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एपिसोड 24: जिसका जन्म नहीं हुआ
firoj saifi · Ghost Stories · 33 मिनट
1. बिस्तर पर लेटा हुआ आदमी
“बेटा, अब मेरी जगह तुम सो जाओ।”
बिस्तर पर लेटे आदमी के मुँह से निकले ये शब्द कमरे में गूँजते रहे।
अर्जुन दरवाज़े पर खड़ा था। उसके पीछे मीरा थी। सामने डॉ. नीलकंठ अपने हाथ में एक पुरानी फाइल पकड़े खड़ा था। दीवार पर लगे कैलेंडर में तारीख थी—12 मार्च 1947।
कमरे में तीन घड़ियाँ थीं।
एक दीवार पर।
एक मेज पर।
और एक बिस्तर के सिरहाने।
तीनों की सुइयाँ 3:13 पर रुकी हुई थीं।
अर्जुन ने बिस्तर पर लेटे आदमी को ध्यान से देखा।
चेहरा उसका था।
नाक, आँखें, होंठ, माथे पर बालों की लट—सब कुछ वैसा ही। फर्क सिर्फ इतना था कि उस आदमी के बाल सफेद थे और चेहरे पर उम्र की गहरी लकीरें थीं।
उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें बनी थीं।
अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।
वहाँ भी वही तीन लकीरें थीं।
“तुम कौन हो?” उसने पूछा।
बिस्तर पर लेटा आदमी मुस्कराया।
“तुम्हें कितनी बार एक ही सवाल पूछना पड़ेगा?”
“जब तक मुझे सही जवाब नहीं मिलेगा।”
“सही जवाब सुनने के बाद भी तुम मुझ पर विश्वास नहीं करोगे।”
“यह फैसला तुम मेरे लिए नहीं कर सकते।”
आदमी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“यही गलती मैंने भी की थी।”
अर्जुन एक कदम आगे बढ़ा।
तभी डॉ. नीलकंठ ने उसका रास्ता रोक लिया।
“उसके पास मत जाना।”
अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
“आपने ही तो कहा था कि यह मेरा पिता है।”
“मैंने कहा था कि यह वह आदमी है जिसने विक्रम को जन्म दिया।”
“तो क्या यह मेरे पिता का पिता है?”
“नहीं।”
“फिर?”
नीलकंठ ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा, “रिश्तों को उन नामों से समझने की कोशिश मत करो, जो तुम्हें सिखाए गए हैं। इस कमरे में पिता वह नहीं है जिसने बच्चे को जन्म दिया। और बेटा वह नहीं है जिसे तुमने गोद में उठाया।”
अर्जुन झुँझला गया।
“आप हर बार पहेली क्यों बुझाते हैं? सीधे-सीधे बताइए कि यहाँ क्या हो रहा है!”
नीलकंठ ने उसकी आँखों में देखा।
“क्योंकि सीधे जवाब तुम्हारे लिए खतरनाक हैं।”
“मुझे खतरों से बचाने के लिए आपने मेरा पूरा जीवन झूठ में क्यों रखा?”
इस बार नीलकंठ के चेहरे पर एक हल्की-सी थकान उभरी।
“मैंने तुम्हारा जीवन नहीं बनाया, अर्जुन। मैंने सिर्फ उस जीवन का हिसाब रखा, जिसे कोई बार-बार मिटा रहा था।”
बिस्तर पर लेटे आदमी ने अचानक हँसना शुरू कर दिया।
पहले धीमे।
फिर तेज।
फिर उसकी हँसी खाँसी में बदल गई।
उसने अपने सीने पर हाथ रखा और उठने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उसने सिरहाने से हाथ हटाया, उसकी उँगलियों के नीचे की चादर पर काले निशान उभर आए।
तीन लंबी लकीरें।
उनके बीच एक चौथी लकीर धीरे-धीरे बनने लगी।
अर्जुन ने यह देखा तो उसकी साँस अटक गई।
“यह निशान…”
नीलकंठ ने तुरंत बिस्तर की चादर खींचकर निशान ढक दिए।
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
“आपने ही मुझे यहाँ बुलाया!”
“मैंने तुम्हें नहीं बुलाया।”
“तो फिर मैं यहाँ कैसे पहुँचा?”
नीलकंठ ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“जिसने तुम्हें बुलाया, वह अभी भी बाहर खड़ा है।”
अर्जुन पलटा।
दरवाज़ा खुला था।
लेकिन उसके पार अस्पताल का गलियारा नहीं था।
वहाँ शर्मा निवास का तीसरी मंज़िल वाला गलियारा दिखाई दे रहा था।
वही टूटी दीवारें।
वही पुरानी लकड़ी की रेलिंग।
वही कमरे का दरवाज़ा, जिसके ऊपर शारदा देवी ने वर्षों पहले ताला लगवाया था।
और उस दरवाज़े के सामने एक छोटी लड़की खड़ी थी।
उसने हल्के नीले रंग की फ्रॉक पहनी थी।
उसके बाल दो चोटियों में बँधे थे।
अर्जुन उसे पहचानता था।
वह मीरा थी।
लेकिन वह आठ साल की मीरा थी—वही उम्र, जब 17 जुलाई 2008 की रात उसे तीसरी मंज़िल पर नहीं होना चाहिए था।
बच्ची ने अर्जुन को देखकर हाथ हिलाया।
“भैया!”
अर्जुन के पैर अपने आप आगे बढ़े।
नीलकंठ ने उसका कंधा पकड़ लिया।
“रुको!”
बच्ची की मुस्कान गायब हो गई।
उसने सिर थोड़ा तिरछा किया।
“भैया, आप मुझे लेने नहीं आए?”
अर्जुन का गला भर आया।
“मीरा…”
पीछे खड़ी असली मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी तरफ देखो।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
मीरा का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
“मैं यहाँ हूँ।”
दरवाज़े के पार खड़ी बच्ची ने अचानक रोना शुरू कर दिया।
“भैया, उसने मुझे बंद कर दिया है!”
अर्जुन ने फिर दरवाज़े की तरफ देखा।
बच्ची दोनों हाथों से लकड़ी पीट रही थी।
“भैया! मुझे बाहर निकालो!”
अर्जुन ने नीलकंठ का हाथ झटक दिया।
“मुझे उसे बचाना होगा!”
“वह मीरा नहीं है!”
“तुम्हें कैसे पता?”
नीलकंठ ने कठोर स्वर में कहा, “क्योंकि असली मीरा उस रात तुम्हें भैया कहकर नहीं पुकार रही थी।”
मीरा का हाथ अर्जुन की कलाई पर कस गया।
“उस रात मैं किसी और को पुकार रही थी।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“किसे?”
मीरा ने काँपते होंठों से उत्तर दिया—
“मैं अपनी माँ को पुकार रही थी।”
दरवाज़े के पार खड़ी बच्ची अचानक चुप हो गई।
उसने दोनों हाथ नीचे कर लिए।
फिर मुस्कराकर कहा—
“अच्छा। तो तुमने अब तक उसे नहीं बताया।”
उसकी आँखें काली होने लगीं।
“तुमने उसे नहीं बताया कि उस रात तुम्हारी माँ तीसरी मंज़िल पर अकेली नहीं थी।”
कमरे में तेज हवा चली।
दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो गया।
और बिस्तर पर लेटे बूढ़े अर्जुन ने आँखें खोलकर कहा—
“अब तुम दोनों को पूरी रात यहीं रहना होगा।”
2. वह तारीख जो कैलेंडर पर नहीं थी
अर्जुन ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
कुंडी हिल रही थी, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने कंधा मारकर देखा।
कोई फायदा नहीं हुआ।
मीरा ने आसपास देखा। अस्पताल के कमरे में अब एक चौथा दरवाज़ा दिखाई दे रहा था, जो पहले वहाँ नहीं था।
उसके ऊपर लिखा था—
अभिलेख कक्ष।
मीरा ने कहा, “हमें यहाँ से निकलने का दूसरा रास्ता ढूँढ़ना होगा।”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“यहाँ कोई रास्ता नहीं है।”
“तो हम यहाँ से निकलेंगे कैसे?” अर्जुन ने पूछा।
“जब तक तुम यह नहीं समझते कि तुम्हें यहाँ क्यों लाया गया है, तब तक नहीं निकल सकते।”
“और अगर मैं समझना ही नहीं चाहता?”
नीलकंठ ने घड़ी की ओर देखा।
“तब तुम यहाँ उतने ही समय तक रहोगे, जितना समय तुम्हें जन्म लेने में लगा था।”
अर्जुन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“इसका क्या मतलब है?”
“तुम्हारी घड़ी में समय बीतता है। इस जगह समय बनता है। यहाँ एक मिनट तुम्हारे लिए एक साल हो सकता है, और एक साल किसी दूसरे के लिए सिर्फ एक साँस।”
मीरा ने दीवार की घड़ी की ओर देखा।
उसकी सुइयाँ अभी भी 3:13 पर थीं।
“तो हम यहाँ कितनी देर से हैं?”
नीलकंठ ने उत्तर दिया, “तुम्हारे हिसाब से शायद कुछ मिनट।”
“और आपके हिसाब से?”
नीलकंठ ने कोई जवाब नहीं दिया।
बिस्तर पर लेटा बूढ़ा अर्जुन अचानक बोल पड़ा।
“मेरे हिसाब से तुम दोनों यहाँ आने में पंद्रह साल देर कर चुके हो।”
अर्जुन उसके पास गया।
“तुम्हें 2023 के बारे में कैसे पता?”
“क्योंकि मैं वहाँ था।”
“कहाँ?”
“शर्मा निवास में।”
“तुमने मुझे देखा था?”
“मैंने तुम्हें जाते हुए देखा था।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“मैं 2008 में देवगढ़ छोड़कर गया था।”
“नहीं।”
बूढ़े अर्जुन की आवाज़ बहुत शांत थी।
“तुम्हें देवगढ़ से भेजा गया था। तुम अपनी इच्छा से नहीं गए थे।”
अर्जुन कुछ कहने ही वाला था कि नीलकंठ ने मेज पर रखी फाइल उसकी ओर बढ़ा दी।
“इसे पढ़ो।”
फाइल पुरानी थी। उसके किनारों पर भूरे धब्बे थे। ऊपर लाल स्याही से लिखा था—
जन्म और मृत्यु के बीच अटके व्यक्तियों का रजिस्टर।
अर्जुन ने पहला पन्ना खोला।
उस पर नामों की सूची थी।
कुछ नामों के सामने जन्म की तारीख थी, कुछ के सामने मृत्यु की। कई नामों के सामने सिर्फ एक ही तारीख दोहराई गई थी।
17 जुलाई 1995।
17 जुलाई 2008।
17 जुलाई 2013।
और सबसे नीचे—
17 अक्टूबर 2026।
अर्जुन ने उस तारीख पर उँगली रखी।
“यह आज की तारीख है।”
“हाँ,” नीलकंठ ने कहा।
“लेकिन यह रजिस्टर तो पुराना है।”
“रजिस्टर पुराना है। उसमें लिखी घटनाएँ नहीं।”
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
पहला नाम था—विक्रम शर्मा।
जन्म: 12 मार्च 1948, प्रातः 3:13।
स्थिति: जन्म प्रमाणित नहीं।
मृत्यु: 17 जुलाई 1995, प्रातः 3:13।
स्थिति: मृत्यु प्रमाणित, मृतक की पहचान असंगत।
नीचे नीलकंठ के हस्ताक्षर थे।
अर्जुन ने अगला नाम पढ़ा।
अर्जुन शर्मा।
जन्म: 17 जुलाई 1995, प्रातः 3:13।
स्थिति: जन्म प्रमाणित, शरीर की पहचान अस्थिर।
मृत्यु: 17 जुलाई 2013, प्रातः 3:13।
स्थिति: मृत्यु प्रमाणित नहीं।
उसके नीचे लिखा था—
पुनः उपस्थिति: 17 जुलाई 2013, समय 3:13।
गवाह: विक्रम शर्मा।
अर्जुन ने पन्ने पर हाथ रख दिया।
“यह झूठ है।”
नीलकंठ चुप रहा।
“मैं 2013 में नहीं मरा था।”
“तुम्हें याद है कि तुम कहाँ थे?” नीलकंठ ने पूछा।
अर्जुन ने जवाब देने की कोशिश की।
उसे अपना कमरा याद आया।
बारिश की आवाज़।
पिता की तस्वीर।
माँ की घबराई हुई आवाज़।
फिर एक अस्पताल।
उसके बाद सब कुछ धुँधला था।
“मैं अस्पताल में था।”
“किस अस्पताल में?”
अर्जुन ने माथे पर हाथ रखा।
“मुझे याद नहीं।”
“किसने तुम्हें वहाँ पहुँचाया?”
“मेरे पिता।”
“कौन-से पिता?”
अर्जुन ने नीलकंठ को घूरा।
“विक्रम शर्मा।”
नीलकंठ ने सिर झुका लिया।
“यही तो समस्या है।”
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
“आप चाहते क्या हैं?”
नीलकंठ ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि तुम उस पन्ने को पढ़ो, जिसे तुम हमेशा छोड़ देते हो।”
“कौन-सा पन्ना?”
नीलकंठ ने फाइल के बीच से एक कागज़ निकाला।
उस पर कोई नाम नहीं था।
सिर्फ एक खाली स्थान था।
नीचे लिखा था—
जन्म की तारीख: अज्ञात।
मृत्यु की तारीख: जन्म से पहले।
पिता: स्वयं।
माता: अनुपस्थित।
पहचान: अर्जुन शर्मा द्वारा स्वीकार नहीं की गई।
अर्जुन ने कागज़ को उलट-पलटकर देखा।
“यह किसका रिकॉर्ड है?”
नीलकंठ ने कहा, “तुम्हारा।”
“इस पर मेरा नाम नहीं है।”
“क्योंकि यह उस अर्जुन का रिकॉर्ड है, जिसे तुमने अपने भीतर छिपा दिया।”
अर्जुन की आवाज़ तेज हो गई।
“मेरे भीतर कोई दूसरा अर्जुन नहीं है!”
बिस्तर पर लेटे बूढ़े ने आँखें बंद करके कहा—
“तुम्हें यह बात मुझसे बेहतर कौन समझा सकता है? मैं भी कभी यही कहता था।”
अर्जुन ने गुस्से में फाइल मेज पर पटक दी।
“बस! मुझे अब कुछ नहीं सुनना!”
उसी समय कमरे में एक छोटी-सी घंटी बजी।
टन।
फाइल अपने आप खुल गई।
खाली पन्ने पर धीरे-धीरे अक्षर उभरने लगे।
पिता: अर्जुन शर्मा।
बेटा: अर्जुन शर्मा।
दोनों की मृत्यु: एक ही रात।
और उसके नीचे एक वाक्य लिखा आया—
“जिसने अपने बेटे को जन्म दिया, उसने अपने पिता को मार दिया।”
अर्जुन पीछे हट गया।
मीरा ने कागज़ उठाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसकी उँगलियाँ उस पर पड़ीं, कागज़ पर आग लग गई।
आग काली थी।
उससे धुआँ नहीं निकल रहा था।
कुछ ही क्षणों में पूरा पन्ना जलकर राख हो गया।
राख के भीतर से एक छोटी धातु की चाबी निकली।
नीलकंठ ने उसे उठाया।
“अब अभिलेख कक्ष खुल सकता है।”
3. वह आदमी जो कभी बच्चा नहीं था
अभिलेख कक्ष के दरवाज़े पर ताला नहीं था।
नीलकंठ ने चाबी घुमाई तो दरवाज़ा बिना आवाज़ किए खुल गया।
भीतर एक छोटी-सी जगह थी, जिसमें चार दीवारों पर लोहे की अलमारियाँ लगी थीं। हर अलमारी पर साल लिखा था।
1947।
1948।
1953।
1995।
2008।
2013।
2023।
और सबसे आखिरी अलमारी पर लिखा था—
जिस वर्ष का कोई नाम नहीं।
अर्जुन ने उस अलमारी की ओर देखा।
“इसमें क्या है?”
नीलकंठ ने कहा, “वे लोग, जिन्हें दुनिया याद नहीं रख पाई।”
“मरे हुए लोग?”
“नहीं।”
“तो?”
“वे लोग, जिनके जन्म के बारे में किसी को याद नहीं।”
मीरा ने पूछा, “क्या कोई व्यक्ति पैदा हो सकता है और फिर भी उसका जन्म किसी को याद न हो?”
नीलकंठ ने उसे देखा।
“अगर वह पैदा होने से पहले ही किसी और की याद में रह रहा हो, तो हाँ।”
अर्जुन ने पहली अलमारी खोली।
उसमें पुराने दस्तावेज़ थे। कुछ जन्म प्रमाणपत्र, कुछ अस्पताल के पर्चे, कुछ तस्वीरें और कुछ ऐसे कागज़ जिन पर लिखी स्याही समय के साथ मिट चुकी थी।
उसने एक फाइल निकाली।
विक्रम शर्मा — 1948।
अंदर एक तस्वीर थी।
एक शिशु अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था। उसके बगल में एक और बच्चा था, जिसकी आँखें खुली थीं।
दोनों की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“दो बच्चे मिले। एक को नाम दिया गया। दूसरे को गिनती में शामिल नहीं किया गया।”
अर्जुन ने अगला कागज़ निकाला।
वह किसी डॉक्टर की रिपोर्ट थी।
“प्रथम शिशु का शरीर सामान्य है। द्वितीय शिशु में श्वसन नहीं है, परंतु उसकी छाया सक्रिय है। दोनों को अलग करने पर प्रथम शिशु का हृदय रुक जाता है। दोनों को साथ रखने पर द्वितीय शिशु की छाया प्रथम शिशु के शरीर में प्रवेश करने का प्रयास करती है।”
रिपोर्ट के अंत में लिखा था—
“अलग करना संभव नहीं। पहचान का निर्णय आवश्यक।”
नीचे हस्ताक्षर थे—
डॉ. नीलकंठ प्रसाद।
अर्जुन ने डॉक्टर की ओर देखा।
“आपने यह सब किया था?”
नीलकंठ ने धीरे से कहा, “मैंने कोशिश की थी कि दोनों जीवित रह सकें।”
“लेकिन एक बच्चा मर गया।”
“हाँ।”
“कौन-सा?”
नीलकंठ ने आँखें बंद कर लीं।
“यही सवाल उस रात किसी ने नहीं पूछा।”
अर्जुन ने गुस्से से कहा, “क्योंकि आप लोगों ने सवाल पूछने का मौका ही नहीं दिया!”
“हमने एक बच्चे को बचाने के लिए दूसरे को खो दिया। फिर हमने उस खोए हुए बच्चे को रिकॉर्ड से मिटा दिया।”
“क्यों?”
नीलकंठ की आँखों में पछतावा उभरा।
“क्योंकि वह बच्चा मरने के बाद भी रो रहा था।”
कमरे में चुप्पी छा गई।
मीरा ने बहुत धीरे से पूछा, “वह बच्चा कहाँ था?”
नीलकंठ ने अलमारी के सबसे निचले खाने की ओर इशारा किया।
वहाँ एक छोटा लकड़ी का डिब्बा रखा था।
उस पर कोई नाम नहीं था।
अर्जुन ने डिब्बा बाहर निकाला।
उसके भीतर एक कलाई पर बाँधने वाला पहचान-पट्टी थी।
उस पर लिखा था—
शिशु संख्या: 0।
जन्म: 12 मार्च 1947।
मृत्यु: 12 मार्च 1947।
कारण: मृत्यु से पहले पहचान समाप्त।
अर्जुन ने पट्टी को देखा।
“यह 1947 है। लेकिन विक्रम का जन्म 1948 में हुआ था।”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“कागज़ों में।”
“तो असली तारीख कौन-सी है?”
“1947।”
“फिर विक्रम का जन्म 1948 में कैसे हुआ?”
नीलकंठ ने जवाब दिया, “क्योंकि एक साल तक वह बच्चा किसी और की याद में जीवित रहा।”
अर्जुन ने डिब्बा मेज पर रख दिया।
“आपका मतलब है कि विक्रम पैदा होने से पहले ही एक साल तक जीवित था?”
“नहीं। मेरा मतलब है कि जिस बच्चे को तुम विक्रम कहते हो, वह 1947 में पैदा हुआ था। लेकिन उस समय उसे कोई विक्रम नहीं कहता था।”
मीरा ने पूछा, “फिर उसका नाम क्या था?”
नीलकंठ ने उत्तर नहीं दिया।
अर्जुन ने पहचान-पट्टी उठाई।
उसकी उँगलियों के नीचे धातु गर्म होने लगी।
पट्टी पर लिखे अक्षर बदलने लगे।
पहले “शिशु संख्या 0” मिटा।
फिर “जन्म” मिटा।
फिर “मृत्यु” मिटा।
अंत में सिर्फ एक शब्द बचा—
अर्णव।
अर्जुन के हाथ से पट्टी छूट गई।
उसी क्षण अलमारी के भीतर से किसी बच्चे की आवाज़ आई।
“यह मेरा नाम है।”
अर्जुन ने पीछे हटकर देखा।
अलमारी के अँधेरे में एक छोटा बच्चा बैठा था।
वही चेहरा।
वही बाल।
वही तीन काली लकीरें।
लेकिन इस बार बच्चा पारदर्शी नहीं था।
वह बिल्कुल जीवित दिखाई दे रहा था।
उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
“तुमने बहुत देर लगा दी, भैया।”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम अर्णव हो?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“तुम्हें मेरा नाम याद आ गया।”
“तुम मेरे भाई हो?”
बच्चे ने कुछ देर उसे देखा।
फिर बोला—
“अगर तुम मुझे भाई कहोगे, तो मैं तुम्हारा भाई बन जाऊँगा।”
“और अगर मैं तुम्हें बेटा कहूँ?”
बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।
“तो मुझे जन्म लेना पड़ेगा।”
कमरे की सारी अलमारियाँ एक साथ काँपने लगीं।
नीलकंठ चिल्लाया, “उसे कोई नाम मत दो!”
लेकिन अर्जुन उस बच्चे को देखता रहा।
“तुम चाहते क्या हो?”
बच्चे ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि कोई मुझे याद रखे।”
“मैं तुम्हें याद रखूँगा।”
“तुम मुझे पहले भी याद रखते थे।”
“तो फिर तुम वापस क्यों आए?”
बच्चे की आँखें नम हो गईं।
“क्योंकि तुमने मुझे भूलने का फैसला किया था।”
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ वापस खींच लिया।
“और इस बार, भैया, मैं तुम्हें भूलने नहीं दूँगा।”
4. 2008 की रात का दूसरा गवाह
अर्जुन बच्चे की तरफ बढ़ा, लेकिन नीलकंठ ने उसे रोक दिया।
“वह तुम्हारे पास नहीं आ सकता।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे बीच की दूरी ही उसे जीवित रखती है।”
बच्चे ने नीलकंठ की ओर देखा।
उसकी आँखों में अचानक गुस्सा भर गया।
“आपने मुझे फिर बंद कर दिया।”
नीलकंठ ने कहा, “मैंने तुम्हें बचाया था।”
“आपने मुझे नाम नहीं दिया।”
“मैंने तुम्हें मरने से बचाने की कोशिश की।”
“मैं मर चुका था!”
बच्चे की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
अलमारियों के दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।
कागज़ हवा में उड़ने लगे।
बच्चा अब अलमारी में नहीं था। वह कमरे के बीच खड़ा था।
उसकी ऊँचाई बढ़ रही थी।
पाँच साल का बच्चा दस साल का हुआ।
फिर तेरह साल का।
फिर सत्रह साल का।
उसका चेहरा बदलता रहा, लेकिन हर उम्र में वह अर्जुन जैसा दिखाई देता था।
“आपने मुझे मरने नहीं दिया,” उसने कहा। “आपने मुझे जीने भी नहीं दिया।”
नीलकंठ ने धीमे स्वर में कहा, “क्योंकि तुम्हारा जीवित होना दूसरे बच्चे की मौत थी।”
बच्चे ने सिर झुका लिया।
“तो आपने दूसरे बच्चे को क्यों चुना?”
नीलकंठ के पास कोई उत्तर नहीं था।
अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा दूसरा बच्चा?”
बच्चे ने उसकी तरफ देखा।
“तुम।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“मैं 1995 में पैदा हुआ था।”
“तुम्हें किसने बताया?”
“मेरे जन्म प्रमाणपत्र में…”
“क्या तुमने वह प्रमाणपत्र देखा है?”
अर्जुन चुप हो गया।
“क्या तुमने अपनी माँ को तुम्हें जन्म देते हुए देखा है?”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
“क्या तुम्हें अपनी पहली साँस याद है?”
उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी।
“क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारी माँ ने पहली बार तुम्हें गोद में उठाया था?”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
उसे कोई दृश्य याद नहीं आया।
बच्चे ने कहा, “तुम्हें कुछ याद नहीं, क्योंकि तुम्हारी पहली याद तुम्हारी नहीं है।”
अचानक कमरे के पीछे की दीवार पर एक दृश्य उभर आया।
अस्पताल का कमरा।
एक युवा राधा बिस्तर पर बैठी थी। उसके हाथ में नवजात बच्चा था। विक्रम उसके सामने खड़ा था। शारदा देवी दरवाज़े के पास थीं।
डॉ. नीलकंठ एक फाइल पर लिख रहे थे।
राधा ने बच्चे को सीने से लगाकर कहा, “इसका नाम अर्जुन होगा।”
शारदा देवी ने तुरंत कहा, “नहीं।”
राधा ने सिर उठाया।
“क्यों?”
“क्योंकि अर्जुन पहले से है।”
“वह मर चुका है।”
“शरीर मरा है। नाम नहीं।”
राधा ने बच्चे को देखा।
“तो फिर यह कौन है?”
शारदा देवी ने उत्तर नहीं दिया।
विक्रम ने कहा, “हम इसे यहाँ नहीं रख सकते।”
राधा की आँखों में आँसू आ गए।
“यह मेरा बच्चा है।”
नीलकंठ ने कागज़ पर कुछ लिखते हुए कहा, “अगर इसे अर्जुन कहा गया, तो दूसरा बच्चा जाग जाएगा।”
राधा ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।
“तो उसे जागने दो।”
शारदा देवी ने उसके हाथ से बच्चा छीनने की कोशिश की।
राधा पीछे हट गई।
“तुम लोग फिर वही गलती कर रहे हो!”
“राधा, हमारी बात सुनो,” विक्रम ने कहा।
“नहीं! मैंने पहले ही एक बच्चा खोया है। अब मैं दूसरे को नहीं खोऊँगी।”
उसने बच्चे के माथे को चूमा।
“इसका नाम अर्जुन है। यह मेरा बेटा है।”
तभी कमरे की सारी रोशनी बुझ गई।
अँधेरे में दो बच्चों के रोने की आवाज़ें सुनाई दीं।
एक रोना धीरे-धीरे बंद हो गया।
दूसरा रोना जारी रहा।
और तीसरी आवाज़ आई—
“माँ, आपने मुझे क्यों नहीं चुना?”
दृश्य गायब हो गया।
अर्जुन साँस लेने के लिए संघर्ष करने लगा।
मीरा ने उसे संभाला।
“अर्जुन! मेरी तरफ देखो!”
उसने आँखें खोलीं।
“मैंने… मैंने उस रात…”
“तुमने कुछ नहीं किया,” मीरा ने कहा।
लेकिन उसकी अपनी आवाज़ में भी विश्वास नहीं था।
बच्चा उनके सामने खड़ा था।
“तुमने उस रात कुछ नहीं किया था, भैया। तुम तो पैदा भी नहीं हुए थे।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“फिर वह दृश्य किसका था?”
बच्चे ने कहा, “वह तुम्हारी पहली याद थी।”
“लेकिन उसमें मैं बच्चा था।”
“तुम्हारा शरीर बच्चा था।”
“और मेरा मन?”
बच्चे ने उत्तर दिया—
“वह मेरा था।”
5. मीरा की याद
कमरे की दीवार पर एक दूसरा दृश्य उभरा।
इस बार अस्पताल नहीं था।
शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल थी।
17 जुलाई 2008 की रात।
बाहर बारिश हो रही थी। घर की बिजली चली गई थी। गलियारे में केवल एक लालटेन जल रही थी।
आठ साल की मीरा सीढ़ियाँ चढ़ रही थी।
उसके हाथ में छोटी-सी चाँदी की घंटी थी।
वह बार-बार पीछे देखती थी, जैसे कोई उसके पीछे चल रहा हो।
कमरे के बाहर पहुँचकर उसने दरवाज़े पर हाथ रखा।
अंदर से राधा की आवाज़ आई।
“मीरा, वापस जाओ।”
बच्ची ने कहा, “माँ?”
“मैंने कहा वापस जाओ!”
“आप अंदर क्या कर रही हैं?”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर राधा ने कहा, “मैं तुम्हारे भाई को घर ला रही हूँ।”
मीरा ने दरवाज़ा खोल दिया।
कमरे के भीतर आईना था।
उसके सामने राधा खड़ी थी।
लेकिन आईने में दिखाई देने वाली राधा की पीठ पर कोई छाया नहीं थी।
कमरे के कोने में एक बच्चा बैठा था।
उसने अर्जुन जैसे कपड़े पहने थे।
मीरा ने उसे देखते ही कहा, “भैया?”
बच्चे ने सिर उठाया।
“तुम मुझे पहचानती हो?”
“हाँ।”
“तो मेरा नाम बताओ।”
मीरा ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“अर्जुन।”
बच्चा मुस्कराया।
“गलत।”
मीरा रुक गई।
“तो?”
बच्चे ने अपनी कलाई उठाई।
तीन काली लकीरें।
“मुझे वह नाम बताओ, जो तुमने मुझे उस रात दिया था।”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया।”
“तुमने दिया था।”
“नहीं!”
“तुमने कहा था कि अगर मैं तुम्हारी माँ को वापस ले आऊँ, तो तुम मुझे भाई कहोगी।”
मीरा रोने लगी।
“मैंने ऐसा नहीं कहा!”
बच्चा उठकर उसके पास आया।
“तुमने मुझे भाई कहा था।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि तुम अर्जुन जैसे दिखते थे।”
बच्चे ने धीरे से कहा, “नहीं। क्योंकि तुमने मुझे पहचान लिया था।”
दृश्य में राधा पलटी।
उसका चेहरा सामान्य था, लेकिन उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी।
उसने मीरा को देखा।
“तुम यहाँ क्यों आई?”
मीरा ने रोते हुए कहा, “माँ, मुझे डर लग रहा है।”
राधा ने हाथ बढ़ाया।
“मेरे पास आओ।”
मीरा आगे बढ़ी।
लेकिन तभी आईने के भीतर से दूसरी राधा ने हाथ बाहर निकाला और मीरा की कलाई पकड़ ली।
बच्ची चीखी।
राधा ने उसका दूसरा हाथ पकड़ लिया।
दोनों स्त्रियाँ उसे अपनी तरफ खींचने लगीं।
एक की आवाज़ में माँ का प्यार था।
दूसरी की आवाज़ में भूख।
मीरा ने छूटने की कोशिश की।
“माँ!”
दोनों एक साथ बोलीं—
“मैं तुम्हारी माँ हूँ!”
तभी कमरे के दरवाज़े पर अर्जुन दिखाई दिया।
वह लगभग तेरह साल का था।
उसने मीरा को देखा।
फिर आईने के भीतर खड़े बच्चे को।
बच्चे ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
“मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन आगे बढ़ा।
मीरा ने चीखकर कहा, “भैया, मुझे बचाओ!”
लेकिन बच्चे ने अर्जुन के कान में फुसफुसाया—
“अगर तुमने उसे बचाया, तो मैं मर जाऊँगा।”
अर्जुन ठिठक गया।
एक तरफ मीरा थी।
दूसरी तरफ बच्चा।
दोनों उसकी ओर हाथ बढ़ाए हुए थे।
तभी पीछे से विक्रम की आवाज़ आई।
“अर्जुन! दरवाज़ा बंद कर दो!”
अर्जुन ने अपने पिता की तरफ देखा।
विक्रम के चेहरे पर डर था।
“किसी को भी बाहर मत आने देना!”
अर्जुन ने दरवाज़ा पकड़ लिया।
मीरा रो रही थी।
बच्चा मुस्करा रहा था।
और राधा दोनों के बीच खड़ी थी।
अर्जुन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
दृश्य समाप्त हो गया।
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
मीरा का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
वह दीवार को देखती रही।
“मैंने यह सब पहले क्यों नहीं देखा?”
अर्जुन ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“मीरा…”
उसने उसका हाथ झटक दिया।
“तुमने मुझे वहाँ छोड़ दिया था।”
“मुझे माफ कर दो।”
“तुमने दरवाज़ा बंद कर दिया था, अर्जुन।”
“मैं बच्चा था।”
“मैं भी बच्ची थी!”
मीरा की आवाज़ टूट गई।
“तुम्हें डर लग रहा था। मुझे भी डर लग रहा था। तुमने अपने डर से बचने के लिए दरवाज़ा बंद किया, और मैं पंद्रह साल तक उस दरवाज़े के पीछे फँसी रही।”
अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।
मीरा ने आँसू पोंछे।
“और अब तुम मुझसे कह रहे हो कि तुम मुझे नहीं छोड़ोगे?”
“मैं तुम्हें इस बार नहीं छोड़ूँगा।”
“क्यों? क्योंकि तुम्हें लगता है कि तुम मुझे बचा सकते हो?”
अर्जुन ने धीरे से कहा, “नहीं।”
उसने मीरा की आँखों में देखा।
“क्योंकि इस बार मैं भागूँगा नहीं।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
कई क्षण तक वह कुछ नहीं बोली।
फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
अर्जुन ने उसे पकड़ लिया।
उसी समय बच्चे ने कहा—
“अब तुम दोनों को याद आ गया।”
अर्जुन और मीरा ने उसकी तरफ देखा।
बच्चा धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।
“अब मुझे जन्म लेने से कोई नहीं रोक सकता।”
6. नाम का चुनाव
डॉ. नीलकंठ ने अपनी फाइल बंद कर दी।
“अब समय आ गया है।”
अर्जुन ने पूछा, “किस बात का?”
“निर्णय का।”
“कैसा निर्णय?”
“तुम्हें तय करना होगा कि उस रात किसे बाहर आने दिया गया था।”
अर्जुन ने कहा, “मैंने दरवाज़ा बंद किया था। किसी को बाहर नहीं आने दिया।”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“तुमने दरवाज़ा बंद किया था। लेकिन दरवाज़े के बाहर कौन था, यह तुम्हें याद नहीं।”
“मीरा।”
“हाँ।”
“तो फिर?”
“मीरा के पीछे एक और व्यक्ति खड़ा था।”
अर्जुन ने बच्चे की तरफ देखा।
बच्चा अब लगभग उसकी उम्र का दिखाई दे रहा था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था, लेकिन आँखों के नीचे काले घेरे थे।
“तुम्हारे पीछे कौन था?” अर्जुन ने पूछा।
बच्चे ने कहा, “तुम।”
“मैं वहाँ था।”
“नहीं। तुमसे पहले वाला तुम।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“यह संभव नहीं है।”
बच्चे ने कहा, “तुम हमेशा यही कहते हो।”
उसने अपनी कलाई उठाई।
तीन काली लकीरों के नीचे एक चौथी लकीर उभर आई।
“तुमने दरवाज़ा बंद किया था। लेकिन तुमने दरवाज़े के दूसरी तरफ खड़े अपने ही रूप को बाहर छोड़ दिया था।”
अर्जुन के भीतर ठंड फैल गई।
“मेरे रूप को?”
“तुम्हारी परछाईं को।”
“परछाईं कोई इंसान नहीं होती।”
बच्चे ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारी परछाईं इंसान थी।”
नीलकंठ ने धीमे स्वर में कहा, “वह सिर्फ परछाईं नहीं थी, अर्जुन। वह तुम्हारी पहचान का वह हिस्सा था, जिसे तुमने कभी स्वीकार नहीं किया।”
“और वह अब कहाँ है?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“तुम्हारे घर में।”
अर्जुन के मन में शर्मा निवास का दृश्य कौंधा।
रात का अँधेरा।
दरवाज़े के बाहर उसकी अपनी आवाज़।
“पापा? दरवाज़ा खोलो। मैं घर लौट आया हूँ।”
उसने नीलकंठ की तरफ देखा।
“वह मेरे घर में है।”
“हाँ।”
“वह क्या चाहता है?”
नीलकंठ ने कहा, “वह अपनी जगह वापस चाहता है।”
“कौन-सी जगह?”
बच्चे ने उत्तर दिया—
“तुम्हारी।”
कमरे की दीवार पर अचानक एक बड़ा आईना उभर आया।
उसमें शर्मा निवास का मुख्य दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।
दरवाज़े के बाहर अर्जुन खड़ा था।
लेकिन वह वर्तमान वाला अर्जुन नहीं था।
उसकी आँखें काली थीं।
चेहरे पर मुस्कान थी।
उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।
ठक।
ठक।
ठक।
अंदर से किसी ने पूछा, “कौन?”
आईने वाला अर्जुन मुस्कराया।
“मैं अर्जुन हूँ।”
अंदर से जवाब आया, “अर्जुन तो घर में है।”
बाहर खड़े अर्जुन ने धीरे से कहा—
“नहीं। घर में जो है, वह मेरा नाम पहनकर बैठा है।”
अंदर से कदमों की आवाज़ आई।
फिर दरवाज़ा खुला।
दरवाज़े पर खड़ी स्त्री का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने बाहर खड़े अर्जुन का हाथ पकड़ा।
और कहा—
“आ जाओ, बेटा। मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी।”
आईने का दृश्य काँपने लगा।
अर्जुन ने चिल्लाकर पूछा, “वह कौन है?”
नीलकंठ ने उत्तर दिया, “वही, जो तुम्हें जन्म देना चाहती थी।”
“राधा?”
“शायद।”
“आप हर बार शायद क्यों कहते हैं?”
नीलकंठ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि कभी-कभी माँ भी अपने बच्चे को पहचानने के लिए उसका चेहरा नहीं, उसका नाम देखती है। और तुम्हारे नाम इतने बदल चुके हैं कि अब किसी को नहीं पता कि तुम्हें किसने जन्म दिया।”
आईने में खड़ा दूसरा अर्जुन दरवाज़े के भीतर चला गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
फिर आईने पर काले अक्षर उभर आए—
“तुम्हें घर लौटना होगा।”
अर्जुन ने कहा, “मैं वापस जाऊँगा।”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“तुम अकेले नहीं जा सकते।”
“क्यों?”
“क्योंकि उस घर में अब दो अर्जुन हैं।”
मीरा ने कहा, “तो हम दोनों जाएँगे।”
नीलकंठ ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि घर में तुम्हारी माँ भी है।”
मीरा का चेहरा बदल गया।
“राधा?”
नीलकंठ ने कुछ क्षण उसे देखा।
“जिस स्त्री को तुम अपनी माँ कहती हो, वह शायद तुम्हारी माँ है। लेकिन जिस स्त्री को तुमने उस रात आईने में देखा था, वह भी तुम्हें अपनी बेटी कहती है।”
मीरा ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “दोनों में से कौन सच है?”
नीलकंठ ने उत्तर दिया—
“यह फैसला तुम्हें करना होगा।”
7. 1947 से बाहर निकलने का रास्ता
कमरे की घड़ियों में अचानक टिक-टिक शुरू हो गई।
पहले दीवार वाली घड़ी चली।
फिर मेज वाली।
और अंत में बिस्तर के सिरहाने वाली।
नीलकंठ ने तेजी से अपनी फाइल उठाई।
“अब तुम्हें जाना होगा।”
अर्जुन ने पूछा, “कहाँ?”
“जहाँ से तुम आए थे।”
“शर्मा निवास?”
“हाँ।”
“वहाँ दो अर्जुन हैं।”
“इसीलिए तुम्हें जल्दी करनी होगी।”
अर्जुन ने पूछा, “हम वापस कैसे जाएँगे?”
नीलकंठ ने दरवाज़े की ओर इशारा किया।
अब वहाँ अस्पताल का गलियारा था।
दीवारों पर सफेद रंग था। दूर एक खिड़की से सुबह की रोशनी आ रही थी।
अर्जुन ने बाहर झाँका।
गलियारे के अंत में एक आदमी खड़ा था।
वह विक्रम जैसा दिखाई देता था।
उसके हाथ में एक पुरानी घड़ी थी।
अर्जुन ने उसे देखते ही कहा, “पिताजी?”
आदमी ने सिर उठाया।
उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।
वह विक्रम नहीं था।
वह अर्जुन था।
लेकिन उसके चेहरे पर कोई उम्र नहीं थी। न वह बच्चा था, न जवान, न बूढ़ा।
उसने अर्जुन को देखकर कहा—
“तुमने बहुत देर लगा दी।”
अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”
आदमी ने अपनी जेब से एक कागज़ निकाला।
“मैं वह हूँ, जिसे तुमने जन्म से पहले खो दिया था।”
अर्जुन उसके पास गया।
“क्या तुम अर्णव हो?”
आदमी ने सिर हिलाया।
“अर्णव वह नाम है, जो मुझे दिया गया था।”
“तो तुम्हारा असली नाम क्या है?”
आदमी ने कागज़ अर्जुन को थमा दिया।
उस पर एक ही शब्द लिखा था—
अभय।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन अभय तो…”
“किसने कहा कि अभय कभी पैदा हुआ था?”
“नीलकंठ के रिकॉर्ड में…”
“नीलकंठ ने तुम्हें जो दिखाया, वह एक रिकॉर्ड था। सच नहीं।”
आदमी ने अपनी कलाई उठाई।
उस पर तीन काली लकीरें थीं।
“तुम्हारे पास कितनी हैं?”
अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।
तीन।
आदमी ने कहा, “मेरे पास चार थीं।”
उसने हाथ मोड़ा।
चौथी लकीर गायब हो गई।
“अब सिर्फ तीन हैं।”
अर्जुन ने पूछा, “तुमने क्या किया?”
“मैंने अपनी जगह वापस ले ली।”
“किससे?”
आदमी ने अर्जुन की तरफ देखा।
“तुमसे।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“तुम मेरी जगह नहीं ले सकते।”
“मैंने कभी तुम्हारी जगह नहीं ली। तुमने मेरी जगह ली थी।”
उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था।
सिर्फ थकान।
“तुम्हें दुनिया ने अर्जुन कहा। मुझे अर्णव। फिर किसी ने तुम्हें अभय कहा। किसी ने मुझे विक्रम। किसी ने मुझे ईशान। हर बार किसी एक को नाम मिला, दूसरे का नाम मिट गया।”
“तो तुम्हारा नाम क्या है?”
आदमी मुस्कराया।
“तुम्हें यह जानना जरूरी नहीं है।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन तुम मेरा नाम जान जाओगे, उसी दिन मुझे तुम्हारा नाम लेने का अधिकार मिल जाएगा।”
अर्जुन ने कुछ देर उसे देखा।
फिर उसने कहा, “मैं तुम्हें नाम नहीं दूँगा।”
आदमी की मुस्कान गायब हो गई।
“तो फिर तुम मुझे याद भी नहीं रखोगे?”
“मैं तुम्हें याद रखूँगा।”
“किस नाम से?”
अर्जुन ने उत्तर दिया—
“उस बच्चे के नाम से, जिसे किसी ने मरने नहीं दिया और जीने भी नहीं दिया।”
आदमी ने पहली बार आँखें बंद कर लीं।
उसके चेहरे पर ऐसा भाव आया, जैसे किसी ने वर्षों से बंद कमरे की खिड़की खोल दी हो।
कुछ क्षण बाद उसने सिर हिलाया।
“शायद यही काफी है।”
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसी पल अस्पताल का गलियारा काँपने लगा।
दीवारों से प्लास्टर झड़ने लगा।
दूर की खिड़की के बाहर रात दिखाई देने लगी।
नीलकंठ ने चिल्लाकर कहा, “हाथ मत छोड़ना!”
अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि अगर तुमने हाथ छोड़ा, तो तुम दोनों अलग-अलग समय में चले जाओगे!”
मीरा ने अर्जुन का दूसरा हाथ पकड़ लिया।
तीनों हाथ एक-दूसरे से जुड़े थे।
अचानक गलियारे के अंत में एक दरवाज़ा खुला।
उसके पार शर्मा निवास का आँगन दिखाई दे रहा था।
नीम का पेड़।
पुरानी दीवार।
बरामदे की सीढ़ियाँ।
और दरवाज़े के सामने खड़ा एक आदमी।
अर्जुन।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही काली आँखें।
वह मुस्कराया।
“आखिर तुम आ ही गए।”
अर्जुन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“अब तुमसे बात होगी।”
दूसरे अर्जुन ने सिर झुकाया।
“बात तो बहुत पहले हो जानी चाहिए थी।”
फिर उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।
उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।
वे मीरा जैसी थीं।
और उसकी आवाज़ राधा जैसी हो गई।
“बेटा, घर आ जाओ।”
अर्जुन का हाथ ढीला पड़ गया।
दरवाज़े के उस पार खड़ी स्त्री ने उसे पुकारा—
“अर्णव।”
फिर—
“अभय।”
फिर—
“विक्रम।”
और अंत में उसने एक ऐसा नाम लिया, जिसे सुनते ही अर्जुन के भीतर कुछ टूट गया।
“मेरे पहले बच्चे।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
मीरा के चेहरे पर भय था।
क्योंकि उसने वह नाम भी सुना था।
और वह जानती थी कि वह नाम अर्जुन का नहीं था।
वह नाम उस बच्चे का था, जिसे राधा ने 1947 में जन्म दिया था।
उस बच्चे का, जिसकी मृत्यु उसी दिन लिख दी गई थी।
और जिसे डॉ. नीलकंठ ने अपनी फाइलों में शिशु संख्या शून्य कहा था।
दरवाज़े के पार खड़े दूसरे अर्जुन ने हाथ बढ़ाया।
“आ जाओ।”
अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”
दूसरे अर्जुन ने मुस्कराकर उत्तर दिया—
“मैं वह हूँ, जिसे तुमने अपने जन्म का नाम दे दिया था।”
और फिर उसने वह नाम लिया।
“विक्रम।”
अस्पताल की सभी घड़ियाँ एक साथ रुक गईं।
नीलकंठ के हाथ से फाइल गिर गई।
मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़कर चिल्लाया—
“नहीं! यह नाम मत मानना!”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
अर्जुन के होंठ हिले।
उसने अनजाने में कहा—
“पिताजी?”
दूसरे अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
“हाँ, बेटा।”
उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
“अब तुम मुझे पहचानते हो।”
अगले ही पल अस्पताल का दरवाज़ा बंद हो गया।
और 1947 का कमरा अँधेरे में डूब गया।
8. घर में कौन लौटा?
जब अर्जुन ने आँखें खोलीं, वह शर्मा निवास के आँगन में पड़ा था।
बारिश हो रही थी।
नीम के पत्तों से पानी टपक रहा था।
दीवार की घड़ी 3:13 दिखा रही थी।
मीरा उसके पास बैठी थी।
उसके चेहरे पर खून की पतली लकीर थी।
“मीरा!”
अर्जुन उठकर बैठ गया।
“तुम ठीक हो?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“तुम वापस आ गए।”
“हम दोनों वापस आ गए?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में संदेह था।
“मुझे नहीं पता।”
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
मुख्य दरवाज़ा बंद था।
बैठक की खिड़की खुली थी।
बरामदे में कोई नहीं था।
“दूसरा अर्जुन कहाँ है?”
मीरा ने घर की तरफ इशारा किया।
“अंदर।”
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“तुमने उसे देखा?”
“हाँ।”
“वह क्या कर रहा है?”
मीरा ने उत्तर देने से पहले कुछ पल इंतजार किया।
“वह तुम्हारे कमरे में बैठा है।”
अर्जुन ने उठने की कोशिश की।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम अंदर नहीं जाओगे।”
“मुझे उससे बात करनी है।”
“वह तुम्हें पहचानता है।”
“तो अच्छा है।”
“नहीं, अर्जुन। वह तुम्हें तुमसे बेहतर पहचानता है।”
अर्जुन ने अपना हाथ छुड़ाया।
“मैं यह जानना चाहता हूँ कि वह कौन है।”
मीरा ने कहा, “अगर वह सचमुच तुम्हारा ही कोई रूप है, तो क्या तुम तैयार हो यह सुनने के लिए कि असली अर्जुन वह है?”
अर्जुन चुप हो गया।
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“और अगर वह कहे कि असली अर्जुन तुम नहीं हो?”
कुछ क्षण बाद अर्जुन ने कहा, “तब भी मैं उससे पूछूँगा कि उसने मेरे साथ क्या किया।”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“ठीक है। लेकिन एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“अगर वह तुम्हें तुम्हारे बचपन की कोई ऐसी बात बताए, जो तुम्हें याद नहीं है, तो तुरंत विश्वास मत करना। और अगर वह तुम्हें किसी ऐसे नाम से पुकारे, जिसे तुमने कभी सुना नहीं, तो जवाब मत देना।”
अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”
मीरा ने उसकी कलाई पकड़ ली।
तीन काली लकीरों के नीचे अब एक हल्की चौथी लकीर दिखाई दे रही थी।
“क्योंकि तुम जब भी किसी नाम का जवाब देते हो, तुम्हारे भीतर कोई दरवाज़ा खुलता है।”
अर्जुन ने अपनी कलाई को देखा।
चौथी लकीर धीरे-धीरे गहरी हो रही थी।
“यह क्या है?”
मीरा ने कहा, “मुझे नहीं पता।”
तभी घर के भीतर से अर्जुन की आवाज़ आई।
“मीरा?”
दोनों ने सिर उठाया।
“मीरा, अंदर आओ। मुझे तुमसे कुछ पूछना है।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
अर्जुन ने पूछा, “उसने तुम्हें क्या बताया था?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
भीतर से आवाज़ फिर आई।
“मीरा, तुम जानती हो कि 2008 में दरवाज़ा किसने बंद किया था।”
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
अर्जुन ने धीरे से पूछा, “क्या वह तुमसे बात कर रहा था?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“उसने क्या कहा?”
मीरा की आवाज़ काँपने लगी।
“उसने कहा कि वह जानता है कि उस रात मैंने किसे बाहर आने दिया था।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुमने किसे बाहर आने दिया था?”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
“मुझे याद नहीं।”
भीतर से आवाज़ आई—
“तुम्हें याद है, मीरा।”
फिर एक लंबी चुप्पी।
और उसके बाद—
“तुमने मुझे बाहर आने दिया था।”
मीरा के हाथ काँपने लगे।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम साथ अंदर जाएँगे।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं। तुम जाओ।”
“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
“अर्जुन, अगर मैं तुम्हारे साथ गई, तो वह मुझे पहचान लेगा।”
“वह तुम्हें पहले से जानता है।”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“नहीं। वह मुझे उस नाम से जानता है, जो मैंने उसे दिया था।”
अर्जुन कुछ समझ पाता, उससे पहले मीरा ने अपनी कलाई पर बँधी चाँदी की घंटी उतारकर उसे दे दी।
“अगर तुम्हें लगे कि तुम खुद को भूलने लगे हो, तो इसे बजा देना।”
“और अगर तुम खुद को भूलने लगीं?”
मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“तब मुझे मेरे असली नाम से पुकारना।”
“तुम्हारा असली नाम मीरा ही है।”
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे उम्मीद है कि तुम सही हो।”
वह आँगन में पीछे हट गई।
अर्जुन ने घर का दरवाज़ा खोला।
बैठक खाली थी।
सीढ़ियाँ अँधेरे में डूबी थीं।
उसके कमरे का दरवाज़ा खुला था।
भीतर एक आदमी कुर्सी पर बैठा था।
उसकी पीठ दरवाज़े की तरफ थी।
अर्जुन ने कहा, “कौन हो तुम?”
आदमी ने उत्तर दिया, “तुम्हें सच में नहीं पता?”
“नहीं।”
आदमी ने धीरे-धीरे कुर्सी घुमाई।
वह अर्जुन जैसा दिखता था।
लेकिन उसकी आँखों में अब काला रंग नहीं था।
उनमें एक अजीब-सी थकान थी।
उसने अर्जुन की ओर देखकर कहा—
“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारी जगह मरना स्वीकार किया था।”
अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
आदमी मुस्कराया।
“तुम्हारी माँ ने मुझे जिस नाम से पुकारा था, वही मेरा नाम है।”
“कौन-सा नाम?”
आदमी ने अपना सिर थोड़ा झुकाया।
फिर उसने कहा—
“विक्रम।”
अर्जुन के भीतर कुछ काँपा।
“तुम मेरे पिता हो?”
विक्रम ने कुछ देर उसे देखा।
फिर धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
अर्जुन ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी विक्रम ने अगला वाक्य कहा—
“और तुम मेरे पिता हो।”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
विक्रम ने मेज पर रखी एक पुरानी तस्वीर उसकी ओर बढ़ाई।
तस्वीर में वही दो आदमी खड़े थे।
एक जवान।
एक बूढ़ा।
दोनों का चेहरा अर्जुन जैसा था।
तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
12 मार्च 1947।
नीचे एक पंक्ति थी—
“पिता ने बेटे को जन्म दिया। बेटे ने पिता को नाम दिया। और दोनों ने मिलकर तीसरे को मार दिया।”
अर्जुन ने तस्वीर गिरा दी।
विक्रम ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
“बैठो, बेटा।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“मुझे तुम पर विश्वास नहीं है।”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“अच्छा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तुम मुझ पर विश्वास कर लेते, तो तुम्हें कभी पता नहीं चलता कि तुम्हारे पिता की मृत्यु कब हुई थी।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“मेरे पिता की मृत्यु 2013 में हुई थी।”
विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।
“नहीं, अर्जुन।”
फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम्हारे पिता की मृत्यु 1947 में हुई थी।”
कमरे की घड़ी 3:14 पर पहुँच गई।
अर्जुन ने पहली बार उसे चलते हुए देखा।
और घड़ी की सुइयों के साथ-साथ उसकी कलाई की चौथी काली लकीर भी आगे बढ़ने लगी।
एपिसोड 24 समाप्त।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 24 of 30
- Category
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- Reading time
- 33 min
- Words
- 6557
- Language
- Hindi (हिंदी)
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