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एपिसोड 23: नीलकंठ का घर

firoj saifi · Ghost Stories · 35 मिनट

1. तीसरी आवाज़
“पापा?”
आवाज़ इतनी धीमी थी कि अर्जुन को पहले लगा, शायद यह शब्द उसके अपने मन में पैदा हुआ है।
लेकिन फिर वही आवाज़ दोबारा आई।
“पापा… दरवाज़ा खोलो।”
शर्मा निवास के भीतर अँधेरा था। बाहर बारिश की बूँदें खिड़कियों पर गिर रही थीं। बैठक की दीवार पर लगी घड़ी की सुइयाँ 3 बजकर 12 मिनट पर अटकी थीं।
अर्जुन के दाएँ हाथ में मीरा की उँगलियाँ थीं।
बाएँ हाथ में एक छोटे बच्चे का हाथ।
दोनों हाथ ठंडे थे। इतने ठंडे, जैसे किसी ने उन्हें बर्फ के भीतर रखकर बाहर निकाला हो।
मीरा ने धीरे से पूछा, “अर्जुन… तुमने भी सुना?”
“हाँ।”
“यह आवाज़ किसकी थी?”
अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि आवाज़ उसकी अपनी थी।
बाहर से कोई उसे उसी आवाज़ में पुकार रहा था, जिसमें वह खुद बोलता था। वही उतार-चढ़ाव, वही साँसों के बीच का छोटा-सा विराम, वही आदत कि किसी शब्द के अंत में उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी पड़ जाती थी।
“पापा…”
इस बार आवाज़ के साथ दरवाज़े पर तीन दस्तकें हुईं।
ठक।
ठक।
ठक।
मीरा ने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“दरवाज़ा मत खोलना।”
“मैं खोल नहीं रहा।”
“तुम्हारा हाथ दरवाज़े की तरफ जा रहा है।”
अर्जुन ने नीचे देखा।
उसका दायाँ हाथ, जिसमें मीरा की उँगलियाँ थीं, बिल्कुल स्थिर था।
लेकिन बायाँ हाथ आगे बढ़ रहा था।
बच्चे की छोटी उँगलियाँ उसकी हथेली में धँसी हुई थीं। वह बच्चा दिखाई नहीं दे रहा था, फिर भी उसका स्पर्श मौजूद था। अर्जुन ने पूरी ताकत से अपना हाथ पीछे खींचा।
एक पल के लिए उसकी हथेली में दर्द उठा।
फिर छोटे हाथ की पकड़ छूट गई।
दरवाज़े के बाहर से हँसी सुनाई दी।
बिल्कुल बच्चे जैसी।
“आपने मुझे फिर छोड़ दिया।”
अर्जुन का दिल धक से रह गया।
उसने अँधेरे में कहा, “तुम कौन हो?”
जवाब आया, “तुम्हें यह सवाल मुझसे नहीं पूछना चाहिए।”
“किससे पूछूँ?”
“उस आदमी से, जिसने मुझे नाम दिया था।”
“डॉ. नीलकंठ?”
कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर आवाज़ ने कहा, “वह आदमी मुझे नाम देने वाला पहला व्यक्ति नहीं था।”
“तो कौन था?”
दरवाज़े के दूसरी ओर किसी ने अपनी उँगली से लकड़ी पर कुछ लिखना शुरू किया।
खर्र…
खर्र…
खर्र…
अर्जुन और मीरा दरवाज़े के पास पहुँचे, लेकिन उसे छुआ नहीं।
लिखने की आवाज़ रुक गई।
फिर बाहर से कहा गया, “बारह मार्च, उन्नीस सौ सैंतालीस।”
मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन को याद आया कि नीलकंठ के पुराने घर से जुड़ी तस्वीर के पीछे यही तारीख लिखी थी।
12 मार्च 1947।
वह तारीख उसके जन्म से लगभग अड़तालीस साल पहले की थी।
दरवाज़े के नीचे से एक पतली काली लकीर भीतर आई।

वह स्याही जैसी दिखती थी, लेकिन फर्श पर पहुँचते ही उसने एक आकृति बना ली।

तीन सीधी लकीरें।

फिर उनके नीचे एक नाम उभरा।

अर्जुन।

उसके ठीक नीचे दूसरा नाम लिखा गया।

विक्रम।

और तीसरा नाम लिखने से पहले ही सारी रोशनी बुझ गई।

अँधेरे में किसी बच्चे ने फुसफुसाकर कहा—

“अब तुम जानते हो कि मुझे कहाँ ढूँढ़ना है।”

अगले ही पल दरवाज़े पर लगी घंटी अपने आप बज उठी।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

और जब अर्जुन ने दोबारा घड़ी की तरफ देखा, तो सुइयाँ 3:13 पर पहुँच चुकी थीं।

लेकिन इस बार घड़ी रुकी नहीं।

उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में चलने लगीं।
2. देवगढ़ का पुराना मोहल्ला
सुबह होने पर शर्मा निवास सामान्य दिखाई देने लगा।

रात की बारिश थम चुकी थी। आँगन में पानी जमा था और नीम के पेड़ से बूँदें गिर रही थीं। दीवार पर लगी घड़ी फिर सही समय दिखा रही थी।

अगर अर्जुन और मीरा ने रात की घटनाएँ अपनी आँखों से न देखी होतीं, तो शायद वे भी मान लेते कि सब किसी बुरे सपने का हिस्सा था।

लेकिन दरवाज़े के नीचे की काली लकीर अब भी मौजूद थी।

वह फर्श पर सूख चुकी थी।

अर्जुन ने उसे कपड़े से साफ करने की कोशिश की। दाग हल्का हुआ, मगर पूरी तरह नहीं मिटा।

मीरा ने कहा, “इसे रहने दो।”

“क्यों?”

“क्योंकि यह सिर्फ स्याही नहीं है।”

“तो क्या है?”

मीरा ने दाग को देखा।

“यह किसी ऐसी चीज़ का निशान है, जो हमारे घर के भीतर आना चाहती है।”

अर्जुन ने थके हुए स्वर में कहा, “वह तो पिछले पंद्रह साल से यही कर रही है।”

“नहीं। पहले वह घर में आना चाहती थी। अब उसे घर की जरूरत नहीं है।”

अर्जुन उसकी ओर मुड़ा।

“मतलब?”

मीरा ने उत्तर देने के बजाय अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।

यह कागज़ उसे पिछली रात नीलकंठ के रिकॉर्ड वाले कमरे में मिला था। उस पर एक पुराने पते का उल्लेख था—

डॉ. नीलकंठ प्रसाद, पुराना देवगढ़, कुएँ वाली गली, मकान नंबर 13।

पते के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

“यह घर मरीजों के लिए नहीं है। यहाँ केवल वे लोग आएँ, जिनका जन्म किसी दूसरे की याद में हुआ हो।”

अर्जुन ने पर्ची पलटी।

पीछे एक छोटा-सा वाक्य था।

“जिस बच्चे को पिता की जरूरत हो, वह दरवाज़े पर दस्तक देगा। जिस पिता को बच्चे की जरूरत हो, वह खिड़की से भीतर आएगा।”

अर्जुन ने कुछ देर उस वाक्य को देखा।

“क्या तुम्हें लगता है, हमें वहाँ जाना चाहिए?”

मीरा ने उसकी ओर देखा।

“मुझे लगता है कि वह जगह हमें पहले से जानती है।”

“तुम वहाँ पहले गई हो?”

“नहीं।”

“फिर तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है?”

मीरा ने धीरे से कहा, “क्योंकि मैंने यह पता पहले भी देखा है।”

“कहाँ?”

उसने अपनी कनपटी पर हाथ रखा।

“याद नहीं। लेकिन जब मैंने यह गली पढ़ी, तो मुझे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। किसी औरत की। वह किसी बच्चे को पुकार रही थी।”

“क्या नाम ले रही थी?”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ पल तक वह चुप रही।

फिर उसके होंठ काँपे।

“वह नाम नहीं ले रही थी, अर्जुन।”

“तो?”

“वह बार-बार कह रही थी—मेरा बच्चा मुझे वापस दे दो।”

अर्जुन के भीतर कुछ कस गया।

उसे अस्पताल के उस कमरे की याद आई, जहाँ तीन पालने रखे थे। एक में बच्चा सो रहा था। दूसरे से रोने की आवाज़ आ रही थी। तीसरा खाली था, मगर उसकी परछाईं मौजूद थी।

और वह स्त्री…

जिसका चेहरा राधा जैसा था, लेकिन आवाज़ राधा की नहीं थी।

अर्जुन ने पर्ची मोड़ी और जेब में रख ली।

“चलो।”

मीरा ने पूछा, “अभी?”

“हाँ।”

“तुम्हें डर नहीं लगता कि वहाँ हमें वही मिलेगा, जिसे हम ढूँढ़ रहे हैं?”

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“डर इसी बात का है कि कहीं वह हमें ढूँढ़ता हुआ वहाँ पहले से न बैठा हो।”

वे सुबह साढ़े नौ बजे घर से निकले।

देवगढ़ की मुख्य सड़क पर दुकानें खुल रही थीं। दूधवाले साइकिलों पर निकल रहे थे। मंदिर के बाहर फूल बेचने वाली बूढ़ी औरत अपने टोकरे सजा रही थी।

सब कुछ सामान्य था।

लेकिन अर्जुन को बार-बार ऐसा लग रहा था कि लोग उसे पहचानते हैं।

एक चायवाले ने उसे देखते ही पूछा, “बाबूजी, वापस आ गए?”

अर्जुन रुक गया।

“आप मुझे जानते हैं?”

चायवाले ने चाय छानते हुए कहा, “आपको कौन नहीं जानता?”

“मेरा मतलब, आपने मुझे पहले कहाँ देखा है?”

चायवाला मुस्कराया।

“यहीं तो रहते थे आप।”

“मैं पंद्रह साल पहले देवगढ़ छोड़कर चला गया था।”

चायवाले का हाथ रुक गया।

उसने पहली बार अर्जुन के चेहरे को ध्यान से देखा।

“पंद्रह साल?”

“हाँ।”

चायवाले ने कुछ क्षण बाद सिर हिलाया।

“अजीब बात है।”

“क्या?”

“आप तो कल भी आए थे।”

अर्जुन के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

मीरा तुरंत आगे आई।

“कल?”

“हाँ, बहनजी। यही साहब। सुबह दुकान खुलने से पहले आए थे। चाय नहीं पी। बस पूछा था कि कुएँ वाली गली किधर है।”

अर्जुन ने कहा, “वह मैं नहीं था।”

चायवाले ने हँसने की कोशिश की।

“चेहरा तो बिल्कुल आपका था।”

“उसने कुछ और कहा था?”

चायवाले ने सोचते हुए माथा खुजलाया।

“हाँ। जाते-जाते बोला था कि अगर कोई दूसरा अर्जुन आए, तो उसे कहना कि नीलकंठ का घर खाली नहीं है।”

मीरा की उँगलियाँ काँपने लगीं।

अर्जुन ने पूछा, “उसने किस दिशा में जाते देखा?”

चायवाले ने पुराने बाजार की ओर इशारा किया।

“कुएँ वाली गली।”

अर्जुन ने मीरा को देखा।

दोनों ने एक साथ सड़क की ओर कदम बढ़ाए।

पीछे से चायवाले की आवाज़ आई।

“साहब!”

अर्जुन पलटा।

“एक बात और।”

“क्या?”

चायवाले ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “वह आदमी आपसे थोड़ा अलग था।”

“कैसे?”

“उसकी परछाईं नहीं थी।”
3. मकान नंबर तेरह
कुएँ वाली गली देवगढ़ के उस हिस्से में थी, जहाँ नई सड़कें और बिजली के खंभे अब भी ठीक से नहीं पहुँचे थे।

गली के दोनों ओर पुराने मकान थे। कुछ की दीवारों पर काई जमी थी। कुछ के दरवाज़े ईंटों से बंद कर दिए गए थे। कई घरों की खिड़कियों पर लकड़ी के पटरे लगे थे, जैसे उनके भीतर रहने वाले लोग वर्षों पहले कहीं चले गए हों।

गली के अंत में एक पुराना कुआँ था।

उसके चारों ओर लोहे की जाली लगी थी।

जाली पर ताला लटका था, लेकिन ताले में जंग नहीं थी।

अर्जुन ने कुएँ को देखते हुए कहा, “यह वही कुआँ है?”

मीरा ने पूछा, “कौन-सा?”

“जिसके बारे में पिताजी ने बताया था। जहाँ पानी नहीं है, सिर्फ कुछ इंतजार कर रहा है।”

मीरा ने कुएँ के भीतर झाँकने की कोशिश नहीं की।

“हमें नीचे नहीं देखना चाहिए।”

“मैं देख भी नहीं रहा।”

“तुम्हारी आँखें उसी तरफ जा रही हैं।”

अर्जुन ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

गली के आखिरी मकान पर पीतल की एक छोटी पट्टी लगी थी।

13 — डॉ. नीलकंठ प्रसाद।

पट्टी इतनी पुरानी थी कि अक्षरों के आसपास हरा रंग जम गया था। लेकिन नाम के नीचे किसी ने हाल ही में नुकीली चीज़ से एक पंक्ति खुरची थी।

“पहला पिता।”

अर्जुन ने दरवाज़ा खटखटाया।

कोई जवाब नहीं आया।

उसने दोबारा दस्तक दी।

इस बार भीतर से किसी भारी वस्तु के घिसटने की आवाज़ सुनाई दी।

मीरा पीछे हट गई।

“अर्जुन, हमें लौट जाना चाहिए।”

“तुमने कहा था, यह जगह हमें पहले से जानती है।”

“मैंने यह भी नहीं कहा था कि हमें भीतर जाना चाहिए।”

अर्जुन ने तीसरी बार दस्तक दी।

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

भीतर एक लंबा गलियारा था। छत पर जाले लटक रहे थे। दीवारों पर धूल की मोटी परत जमी थी। फर्श पर सूखे पत्ते बिखरे थे, जबकि बाहर से हवा आने का कोई रास्ता नहीं था।

अर्जुन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

गलियारे के अंत में एक लकड़ी की मेज रखी थी। मेज पर काँच का गिलास था, जिसमें आधा पानी भरा हुआ था।

पानी की सतह पर एक पत्ता तैर रहा था।

अर्जुन ने ध्यान से देखा।

वह पत्ता हरा था।

जबकि उस घर में कोई पौधा नहीं था।

“कोई यहाँ रहता है,” उसने कहा।

मीरा ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, “या कोई चाहता है कि हमें ऐसा लगे।”

वे गलियारे में आगे बढ़े।

दीवार पर लगे पहले दरवाज़े के पीछे एक छोटा कमरा था। उसमें टूटी कुर्सियाँ और पुराने चिकित्सा उपकरण रखे थे। एक कोने में लकड़ी की अलमारी थी, जिसके भीतर शीशियों पर धूल जमी थी।

दूसरे कमरे में बिस्तर था।

उसके सिरहाने दीवार पर तारीखें लिखी थीं।

12 मार्च 1947।

17 जुलाई 1953।

17 जुलाई 1995।

17 जुलाई 2008।

17 जुलाई 2013।

और सबसे नीचे—

17 जुलाई 2023।

हर तारीख के सामने एक ही समय लिखा था।

3:13।

अर्जुन ने आखिरी तारीख को छुआ।

दीवार का प्लास्टर उसके स्पर्श से झड़ गया।

नीचे कुछ अक्षर उभरे।

“जिस दिन घर अपने मालिक को पहचानेगा, उसी दिन घर का असली मालिक मरेगा।”

मीरा ने उसका हाथ खींच लिया।

“इसे मत छुओ।”

“यहाँ मेरी दादी की मौत की तारीख लिखी है।”

“और उससे पहले तुम्हारे पिता की। उससे पहले तुम्हारी जन्मतिथि। और उससे पहले…”

“1947।”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हारे जन्म से बहुत पहले।”

अर्जुन ने दीवार से हाथ हटा लिया।

गलियारे के अंत में एक बड़ा दरवाज़ा था। उसके ऊपर कोई नाम नहीं लिखा था। केवल लकड़ी पर तीन गहरी लकीरें खींची गई थीं।

अर्जुन ने दरवाज़े को धक्का दिया।

वह नहीं खुला।

मीरा ने नीचे देखा।

दरवाज़े के सामने धूल में किसी ने उँगली से एक वाक्य लिखा था—

“जिसे तुम पिता कहते हो, वह भीतर नहीं है।”

अर्जुन ने कहा, “तो भीतर कौन है?”

पीछे से किसी ने उत्तर दिया—

“जिसे तुमने कभी बेटा नहीं कहा।”

दोनों पलटे।

गलियारा खाली था।

लेकिन मेज पर रखा पानी का गिलास अब पूरी तरह खाली था।

उसमें तैरने वाला हरा पत्ता गायब हो चुका था।
4. तस्वीरों का कमरा
तीन लकीरों वाले दरवाज़े के बगल में दीवार पर एक छोटा-सा धातु का ताला लगा था।

अर्जुन ने जेब से पिछली रात मिला धातु का टुकड़ा निकाला। उसका आकार ताले की चाबी जैसा था।

मीरा ने उसे रोकना चाहा।

“सोच लो।”

“किस बारे में?”

“अगर इस दरवाज़े के पीछे वही है, जो हमें लगता है, तो उसके पास हमारे सारे सवालों के जवाब हो सकते हैं।”

“और अगर उसके पास जवाबों की जगह नए सवाल हुए?”

मीरा ने फीकी मुस्कान दी।

“तब हम वही करेंगे जो पिछले पंद्रह साल से कर रहे हैं।”

“क्या?”

“भागने की कोशिश।”

अर्जुन ने धातु का टुकड़ा ताले में डाल दिया।

ताला खुल गया।

दरवाज़ा चरमराता हुआ भीतर की ओर खुला।

कमरे में कदम रखते ही अर्जुन को एक अजीब गंध महसूस हुई। पुराने कागज़, बंद अलमारी और गीली मिट्टी की मिली-जुली गंध।

कमरा बाहर से जितना छोटा लगता था, भीतर उतना ही बड़ा था।

दीवारों पर तस्वीरें लगी थीं।

सैकड़ों तस्वीरें।

कुछ काले-सफेद, कुछ पुराने रंगीन कैमरे से खींची गईं, और कुछ इतनी नई कि उनमें लोगों के कपड़ों की सिलवटें तक दिखाई दे रही थीं।

पहली तस्वीर में एक बूढ़ा आदमी एक छोटे बच्चे को गोद में लिए बैठा था। बच्चे का चेहरा धुँधला था।

दूसरी तस्वीर में एक औरत बच्चे के माथे पर हाथ रखे हुए थी। उसके पीछे एक लंबा आदमी खड़ा था, जिसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

तीसरी तस्वीर में एक परिवार था—माँ, पिता और दो बच्चे। लेकिन परिवार के बीच खड़े एक आदमी की आँखें पूरी तरह काली थीं।

हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

और हर तस्वीर में कोई न कोई व्यक्ति उस बच्चे को देख रहा था, जैसे वह बच्चा उसकी जिंदगी का सबसे जरूरी हिस्सा हो।

मीरा धीरे-धीरे तस्वीरें देखने लगी।

“ये सभी बच्चे हैं?”

“नहीं,” अर्जुन ने कहा।

“तो?”

उसने एक तस्वीर के पास जाकर धूल साफ की।

तस्वीर में एक बच्चा पालने में लेटा था। उसके सिरहाने एक आदमी खड़ा था, जिसने अपने हाथ में कागज़ पकड़ा हुआ था। कागज़ पर लिखा था—

“मैं इसे अपना बेटा मानता हूँ।”

नीचे हस्ताक्षर थे।

डॉ. नीलकंठ प्रसाद।

अर्जुन ने अगली तस्वीर देखी।

उसमें वही आदमी था।

लेकिन इस बार वह बूढ़ा नहीं, लगभग तीस वर्ष का दिखाई दे रहा था।

उसके सामने एक छोटा बच्चा खड़ा था। बच्चे ने सफेद कपड़े पहने थे और उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

तस्वीर के पीछे लिखी तारीख थी—

12 मार्च 1947।

अर्जुन ने तस्वीर पलटी।

पीछे हाथ से लिखा था—

“पहली बार उसने मुझे पिता कहा।”

मीरा ने धीरे से पूछा, “क्या डॉ. नीलकंठ ने किसी बच्चे को गोद लिया था?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

वह दूसरी तस्वीर के सामने खड़ा था।

उस तस्वीर में नीलकंठ एक किशोर के साथ खड़ा था। किशोर का चेहरा अर्जुन से मिलता-जुलता था।

बहुत ज्यादा।

इतना कि पहली नजर में लगता था, अर्जुन की ही पुरानी तस्वीर है।

लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख थी—

17 जुलाई 1953।

अर्जुन ने तस्वीर नीचे कर ली।

“यह मैं नहीं हूँ।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने कुछ कहा?”

“तुम्हारी आँखें कह रही थीं।”

“अर्जुन, तस्वीर में तुम्हारे जैसे दिखने वाले लोग हो सकते हैं।”

“1947 में भी?”

मीरा चुप हो गई।

अर्जुन ने तस्वीर को दोबारा देखा। उसमें खड़े किशोर के बाएँ हाथ पर तीन काली लकीरें थीं।

लेकिन उसके दाएँ हाथ पर भी वैसी ही लकीरें थीं।

कुल छह।

तस्वीर के नीचे नीलकंठ की लिखावट में लिखा था—

“यह बच्चा मुझे पिता कहता है, लेकिन इसकी उम्र कभी आगे नहीं बढ़ती। इसे हर साल जन्मदिन याद रहता है। इसे अपना जन्म याद नहीं।”

मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “यह वही आदमी है जो कल रात तुम्हारे घर आया था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि मैंने उसके चेहरे पर वही उम्र देखी थी। वह बूढ़ा भी था और बच्चा भी।”

अर्जुन ने तस्वीर को सावधानी से दीवार पर वापस लगा दिया।

कमरे में आगे बढ़ते हुए उन्हें एक लंबी मेज दिखाई दी। उस पर तस्वीरों के ढेर रखे थे। हर ढेर के ऊपर एक नाम लिखा था।

विक्रम।

नीलकंठ।

अभय।

अर्णव।

ईशान।

अर्जुन।

अर्जुन ने अपने नाम वाला ढेर उठाया।

उसमें कम से कम पचास तस्वीरें थीं।

पहली तस्वीर में वह एक नवजात शिशु था।

दूसरी में पाँच साल का बच्चा।

तीसरी में लगभग तेरह साल का लड़का।

चौथी में बीस वर्ष का युवक।

पाँचवीं में वर्तमान का अर्जुन।

लेकिन तस्वीरों की तारीखें गलत थीं।

जिस तस्वीर में वह पाँच साल का था, उसके पीछे 1947 लिखा था।

जिस तस्वीर में वह तेरह साल का था, उसके पीछे 1953।

और वर्तमान जैसी तस्वीर के पीछे लिखा था—

17 जुलाई 2013।

अर्जुन का गला सूख गया।

“यह कैसे संभव है?”

मीरा ने तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

“तुम्हारी उम्र 2013 में अठारह साल थी।”

“मैं जानता हूँ।”

“तो फिर यह तस्वीर किसकी है?”

तस्वीर में अर्जुन के चेहरे पर कोई चोट नहीं थी। उसकी आँखें खुली थीं और वह कैमरे की तरफ देख रहा था।

लेकिन उसके पीछे खड़े व्यक्ति का चेहरा विक्रम का था।

विक्रम ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा हुआ था।

तस्वीर के नीचे लिखा था—

“पिता ने बेटे को वापस पाया। बेटा यह नहीं जानता कि वह पहले मर चुका है।”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

उसे 2013 की वह रात याद नहीं थी।

वह सिर्फ इतना जानता था कि उसके पिता की मृत्यु हुई थी, फिर कुछ समय बाद वह खुद भी एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुआ था। परिवार ने हमेशा उस घटना के बारे में अधूरी बातें की थीं।

लेकिन क्या वह सचमुच मर गया था?

और अगर मर गया था, तो उसके बाद घर कौन लौटा था?

मीरा ने तस्वीर पलटी।

पीछे एक और पंक्ति थी, जो पहले दिखाई नहीं दी थी।

“जिसे वापस लाया गया, वह वही नहीं था जिसे खोया गया था।”

कमरे की छत से अचानक कुछ गिरा।

एक छोटी-सी तस्वीर।

वह अर्जुन के पैरों के पास आकर उलटी पड़ी।

उसने उसे उठाया।

तस्वीर में एक बूढ़ी औरत थी।

शारदा देवी।

उसके सामने एक छोटा बच्चा खड़ा था। बच्चे का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

अर्जुन ने तस्वीर को पलटा।

पीछे लिखा था—

“मैंने इसे घर में लाया। लेकिन इसे जन्म किसने दिया, यह आज तक नहीं जानती।”

नीचे शारदा के हस्ताक्षर थे।

और तारीख—

12 मार्च 1947।

अर्जुन ने धीरे से कहा, “दादी भी यहाँ आई थीं।”

मीरा ने तस्वीर छीनकर नहीं देखी। उसने सिर्फ अर्जुन का चेहरा देखा।

“अर्जुन, मुझे लगता है कि यह कमरा हमें सच नहीं दिखा रहा।”

“क्यों?”

“क्योंकि यहाँ हर तस्वीर में तुम हो। लेकिन हर तस्वीर में तुम्हारी उम्र अलग है। और किसी भी तस्वीर में तुम बूढ़े नहीं होते।”

अर्जुन ने तस्वीरों की दीवार की ओर देखा।

वह सही कह रही थी।

हर तस्वीर में बच्चा बड़ा होता दिखता था, फिर अचानक उसकी उम्र वापस घट जाती थी। किसी में वह शिशु था, किसी में किशोर, किसी में वयस्क। लेकिन कोई तस्वीर ऐसी नहीं थी जिसमें वह अपने चेहरे पर झुर्रियाँ लिए खड़ा हो।

सिवाय एक तस्वीर के।

वह कमरे के सबसे अँधेरे कोने में लगी थी।

उसमें एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसके बाल सफेद थे। चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं और आँखों के नीचे काले घेरे थे।

उसके सामने एक खाली कुर्सी थी।

बूढ़े के हाथ में एक कागज़ था।

अर्जुन तस्वीर के करीब गया।

बूढ़े का चेहरा देखकर उसकी साँस अटक गई।

वह अर्जुन था।

लेकिन तस्वीर के नीचे की तारीख आज से लगभग पचास साल आगे की थी।

17 जुलाई 2073।

मीरा ने काँपते स्वर में पूछा, “यह तुम हो?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

“जब वह बूढ़ा होगा, तब भी उसे अपना बचपन याद नहीं होगा।”

उसके नीचे दूसरी लिखावट थी।

यह लिखावट नीलकंठ की नहीं थी।

“उसे बूढ़ा होने मत देना। बूढ़ा अर्जुन दरवाज़ा खोल देगा।”

अर्जुन ने तस्वीर दीवार से उतारने के लिए हाथ बढ़ाया।

तभी कमरे में एक घंटी बजी।

टन्न…

टन्न…

टन्न…

तस्वीरें दीवार पर हिलने लगीं।

कुछ के काँच टूट गए। कुछ के भीतर के चेहरे अचानक कैमरे की ओर मुड़ गए।

मीरा ने अर्जुन को पीछे खींचा।

“बाहर चलो!”

लेकिन अर्जुन की नजर सामने की दीवार पर टिक गई थी।

वहाँ एक नई तस्वीर उभर रही थी।

धीरे-धीरे।

जैसे किसी ने दीवार के भीतर से कागज़ को बाहर धकेला हो।

तस्वीर में अर्जुन खड़ा था।

उसके बगल में मीरा थी।

उनके पीछे डॉ. नीलकंठ खड़ा था।

और उनके सामने एक बच्चा था, जिसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

बच्चे के हाथ में एक छोटा-सा बोर्ड था।

बोर्ड पर लिखा था—

“पिता कौन है?”

तस्वीर के नीचे तारीख थी—

आज।

अर्जुन ने अपना मोबाइल निकाला।

तारीख सचमुच 17 अक्टूबर 2026 थी।

वह तस्वीर आज की थी।

लेकिन तस्वीर में वे तीनों उसी कमरे में खड़े थे।

जिस कमरे में वे अभी मौजूद थे।

अर्जुन ने सिर उठाकर सामने देखा।

कमरा खाली था।

तस्वीर में मौजूद नीलकंठ वहाँ नहीं था।

बच्चा भी नहीं था।

लेकिन तस्वीर में मीरा की आँखें काली थीं।

और तस्वीर वाला अर्जुन मुस्करा रहा था।

जबकि असली अर्जुन के चेहरे पर डर था।
5. वह आदमी जो तस्वीरों में नहीं बदलता था
कमरे के दूसरे छोर पर एक संकरा दरवाज़ा था, जिसे पर्दे से ढका गया था।

पर्दा बाकी घर की तरह धूल से भरा नहीं था। वह साफ था, जैसे किसी ने कुछ देर पहले ही उसे छुआ हो।

मीरा ने कहा, “वहाँ मत जाना।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हें हर दरवाज़े से डर क्यों लगता है?”

“क्योंकि हर बार जब हम कोई दरवाज़ा खोलते हैं, कोई हमें पहचान लेता है।”

“शायद हमें भी किसी को पहचानना चाहिए।”

“और अगर पहचानने के बाद पता चले कि वह कभी हमारा था ही नहीं?”

अर्जुन ने पर्दा हटाया।

दरवाज़े के पीछे सीढ़ियाँ थीं।

वे नीचे नहीं, ऊपर जा रही थीं।

यह असंभव था, क्योंकि वे मकान की दूसरी मंज़िल पर थे और घर की छत उनसे ऊपर नहीं हो सकती थी। लेकिन सीढ़ियाँ ऊपर की ओर मुड़ती चली जा रही थीं।

उनके अंत में एक दरवाज़ा था।

दरवाज़े पर लिखा था—

कमरा 313।

मीरा पीछे हट गई।

“यहाँ भी?”

अर्जुन ने कहा, “शायद यह जगह हर जगह है।”

“नहीं,” मीरा ने धीरे से कहा, “शायद हम हर जगह उसी जगह पहुँच रहे हैं।”

सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उन्हें किसी के चलने की आवाज़ सुनाई देती रही।

कभी आगे।

कभी पीछे।

कभी ठीक उनके बीच।

अर्जुन ने दो बार मुड़कर देखा, लेकिन कोई नहीं था।

तीसरी बार जब उसने पीछे देखा, तो सीढ़ियों के सबसे नीचे एक आदमी खड़ा था।

उसका चेहरा नीलकंठ जैसा था।

लेकिन उसकी आँखें विक्रम की थीं।

और उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

अर्जुन रुक गया।

“तुम कौन हो?”

आदमी ने कहा, “तुमने मुझे बहुत नाम दिए हैं।”

“तुम्हारा असली नाम क्या है?”

“तुम्हें अपना नाम याद है?”

अर्जुन चुप रहा।

आदमी मुस्कराया।

“फिर मुझसे क्यों पूछते हो?”

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़कर आगे खींचा।

“उसकी बात मत सुनो।”

आदमी ने मीरा की ओर देखा।

“तुम्हें अब भी याद नहीं कि तुमने मुझे क्या कहा था?”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा।”

“सत्रह जुलाई, दो हज़ार आठ। तीसरी मंज़िल। जब तुम्हारी माँ आईने के सामने खड़ी थी।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

“तुमने मुझसे कहा था कि अगर मैं तुम्हारी माँ को वापस ले आऊँ, तो तुम मुझे भाई कहोगी।”

मीरा की साँस तेज हो गई।

“मैं बच्ची थी।”

“हाँ।”

“मुझे नहीं पता था कि तुम क्या हो।”

“तुमने फिर भी मेरा नाम लिया।”

अर्जुन ने बीच में कहा, “उसका नाम क्या है?”

आदमी ने उसकी तरफ देखा।

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

“तुम्हें याद नहीं?”

“नहीं।”

“तुमने ही तो उसे पहली बार पुकारा था।”

अर्जुन की कनपटियों में दर्द उठने लगा।

उसके सामने कुछ दृश्य चमके।

तीसरी मंज़िल का कमरा।

टूटा हुआ आईना।

फर्श पर बैठी मीरा।

एक औरत की चीख।

और एक बच्चा, जो अँधेरे में खड़ा था।

बच्चे ने उससे कहा था—

“मुझे कोई नाम दे दो।”

अर्जुन ने उस रात क्या कहा था?

वह याद करने की कोशिश करता रहा।

फिर अचानक उसके मुँह से एक नाम निकला।

“विक्रम…”

सीढ़ियों पर खड़ा आदमी मुस्कराया।

“नहीं।”

उसकी आवाज़ बदल गई।

अब वह डॉ. नीलकंठ की आवाज़ में बोल रहा था।

“यह नाम तुम्हें दिया गया था।”

फिर उसकी आवाज़ बदलकर शारदा देवी जैसी हो गई।

“यह नाम तुमसे छीन लिया गया था।”

फिर राधा की आवाज़ आई।

“यह नाम कभी तुम्हारा था ही नहीं।”

अंत में उसने अर्जुन की अपनी आवाज़ में कहा—

“मेरा नाम अर्जुन है।”

सीढ़ियों पर खड़ा आदमी कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर उसने सिर हिलाया।

“यह वह नाम है, जिसे तुमने सबसे आखिर में सीखा।”

उसने अपनी कलाई उठाई।

तीन काली लकीरें अचानक चार हो गईं।

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

आदमी ने कहा, “अब ऊपर जाओ। वहाँ वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है, जो तुम बनोगे।”

“कौन?”

“वह अर्जुन, जिसने कभी जन्म नहीं लिया।”

आदमी धीरे-धीरे अँधेरे में पीछे हटने लगा।

कुछ ही क्षणों में वह गायब हो गया।

मीरा ने अर्जुन को लगभग घसीटते हुए ऊपर पहुँचाया।

कमरा 313 का दरवाज़ा खुला हुआ था।

भीतर से किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी।
6. कमरा 313
कमरे के भीतर एक पुराना अस्पताल था।

कम से कम पहली नजर में तो ऐसा ही लगा।

दीवारों पर सफेद रंग था, लेकिन जगह-जगह से उखड़ चुका था। बीच में तीन पालने रखे थे। एक मेज पर चिकित्सा उपकरण बिखरे थे और एक कोने में पुराना टेलीफोन रखा था।

कमरे में कोई खिड़की नहीं थी।

फिर भी हवा चल रही थी।

पहले पालने में एक सफेद कपड़ा पड़ा था।

दूसरे में एक छोटा बच्चा सो रहा था।

तीसरा पालना खाली था।

लेकिन तीसरे पालने के नीचे एक परछाईं हिल रही थी।

अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं।”

“मुझे देखना होगा।”

“तुम हर बार यही कहते हो।”

“और हर बार हम कुछ न कुछ जान जाते हैं।”

“और हर बार कुछ खो भी देते हैं।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

मीरा की आँखों में आँसू थे।

“मैंने अपनी माँ खोई। फिर अपना बचपन। फिर तुम्हें। जब तुम लौटे, तो मुझे लगा कि शायद अब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन अब मुझे यह भी नहीं पता कि तुम वही अर्जुन हो या नहीं, जिसे मैं जानती थी।”

अर्जुन ने उसका हाथ दोनों हाथों में ले लिया।

“मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ।”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि तुम मेरी मीरा हो। तुमने मुझे बचाया है। तुमने मुझे रोका है। तुमने मुझसे झूठ भी बोले हैं, लेकिन हर बार किसी डर की वजह से। मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ पल बाद उसने सिर हिलाया।

“ठीक है। लेकिन अगर वहाँ कुछ ऐसा दिखे जो तुम्हें तुम्हारे बारे में बताए, तो तुरंत उस पर विश्वास मत करना।”

अर्जुन ने तीसरे पालने के नीचे देखा।

परछाईं धीरे-धीरे बाहर निकल रही थी।

पहले दो छोटे हाथ दिखाई दिए।

फिर सिर।

फिर एक बच्चा पालने के नीचे से रेंगकर बाहर आया।

वह लगभग पाँच साल का था।

उसके बाल काले थे और चेहरे पर धूल लगी थी। उसने पुराने ढंग के कपड़े पहने थे। उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

उसने अर्जुन को देखा और मुस्कराया।

“आप आ गए।”

अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने पूछा, “आप मुझे नहीं पहचानते?”

“नहीं।”

“आपने मुझे अपनी जगह छोड़ दिया था।”

“कहाँ?”

“वहीं, जहाँ आप पैदा हुए थे।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“तुम अभय हो?”

बच्चे की मुस्कान मिट गई।

“यह नाम किसने बताया?”

“नीलकंठ के रिकॉर्ड में…”

“रिकॉर्ड झूठ बोलते हैं।”

“तो तुम्हारा नाम अर्णव है?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“वह नाम भी किसी और का है।”

“ईशान?”

बच्चे ने हँस दिया।

“वह तो अभी पैदा भी नहीं हुआ।”

अर्जुन ने मीरा की ओर देखा।

वह भी बच्चे को देख रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर पहचान का कोई संकेत नहीं था।

बच्चा उठकर अर्जुन के पास आया।

“आपको सच में याद नहीं?”

“क्या?”

“जब हम दोनों पालने में थे, आपने मेरा हाथ पकड़ा था।”

अर्जुन ने अपने हाथों की तरफ देखा।

“मैं बच्चा था। मुझे कुछ याद नहीं।”

बच्चे ने बहुत गंभीर होकर कहा, “आपको याद है। लेकिन आपने याद को आईने के पीछे रख दिया।”

“मैंने ऐसा क्यों किया?”

“क्योंकि मैं मर रहा था।”

कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “अर्जुन, उससे दूर हटो।”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें भी याद है।”

“मुझे कुछ याद नहीं,” मीरा ने कहा।

“तुमने मेरी माँ को देखा था।”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“किसकी माँ?”

बच्चे ने जवाब नहीं दिया।

वह पालने की तरफ मुड़ा और खाली पालने के भीतर देखने लगा।

“वह कहती थी कि एक बच्चा बाहर जाएगा और एक भीतर रहेगा। लेकिन तीसरे को कहीं जगह नहीं मिलेगी।”

अर्जुन ने पूछा, “तीसरा कौन था?”

बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मैं।”

“लेकिन तुम तो यहाँ हो।”

“मैं यहाँ नहीं हूँ।”

बच्चे ने अपना हाथ उठाया।

उसकी हथेली के आर-पार पीछे की दीवार दिखाई दे रही थी।

मीरा ने चीख दबा ली।

बच्चा मुस्कराया।

“मैं केवल तब दिखाई देता हूँ, जब कोई मुझे याद करता है।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

बच्चा धीरे-धीरे उसके पास आया।

“मुझे जन्म दो।”

“मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ?”

“माँ को मेरा नाम बताकर।”

“कौन-सी माँ?”

बच्चे ने कमरे के उस कोने की तरफ देखा जहाँ पुराना टेलीफोन रखा था।

“जो अभी तक तुम्हें अपना बेटा कहने से डरती है।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“राधा?”

बच्चे की आँखों में अचानक चमक आ गई।

“तुम्हें उसका नाम याद है।”

“वह कहाँ है?”

बच्चे ने टेलीफोन की ओर इशारा किया।

“वह फोन उठाओ।”

मीरा ने तुरंत कहा, “नहीं। बिल्कुल नहीं।”

अर्जुन ने फोन की तरफ देखा।

पुराने टेलीफोन की तार दीवार में नहीं जा रही थी।

वह फर्श में बने एक छोटे छेद के भीतर उतर रही थी।

और उस छेद से किसी की धीमी साँसें सुनाई दे रही थीं।

अर्जुन फोन के पास गया।

उसने रिसीवर उठाया।

दूसरी तरफ कोई आवाज़ नहीं थी।

फिर एक स्त्री ने फुसफुसाकर कहा—

“अर्जुन?”

वह आवाज़ सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए।

“माँ?”

कुछ पल चुप्पी रही।

फिर वही आवाज़ बोली—

“नहीं, बेटा। मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”

अर्जुन ने रिसीवर कसकर पकड़ लिया।

“तो आप कौन हैं?”

दूसरी ओर से रोने की आवाज़ आई।

“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें जन्म दिया था।”

अर्जुन का शरीर सुन्न पड़ गया।

“राधा?”

स्त्री ने कोई उत्तर नहीं दिया।

इसके बजाय उसने पूछा—

“क्या तुम्हारे साथ मीरा है?”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“हाँ।”

फोन पर साँस लेने की आवाज़ तेज हो गई।

“उसे कमरे से बाहर भेज दो।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह तुम्हारी बहन नहीं है।”

अर्जुन की पकड़ ढीली पड़ गई।

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“क्या कहा उसने?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

फोन पर स्त्री फिर बोली—

“अर्जुन, सुनो। तुम्हारे पास बहुत कम समय है। वह बच्चा तुम्हें जो भी बताए, उस पर विश्वास मत करना। वह तुम्हारा भाई नहीं है।”

पालने के पास खड़ा बच्चा धीरे-धीरे सिर झुकाने लगा।

स्त्री ने कहा—

“और मीरा को यह मत बताना कि 2008 में वह अकेली तीसरी मंज़िल पर नहीं गई थी।”

मीरा की आँखें फैल गईं।

“यह झूठ है!” वह चीखी। “मैं अकेली गई थी!”

फोन पर स्त्री रोने लगी।

“नहीं, बेटी। तुम अकेली नहीं गई थीं।”

“तो मेरे साथ कौन था?”

कुछ क्षण बाद स्त्री ने कहा—

“अर्जुन।”

कमरे की सारी घड़ियाँ एक साथ बजने लगीं।

तीन बजकर तेरह मिनट।

अर्जुन ने फोन गिरा दिया।

उसने मीरा की तरफ देखा।

मीरा पीछे हट रही थी।

“नहीं… नहीं… यह सच नहीं है।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।

“मीरा, मेरी बात सुनो।”

“तुम वहाँ थे?”

“मुझे याद नहीं!”

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

“मुझे याद नहीं!”

“तुमने मुझे उस कमरे में अकेला छोड़ दिया था!”

मीरा की आवाज़ में अचानक ऐसा दर्द उभरा, जिसे अर्जुन ने पहले कभी नहीं सुना था।

“मैंने तुम्हें पुकारा था, अर्जुन। मैं बार-बार तुम्हें पुकारती रही। तुमने मेरी तरफ देखा भी था। फिर तुमने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

उसकी आँखों के सामने एक दृश्य उभरा।

वह लगभग तेरह साल का था।

तीसरी मंज़िल के गलियारे में खड़ा।

दरवाज़े के भीतर मीरा रो रही थी।

उसके पीछे एक और बच्चा खड़ा था।

उस बच्चे का चेहरा अर्जुन जैसा था।

उसने अर्जुन के कान में कहा था—

“अगर तुमने दरवाज़ा खोला, तो हम दोनों बाहर नहीं निकल पाएँगे।”

फिर अर्जुन ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।

अंदर से मीरा की आवाज़ आती रही।

“अर्जुन! दरवाज़ा खोलो!”

और वह भाग गया था।

वर्तमान में अर्जुन घुटनों के बल गिर पड़ा।

“मैंने ऐसा नहीं किया…”

मीरा की आँखों से आँसू बह रहे थे।

“शायद तुमने नहीं किया। शायद तुम्हारी परछाईं ने किया। लेकिन उस रात मैं अकेली थी, अर्जुन। मुझे यह याद है।”

बच्चे ने धीरे से कहा, “अब तुम्हें भी याद आ गया।”

अर्जुन ने सिर उठाया।

“तुमने मेरी यादें बदल दीं?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“मैंने नहीं। तुमने खुद बदल दीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम मुझे बचाना चाहते थे।”

अर्जुन की आँखें बच्चे पर टिक गईं।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने पहली बार मुस्कराना बंद किया।

“मैं वह हूँ, जिसे तुमने अपनी जगह मरने के लिए छोड़ दिया था।”
7. आखिरी तस्वीर
कमरे की दीवारों पर लगी सभी तस्वीरें अब नीचे गिरने लगी थीं।

काँच टूटने की आवाज़ें गूँज रही थीं। हर तस्वीर में मौजूद व्यक्ति अपने फ्रेम से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था।

मीरा ने अर्जुन को उठाया।

“हमें यहाँ से निकलना होगा!”

अर्जुन ने बच्चे की तरफ देखा।

“तुम हमारे साथ चलोगे?”

बच्चे ने अपना सिर झुका लिया।

“मैं कहीं जा नहीं सकता।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरा जन्म नहीं हुआ।”

“मैं तुम्हें बाहर निकालूँगा।”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।

वे अर्जुन जैसी थीं।

बिल्कुल वैसी ही।

“तुम मुझे बाहर निकाल सकते हो,” उसने कहा, “लेकिन तब तुम्हें मेरी जगह भीतर जाना होगा।”

मीरा ने अर्जुन का हाथ खींचा।

“उसकी बात मत सुनो!”

बच्चे ने कहा, “तुम्हें याद है न, अर्जुन? दो पालने थे। एक में तुम थे। दूसरे में मैं। फिर किसी ने एक बच्चे का नाम बदल दिया। किसी ने एक बच्चे की मौत लिख दी। और किसी ने तीसरे बच्चे के जन्म को रोक दिया।”

उसने खाली पालने की तरफ इशारा किया।

“अब मुझे जगह चाहिए।”

अर्जुन ने पूछा, “किस चीज़ की जगह?”

बच्चे ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“तुम्हारी जिंदगी में।”

अचानक कमरे के बीचोंबीच एक तेज आवाज़ हुई।

धड़ाम!

फर्श में दरार पड़ गई।

दरार के भीतर से काला पानी ऊपर उठने लगा। वह पानी नहीं था, क्योंकि उसमें कोई प्रतिबिंब नहीं बन रहा था।

वह धीरे-धीरे फैलकर तीन पालनों को घेरने लगा।

मीरा और अर्जुन दरवाज़े की तरफ भागे।

लेकिन दरवाज़ा गायब था।

उसकी जगह एक विशाल आईना लगा था।

आईने में कमरे का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था, मगर उसमें एक चीज़ अलग थी।

आईने वाला अर्जुन वहीं खड़ा था।

वास्तविक अर्जुन उसके सामने खड़ा नहीं था।

आईने वाला अर्जुन धीरे-धीरे मुस्कराया।

उसने अपने पीछे खड़े बूढ़े आदमी की तरफ देखा।

वह बूढ़ा वही था, जो तस्वीर में 2073 में दिखाई दिया था।

बूढ़े अर्जुन ने आईने के भीतर से हाथ उठाया।

उसकी हथेली पर तीन काली लकीरें थीं।

उसने काँच पर उँगली से लिखा—

“तुम्हें नीलकंठ का घर नहीं खोजना चाहिए था।”

अर्जुन ने आईने के करीब जाकर पूछा, “तुम कौन हो?”

बूढ़े ने उत्तर दिया—

“मैं वह हूँ, जो तुम्हारे बाद बचा रहेगा।”

“क्या तुम भविष्य के अर्जुन हो?”

“अगर तुम मुझे भविष्य कहोगे, तो मैं भविष्य बन जाऊँगा।”

“और अगर मैं तुम्हें झूठ कहूँ?”

बूढ़ा मुस्कराया।

“तो तुम्हें मेरी जगह जीना पड़ेगा।”

आईने के भीतर अचानक एक और चेहरा दिखाई दिया।

डॉ. नीलकंठ।

वह बूढ़े अर्जुन के पीछे खड़ा था। उसके हाथ में एक फाइल थी।

उसने फाइल खोली।

पहले पन्ने पर लिखा था—

जन्म रजिस्टर — 12 मार्च 1947।

दूसरे पन्ने पर—

मृत्यु रजिस्टर — 17 जुलाई 1995।

तीसरे पन्ने पर—

पुनर्जन्म रजिस्टर — 17 जुलाई 2013।

और चौथे पन्ने पर—

अंतिम अभिभावक — अर्जुन शर्मा।

अर्जुन ने काँपते स्वर में पूछा, “अंतिम अभिभावक का क्या मतलब है?”

नीलकंठ ने पहली बार सीधे उसकी तरफ देखा।

“इसका मतलब है कि तुम्हारे बाद उस बच्चे को कोई पिता नहीं मिलेगा।”

“किस बच्चे को?”

आईने में खड़ा बूढ़ा अर्जुन पीछे हट गया।

उसकी जगह वही छोटा बच्चा दिखाई दिया।

वह काँच के भीतर से अर्जुन को देख रहा था।

“मुझे।”

अर्जुन ने आईने पर हाथ रख दिया।

काँच बर्फ जैसा ठंडा था।

“मैं तुम्हें बाहर निकालूँगा।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“तुम पहले भी यही कह चुके हो।”

“मैं इस बार तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”

बच्चे ने अपना हाथ आईने पर रखा।

दोनों की हथेलियाँ एक-दूसरे के सामने थीं।

अर्जुन ने महसूस किया कि उसकी हथेली के नीचे काँच नहीं था।

वहाँ गर्म त्वचा थी।

उसने जोर लगाया।

आईने में एक छोटी दरार उभरी।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

मीरा चीखी, “अर्जुन, पीछे हटो!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

आईना टूट गया।

काँच के टुकड़े हवा में ठहर गए।

हर टुकड़े में अलग-अलग अर्जुन दिखाई दे रहा था।

एक बच्चा।

एक किशोर।

एक वयस्क।

एक बूढ़ा।

एक ऐसा अर्जुन जिसकी आँखें काली थीं।

एक ऐसा अर्जुन जिसके चेहरे पर कोई आँखें ही नहीं थीं।

और सबसे छोटे टुकड़े में एक नवजात शिशु दिखाई दिया।

उसके सीने पर कोई साँस नहीं चल रही थी।

फिर भी वह रो रहा था।

अर्जुन ने उसकी आवाज़ सुनी।

“पापा…”

सभी काँच के टुकड़े एक साथ फर्श पर गिर पड़े।

कमरे में अँधेरा छा गया।

कुछ क्षण बाद जब मीरा ने मोबाइल की टॉर्च जलाई, तो कमरा खाली था।

तीनों पालने गायब थे।

दीवारों की तस्वीरें गायब थीं।

पुराना टेलीफोन गायब था।

और उनके सामने कोई दरवाज़ा नहीं था।

केवल एक छोटी मेज बची थी।

उस पर एक तस्वीर रखी थी।

अर्जुन ने तस्वीर उठाई।

उसमें डॉ. नीलकंठ खड़े थे।

उनके बगल में विक्रम शर्मा था।

विक्रम के पीछे शारदा देवी थीं।

और उनके सामने एक युवा स्त्री खड़ी थी, जिसका चेहरा राधा जैसा था।

स्त्री ने अपनी गोद में एक नवजात बच्चा पकड़ रखा था।

तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

12 मार्च 1947।

लेकिन इस बार नीचे एक और पंक्ति थी।

“बच्चे को पिता ने नहीं, बेटे ने जन्म दिया।”

अर्जुन ने पंक्ति दोबारा पढ़ी।

फिर तीसरी बार।

मीरा ने पूछा, “क्या लिखा है?”

अर्जुन ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।

मीरा ने पढ़ा और उसका चेहरा बदल गया।

“यह कैसे हो सकता है?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

तस्वीर के नीचे एक और कागज़ रखा था।

उस पर नीलकंठ की लिखावट थी—

“अगर यह तस्वीर अर्जुन तक पहुँचे, तो उसे बता देना कि 1947 में जन्म लेने वाला बच्चा विक्रम नहीं था। विक्रम वह नाम था, जो उस बच्चे को दिया गया जिसने अपने पिता को जन्म दिया।”

मीरा ने काँपते हाथों से कागज़ नीचे रख दिया।

“इसका कोई मतलब नहीं बनता।”

अर्जुन ने कहा, “शायद हम गलत सवाल पूछ रहे हैं।”

“तो सही सवाल क्या है?”

अर्जुन ने तस्वीर को आखिरी बार देखा।

उसमें खड़ी राधा जैसी स्त्री के पीछे एक और आकृति थी।

वह बहुत धुँधली थी।

लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

अर्जुन ने तस्वीर को रोशनी के सामने किया।

आकृति का चेहरा दिखाई देने लगा।

वह डॉ. नीलकंठ नहीं था।

वह विक्रम भी नहीं था।

वह अर्जुन था।

वर्तमान का अर्जुन।

उसके चेहरे पर वही कपड़े थे जो उसने उस सुबह पहने थे।

तस्वीर में वह राधा के पीछे खड़ा था और उसके हाथ में एक छोटा-सा चाकू था।

चाकू की नोक बच्चे की ओर थी।

तस्वीर के नीचे किसी ने एक आखिरी वाक्य लिखा था—

“पहला बच्चा पैदा होने से पहले ही अपने बेटे को मार चुका था।”

अर्जुन के हाथ से तस्वीर गिर गई।

उसी क्षण कमरे के बाहर किसी ने दस्तक दी।

ठक।

ठक।

ठक।

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“हम यहाँ अकेले नहीं हैं।”

अर्जुन ने अँधेरे में दरवाज़ा खोजने की कोशिश की।

अब वहाँ एक दरवाज़ा था।

लकड़ी का।

पुराना।

उस पर पीतल की पट्टी लगी थी।

डॉ. नीलकंठ प्रसाद।

दरवाज़े के पीछे से एक आदमी की आवाज़ आई।

“डॉक्टर साहब, मरीज आ गया है।”

फिर दूसरी आवाज़ सुनाई दी।

“कौन-सा मरीज?”

पहली आवाज़ ने उत्तर दिया—

“वही बच्चा, जो अपनी मौत से अड़तालीस साल पहले पैदा हुआ था।”

दरवाज़ा खुलने लगा।

अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

भीतर से एक तेज सफेद रोशनी बाहर आई।

उस रोशनी में किसी ने अर्जुन को पुकारा।

“अर्णव।”

अर्जुन जम गया।

यह नाम उसने पहले भी सुना था।

लेकिन पहली बार किसी ने उसे ऐसे पुकारा था, जैसे वह नाम उसके भीतर की किसी बंद जगह से आया हो।

फिर आवाज़ बदली।

“अभय।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

और अंत में तीसरी आवाज़ आई।

“विक्रम।”

दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।

भीतर एक अस्पताल का कमरा था।

दीवार पर कैलेंडर टँगा था।

तारीख थी—

12 मार्च 1947।

बिस्तर पर एक आदमी लेटा था।

उसका चेहरा अर्जुन का था।

लेकिन उसके बाल सफेद थे और आँखें बंद थीं।

बिस्तर के पास डॉ. नीलकंठ खड़ा था।

उसने अर्जुन को देखकर कहा—

“तुम देर से आए।”

अर्जुन ने काँपते स्वर में पूछा, “यह कौन है?”

नीलकंठ ने बिस्तर पर लेटे आदमी की ओर देखा।

“तुम्हारे पिता।”

“मेरे पिता तो विक्रम शर्मा थे।”

नीलकंठ ने सिर हिलाया।

“विक्रम तुम्हारा पिता था।”

फिर उसने बिस्तर पर लेटे आदमी का चेहरा छुआ।

“लेकिन यह वह आदमी है, जिसने विक्रम को जन्म दिया।”
अर्जुन ने पूछा, “इसका नाम क्या है?”
नीलकंठ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“इसका नाम तुम हो।”
उसी पल बिस्तर पर लेटे अर्जुन ने आँखें खोल दीं।
उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी।
सिर्फ काला अँधेरा।
उसने मुस्कराकर कहा—
“बेटा, अब मेरी जगह तुम सो जाओ।”
और कमरे की सारी घड़ियाँ एक साथ 3:13 पर रुक गईं।
एपिसोड 23 समाप्त।

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
23 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
35 min
Words
6874
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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