम का शरीर तन गया।

अंदर से आवाज़ फिर आई।

“पिताजी, मुझे बाहर निकालिए।”

अर्जुन ने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

विक्रम ने उसे रोक लिया।

“नहीं।”

“वह मेरी आवाज़ है!”

“इसीलिए नहीं।”

“अगर अंदर मैं हूँ, तो मुझे बाहर निकालना होगा!”

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

“और अगर अंदर वाला तुम हो, तो बाहर कौन खड़ा है?”

अर्जुन ने उत्तर देने की कोशिश की।

लेकिन तभी दरवाज़े के नीचे से एक छोटी उँगली बाहर निकली।

फिर दूसरी।

फिर एक छोटा हाथ।

उस हाथ की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

अर्जुन की पकड़ में मौजूद चाँदी की घंटी अचानक गर्म हो गई।

अंदर से आवाज़ आई—

“मुझे बाहर निकाल दो। मैं तुम्हारी जगह नहीं लूँगा।”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“झूठ।”

“मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

“तुम्हारा जन्म ही झूठ से हुआ था।”

अंदर से बच्चा रोने लगा।

“पिताजी, आप मुझे पहचानते हैं।”

विक्रम के चेहरे पर दर्द उभर आया।

“हाँ।”

“तो मुझे बाहर निकालिए।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“मैंने एक बार तुम्हें बाहर निकाला था।”

“फिर आपने मुझे वापस क्यों भेज दिया?”

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।

अंदर से आवाज़ आई—

“क्योंकि आप डर गए थे।”

विक्रम ने अचानक दरवाज़े पर मुक्का मारा।

“चुप रहो!”

पूरी मंज़िल काँप उठी।

अर्जुन ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।

“पिताजी, यह कौन है?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में ऐसा डर था, जैसा अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखा था।

“मेरा बेटा।”

“मैं आपका बेटा हूँ।”

“तुम भी।”

“तो दूसरा कौन है?”

विक्रम ने काँपते स्वर में कहा—

“वह बच्चा, जिसे मैंने तुम्हारी जगह मरने के लिए छोड़ दिया था।”

दरवाज़े के भीतर से हँसी सुनाई दी।

बच्चे की हँसी।

फिर एक वयस्क आदमी की।

और अंत में विक्रम की अपनी आवाज़।

“तुमने मुझे मरने के लिए छोड़ा था, लेकिन मैं मरा नहीं।”

दरवाज़े पर तीन गहरी चोटें पड़ीं।

ठक!

ठक!

ठक!

विक्रम ने अर्जुन को अपनी तरफ खींच लिया।

“भागो!”

लेकिन अर्जुन ने कदम नहीं बढ़ाया।

“मैं मीरा को छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

विक्रम ने कहा, “मीरा वहाँ नहीं है।”

अर्जुन ने दरवाज़े के भीतर से आती रोने की आवाज़ सुनी।

“वह है!”

“वह आवाज़ मीरा की है।”

“तो?”

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

“आवाज़ और इंसान एक ही चीज़ नहीं होते।”

दरवाज़े के नीचे से अब दो हाथ बाहर थे।

एक छोटा।

एक बड़ा।

दोनों की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

अर्जुन ने घंटी बजा दी।

टन!

आवाज़ के साथ गलियारे की रोशनी बुझ गई।

अँधेरे में विक्रम ने अर्जुन को धक्का दिया।

“नीचे भागो!”

अर्जुन लड़खड़ाया।

जब उसने दोबारा दरवाज़े की तरफ देखा, तो वहाँ कोई हाथ नहीं था।

सिर्फ एक कागज़ पड़ा था।

उसने उसे उठाया।

उस पर लिखा था—

“जिस बच्चे को तुम बचाओगे, वही तुम्हें पिता कहेगा।”

और उसके नीचे दो नाम थे।

अर्जुन।

विक्रम।

दोनों के बीच एक तीर बना था।

लेकिन तीर की दिशा तय नहीं थी।

वह कभी अर्जुन की ओर जाता।

कभी विक्रम की ओर।

अचानक दरवाज़ा खुल गया।

अंदर मीरा खड़ी थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“भैया?”

अर्जुन उसकी ओर दौड़ा।

लेकिन जैसे ही उसने मीरा का हाथ पकड़ा, गलियारे में एक और अर्जुन दिखाई दिया।

वह उसके जैसा ही था।

उसने मीरा का दूसरा हाथ पकड़ रखा था।

दोनों अर्जुन एक-दूसरे को देखने लगे।

मीरा बीच में खड़ी काँप रही थी।

पहले अर्जुन ने कहा, “उसे छोड़ दो।”

दूसरे ने उत्तर दिया, “तुम उसे पहले ही छोड़ चुके हो।”

फिर दोनों ने एक साथ कहा—

“मीरा, बताओ। असली अर्जुन कौन है?”

मीरा ने दोनों चेहरों को देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

वह कुछ नहीं बोली।

और तभी गलियारे के अंत से राधा की आवाज़ आई—

“जिसे मीरा चुनेगी, वही बाहर जाएगा।”

अर्जुन ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसे पिता की बात याद आई।

अगर कोई तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकारे, तो जवाब मत देना।

लेकिन अब कोई नाम नहीं पुकार रहा था।

अब उसे चुना जा रहा था।

और वह नहीं जानता था कि अगर मीरा ने दूसरे अर्जुन को चुन लिया, तो क्या होगा।

उसने धीरे से आँखें खोलीं।

मीरा उसके सामने खड़ी थी।

उसने अर्जुन का हाथ छोड़ दिया।

फिर दूसरे अर्जुन की तरफ देखा।

“मैं…”

वह बोलते-बोलते रुक गई।

उसकी आँखें अचानक काली हो गईं।

दोनों अर्जुन पीछे हट गए।

मीरा ने एक अजीब मुस्कान के साथ कहा—

“मैं किसी को नहीं चुनूँगी।”

उसने दोनों के हाथ पकड़ लिए।

“मैं तुम दोनों को भीतर रखूँगी।”

फिर उसने दरवाज़ा बंद कर दिया।

अँधेरा।

एक चीख।

और उसके बाद कुछ भी नहीं।
4. याद का दूसरा हिस्सा
अर्जुन ने अचानक साँस खींची।

वह फिर शर्मा निवास के अपने कमरे में था।

उसके हाथ आईने पर टिके हुए थे। माथे पर पसीना था। मीरा कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी।

विक्रम कुर्सी पर बैठा था।

“तुमने देख लिया?” उसने पूछा।

अर्जुन ने काँपते हुए हाथ नीचे किए।

“यह सच था?”

विक्रम ने उत्तर दिया, “तुम्हें क्या याद आया?”

“मीरा ने दरवाज़ा बंद किया था।”

“हाँ।”

“उसने हम दोनों को भीतर बंद कर दिया।”

“हाँ।”

“लेकिन हम दोनों कौन थे?”

विक्रम ने कुछ क्षण उसे देखा।

“तुम।”

अर्जुन ने गुस्से में कहा, “यह जवाब नहीं है!”

“मैं जानता हूँ।”

“तो मुझे बताओ!”

विक्रम ने अपनी हथेली खोली।

उसमें एक पुराना कागज़ था।

उसने अर्जुन को दे दिया।

कागज़ पर किसी अस्पताल का मुहर लगा हुआ रिकॉर्ड था।

रोगी का नाम: विक्रम शर्मा।

प्रवेश की तारीख: 12 मार्च 1947।

आयु: अज्ञात।

स्थिति: मृत घोषित।

नीचे डॉक्टर की टिप्पणी थी—

“रोगी की मृत्यु के बाद भी उसने स्वयं को जीवित बताया। रोगी ने कहा कि वह अपने पिता को पहचानता है। जब उससे पिता का नाम पूछा गया, तो उसने अपना ही नाम बताया।”

अर्जुन ने कागज़ पलटा।

पीछे दूसरी रिपोर्ट थी।

रोगी का नाम: अर्जुन शर्मा।

प्रवेश की तारीख: 17 जुलाई 2013।

आयु: 18 वर्ष।

स्थिति: मृत घोषित।

नीचे लिखा था—

“रोगी ने अंतिम समय में किसी व्यक्ति को पिता कहकर पुकारा। उपस्थित गवाह ने उस व्यक्ति की पहचान विक्रम शर्मा के रूप में की। लेकिन शव की जाँच में पाया गया कि रोगी के शरीर पर विक्रम शर्मा की पहचान के निशान मौजूद थे।”

अर्जुन ने कागज़ नीचे रख दिया।

“2013 में मैं सचमुच मर गया था?”

विक्रम ने कहा, “तुम्हारे शरीर ने साँस लेना बंद कर दिया था।”

“और फिर?”

“फिर तुमने मुझे पुकारा।”

“मैंने आपको पुकारा?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“तुमने कहा था, पिताजी, मुझे घर ले चलिए।”

अर्जुन ने अपने माथे पर हाथ रख लिया।

“और आप मुझे घर ले गए।”

“हाँ।”

“तो मैं बच गया।”

विक्रम ने बहुत धीरे से कहा—

“मैं एक बच्चे को घर ले गया था।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“क्या?”

“उस बच्चे ने तुम्हारी आवाज़ में मुझे पुकारा था। उसने तुम्हारी यादें बताई थीं। उसने तुम्हारी माँ को माँ कहा था। उसने मुझे पिता कहा था।”

“लेकिन वह मैं था।”

विक्रम ने उत्तर नहीं दिया।

अर्जुन की आवाज़ तेज हो गई।

“वह मैं ही था!”

“मैं भी यही मानना चाहता था।”

“तो फिर?”

विक्रम की आँखों में आँसू आ गए।

“फिर एक रात वह बच्चा आईने में चला गया।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम ने आगे कहा, “और जब वह बाहर आया, तो उसकी परछाईं किसी और की थी।”

अर्जुन ने पूछा, “किसकी?”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

“मेरी।”

अर्जुन ने धीरे-धीरे कुर्सी पकड़ ली।

“आप कहना चाहते हैं कि 2013 में घर लौटने वाला मैं नहीं था?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“मैं यह नहीं कह रहा कि तुम वह नहीं थे।”

“तो?”

“मैं कह रहा हूँ कि उस रात घर में दो लोग लौटे थे।”

“लेकिन माँ ने तो एक को ही देखा।”

“हाँ।”

“दादी ने भी?”

“हाँ।”

“तो दूसरा कहाँ गया?”

विक्रम ने आईने की तरफ देखा।

“वह तुम्हारे भीतर रहा।”

अर्जुन को लगा कि कमरे की हवा खत्म हो रही है।

उसने खिड़की खोल दी।

बाहर रात थी।

दूर मंदिर की घंटी बज रही थी।

वह आवाज़ सामान्य थी।

लेकिन उसके बीच एक दूसरी ध्वनि भी थी।

टिक।

टिक।

टिक।

जैसे कोई पुरानी घड़ी उसके सीने के भीतर चल रही हो।

“मैं कौन हूँ?” अर्जुन ने पूछा।

विक्रम ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

फिर उसने कहा—

“तुम वह हो, जिसे मैंने घर लाया था।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“और दूसरा?”

विक्रम ने कहा, “वह वह है, जिसे मैं वापस नहीं ला सका।”

“वह कहाँ है?”

विक्रम ने अपने सीने पर हाथ रखा।

“यहीं।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“आपके भीतर?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। तुम्हारे भीतर।”
5. पिता का पहला नाम
मीरा धीरे-धीरे कमरे के भीतर आई।

उसने विक्रम की तरफ देखा।

“आप उसे सब कुछ बता रहे हैं?”

विक्रम ने कहा, “अब छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा।”

मीरा ने कड़वाहट से कहा, “आपने यही बात 2008 में भी कही थी।”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“मैंने गलती की थी।”

“आपने सिर्फ गलती नहीं की। आपने हमें उस घर में छोड़ दिया था।”

“मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

“किससे?”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“उससे, जो तुम्हारी माँ का चेहरा पहनकर घूम रहा था।”

मीरा का चेहरा बदल गया।

“आपने कहा था कि मेरी माँ 2008 में गायब हो गई थी।”

“हाँ।”

“लेकिन मैंने उसे उसी रात देखा था।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“तुमने उसकी शक्ल देखी थी।”

“वह मेरी माँ थी!”

“तुम्हारी माँ की शक्ल में।”

मीरा ने गुस्से में कहा, “आपको कैसे पता?”

विक्रम ने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें थीं।

“क्योंकि तुम्हारी माँ के गायब होने से पहले उसने मेरे हाथ पर ये निशान बनाए थे।”

मीरा ने पूछा, “क्यों?”

विक्रम ने कहा, “ताकि मैं उसे पहचान सकूँ।”

“और आपने पहचाना?”

विक्रम ने बहुत धीमे स्वर में उत्तर दिया—

“नहीं।”

कमरे में चुप्पी छा गई।

अर्जुन ने पूछा, “आपने किसे नहीं पहचाना?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“अपने बेटे को।”

“कौन-सा बेटा?”

“वह, जिसे मैंने 1947 में खो दिया था।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“फिर वही बात।”

विक्रम ने कहा, “तुम्हें लगता है कि 1947 की बात खत्म हो चुकी है। लेकिन वह रात कभी खत्म नहीं हुई।”

उसने अपनी घड़ी खोली।

घड़ी के भीतर की तस्वीर अब बदल चुकी थी।

इस बार तस्वीर में विक्रम अकेला था।

उसके सामने एक बच्चा खड़ा था।

बच्चे का चेहरा धुँधला था।

लेकिन तस्वीर के नीचे लिखा था—

“पहली बार पिता कहने वाला बच्चा।”

विक्रम ने कहा, “1947 में मैं एक घर में मिला था। मुझे नहीं पता था कि मैं कौन हूँ। मुझे अपनी माँ याद नहीं थी। मुझे अपना जन्म याद नहीं था। मुझे सिर्फ एक आवाज़ याद थी, जो कहती थी कि मैं किसी का बेटा हूँ।”

“किसका?” अर्जुन ने पूछा।

“उस आदमी का, जो हर रात मेरे सपनों में आता था।”

“उसका चेहरा कैसा था?”

विक्रम ने कहा, “तुम्हारे जैसा।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“आपके सपनों में मैं आता था?”

“नहीं। तुमसे पहले वाला तुम।”

विक्रम ने तस्वीर वापस घड़ी में रख दी।

“मैं बड़ा हुआ, लेकिन मेरी उम्र बदलती रही। कभी मैं बच्चा था, कभी जवान, कभी बूढ़ा। डॉक्टर कहते थे कि मेरे शरीर में कोई बीमारी है। लेकिन मुझे पता था कि बीमारी मेरे शरीर में नहीं थी।”

“कहाँ थी?”

विक्रम ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मेरी पहचान में।”

“फिर नीलकंठ ने क्या किया?”

“उसने मुझे एक नाम दिया।”

“विक्रम।”

“हाँ।”

“और उसके बाद?”

“मैंने उसे पिता कहना शुरू कर दिया।”

अर्जुन ने कहा, “लेकिन आपने कहा था कि नीलकंठ आपका पिता नहीं था।”

“वह मेरा पिता था, जब तक मैं उसे पिता मानता रहा।”

“और फिर?”

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

“एक दिन मुझे अपनी पहली याद वापस मिल गई।”

“क्या याद?”

विक्रम की आवाज़ काँपने लगी।

“मैंने देखा कि 1947 में जिस आदमी को मैंने पिता कहा था, वह मर रहा था। वह मेरे सामने लेटा था। उसके चेहरे पर तुम्हारा चेहरा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा—”

विक्रम कुछ क्षण रुक गया।

अर्जुन ने पूछा, “क्या कहा?”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“उसने कहा, ‘बेटा, मुझे मार दो। अगर मैं जीवित रहा, तो तुम्हें कभी जन्म नहीं लेने दूँगा।’”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “आपने उसे मार दिया?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“आपने अपने पिता को मार दिया?”

“हाँ।”

“और वह पिता कौन था?”

विक्रम ने आँखें खोलीं।

“मैं।”

अर्जुन कुछ देर उसे देखता रहा।

फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“आपने खुद को मार दिया?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“उस रात मैंने अपने पिता को मार दिया। और उसी क्षण मैं उनका पिता बन गया।”

मीरा ने दीवार का सहारा ले लिया।

अर्जुन ने पूछा, “तो आप कौन हैं? मेरे पिता या मेरे बेटे?”

विक्रम ने उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने पिता कहना चुना।”

अर्जुन ने गुस्से से कहा, “मैंने आपको नहीं चुना! मुझे बताया गया कि आप मेरे पिता हैं!”

विक्रम की आँखें नम हो गईं।

“और मैंने भी तुम्हें बेटा कहना चुना था, अर्जुन। क्योंकि अगर मैं तुम्हें बेटा नहीं कहता, तो मुझे मानना पड़ता कि मैंने अपने ही पिता को मार दिया था।”

अर्जुन चुप हो गया।

अब उसे समझ आने लगा था कि इस घर में रिश्ते खून से नहीं, चुनाव से बनते थे।

लेकिन हर चुनाव की कीमत थी।

किसी को नाम देना, किसी और से उसका नाम छीन लेना था।

किसी को बेटा कहना, किसी दूसरे बच्चे को अनाथ छोड़ देना था।

और किसी को पिता मानना, शायद किसी और की मौत स्वीकार करना था।

विक्रम ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“अब तुम मुझे बताओ।”

“क्या?”

“तुम मुझे क्या कहना चाहते हो?”

अर्जुन ने उसके हाथ को देखा।

फिर उसके चेहरे को।

“मैं नहीं जानता।”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

“यही सही जवाब है।”
6. वह आदमी जो घर में नहीं था
अचानक ऊपर की मंज़िल से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

धड़ाम!

मीरा तुरंत दरवाज़े की ओर मुड़ी।

“तीसरी मंज़िल।”

अर्जुन ने पूछा, “क्या हुआ?”

“वहाँ कोई है।”

विक्रम उठ खड़ा हुआ।

“वहाँ कोई नहीं जा सकता।”

“क्यों?”

“क्योंकि तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा बंद है।”

उसी समय फिर आवाज़ आई।

इस बार किसी बच्चे के दौड़ने की।

फिर एक खिलखिलाहट।

मीरा का चेहरा पीला पड़ गया।

“यह आवाज़…”

अर्जुन ने पूछा, “किसकी?”

मीरा ने उत्तर नहीं दिया।

वह कमरे से बाहर भागी।

अर्जुन उसके पीछे गया।

सीढ़ियों के पास पहुँचते ही उन्हें ऊपर से आवाज़ सुनाई दी—

“भैया!”

अर्जुन रुक गया।

यह मीरा की आवाज़ थी।

लेकिन मीरा तो उसके सामने खड़ी थी।

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

ऊपर से फिर आवाज़ आई—

“भैया, जल्दी आओ!”

मीरा ने धीरे से कहा, “यह मेरी आवाज़ नहीं है।”

विक्रम उनके पीछे आ गया।

“किसी को ऊपर नहीं जाना है।”

अर्जुन ने कहा, “अगर वहाँ कोई है, तो हमें देखना होगा।”

“मैंने कहा, कोई ऊपर नहीं जाएगा!”

विक्रम की आवाज़ इतनी तेज थी कि घर की दीवारें काँप उठीं।

अर्जुन ने पहली बार उसके चेहरे पर गुस्सा देखा।

“आप डर रहे हैं,” उसने कहा।

विक्रम ने उत्तर दिया, “हाँ।”

“किससे?”

विक्रम ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

“उस आदमी से, जिसे मैंने 1947 में मार दिया था।”

अर्जुन ने कहा, “वह आदमी तो आप थे।”

विक्रम ने धीरे से सिर हिलाया।

“नहीं, अर्जुन। मैंने अपने पिता को मारा था। लेकिन वह मेरे भीतर मरने के लिए तैयार नहीं था।”

“तो वह कौन है?”

विक्रम ने कहा—

“वह तुम्हारा असली पिता है।”

सीढ़ियों के ऊपर से कदमों की आवाज़ आने लगी।

धीरे-धीरे।

एक-एक सीढ़ी उतरते हुए।

पहले किसी का हाथ रेलिंग पर दिखाई दिया।

फिर सफेद कपड़े की बाँह।

फिर एक चेहरा।

अर्जुन ने साँस रोक ली।

वह विक्रम था।

लेकिन वह बूढ़ा नहीं था।

वह लगभग तीस वर्ष का था।

उसके चेहरे पर कोई झुर्री नहीं थी। बाल काले थे। आँखें शांत थीं।

उसने सीढ़ियों से उतरते हुए कहा, “इतने साल बाद भी तुमने मुझे पहचानना नहीं सीखा, विक्रम?”

कुर्सी के पास खड़ा विक्रम पीछे हट गया।

“तुम यहाँ नहीं आ सकते।”

सीढ़ियों से उतरता आदमी मुस्कराया।

“मैं हमेशा से यहीं था।”

“मैंने तुम्हें मार दिया था।”

“तुमने मेरे शरीर को मारा था।”

“मैंने तुम्हारी पहचान खत्म कर दी थी।”

“तुमने मेरा नाम बदल दिया था।”

वह नीचे आ गया।

अब दोनों विक्रम आमने-सामने खड़े थे।

उनका चेहरा एक जैसा था।

लेकिन एक की आँखों में डर था।

दूसरे की आँखों में गहरा दुख।

जवान विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा।

“बेटा।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“मुझे बेटा मत कहो।”

जवान विक्रम ने सिर झुका लिया।

“ठीक है।”

फिर उसने मीरा की ओर देखा।

“तुमने मुझे भाई कहा था।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मैंने तुम्हें नहीं कहा था।”

“तुमने कहा था। तीसरी मंज़िल पर। जब तुमने मुझे आईने से बाहर आने दिया था।”

मीरा के होंठ काँपने लगे।

“मैंने किसी को बाहर नहीं आने दिया।”

जवान विक्रम ने कहा, “तुमने दरवाज़ा बंद किया था। लेकिन दरवाज़ा किस तरफ से बंद किया था, यह तुम्हें याद नहीं।”

उसने अपनी जेब से एक छोटी चाँदी की घंटी निकाली।

मीरा ने अपनी हथेली देखी।

उसकी घंटी तो अर्जुन के पास थी।

अर्जुन ने जेब से घंटी निकाली।

दोनों घंटियाँ एक जैसी थीं।

जवान विक्रम ने कहा, “एक घंटी उस बच्चे के लिए थी, जिसे तुमने बचाया। दूसरी उस बच्चे के लिए, जिसे तुमने भीतर छोड़ दिया।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन-सी असली है?”

जवान विक्रम ने उत्तर दिया, “दोनों।”

“तो नकली कौन है?”

वह मुस्कराया।

“जिसे तुम नकली कहोगे।”

अर्जुन ने गुस्से से कहा, “तुम हर बार जवाब देने से बचते हो!”

जवान विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। मैं तुम्हें जवाब दे रहा हूँ। तुम सिर्फ एक ऐसा जवाब चाहते हो, जिसमें तुम्हारी कोई गलती न हो।”

अर्जुन चुप हो गया।

जवान विक्रम उसके पास आया।

“तुम्हें लगता है कि तुम्हारी कहानी में कोई खलनायक है। कोई ऐसा, जिसे दोष देकर तुम अपने डर से बच सको।”

उसने अर्जुन के सीने पर हाथ रखा।

“लेकिन इस कहानी में कोई अकेला दोषी नहीं है।”

अर्जुन ने उसका हाथ हटा दिया।

“तो फिर दोषी कौन है?”

जवान विक्रम ने कहा—

“वह बच्चा, जिसे हमने एक ही जीवन में दो बार जन्म दिया।”

फिर उसने अपनी उँगली अर्जुन की तरफ उठाई।

“और वह पिता, जिसने दोनों बार उसे पहचानने से इनकार कर दिया।”
7. पिता की पहली मौत
दोनों विक्रमों के बीच अचानक एक अजीब सन्नाटा छा गया।

जवान विक्रम ने कुर्सी पर बैठे बूढ़े विक्रम की ओर देखा।

“तुम उसे बताओगे या मैं बताऊँ?”

बूढ़े विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम बताओ।”

जवान विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा।

“12 मार्च 1947 को डॉ. नीलकंठ के अस्पताल में एक बच्चा पैदा हुआ था। उस बच्चे के जन्म के समय कोई माँ मौजूद नहीं थी। कोई पिता नहीं था। कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं था।”

अर्जुन ने कहा, “वह बच्चा विक्रम था?”

“लोगों ने उसे विक्रम कहा।”

“तो वह बच्चा कौन था?”

जवान विक्रम ने उत्तर दिया, “तुम्हारी पहली पहचान।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैं 1995 में पैदा हुआ था।”

“तुम्हारा शरीर 1995 में दुनिया के सामने आया था।”

“और मेरा जन्म?”

“वह 1947 में हुआ था।”

अर्जुन ने कहा, “यह असंभव है।”

जवान विक्रम ने शांत स्वर में कहा, “तुम्हारे लिए असंभव और मेरे लिए याद—दोनों एक ही चीज़ हैं।”

उसने आगे कहा, “उस बच्चे को नीलकंठ ने अपने पास रखा। उसे कोई नाम नहीं दिया। जब बच्चा बड़ा हुआ, तो उसने डॉक्टर से पूछा कि उसका पिता कौन है। नीलकंठ ने कहा कि उसका कोई पिता नहीं है।”

“फिर?”

“बच्चा बीमार पड़ गया। उसकी साँसें रुक गईं। डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया।”

अर्जुन ने पूछा, “और फिर वह जीवित हो गया?”

जवान विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। उसका शरीर मर गया। लेकिन उसकी पहचान जीवित रही।”

बूढ़े विक्रम ने धीरे से कहा, “मैंने उस पहचान को अपने भीतर महसूस किया। मैं उस समय सिर्फ एक बच्चा था। मुझे नहीं पता था कि मेरे भीतर किसी और की यादें क्यों थीं। मुझे सिर्फ इतना पता था कि मैं किसी को पिता कहकर पुकारना चाहता हूँ।”

जवान विक्रम ने बात आगे बढ़ाई।

“तुम्हें नीलकंठ याद है। वह आदमी जिसने तुम्हें नाम दिया। तुम उसे पिता कहने लगे। लेकिन हर बार जब तुम उसे पिता कहते, तुम्हारे भीतर से किसी और की आवाज़ आती।”

अर्जुन ने पूछा, “किसकी?”

जवान विक्रम ने कहा, “उस मृत बच्चे की।”

“वह क्या कहता था?”

“वह कहता था कि नीलकंठ उसका पिता नहीं है। वह कहता था कि उसका पिता कोई और है।”

“कौन?”

जवान विक्रम ने अर्जुन की आँखों में देखा।

“वह आदमी, जो 1947 में मरा था।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“कौन-सा आदमी?”

बूढ़े विक्रम ने जवाब दिया।

“मैं।”

जवान विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। तुम वह आदमी नहीं थे। तुम उस आदमी का नाम थे।”

अर्जुन ने दोनों को देखा।

“मैं कुछ नहीं समझ रहा।”

जवान विक्रम ने कहा, “तुम्हें समझना भी नहीं चाहिए। अभी नहीं।”

फिर उसने बूढ़े विक्रम की ओर देखा।

“तुम्हें याद है, जब तुमने पहली बार अपने बेटे को देखा था?”

बूढ़े विक्रम की आँखें भर आईं।

“हाँ।”

“वह कहाँ था?”

“अस्पताल में।”

“किस साल?”

“1995।”

“तुम्हें कैसे पता कि वह तुम्हारा बेटा था?”

बूढ़े विक्रम ने उत्तर नहीं दिया।

जवान विक्रम ने कहा, “क्योंकि वह तुम्हारी आवाज़ में रो रहा था। क्योंकि उसने तुम्हारी आँखों से देखा। क्योंकि जब तुमने उसे गोद में उठाया, तो उसने तुम्हें पिता कहा।”

अर्जुन ने कहा, “नवजात बच्चा बोल नहीं सकता।”

जवान विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हें किसने बताया कि वह नवजात बच्चा था?”

अर्जुन चुप हो गया।

जवान विक्रम ने कहा, “उस रात अस्पताल में दो बच्चे थे। एक बच्चा जीवित था। दूसरा मृत। लेकिन जब नीलकंठ ने रिकॉर्ड बनाया, तो उसने दोनों को एक ही नाम दे दिया।”

“कौन-सा नाम?”

जवान विक्रम ने कहा—

“अर्जुन।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तो फिर अभय और अर्णव?”

“वे नाम बाद में दिए गए। जब किसी को लगा कि एक नाम दो बच्चों के लिए काफी नहीं है।”

“और ईशान?”

“वह उस बच्चे का नाम है, जिसे कभी जन्म नहीं मिला।”

अर्जुन ने पूछा, “तो मेरा असली नाम क्या है?”

जवान विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारा असली नाम वह है, जिसे तुम्हारी माँ ने तुम्हारे जन्म से पहले पुकारा था।”

“वह नाम क्या है?”

वह कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला—

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“तुम्हें नहीं पता?”

जवान विक्रम ने सिर झुका लिया।

“मैंने उस रात भी यही पूछा था।”

“किससे?”

“उस आदमी से, जो मर रहा था।”

“उसने क्या कहा?”

जवान विक्रम ने धीरे से उत्तर दिया—

“उसने कहा, ‘मेरा नाम तुम्हारे जन्म से पहले मर चुका है।’”

अर्जुन ने महसूस किया कि उसके पैरों के नीचे फर्श काँप रहा है।

दीवार की घड़ी फिर 3:13 पर पहुँच गई थी।

बूढ़े विक्रम ने कहा, “अब तुम्हें फैसला करना होगा।”

“किस बारे में?”

“तुम किसे अपना पिता मानते हो।”

अर्जुन ने दोनों विक्रमों को देखा।

एक जवान।

एक बूढ़ा।

दोनों की आँखों में दर्द।

दोनों के चेहरे पर वही चेहरा।

दोनों उसे बेटा कह सकते थे।

और दोनों शायद सच बोल रहे थे।

“अगर मैं किसी को नहीं चुनूँ?” अर्जुन ने पूछा।

जवान विक्रम ने उत्तर दिया, “तो घर तुम्हें चुनेगा।”

“और अगर घर ने मुझे चुना?”

बूढ़े विक्रम ने कहा—

“तो तुम उस आदमी की जगह ले लोगे, जो 1947 में मर गया था।”
8. तीसरी दस्तक
अचानक मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक।

ठक।

ठक।

तीनों ने एक साथ दरवाज़े की तरफ देखा।

मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “कोई बाहर है।”

बूढ़े विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

दस्तक फिर हुई।

ठक।

ठक।

ठक।

जवान विक्रम ने कहा, “वह बाहर नहीं है।”

अर्जुन ने पूछा, “तो कहाँ है?”

दोनों विक्रमों ने एक साथ उसकी ओर देखा।

फिर एक ही आवाज़ में बोले—

“तुम्हारे भीतर।”

अर्जुन पीछे हट गया।

उसकी छाती में तेज दर्द उठा।

उसे लगा, जैसे किसी ने उसके दिल के चारों ओर एक ठंडी मुट्ठी बाँध दी हो।

फिर भीतर से आवाज़ आई।

एक बच्चे की।

“भैया?”

अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया।

“कौन है?”

आवाज़ फिर आई।

“भैया, मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“अर्णव?”

कमरे की सारी रोशनी एक साथ बुझ गई।

अँधेरे में बूढ़े विक्रम ने कहा, “तुमने उसे नाम दे दिया।”

जवान विक्रम ने कहा, “अब वह तुम्हें सुन सकता है।”

अर्जुन ने चीखकर पूछा, “क्या सुन सकता है?”

फिर उसके भीतर से आवाज़ आई—

“पापा?”

अर्जुन जम गया।

वह आवाज़ अब बच्चे की नहीं थी।

वह उसी की अपनी आवाज़ थी।

वही स्वर।

वही साँस।

वही छोटा-सा विराम।

“पापा, दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने अँधेरे में मीरा का हाथ खोजा।

उसे मीरा का हाथ मिल गया।

लेकिन उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।

“मीरा?”

कोई जवाब नहीं आया।

अर्जुन ने हाथ कसकर पकड़ लिया।

“मीरा, बोलो!”

अँधेरे में मीरा की आवाज़ आई।

“मैं यहाँ हूँ।”

लेकिन आवाज़ उसके पीछे से आई थी।

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

उसके चेहरे पर आँसू थे।

उसकी आँखें सामान्य थीं।

उसने हाथ बढ़ाया।

“अर्जुन, मेरे पास आओ।”

अर्जुन ने अपने हाथ में पकड़े हाथ की तरफ देखा।

वह भी मीरा का हाथ था।

उसने पीछे देखा।

फिर सामने।

दो मीरा।

दोनों की आँखों में आँसू।

दोनों उसे बुला रही थीं।

पीछे खड़ी मीरा ने कहा, “उसका हाथ छोड़ दो।”

सामने खड़ी मीरा ने कहा, “उसके पास मत जाना।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम दोनों में से असली कौन है?”

दोनों ने एक साथ उत्तर दिया—

“मैं।”

अर्जुन ने चाँदी की घंटी बजाई।

टन!

आवाज़ पूरे घर में फैल गई।

एक मीरा गायब हो गई।

दूसरी उसके सामने खड़ी रही।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

“मीरा…”

लेकिन उसके सामने खड़ी मीरा ने सिर हिलाया।

“तुमने गलत को चुना।”

अर्जुन का दिल डूब गया।

मीरा का चेहरा बदलने लगा।

उसकी त्वचा के नीचे काली लकीरें उभर आईं।

उसकी आँखें पूरी तरह काली हो गईं।

और जब उसने मुँह खोला, तो उसके भीतर से विक्रम की आवाज़ निकली।

“तुम्हें हमेशा गलत बच्चा ही क्यों चुनना पड़ता है, बेटा?”

अर्जुन ने उसे धक्का दिया।

वह पीछे गिर गई।

लेकिन जमीन पर गिरने के बजाय उसका शरीर हवा में ठहर गया।

फिर वह धीरे-धीरे उल्टा होने लगा।

उसका सिर फर्श की ओर और पैर छत की ओर चले गए।

उसकी पीठ से एक लंबी काली परछाईं निकलने लगी।

वह परछाईं दीवार पर चढ़ी और आईने के भीतर समा गई।

आईने में अब एक ही व्यक्ति दिखाई दे रहा था।

अर्जुन।

लेकिन वह मुस्करा नहीं रहा था।

वह रो रहा था।

उसके गालों पर आँसू थे।

उसने काँच के भीतर से दोनों हाथ उठाए।

फिर होंठ हिलाए।

अर्जुन ने शब्द पढ़ लिए।

“मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन ने आईने पर हाथ रख दिया।

“तुम कौन हो?”

आईने के भीतर का अर्जुन धीरे-धीरे मुस्कराया।

फिर उसने कहा—

“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

अर्जुन ने अपना हाथ खींच लिया।

आईने के भीतर का आदमी सिर हिलाने लगा।

“नहीं।”

उसने अपने चेहरे पर हाथ फेरा।

चेहरा बदलने लगा।

पहले विक्रम।

फिर नीलकंठ।

फिर शारदा देवी।

फिर राधा।

फिर एक छोटा बच्चा।

अंत में वह फिर अर्जुन बन गया।

उसने काँच पर अपनी उँगली से लिखा—

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने जन्म दिया।”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “मैंने किसी को जन्म नहीं दिया।”

आईने के भीतर का अर्जुन रोने लगा।

“तुमने मुझे नाम दिया था।”

“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया!”

“तुमने मुझे अर्जुन कहा।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“तुम अर्जुन हो।”

आईने के भीतर का आदमी सिर हिलाने लगा।

“नहीं।”

उसने धीरे से अपने सीने पर हाथ रखा।

“तुम अर्जुन हो।”

फिर उसने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें।

और उनके नीचे एक चौथी लकीर उभर आई।

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने अपने नाम के नीचे छिपा दिया।”

आईने में दरार पड़ गई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

काँच टूटने से पहले भीतर के अर्जुन ने आखिरी बार कहा—

“जब तुम्हारी माँ तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकारेगी, तब तुम्हें पता चलेगा कि हम दोनों में से कौन पहले पैदा हुआ था।”

आईना टूट गया।

कमरे में अँधेरा छा गया।

कुछ क्षण बाद जब अर्जुन ने आँखें खोलीं, तो वह अकेला था।

विक्रम नहीं था।

मीरा नहीं थी।

जवान विक्रम नहीं था।

सिर्फ फर्श पर एक तस्वीर पड़ी थी।

उसने तस्वीर उठाई।

तस्वीर में 1947 का अस्पताल था।

एक बिस्तर पर आदमी लेटा था।

उसके पास एक बच्चा खड़ा था।

बच्चे ने आदमी का हाथ पकड़ा हुआ था।

बिस्तर पर लेटे आदमी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

वह विक्रम नहीं था।

वह नीलकंठ नहीं था।

वह अर्जुन भी नहीं था।

वह एक ऐसा चेहरा था, जिसे अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखा था।

लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा नाम पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई।

मृतक का नाम: राधा शर्मा।

नीचे दूसरी पंक्ति थी—

“मृत्यु के समय गर्भवती।”

और सबसे नीचे, किसी दूसरी लिखावट में एक वाक्य था—

“बच्चे का पिता स्वयं बच्चा था।”

अर्जुन ने तस्वीर हाथ से गिरा दी।

तभी घर के मुख्य दरवाज़े पर चौथी दस्तक हुई।

ठक।

इस बार दरवाज़े के बाहर से किसी ने अर्जुन को नहीं पुकारा।

बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आई।

“अर्जुन, दरवाज़ा खोलो।”

वह आवाज़ काँप रही थी।

“बेटा, मैं बहुत देर से बाहर खड़ी हूँ।”

अर्जुन दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

फिर उसे मीरा की चेतावनी याद आई।

अगर कोई तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकारे, तो जवाब मत देना।

उसने दरवाज़े के पास जाकर पूछा, “आप कौन हैं?”

बाहर से रोने की आवाज़ आई।

“मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“मेरी माँ का नाम बताइए।”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर बाहर से उत्तर आया—

“राधा।”

अर्जुन ने कुंडी पर हाथ रखा।

तभी उसे अपने पीछे किसी की साँस सुनाई दी।

उसने पलटकर देखा।

कमरे के अँधेरे में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

उसने अर्जुन की तरफ देखकर कहा—

“मत खोलना।”

अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”

बच्चे ने कहा—

“क्योंकि बाहर तुम्हारी माँ नहीं है।”

“तो कौन है?”

बच्चे ने सिर झुका लिया।

“वह आदमी, जिसे तुमने 1947 में मरने के लिए छोड़ दिया था।”

दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई।

“बेटा…”

इस बार आवाज़ राधा की नहीं थी।

वह विक्रम की थी।

“बेटा, दरवाज़ा खोलो।”

फिर नीलकंठ की।

“बेटा, मुझे बाहर आने दो।”

फिर शारदा देवी की।

“अर्जुन, मेरी बात सुनो।”

और अंत में एक ऐसी आवाज़ आई, जिसे अर्जुन पहचान नहीं पाया।

उस आवाज़ ने कहा—

“अर्णव।”

अर्जुन का हाथ कुंडी पर जम गया।

बच्चे ने चीखकर कहा—

“जवाब मत देना!”

लेकिन अर्जुन के होंठ अपने आप खुल गए।

उसने फुसफुसाकर कहा—

“कौन?”

दरवाज़े के बाहर सब कुछ शांत हो गया।

फिर किसी ने बहुत धीरे से उत्तर दिया—

“तुम्हारा पहला पिता।”

कुंडी अपने आप घूम गई।

दरवाज़ा खुलने लगा।

और अँधेरे के भीतर से एक आदमी ने कदम रखा।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसकी कलाई पर कोई काली लकीर नहीं थी।

वह मुस्कराया और बोला—

“अब तुम्हारी बारी है, बेटा।”

एपिसोड 25 समाप्त।

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
25 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
35 min
Words
6802
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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